अहोई अष्टमी

.         दिनांक 24.10.2024 दिन गुरुवार तदनुसार संवत् २०८१ कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आने वाला व्रत–
अहोई अष्टमी का पर्व दिवाली से पहले मनाया जाता है। इस त्योहार को अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन शुभ मुहूर्त में उपासना करने से संतान-सुख की प्राप्ति होती है। इस व्रत का पारण तारों को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है,इससे संतान को जीवन में सफलता प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि अहोई माता की पूजा अर्चना विधिपूर्वक न करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए इस दिन विधि-विधान से उपासना करनी चाहिए। अगर आप भी इस व्रत को कर रही हैं, तो इससे पहले इस लेख में दी गई अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में जान लें।

अहोई अष्टमी पौराणिक मान्यता एवं महत्व

हिन्दू धर्म में प्रत्येक त्यौहार एवं पर्व का अपना विशेष महत्व है। इसी क्रम में करवा चौथ व्रत के ठीक चार दिन बाद आने वाली अष्टमी तिथि को देवी अहोई माता का व्रत किया जाता है। चूँकि कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में यह व्रत रखा जाता है इसलिए इसे अहोई अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।

अहोई अष्टमी के दिन माताएँ अपने पुत्रों की दीर्घायु एवं सुख समृद्धि के लिए भोर से लेकर शाम तक उपवास करती हैं। शाम के दौरान आकाश में तारों को देखने के बाद व्रत खोला जाता है। कुछ महिलाएँ चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद व्रत का पारण करती हैं, लेकिन इसका अनुसरण करना अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि अहोई अष्टमी के दिन रात में चन्द्रोदय बहुत देर से होता है।

अहोई अष्टमी का दिन अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह व्रत अष्टमी तिथि, जो कि माह का आठवाँ दिन होता है, के दौरान किया जाता है। करवा चौथ के समान अहोई अष्टमी का दिन भी कठोर उपवास का दिन होता है और बहुत सी महिलाएँ पूरे दिन जल भी ग्रहण नहीं करती।

| क्यों मनाई जाती है अहोई अष्टमी

माना जाता है की अहोई अष्टमी का उपवास करने वाली माताओं की सभी संतानों को माता अहोई सफल जीवन, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र का आशीर्वाद देती हैं। इस व्रत की महिमा इतनी अपार है, कि माना जाता है, इसके प्रभाव से निसंतानों को भी संतान रत्न की प्राप्ति होती है। इस दिन अहोई माता के साथ तारों और चन्द्रमा की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन माता पार्वती और शिव जी की पूजा करने से विशेष फल मिलता है और व्रत करने वाली माताओं की संतानों को समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

अहोई अष्टमी का खास महत्व

1. माना जाता है कि इस व्रत को करने वाली माताओं की संतानों को दीर्घ, स्वस्थ एवं मंगलमय जीवन का आशीर्वाद मिलता है।

2. यह व्रत संतानहीन दंपतियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, संतान प्राप्ति के लिए भी स्त्रियां माता अहोई की पूजा करती हैं।

3. जो महिलाएं गर्भधारण में असमर्थ रहती हैं, अथवा जिन महिलाओं का गर्भपात हो गया हो, उन्हें भी पुत्र प्राप्ति के लिए अहोई माता का व्रत करना चाहिए।

4. इस दिन को कृष्णा-अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। मथुरा के राधाकुंड में इस दिन स्नान करने का विशेष महत्व है।

5. अहोई अष्टमी के दिन विधिपूर्वक व्रत करने से माता अहोई की विशेष कृपा प्राप्त होती है और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख समृद्धि आती है।

#अहोई_अष्टमी_तिथि:
पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 24 अक्टूबर को रात 01 बजकर 18 मिनट पर होगा। वहीं, इसका समापन अगले दिन यानी 25 अक्टूबर को रात 01 बजकर 58 मिनट पर होगा। ऐसे में अहोई अष्टमी का पर्व 24 अक्टूबर को बेहद उत्साह के साथ मनाया जाएगा।

#अहोई_अष्टमी_2024_शुभ_मुहूर्त:
इस दिन पूजा करने का शुभ मुहूर्त शाम को 05 बजकर 42 मिनट से लेकर 06 बजकर 59 मिनट तक है। इस दौरान महिलाएं अहोई माता और भगवान गणेश की उपासना कर सकती हैं।

