करवा चौथ व्रत-कथा की कहानी, करवाचौथ व्रत एवं पूजन विधि के साथ।।
करवा चौथ व्रत-कथा की कहानी, करवाचौथ व्रत एवं पूजन विधि के साथ।।
करवा चौथ का महत्व
करना बौथ व्रत का हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्व है। करवा बौध का त्यौहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी में मनाया जाता है।
करवा चौथ में दो शब्द है। पहला शब्द करवा है, जिसका अर्थ होता है कि मिट्टी से बनरा बर्तना जबकि चौथ से आशव चतुर्थी तिथि से है।
मानता है कि करत्रा का प्रयोग जीवन में सुख-समृद्धि को दर्शाता है। इस दिन विवाहित स्थिर्मा अपने पति के लिये विधि विधान के साथ लम्बी उम्र एवं सुखी जीवन की कामना हेतु निर्जला व्रत रखती है। करवा बौध पति-पत्नी के बीथ एक प्रेम और विश्वास से परिपूर्ण अटूट बंधन को दर्शाता है।
करवा चौथ व्रत के नियम
1. सुचार सूर्योदय से पहले स्नान आदि करके पूजा घर की सफाई करें। और भगवान की पूजा करके निर्जला व्रत का संकल्प लें।
2. यह व्रत उनको संध्या में सूरज अस्त होने के बाद चन्द्रमा के दर्शन करके ही खोलना चाहिए और बीच में जल भी नहीं पीना चाहिए।
3. संध्या के समय चंद्रोदय से घंटा पहले एक बेदी पर शिव-पार्वती स्वामीकार्तिक गणेश एवं चंद्रमा (मूर्ति के अभाव में सुपारी) की स्थापना करें एवं माँ पार्वती का सुहाग सामंधी आदि से बुंगार करें। तथा कथा सुनें। इसमें 10 से 13 करने (करवा चौथ के लिए खास मिट्टी के कलश) रखें।
पूजन-सामाग्री में धूप, दीप, चन्दन, रोली, सिन्दूर आदि बाली में रखो दीपक में पर्यात्र मात्रा में भी रहना बाहिए, जिससे वह पूरे समय तक जलता रहे।
5. पूजन के समय देक-प्रतिमा का मुख पश्चिम की तरफ होना चाहिए तथा श्री को पूर्व की तरफ मुख करके बैठना चाहिए।
6. चन्द्रमा निकलने से लगभग एक घंटे पहले पूजा शुरू की जानी चाहिए। अच्छा हो कि परिवार की सभी महिलाएँ साथ पूजा करें।
7. चन्द्र दर्शन छलनी के द्वारा किया जाना चाहिए और साथ ही दर्शन के समय अर्थ के साथ चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए। अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से जल एवं मिष्ठान खा कर व्रत खोलो
8. चन्द्र-दर्शन के बाद बहू अपनी सास को बाली में सजाकर मिहान, फल, मेवे, रुपये आति देकर उनका आशीर्वाद ले और सास उसे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद के
करवा चौथ पर्व की पूजन सामग्री
कुकुम, शहद, अगरवती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, मुद्ध पी, दही, मेहवी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंपा, बिंदी, चुनी, यूडी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व राजकन, दीपका, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का भूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, चलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे।
करवा चौथ महात्म्य
छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से साले पाप नह हो जाते हैं। इससे जीवन में किसी भी प्रकार का कट नहीं होता है। साथ ही साथ इससे लंबी और पूर्ण आयु की प्रामि होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव पार्वती, कार्तिकेय, गणोश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद बंद्रमा को आध्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करने में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा साथ के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव सूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए।
