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Showing posts from May, 2024

वैशाखमास–माहात्म्य || अध्याय–01 || वैशाख मास की श्रेष्ठता; उसमें जल, व्यजन, छत्र, पादुका और अन्न आदि दानों की महिमा

.                      वैशाखमास–माहात्म्य || अध्याय–01 || वैशाख मास की श्रेष्ठता; उसमें जल, व्यजन, छत्र, पादुका और अन्न आदि दानों की महिमा                नारायणं  नमस्कृत्य  नरं चैव  नरोत्तमम्।                देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥           'भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके भगवान् की विजय-कथा से परिपूर्ण इतिहास-पुराण आदि का पाठ करना चाहिये।           सूतजी कहते हैं–“राजा अम्बरीष ने परमेष्ठी ब्रह्मा के पुत्र देवर्षि नारद से पुण्यमय वैशाख मास का माहात्म्य इस प्रकार पूछा–‘ब्रह्मन्! मैंने आपसे सभी महीनों का माहात्म्य सुना। उस समय आपने यह कहा था कि सब महीनों में वैशाख मास श्रेष्ठ है। इसलिये यह बताने की कृपा करें कि वैशाख-मास क्यों भगवान् विष्णु को प्रिय है और उस समय कौन-कौन-से धर्म भगवान् विष्णु के लिये प्रीतिकारक हैं ?’ ‘श्रीजी की चर...

वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 02 || वैशाख मास में विविध वस्तुओं के दान का महत्त्व तथा वैशाख स्नान के नियम

.                      वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 02 || वैशाख मास में विविध वस्तुओं के दान का महत्त्व तथा वैशाख स्नान के नियम           नारदजी कहते हैं–‘वैशाख मास में धूप से तपे और थके-माँदे ब्राह्मणों को श्रमनाशक सुखद पलंग देकर मनुष्य कभी जन्म-मृत्यु आदि के क्लेशों से कष्ट नहीं पाता। जो वैशाख मास में पहनने के लिये कपड़े और विछावन देता है, वह उसी जन्म में सब भोगों से सम्पन्न हो जाता है और समस्त पापों से रहित हो ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है।           जो तिनके की बनी  या अन्य खजूर आदि के पत्तों की बनी हुई चटाई दान करता है, उसकी उस चटाई पर साक्षात् भगवान् विष्णु शयन करते हैं। चटाई देने वाला बैठने और बिछाने आदि में सब ओर से सुखी रहता है।            जो सोने के लिये चटाई और कम्बल देता है, वह उतने ही मात्र से मुक्त हो जाता है। निद्रा से दुःख का नाश होता है, निद्रा से थकावट दूर होती है और वह निद्रा चटाई पर सोने वाले को सुखपूर्वक आ जाती...

वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 03 || वैशाख मास में छत्रदान से हेमकान्त का उद्धार

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वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 04 || महर्षि वसिष्ठ के उपदेश से राजा कीर्तिमान् का अपने राज्य में वैशाख मास के धर्म का पालन कराना और यमराज का ब्रह्माजी से राजा के लिये शिकायत करना

.                      वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 04 || महर्षि वसिष्ठ के उपदेश से राजा कीर्तिमान् का अपने राज्य में वैशाख मास के धर्म का पालन कराना और यमराज का ब्रह्माजी से राजा के लिये शिकायत करना           मिथिलापति ने पूछा–‘ब्रह्मन् ! जब वैशाख मास के धर्म अतिशय सुलभ, पुण्यराशि प्रदान करने वाले, भगवान् विष्णु के लिये प्रीतिकारक, चारों पुरुषार्थों की तत्काल सिद्धि करने वाले, सनातन और वेदोक्त हैं तब संसार में उनकी प्रसिद्धि कैसे नहीं हुई ?’           श्रुतदेवजी ने कहा–‘राजन्! इस पृथ्वी पर लौकिक कामना रखने वाले ही मनुष्य अधिक हैं। उनमें से कुछ राजस और कुछ तामस हैं। वे लोग इस संसार के भोगों तथा पुत्र- पौत्रादि सम्पदाओं की ही अभिलाषा रखते हैं। कहीं किसी प्रकार कभी बड़ी कठिनाई से कोई एक मनुष्य ऐसा मिलता है, जो स्वर्गलोक के लिये प्रयत्न करता है और इसीलिये वह यज्ञ आदि पुण्यकर्मों का अनुष्ठान बड़े प्रयत्न से करता है; परन्तु मोक्ष की उपासना प्राय: कोई नहीं करता।       ...

वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 05 || ब्रह्माजी का यमराज को समझाना और भगवान् विष्णु का उन्हें वैशाख मास में भाग दिलाना

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वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 06 || भगवत् कथा के श्रवण और कीर्तन का महत्त्व तथा वैशाख मास के धर्मों के अनुष्ठान से राजा पुरुयशा का संकट से उद्धार

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वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय–07 || ‘राजा पुरुयशा को भगवान् का दर्शन, उनके द्वारा भगवत्स्तुति और भगवान् के वरदान से राजा की सायुज्य मुक्ति

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वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 08 || शंख-व्याध-संवाद, व्याध के पूर्वजन्म का वृत्तान्त

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एकादशी व्रत महत्व

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वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय–09 || भगवान् विष्णु के स्वरूप का विवेचन, प्राण की श्रेष्ठता, जीवों के विभिन्न स्वभावों और कर्मों का कारण तथा भागवत धर्म

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वैशाख कृष्ण पक्ष की:- “वरूथिनी एकादशी”

वैशाख कृष्ण पक्ष की:-  “वरूथिनी एकादशी”             वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकदशी के नाम से जानते हैं। यह पुण्यदायिनी, सौभाग्य प्रदायिनी एकादशी है। यह व्रत सुख-सौभाग्य का प्रतीक है। यह व्रत करने से सभी प्रकार के पाप व ताप दूर होते हैं, अनन्त शक्ति मिलती है और स्वर्गादि उत्तम लोक प्राप्त होते हैं। सुपात्र ब्राह्मण को दान देने, करोड़ों वर्ष तक ध्यान मग्न तपस्या करने तथा कन्यादान के फल से बढ़कर ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत है। हिन्दू वर्ष की तीसरी एकादशी यानी वैशाख कृष्ण एकादशी को ‘वरुथिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। ‘वरुथिनी’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘वरुथिन्’ से बना है, जिसका मतलब है–प्रतिरक्षक, कवच या रक्षा करने वाला। वैशाख कृष्ण एकादशी का व्रत भक्तों की हर संकट से रक्षा करता है, इसलिए इसे वरुथिनी एकदशी कहा जाता हैं। पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण इस व्रत से मिलने वाले पुण्य के बारे में युधिष्ठिर को बताते हैं–‘पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त भी इस व्रत के पुण्य का हिसाब-किताब रख पाने में सक्षम...

वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय–10 || वैशाख मास के माहात्म्य-श्रवण से सर्प क उद्धार और एक वैशाख धर्म के पालन तथा रामनाम-जप से व्याध का वाल्मीकि होना

.                      वैशाखमास-माहात्म्य                              अध्याय–10 वैशाख मास के माहात्म्य-श्रवण से सर्प क उद्धार और एक वैशाख धर्म के पालन तथा रामनाम-जप से व्याध का वाल्मीकि होना           देव कहते हैं–‘तदनन्तर व्याध सहित शंख मुनि ने विस्मित होकर पूछा–‘तुम कौन हो ? और तुम्हें यह दशा कैसे प्राप्त हुई थी ?’           सर्प ने कहा–‘पूर्वजन्म में मैं प्रयाग का ब्राह्मण था। मेरे पिता का नाम कुशीद मुनि और मेरा नाम रोचन था मैं धनाढ्य, अनेक पुत्रों का पिता और सदैव अभिमान से दूषित था। बैठे-बैठे बहुत बकवाद किया करता था। बैठना, सोना, नींद लेना मैथुन करना, जुआ खेलना, लोगों की बातें करना और सूद लेना यही मेरे व्यापार थे।            मैं लोकनिन्दा से डरकर नाम मात्र के शुभ कर्म करता था; सो भी दम्भ के साथ उन कर्मों में मेरी श्रद्धा नहीं थी। इस प्रकार मुझ दुष्ट और दुर्बुद्धि के कितने ही ...