#अहोई_अष्टमी_की_पूजा_विधि:
अहोई अष्टमी के दिन आपको पूजा करने के लिए विधि का सही-सही पालन करना होता है. आइए, जान लेते हैं अहोई अष्टमी की पूजा विधि.
- महिलाएं सुबह उठकर स्नान करें, साफ वस्त्रों को धारण करें और व्रत का संकल्प लें.
- दीवार पर कुमकुम से देवी अहोई का चित्र बनाएं.
- अहोई अष्टमी पर शाम को पूजा में में 8 पूड़ी, 8 पुआ और हलवा रखें.
- पूजा में व्रत कथा सुनें, फिर देवी से संतान की लंबी आयु प्रार्थना करें.
- अहोई अष्टमी पर सेई की पूजा करें, सात सिक्के अर्पित करें.
- अहोई अष्टमी पर तारों को देख कर व्रत का पारण करें.

#अहोई_अष्टमी_का_महत्व:
अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं. बता दें कि हिंदू धर्म में मां पार्वती को अहोई का ही स्वरूप माना जाता है. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर महिलाएं अपनी संतान की तरक्की और खुशहाल जीवन के लिए व्रत रखती हैं.                             “अहोई अष्टमी”

           अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। माताएं अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं, और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय अहोई माता का पूजन किया जाता है। तारों को करवा से अर्ध्य भी दिया जाता है। 
           यह अहोई गेरू आदि के द्वारा दीवार पर बनाई जाती है, अथवा किसी मोटे वस्त्र पर अहोई काढ़कर पूजा के समय उसे दीवार पर टांग दिया जाता है। 
          अहोई अष्टमी का व्रत महिलायें अपनी सन्तान की रक्षा और दीर्घ आयु के लिए रखती हैं। इस दिन धोबी मारन लीला का भी मंचन होता है, जिसमें श्री कृष्ण द्वारा कंस के भेजे धोबी का वध प्रदर्शन किया जाता है।

                                 अहोई माता

           अहोई माता के चित्रांकन में ज़्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास सेह तथा उसके बच्चों की आकृतियाँ बना दी जाती हैं। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अहोई माता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। 
           सम्पन्न घर की महिलाएँ चांदी की अहोई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोई माता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात् एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है।

पूजन सामग्री

जल से भरा हुआ कलश, पुष्प, धुप-दीप, रोली, दूध-भात, मोती की माला या चांदी के मोती, गेंहू, और दक्षिणा (बायना), घर में बने 8 पुड़ी और 8 मालपुए।