महाभारत से संबंधित कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर बले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती है। यह करते हैं कि यदि का कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।
सरगी का महत्व
पंजाब में करवा चौथ में सरगों का काफी महत्व है। सरगों सास की तरफ से अपनी बहू को दी जाती है। इसका सेवन महिलाएं करवामी के दिन सूर्य निकलने से पहले तारों की छांव में करती हैं। सरगी के रूप में सास अपनी बहू को विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं बस इत्यादि देती हैं। सरगी, सौभाग्य और समृद्धि का रूप होती है। सरगी के रूप में खाने की वस्तुओं को जैसे फल, मीतई आदि को वती महिलाएं इत बाले दिन सूर्योदय से पूर्व प्रातः काल में तारों की छांव में ग्रहण करती है। तापक्षात जत आरंभ होता है। अपने जत को पूर्ण करती हैं।
भारत के अन्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश राजस्थान मध्य प्रदेश आदि में गौर माता की पूजा की जाती है। गौर माता की पूजा के लिए प्रतिमा गाय के गोबर से बनाई जाती है।
मेहंदी को भाग्य का प्रतीक माना जाता है। भारत में ऐसी मान्यता है कि यदि किसी लड़की के हाथों में मेहंदी का रंग गहराई से बढ़ता है तो उसका पति अथवा प्रेमी उसे उतना ही प्रेम करता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि हाथों में मेंहदी का गाढ़ा रंग पति की दीर्घायु और उसके स्वस्थ्य जीवन को दर्शाता है।
चंद्रमा को अध्यं देने की परंपरा
करवा चौथ की रात में जब चंद्रमा उदय होता है तो उसी व्रत रखने वाली शादीशुदा महिलाएँ पूजा की सजी हुई बाली के साथ छत पर आ जाती हैं। इस दौरान वे चंद्रमा की पूजा करती हैं। वे चंद्र देव को अध्र्जा देती हैं। करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा का बड़ा महत्व है। इस दिन चंद्रमा के दर्शन और पूजन के बाद महिलाएं व्रत तोड़कर अन्न-जल ग्रहण करती है।
इस पूजन के दौरान पहले महिलाएँ छलनी से चंद्रमा के दर्शन करती हैं और फिर अपने पति को देखती हैं। इसके बाद पति के हाथों जल या मिठाई लेकर व्रत खोलती हैं। इस दिन चंद्रमा के साथ-साथ भगवान शिव एवं माँ पार्वती और भगवान कार्तिकेय की पूजा होती है। ऐसा कहा जाता है कि इनकी पूजा करने से दांपत्य जीवन खुशहाल बना रहता है और जीवनभर सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
।। पूजा प्रारम्भ ।।
पवित्रकरणम्......
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सः वाह्यानंतरः शुचिः ॥
आचम्य (मुंह को स्पर्श करें पीयें न)
ॐ केशवाय नमः, ॐ माधवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः ॐ हृषीकेशाय नमः।
जासन शुद्धि
ॐ पृथ्वी त्वया धूता लोका देवि त्वं विष्णुना धुता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥
तिलक / चन्दन
चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्।
आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठ सर्वदा ।।
ॐ आदित्या वसो रुद्रा विश्वेदेवा मरुङ्गणाः।
तिलकन्ने प्रचच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये ।।
रक्षासूत्र बन्धनम्
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् प्रतिवद्धनामि रक्षे माचल माचलः ॥
ॐ बनेन दीक्षामाप्नोति, दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति, अद्धया सत्यमाप्यते।
भद्रसूक्त / स्वस्ति-पाचन...
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदव्यासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो बधा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुधो रक्षितारो दिवे-दिवे ॥१॥
देवानां भद्रा सुमतिक्रेजूयतां देवाना में रातिरभिनो निवर्तताम् । देवाना गुं सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्रत्तिरन्तु जीवसे ॥२॥
तान् पूर्वयां निविदा हूमहे वयं भग मित्रमदिति दक्षमस्रिधम्। अर्यमणं वरुणं गं सोममविना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ॥३॥
तन्नो वानो मयो भुवातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिना द्यौः। तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्चिना शृणुतं चिष्णया युवम् ॥४॥
तमीशानं जगतस्तस्थुषस्यत्ति धियंजिन्यमवसे हमहे वयम्।
पूषा नो यथा वेदसामसद् बुधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥५॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो चहस्पतिर्दधातु ॥६॥
पृषदचा मरुतः पुत्रिमातरः शुभयात्रानो विदथेष जग्मयः। अग्निजिह्वा मनचः सूरचक्षसो विद्धे नो देवा अवसा गमन्निह ॥७॥
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा गुं सस्तनूभिव्र्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥८॥
शतमिन्नु शरदो अन्ति देखा यत्रा नक्षका जरसे तनुनाम। पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ।॥9॥
अदितिर्धारदितिरन्तरिक्षमदितिमर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम ॥१०॥
द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष में शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विवेदेषाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व में शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥११॥
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ॥१२॥
सुमुखी एकदेतच कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरच विकटो विघ्ननाशो विनायकः ।।
मुम्रकेतुर गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्थ न जायते ।।
शुक्लाम्बरधरम देवं शशि वर्णं चतुर्भुजम। प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्व विघ्नोपशान्तये ।।
अभीप्सितार्थ सिद्व्यर्थ पूजितो यः सुरासुरैः। सर्वविध्नहरस्तस्यै गणाधिपतये नमः ।।
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तु ते ।।
सर्वदा सर्व कार्येषु नास्ति तेषाममंगलम। येषां हृदयस्थो भगवान मंगलायतनी हरीः ॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव तारावलं चंद्रवलं तदेव। विद्यावलं देवबलम तदेव लक्ष्मीपते तेन्त्री युगं स्मरामि ।।
चक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ।।
ॐ श्रीमन महागणाचीपतये नमः, इष्ट देवताभ्यो नमः, कुल देवताभ्यो नमः, ग्राम देवताभ्यो नमः, स्थान देवताभ्यो नमः, वास्तु देवताभ्यो नमः, वाणी हिरण्यगर्भाभ्याम नमः, लक्ष्मी नारायणाभ्याम नमः, उमा महेश्वराभ्याम नमः, शची पुरंदाराभ्याम नमः, मातृ पितु चरण कमलेभ्यो नमः, सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः, सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः, एतत कर्म प्रधान देवताभ्यो नमः।
संकल्प
ॐॐॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, ॐ श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्धे श्री क्षेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे भारतवर्षे जम्वद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तकदेशे अमुकक्षेत्रे, अमुकदेशे, अमुकनाम्नि नगरे, (ग्रामे वा) बौद्धावतारे अमुक शालीवाहन शके, अस्मिन्वर्तमाने, अमुक नाम संवत्सरे, दक्षिणायने, मासानां मासोत्तमे मासे कार्तिक मासे, कृष्ण पक्षे, करक चतुर्थी तिथी, अमक वासरे, अमुक गोत्रोत्पन्नोऽहं (गोत्र का नाम लें) अमुकनामाः (अपना नाम लें) मम श्रुति-स्मृति-प्राणोक्तफल प्राप्तवर्थ सुख-सौभाग्य दीर्घ आयु-आरोग्य पुत्र-पौत्र-धन-धान्यादि समृद्ध्यर्थे शिवपरिवार पूजनसहितं करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।
रक्षा विधानम्...
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः। ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ।। अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशम् । सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्म समारभे ।।
सूर्यनमस्कार.....
आकृणोन रजसा वर्तमानो निवेश्शयन्नमृतम्मर्त्यञ्च । हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।।
शंख पूजनम्
ॐ पांचजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि। तन्नो शंखः प्रचोदयात् ।।
घंटी पूजनम्......
आगमार्थ तु देवानां गमनार्थ तु रक्षसाम्। घण्टा नाद प्रकुर्वीत पश्चात् घण्टां प्रपूजचेत ।।
कलश ध्यान...
ॐ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश गुं समान आयुः प्रमोषीः।
गणेश आवाहन.....
गणानां त्वा गणपति गं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति गं हवामहे।
निधीनां त्वा निधिपतिं गुं हवामहे वसों मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ।।
शिव आवाहन.....
ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिर्भ चारुचन्द्रावतंसं । रत्नाकल्पोज्वलांग परषुमुगावरा भीतिहस्तं प्रसन्नम् ॥
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतमभरगण व्र्व्याघ्रकृति वसानं।
विश्वारां विश्ववन्यं निखिलभवहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
ॐ नमः सम्भवावच मयो भवायच नमः शङ्कराच मयस्कराचच नमः शीवायच शिवतराय च ॥
माता गौरी ध्यान
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ।।
कार्तिके आवाहन
देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव। कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते ॥
चंद्रमा आवाहन
ॐ इमं देवा असपत्नं गुं सुवध्वं। महते क्षत्राय महते ज्वैष्ठयाय महते जानराज्या पेन्दस्ये न्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एस वोऽभी राज सोमोऽस्माकं ब्राह्माणाना में राजा ।
प्राणप्रतिष्ठा
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ गुं समिमं दधातु । विश्वे देवास सऽड़ह मादयन्तामोम्प्रतिष्ठ।।
आह्वान
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्ला सभूमि गुं सर्वतरुपुत्वा त्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥
आसन
पाहा पुरुषऽएवेदं गुं सर्व व्यद्भुतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।।
अर्थ
एतावानस्य महिमातो ज्यायांच पूरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।
त्रिपावृर्थ्य उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहा भवत्पुनः। ततो विष्वङ्ग व्यक्का मत्त्या शनानशनेऽअभि
आचमन स्नान
ततो विराडजायत विराजोऽअधि पूरुषः। स जातोऽअत्यरिच्यत पश्चाद्धमिमथो पुरः ॥
पंचामृत स्नान
तस्माद्यज्ञात्सर्वहतः सम्भूतं पृषदाज्यम्। पशुस्न्तॉचक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याच ये ।।
ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमपि यान्ति सस्रोतसः। सरस्वती तु पंचधा सो देशे भवत्सरित।
गन्धोदक स्नान..
ॐ गन्य-द्वारां दुराधर्षा, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्। ईधरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।।
शुद्धोदक स्नान....
ॐ शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्तऽ आचिनः। घेतः चेताक्षी रुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णायामाऽ अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः।
वस्त्र
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे। मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृहातां ।।
उपवस्त्र
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शम्म वरूधमासदत्रवः। वासोग्ने विश्वरूप गुं संव्ययस्य विभावसो ॥
यज्ञोपवित
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेर्यत्सहज पुरस्तात् ।
आयुष्यमायं प्रतिमुञ्च शुभ्रे, यज्ञोपवीतं यलमस्तु तेजः ॥
गंध / चंदन
ॐ गन्ध-द्वारा दुराधषों, नित्य-पुष्ठां करीषिणीम्। ईखरी सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।।
ॐ त्वां गन्धयाँ अखर्वस्त्वां मिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यत्याद् मुच्यत् ॥
अक्षत
अक्षताच सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता सुशोभिताः। मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ अक्क्षन्नमीमदन्त ह्यवप्रियाऽअधुषता
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा न्नविष्ठ्या मती योजान् विन्द्रतेहरी।।
ॐ त्रयम्यकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम। उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ।।
ॐ अगुं शुनाते अगुं शुः पृष्यतां परुषा परुः। गन्धस्ते सोम मवतु मदाय रसोऽअच्च्युतः ॥
पुष्प पुष्पमाला
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्याचीनि वै प्रभो। मयाहृतानि पुष्याणि पूज्यार्थ प्रतिगृह्यतां ।।
ॐ काण्डात काण्डात प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो टूर्व प्रतनु सहखेण शतेन च ।।
ॐ नमो विल्मिने च कवचिने व नमो व्वर्मिणे च वरूथिने च
नमः श्रुताय च अतसेनाय च नमो दन्दभ्यश्व चाहनन्यायच।
सौभाग्य इत्य......
दीप
ॐ अहिरीष भोगेः पर्येति वाहन्ज्यावा हेतिम्परित्राधमानः ।
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हस्तप्नो विश्वावयुनानिविद्वान पुमान पुया गंगवहे समपरिपातुविश्वतः।
धूरसि धूर्व धुर्वन्तं धर्व तं पोऽस्मान् धुर्वति तं धूर्व वं व्वयं धूर्वामः।
देवानामसि बद्धित सरिनतमं पति जुष्टतमं देवतमom
ॐ साज्यं च वर्ति संयुक्तम वाहिन्ना योजितम मया। दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्य तिमिरापहम ॥
नेवा
ॐॐॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्ष में शीच्यों छीः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां२ अकल्पयन्।।
अखण्ड ऋतफल....