                                पूजन विधि

01. अहोई अष्टमी व्रत के दिन प्रात: उठकर स्नान करें और पूजा पाठ करके अपनी सन्तान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन हेतु कामना करते हुए, मैं अहोई माता का व्रत कर रही हूँ, ऐसा संकल्प करें।
02. अहोई माता मेरी संतान को दीर्घायु, स्वस्थ एवं सुखी रखे। माता पार्वती की पूजा करें।
03. अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएँ और साथ ही सेह और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएँ।
04. संध्या काल में इन चित्रों की पूजा करें।
05. अहोई पूजा में एक अन्य विधान यह भी है कि चांदी की अहोई बनाई जाती है जिसे सेह या स्याहु कहते हैं। इस सेह की पूजा रोली, अक्षत, दूध व भात से की जाती है। पूजा चाहे आप जिस विधि से करें लेकिन दोनों में ही पूजा के लिए एक कलश में जल भर कर रख लें।
06. पूजा के बाद अहोई माता की कथा सुने और सुनाएं।
07. पूजा के पश्चात् सासू-मां के पैर छूएं और उनका आर्शीवाद प्राप्त करें।
08. तारों की पूजा करें और जल चढ़ायें तथा इसके पश्चात् व्रती अन्न जल ग्रहण करें।
सबसे पहले प्रातः काल नित्यकर्मों से निवृत होकर स्नान करें।
★ अब पूजा स्थल को साफ करके यहां धुप-दीप जलाएं,
माता दुर्गा और अहोई माता का का स्मरण कर पूजा का संकल्प लें। और दिन भर निर्जला व्रत का पालन करें।
★ अब सूर्यास्त के बाद तारे निकलने पर पूजन आरम्भ करें।
★ पूजा स्थल को साफ करके यहां चौकी की स्थापना करें। (चौकी की स्थापना हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा या ईशान कोण में की जाती है।)
★ चौकी को गंगाजल से पवित्र करें। इस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
★ अब इस पर माता अहोई की प्रतिमा स्थापित करें।
★ गेंहू के दानों से चौकी के मध्य में एक ढेर बनाएं, इस पर पानी से भरा एक तांबे का कलश रखें।
★ चौकी पर माता अहोई के चरणों में मोती की माला या चांदी के मोती रखें।
• अब आचमन विधि करके, चौकी पर धुप-दीप जलाएं और अहोई माता जी को पुष्प चढ़ाएं।
• अहोई माता को रोली, अक्षत, दूध और भात अर्पित करें।
• बायना (दक्षिणा), के साथ आठ पुड़ी, आठ मालपुए एक कटोरी में लेकर चौकी पर रखें।
• अब हाथ में गेहूं के सात दाने और फूलों की पखुड़ियां लेकर कथा पढ़ें। यह कथा आप श्रीमंदिर के माध्यम से भी सुन सकते हैं।
• कथा पूर्ण होने पर, हाथ में लिए गेहूं के दाने और पुष्प माता के चरणों में अर्पण कर दें
• इसके बाद मोती की माला को गले में पहन लें। अगर आपने चांदी के मोती पूजा में रखें हैं तो इन्हें एक साफ डोरी या कलावा में पिरोकर गले में पहनें।
• इसके पश्चात् माता दुर्गा की आरती करें।
• अब तारों और चन्द्रमा को अर्घ्य देकर इनकी पंचोपचार (हल्दी, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और भोग) के द्वारा पूजा करें।
• इसके बाद जल ग्रहण करके अपने व्रत का पारण करें और पूजा में रखी गई दक्षिणा अर्थात बायना अपनी सास या घर की बुजुर्ग महिला को दें। इसके बाद भोजन ग्रहण करें।
• अब गले में पहनी हुई माला को दीपावली के बाद किसी शुभ दिन पर गले से निकालकर माता दुर्गा को गुड़ और जल का भोग लगाकर प्रणाम करें।
• यदि आप चांदी के मोती को धारण कर रहे हैं, तो अविवाहित पुत्र के लिए एक चांदी का मोती और विवाहित पुत्र के लिए दो चांदी के मोती धारण करें।
• इस माला या मोती को निकाल कर आप अगले वर्ष की अहोई अष्टमी की पूजा में भी उपयोग कर सकते हैं।

अहोई अष्टमी पूजा विधि

अहोई अष्टमी अहोई माता को समर्पित है। करवा चौथ के चार दिन बाद मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत, महिलाऐं अपनी संतान की लम्बी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करती हैं। अहोई अष्टमी के दिन महिलाऐं पूरे दिन निर्जला व्रत करती हैं, और संध्या समय तारे उदय होने के बाद पूजा करके तारों का दर्शन करती हैं। इसके बाद ही महिलाएं अपने व्रत का पारण करती हैं।

                       “अहोई अष्टमी व्रत कथाएँ”

       (अहोई अष्टमी व्रत की दो लोक कथाएँ प्रचलित हैं)

                                  प्रथम कथा

           प्राचीन काल में किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात लड़के थे। दीपावली से पहले साहूकार की स्त्री घर की लीपा-पोती हेतु मिट्टी लेने खदान में गई और कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। 
          दैव योग से उसी जगह एक सेह की मांद थी। सहसा उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग गई जिससे सेह का बच्चा तत्काल मर गया। अपने हाथ से हुई हत्या को लेकर साहूकार की पत्नी को बहुत दु:ख हुआ परन्तु अब क्या हो सकता था ? वह शोकाकुल पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई। 
          कुछ दिनों बाद उसके बेटे का निधन हो गया। फिर अकस्मात दूसरा, तीसरा और इस प्रकार वर्ष भर में उसके सभी बेटे मर गए। महिला अत्यन्त व्यथित रहने लगी। 
          एक दिन उसने अपने आस-पड़ोस की महिलाओं को विलाप करते हुए बताया कि उसने जान-बूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो और लाईक करें तथा हमारा व्हाट्सएप चैनल ज्वॉइन करें। चैनल का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। हाँ, एक बार खदान में मिट्टी खोदते हुए अंजाने में उससे एक सेह के बच्चे की हत्या अवश्य हुई है और तत्पश्चात् मेरे सातों बेटों की मृत्यु हो गई। 
          यह सुनकर पास-पड़ोस की वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा देते हुए कहा कि यह बात बताकर तुमने जो पश्चाताप किया है उससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। तुम उसी अष्टमी को भगवती माता की शरण लेकर सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी अराधना करो और क्षमा-याचना करो। ईश्वर की कृपा से तुम्हारा पाप धुल जाएगा। 
          साहूकार की पत्नी ने वृद्ध महिलाओं की बात मानकर कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उपवास व पूजा-याचना की। वह हर वर्ष नियमित रूप से ऐसा करने लगी। बाद में उसे सात पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। तभी से अहोई व्रत की परम्परा प्रचलित हो गई।