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ॐ याफलिनीयाँऽफला अपुण्या याच पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्य गूं ह सः।।
ताम्बूल / यूगीफल.....
इदं फलं मया देवि स्थापितम पुरतस्तव। तेन में सफला वाप्तिर भवेत जन्मनि जन्मनि ॥
ॐ पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लो दलैर्युतम्। एलादिवर्ण संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ।।
ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञयतन्वत। वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ।।
22:31
करवा_चौथ_व्रत_एवं...
९
ॐ हिरण्यगर्भमा भूतस्य जातः पतिरेक आसीत 3000~
स दाधार पृथिवीं चामुतेमां कहरमै देवाय हविषा विधेम् ।।
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दक्षिणा
नीराजन
ॐ आ रात्रि पार्थिव गं रजः पितरप्राथि धामभिः।
-17.10.2019
दिवः सदा पूं सि बृहती वितिष्ठस आल्वेषं वर्तते तमः ।।
ॐॐॐ इद गं हविः प्रजननम्मे अस्तु दशवीर गुं सर्वगण गुं स्वस्तये। आत्मसनि प्रजासनि पशुमति लोकसन्य भयसनिः। अग्नि प्रजा बहुलां में करोत्वनं न्यतो रेतोऽस्मासु धता
करवा चौथ प्रथम कथा
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्री का नाम करवा था। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। वे उसे इतना प्यार करते थे कि उसके खिलाए बिना भोजन नहीं करते थे। वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे।
समय बीता और उसका विवाह हो गया और वह ससुराल चली गई। एक बार उनकी बहन ससुराल में मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार व्यवसाय बंद कर घर आए तो उन्होंने देखा कि उनकी बहन बहुत व्याकुल है। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया "भाई! आज मेरा करवा चौथ का निर्जल व्रत है। अभी चाँद नहीं निकला है, उसके निकलने पर चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्य देकर ही भोजन करूँगी।"
चूंकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल लग रही थी। सबसे छोटे भाई से अपनी बहन की हालत देखी नहीं गई और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर छलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर यह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चांद उदित हो रहा हो।
उसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है।
यह देखकर उसने अपनी भाभियों से कहा कि आओ, तुम भी चन्द्रमा को अर्घ्य दे दें। परन्तु भाभियों इस बात को जानती थीं। उसने कहा- "बाईजी! अभी चाँद नहीं निकला, आपके भाईयों ने आपके साथ धोखा करते हुए दीपक का प्रकाश छलनी से दिखा रहे हैं।"
भाभियों की बात सुनकर भी उसने कुछ ध्यान नहीं दिया व भाईयों द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार व्रत भंग करने से गणेशजी उस पर अप्रसन्न हो गए।
उसे अर्ध्य देकर खाना खाने बैठ जाती है। इस प्रकार व्रत भंग करने से गणेशजी उस पर अप्रसन्न हो गए। वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक जा जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। यह डर जाती है।
उसकी भाभियों ने उसे सच्चाई से अवगत कराया , बाईं जी हमने तो पहले ही कह दिया था कि यह आपके भाईयों ने तुम्हारे साथ धोखा किया है। अब उसे मालूम हुआ कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ । करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है। इस प्रकार जब उसे अपने किए हुए दोषों का पता लगा तो उसने पश्चाताप किया। गणेशजी की प्रार्थना करते हुए अगली बार विधि-विधान से पुनः चतुर्थी का व्रत करने निश्चय करती है।
सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। आसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को यह एकत्रित करती जाती है।
एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियां भी करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से आग्रह करती है।
'यम मुई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो।' लेकिन हर भाभी उससे अगली भाभी से आग्रह करने का कह कर चली जाती है।
इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूंकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह कर वह चली जाती है।
अब सबसे अंत में छोटी भाभी उससे आशीर्वाद लेने आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनाने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख कर करवा उसे जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है।
छोटी भाभी गणेश जी की भक्त थीं कि यह सब गणेश जी के कोप के कारण हुआ है। भाभी उससे खुद को छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी का दिल पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत निकाल कर करवा के पति के मुँह में वह अमृत डाल देती है।
करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से और छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश, हे माँ गौरी ! जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन होने का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।
इस प्रकार जो कोई छल-कपट को त्याग कर श्रद्धा-भक्ति से चतुर्थी का व्रत करेंगे, वे सब प्रकार से सुखी होते हुए क्लेशों से मुक्त हो जायेंगे।
करवा चौथ का उजमन
उजमन करने के लिए एक थाली में तेरह जगह चार-चार पूड़ी और थोड़ा-सा सीरा रख लें, उसके ऊपर एक साड़ी-ब्लाऊजा और रूपये जितना चाहें रख लें। उस थाली के चारों ओर रोली, चावल से हाथ फेर कर अपनी सासूजी के पांव लग कर उन्हें दे देवें। उसके बाद तेरह ब्राह्मणों को भोजन करावें और दक्षिणा देकर तथा बिन्दी लगा कर उन्हें विदा करें।
करवाचीत्र द्वितीय कथा
इस कथा का सार यह है कि शाकप्रस्थपुर बेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार जसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उनहोंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा दिया और बौरवती को भोजन करा दिया।
परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अदृश्य हो गयाः अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।
करवा चौथ तृतीय कथा
एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुंची और यमराज से कहने लगी हे भगवन ! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को मेरे पति के पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।
यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को शाप देकर नष्ट कर देगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिज्ञता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता ! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे ही सबके पतियों की रक्षा करना।
करवाचौथ चौधी कथा
एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थी उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का पत्र एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था।
पूजन कर चंद्रमा को अर्ध्य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चांदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम भाव की बढाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती है।
तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा पर आने वाले संकट से पहले ही कर सकती है। जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।
एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।
भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय विखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने से से बहन को आवाज दी देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहाण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया।
भोजन ग्रहाण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब का दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थी। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।
अब तू वर्ष भर की चौध का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं।
चंद्रदेव अर्ध्य मंत्र
चंद्रदेव को अध्यं देते समय इस मंत्र का जप करें। इस मंत्र के जप करने से घर में सुख व शांति आती है।
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते। गृहाणाध्ये मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक।
करवा चौथ आरती...
ॐ जय करवा मैया, माता जप करवा भैया।
जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नड्या
ॐ जय करवा मैया।
सब जग की हो माता, तुम हो रद्राणी।
यश तुम्हारा गावत, जग के सब प्राणी......
ॐ जय करवा मैया।
कार्तिक कृष्णा चतुर्थी, जो नारी व्रत करती।
ॐ जय करवा मैया ।
दीर्घायु पप्ति होवे, दुख सारे हरती ......
ॐॐॐ जय करवा मैया।
होए सुहागिन नारी, सुख संपत्ति पाये।
गणपति जी बड़े तयालु, विघ्न सभी नाप्ने......
ॐ जय करवा मैया।
करवा मैया की आरती, व्रत कर जो गावे।
व्रत हो जाता पूरन, सब विधि सुख पावे......
पुष्पांजलि......