(अहोई अष्टमी व्रत कथा प्राचीनकाल में किसी नगर में एक साहूकार रहता था, उसके सात लड़के थे। दीपावली से पहले साहूकार की पत्नी, घर की लीपा-पोती करने के लिए मिट्टी लेने खदान में गई और कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। उसी जगह एक सेह की मांद भी थी। भूल से उस स्त्री के हाथ से कुदाली, सेह के बच्चे को लग गई, जिससे वह सेह का बच्चा उसी क्षण मर गया। यह सब देखकर साहूकार की पत्नी को बहुत दुःख हुआ, परन्तु अब वह करती भी क्या, तो वह स्त्री पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई।

इस प्रकार कुछ दिन बीतने के बाद, उस स्त्री की पहली संतान की मृत्यु हो गई। दुर्भाग्यपूर्ण फिर दूसरी और तीसरी संतान भी देवलोक सिधार गईं। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, एक वर्ष में उस स्त्री की सातों संतानों की मृत्यु हो गई।

इस प्रकार एक-एक करके अपनी संतानों की मृत्यु को देखकर साहूकार की पत्नी अत्यंत दुखी रहने लगी। अपनी सभी संतानों को खोने का दुख उसके लिए असहनीय था।

एक दिन उसने अपने पड़ोस की स्त्रियों को अपनी व्यथा बताते हुए, रो-रोकर कहा कि, "मैंने जान-बूझकर कोई पाप नहीं किया, एक बार मैं मिट्टी खोदने को खदान में गई थी। मिट्टी खोदने में सहसा मेरी कुदाली से एक सेह का बच्चा मर गया था, तभी से एक वर्ष के भीतर मेरी सातों संतानों की मृत्यु हो गई।"

यह सुनकर उन स्त्रियों ने धैर्य देते हुए कहा कि तुमने जो यह बात हम सबको सुनाकर पश्चाताप किया है इससे तेरा आधा पाप तो नष्ट हो गया। अब तुम माँ पार्वती की शरण में जाओ और अष्टमी के दिन सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी पूजा करो और क्षमा याचना करो। ईश्वर की कृपा से तुम्हारा समस्त पाप धुल जाएगा और तुम्हें पहले की तरह ही पुत्रों की प्राप्ति हो जाएगी। उन सबकी बात मानकर उस स्त्री ने कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत किया तथा हर साल व्रत व पूजन करती रही। फिर उसे ईश्वर की कृपा से सात पुत्र प्राप्त हुए। तभी से इस व्रत की परम्परा चली आ रही है।)

                               द्वितीय कथा

          प्राचीन काल में दतिया नगर में चन्द्रभान नाम का एक आदमी रहता था। उसकी बहुत सी सन्तानें थीं, परन्तु उसकी सन्तानें अल्प आयु में ही अकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगती थीं। अपने बच्चों की अकाल मृत्यु से पति-पत्नी दु:खी रहने लगे थे। कालान्तर तक कोई सन्तान न होने के कारण वह पति-पत्नी अपनी धन दौलत का त्याग करके वन की ओर चले जाते हैं और बद्रिकाश्रम के समीप बने जल के कुण्ड के पास पहुँचते हैं तथा वहीं अपने प्राणों का त्याग करने के लिए अन्न-जल का त्याग करके उपवास पर बैठ जाते हैं। 
          इस तरह छह दिन बीत जाते हैं तब सातवें दिन एक आकाशवाणी होती है–‘हे साहूकार! तुम्हें यह दु:ख तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप से मिल रहे हैं। अतः इन पापों से मुक्ति के लिए तुम्हें अहोई अष्टमी के दिन व्रत का पालन करके अहोई माता की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, जिससे प्रसन्न हो अहोई माता तुम्हें पुत्र प्राप्ति के साथ-साथ उसकी दीर्घ आयु का वरदान देंगी।’
          इस प्रकार दोनों पति-पत्नी अहोई अष्टमी के दिन व्रत करते हैं और अपने पापों की क्षमा माँगते हैं। अहोई माँ प्रसन्न होकर उन्हें सन्तान की दीर्घायु का वरदान देती हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो और लाईक करें तथा हमारा व्हाट्सएप चैनल ज्वॉइन करें। चैनल का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। आज के समय में भी संस्कारशील माताओं द्वारा जब अपनी सन्तान की इष्टकामना के लिए अहोई माता का व्रत रखा जाता है और सायंकाल अहोई माता की पूजा की जाती है तो निश्चित रूप से इसका शुभफल उनको मिलता ही है और सन्तान चाहे पुत्र हो या पुत्री, उसको भी निष्कण्टक जीवन का सुख मिलता है।