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।। ॐ राधाधिराजाय प्रसद्ध साहिने। नमो वयं वैश्रणाय कुर्महे। समे कामान् कामकामाय महाम्। कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु । कुवेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः। ॐ स्वास्ति साम्राज्यं भोज्यं स्वराज्यं वैराज्यं पारमेहवं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्तपर्यायी स्वात् सार्वभौमः। सार्वायुष आन्तावा परार्भात। पृथिव्यै समुद्रपर्यान्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगितो मरुतः परिवेष्टारो मरुतस्यावसन्नगृहे। आविक्षितस्य कामप्रेविश्वेदेवाः सभासद इतिः।
ॐ विच तक्षक्क्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो शाहु रुत विद्यतस्थात। सम्वाहुभ्यां धमति सम्पतौर्याचा भूमी जनयंदेव एकः। नानासुगन्धि पुष्याणि यथाकालोद्भवानि च। पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥
प्रदक्षिणा
समर्पण ॐॐ वानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणं पदे पदे ।।
ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सुकाहस्ता निषङ्गिणः। तेषा गुं सहस्रयोजनेऽ वधन्वा नितन्मसि ।।
अनेन कृतेन पूजनेन शिव-पार्वती प्रीयताम्, न मम। शिवार्पणमस्तु ।
करवा चौथ व्रत-कथा की कहानी
अतीत प्राचीन काल की बात है। एक बार पाण्डु पुत्र अर्जुन तप करने के लिए नीलगिरि पर्वत पर चले गए थे। इधर पांडवो पर अनेक मुसीबते पहले से ही थी। इसे द्रौपदी ने शोक विहवल, हो श्री कृष्ण की आराधना की।
श्री कृष्ण उपस्थित हुए और उन्होंने द्रौपदी से पूछा, "कहो ! क्या कष्ट है तुम्हे ?
द्रौपदी ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु ! मुझे क्या कष्ट है ? आप तो स्वयं जानते है। आप तो अन्तर्यामी है। मुझे कष्टों के बोझ ने विह्वल कर दिया है। क्या कोई ऐसा उपाए है जिससे इन कष्टों से छुटकारा मिल सके।"
"तुम्हारा प्रश्न अति उत्तम है, द्रौपदी !" कृष्ण मुस्कराकर बोले।
" प्रभु ! फिर मुझ दुःखी नारी का कष्ट दूर करने का उपाय बताइये।" द्रौपदी ने पूछा।
इस पर श्री कृष्णा बोल, "यही प्रश्न एक बार पार्वती जी ने शिवजी से किया था। तब श्री शिवजी ने कष्ट दूर करने का उपाय के रूप में करवा चौथ व्रत का विधान बताया था।"
इस पर द्रौपदी बोली, "फिर प्रभु ! करवा चौथ की जानकारी मुझे भी दीजिए.... और उसकी कथा कहिए।"
तब कृष्ण ने एक पल सोचने के बाद कहा था। दुःख-सुख को तो सांसारिक माना जाता है, प्राणी उनमें सदा ही लिप्त रहता है। मैं तुम्हें अति उत्तम करवा चौथ व्रत की कथा सुनाता हूं, इसे ध्यान से सुनो
प्राचीन काल में एक गुणी, धर्मपरायण व विद्वान ब्राह्मण रहता था। उसके चार पुत्र तथा एक गुणवती सुशील पुत्री थी। भाई अपनी बहन को बहुत प्यार करते थे। पुत्री ने विवाहित होकर पहला करवा चतुर्थी का व्रत किया।
किन्तु चन्द्रोदय से पूर्व ही उसे क्षुधा ने बहुत बाध्य कर दिया। भाईयों से उसकी यह दशा देखी नहीं गई। इससे उसके स्नेही दयालु भाइयों ने छल से पीपल की आड़ में कृत्रिम चन्द्रमा बनाकर दिखा दिया।
लड़की ने अर्घ्य दे भोजन कर लिया। भोजन करते ही उसके पति की हृदयगति बन्द हो गयी। इससे दुःखी हो, उसने अन्न-जल त्याग दिया। उसी रात्रि में इन्द्राणी भूविचरण करने आयी। ब्राह्मण पुत्री ने उससे अपने दुःख का कारण पूछा। इन्द्राणी वर्ष की तरह इस वर्ष भी करवा चौथ का व्रत आया।
अन्य बहुओं के मायकों से उनके भाई, करवा लेकर आए। पर छोटी के मायके में यदि कोई होता तो करवा भी लाता। सास भी छोटी को ही खरी-खोटी सुना रही थी। वह दुःखी हो घर से निकल पड़ी और जंगल में जाकर रोने लगी।
एक नाग बहुत देर से उसका रोना सुनता रहा। अन्त में वह अपने बिल से निकल आया तथा छोटी से पूछने लगा-बेटी क्या बात है। तुम रो क्यों रही हो? छोटी बोली आज करवा चौथ है मेरा कोई भाई नहीं है। यदि मेरा कोई भाई होता तो आज जरूर करवा लेकर आता।
नाग को छोटी पर दया आई। नाग ने कहा-बेटी तुम घर चलो मैं अभी करवा लेकर आता हूं। थोड़ी देर बाद नाग ससुराल पहुंचा। ससुराल वाले इतना सामान देखकर चकित हो गए। सास भी प्रसन्न हो गई। सास ने प्रसन्न मन से छोटी को नाग देवता के साथ भेज दिया।
नाग देवता ने छोटी को अपना सारा महल दिखाया और कहा-जितने दिन चाहो आराम, से रहो। मन चाहा खाओ मन चाहा पहनो। पर एक बात याद रखना। सामने रखी नांद कभी मत खोलना। छोटी सारा समय महल में आराम से काटती पर नांद के बारे में उसकी उत्सुकता बढ़ती जाती। एक दिन जब घर में कोई न था उसने नांद उठाकर देखा तो हजारों छोटे-छोटे सांप के बच्चे इधर-उधर रेंगने लगे। उसने जल्दी ही नांद ढक दी। जल्दी में एक सांप की पूंछ नांद के नीचे आकर कट गई।
शाम को नाग के आने पर छोटी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। नाग ने भी उसे क्षमा कर दिया। जब छोटी ने ससुराल जाने की इच्छा की तो उसे धन-रत्न आदि देकर विदा किया। छोटी के ससुराल में जब उसकी बड़ी इज्जत होने लगी।
जिस सांप की पूंछ कटी थी। उसे सभी बण्डा कहकर तंग करते। एक दिन उसने अपनी मां से पूछा कि मेरी पूंछ कैसे कटी है। मां ने कहा कि छोटी के नांद उठाने और जल्दी से रखने में ही तुम्हारी पूंछ कटी है तो वह बोला कि मैं छोटी से बदला लूंगा। मां के बहुत समझाने पर भी वह एक दिन चुपचाप छोटी के घर जा छुपा और मौका पाकर उसे काटने की सोचने लगा।
वहां छोटी और उसकी सास में किसी बात पर बहस हो रही थी तो छोटी कसम खा-खाकर कह रही थी कि मैंने ऐसा नहीं किया। वह कह रही थी कि मुझे बण्डा भैया से प्यारा कोई नहीं है उन्हीं की कसम खाकर कहती हूं कि मैंने ऐसा नहीं किया।
बण्डा ने जब सुना तो सोचने लगा-जो मुझसे इतना प्यार करती है मैं उसे ही काटने आया हूं। वह चुपचाप घर चला गया। मां ने पूछा-ले आये बहन से बदला, वह कहने लगा मां बहन से कैसा बदला। तभी से बण्डा भाई व छोटी बहन हुए भाई प्रति वर्ष चौथ के दिन करवा लेकर जाता व बहन बड़े प्यार से करवा चौथ का व्रत करती।
करवा की कथा
करवा चौथ व्रत-कथा की चौथी कहानी प्राचीन काल में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी किनारे एक गांव में रहती थी। कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी (चौथ) के दिन उसका पति नदी में स्नान करने के लिये गया। स्नान करते समय एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह करवा करवा नाम लेकर जोर-जोर से अपनी पत्नी को पुकारने लगा। आवाज सुनकर उसकी पत्नी दौड़कर आई और उसने मगर को कच्चे धागे से बांध दिया।
मगर को बांधकर वह यमराज के यहां पहुंची और यमराज से बोली- भगवान ! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। अतः पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से उस मगर को नरक में ले जाओ। यमराज ने कहा- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा ने कहा- यदि आप ऐसा नहीं करोगे, तो मैं आपको श्राप देकर नष्ट कर दूंगी।
यह सुनकर यमराज डर गये और उस पतिव्रता स्त्री करवा के साथ जाकर मगर को उन्होंने यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु प्रदान की।
उसी दिन से यह करवा चौथ मनाई जाती है, और सुहागन स्त्रियों के द्वारा व्रत रखा जाता है।
हे करवा माता ! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सब के पतियों की रक्षा करना।
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