                    अहोई अष्टमी उद्यापन विधि

          जिस स्त्री का पुत्र न हो अथवा उसके पुत्र का विवाह हुआ हो, उसे उद्यापन अवश्य करना चाहिए। इसके लिए एक थाल में सात जगह चार-चार पूरियाँ एवं हलवा रखना चाहिए। इसके साथ ही पीत वर्ण की पोशाक-साडी, ब्लाउज एवं रुपये आदि रखकर श्रद्धा पूर्वक अपनी सास को उपहार स्वरूप देना चाहिए। उसकी सास को चाहिए कि वस्त्रादि को अपने पास रखकर शेष सामग्री हलवा-पूरी आदि को अपने पास-पड़ोस में वितरित कर दे। यदि कोई कन्या हो तो उसके यहाँ भेज दे।

अहोई अष्टमी सावधानियां

हिंदू धर्म में कई व्रत और त्यौहार मनाए जाते हैं, जिनके अपने अलग-अलग महत्व है। कुछ व्रत महिलाएं अपने पति की दीर्घायु की कामना के लिए रखती हैं, तो कुछ संतान के उज्जवल भविष्य और अच्छे स्वास्थ्य के लिए। इन्हीं व्रत में से एक है अहोई अष्टमी का व्रत। जो हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर दिवाली से लगभग आठ दिन पहले और करवा चौथ के चौथे दिन रखा जाता है।

इस दिन महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु के साथ-साथ संतान प्राप्ति के लिए भी व्रत रखती हैं। महिलाएं इस दिन अहोई माता की पूजा करती हैं। साथ ही इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। मान्यता है कि अहोई माता के पूजन से संतान के जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं, और उसे निरोगी काया मिलती है। मान्यताओं के अनुसार अहोई अष्टमी व्रत के कुछ नियम बताए गए हैं, जिन्हें ध्यान में रखना अति आवश्यक है।

अहोई अष्टमी के दिन क्या ना करें

• अहोई अष्टमी पर व्रती महिलाओं को किसी भी धारदार चीजों जैसे चाकू, कैंची आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। ना ही इस दिन कपड़े आदि सिलने और काटने का कोई कार्य करना चाहिए।

इस दिन माताओं को भूलकर भी मिट्टी से संबंधित कोई कार्य नहीं करना

चाहिए। इस दिन मिट्टी के स्थान पर खुरपी आदि का प्रयोग न करें।

• इस दिन घर में किसी भी प्रकार से क्लेश न करें, और अपनी संतान को किसी तरह के अपशब्द बोलने से बचें।

यदि आपने अहोई अष्टमी का व्रत रखा है तो आपको दिन के समय सोना नहीं चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

• अहोई अष्टमी के दिन तारों को अर्घ्य देते समय तांबे के कलश से अर्घ्य नहीं देना चाहिए। इस दिन अर्घ्य देने के लिए पीतल के कलश का प्रयोग किया जा सकता है।

• अहोई अष्टमी पर पूरी तरह से सात्विक भोजन बनाना चाहिए। इस दिन घर में तामसिक चीजों का प्रवेश निषेध रखें।

इस दिन काले वस्त्र धारण न करें। दिनभर सकारात्मक विचार मन में रखें और किसी के प्रति बुरी भावना न रखें।

| अहोई अष्टमी व्रत में क्या खाएं

• अहोई अष्टमी व्रत के दिन यूं तो निर्जल और निराहार व्रत रखने का विधान होता है। लेकिन अगर आप किसी कारण से इस दिन निर्जल व्रत नहीं रख पा रहे हैं तो आप फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।

इस दिन कंदमूल जैसे मूली, गाजर और आलू खाए जा सकते हैं।

शाम को भोजन पका हुआ करना चाहिए, जैसे पुड़ी-सब्जी और मालपुए।

आप कुट्टू और सिघाड़े के आटे का उपयोग कर सकते हैं। साथ ही साबूदाने की खीर भी इस दिन आप खा सकते हैं।


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                           “जय अहोई माता”
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