प्रश्न- एकादशी व्रत का क्या महत्व है ? क्या व्रत अनिवार्य है या कृष्ण के नाम से ही काम चल जाएगा ?

प्रश्न- एकादशी व्रत का क्या महत्व है ? क्या व्रत अनिवार्य है या कृष्ण के नाम से ही काम चल जाएगा ? 
व्रत न रखें तो उस दिन वर्जित अन्न खाने का पाप लगेगा ?
भक्ति में शरीर की सफाई का क्या महत्व है ?
यानी बिना नहाए धोए भक्ति करने की स्थिति में हैं हम लोग?

उत्तर- आदरणीय श्री श्वेताभ भैया जी के द्वारा- 

व्रत किसी दिन या तिथी का नही होता सदाचार संयम सात्विकता भजन-कीर्तन नित्य होना चाहिए l
वो तो हमारे लिए संतो ने एक रास्ता बताया है कि कुछ भी न कर पाए तो कम से कम कुछ निश्चित तिथी दिन ही कर लो यह यथार्थ है l

★ भक्ति मन का विषय वस्तु है शरीर का नहीं । 
भक्ति का शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है । 
लेकिन शुरू शुरू में वैधी भक्ति का ही महत्व है । शरीर की सफाई , स्वच्छता , नियम , संयम ,शरीर को अनुशासन में ढालना इत्यादि सब करना पड़ेगा ।

अभी हम इतने बड़े साधक नहीं हो गए हैं कि वैधी भक्ति को छोड़कर सीधे परा में प्रवेश कर जाएंगे । 

Nursery class के बच्चे को जैसे अनुशासन में बैठने के लिए विद्यालय में विभिन्न तरीकों का सहारा लिया जाता है कि इतने बजे school पहुँचो ,इतने बजे lunch , tie belt से लेकर proper dress में , line में खड़े हो , ऐसे करो वैसे करो इत्यादि सब नियम में ढालने के लिए बनाया जाता है । 

पहले ही college में दाखिला नहीं मिल जाता । 
इसलिए शरीर की शुद्धि बहुत आवश्यक है । 
शरीर की शुद्धिकरण से सात्विक विचार आते हैं और साधना मार्ग में सहायता मिलती है । 
इसलिये यह आवश्यक है । 
अनुशासन और शारीरिक स्वच्छता ही आगे बढ़ाएगी । 
सब अपने अपने समय के अनुसार पालन करना होता है ।

पहले गुरु बताएगा कि कोई भी बाहर का अन्न नहीं खाना । किसी का छुवा नहीं खाना । 
लेकिन फिर जब एक अवस्था पार हो जाएगी तो वही गुरु बोलेगा कि जाओ मधुकरी करो । 
ब्राह्मण से लेकर शूद्र क्या चांडाल के भी घर से भोजन ग्रहण करो । 
पहले नहीं कहेगा अन्यथा पतन हो जाएगा ।

पहले कहेगा सभी व्रत उपवास नियम इत्यादि करो , ऐसे बैठो , यह खाओ यह न खाओ इत्यादि । 

फिर अवस्था जब आएगी तब आपको नीचे बैठाएगा , कीचड़ में लिटा देगा , कहेगा कि मल का भी सेवन कर लो । 

यह साधने के लिए कि हम सब कुछ समान रूप से देख रहे हैं । मन मे अहंकार तो नहीं , यह देहाभिमान तो नहीं । 
सबमें सम दृष्टि है या नहीं । 
लेकिन वह अवस्था आने पर । 

शुरुवात में नहीं । शुरुवात में विधि निषेध का पालन करवाएगा ही करवाएगा । अन्यथा पतन हो जाएगा ।।

लेकिन भक्ति की बात करें तो वह केवल और केवल मन से सम्बंधित होता है ।

व्रत उपवास इत्यादि सब मन को ही प्रमुक्ज बनाकर बनाये गए हैं । शरीर और इन्द्रिय तो मात्र सहायक हैं इसके ।

अन्न का निषेध इसलिए किया गया ताकि शरीर शुद्धिकरण हो सके ।
फल इत्यादि सात्विक पदार्थ में आते हैं ।
अन्न इत्यादि राजसिक में ।
तामसिक में मद्यपान या नशीली या मांसाहार इत्यादि ।

भोजन का मन पर बहुत प्रभाव पड़ता है । अन्न से ही मन बनता है । अर्थात उसकी स्थिति बनती है । 
इसलिए अन्न को वेदों में अन्नम ब्रह्म की उपाधि दी गयी है । 
बस यही कारण है कि व्रत इत्यादि में शरीर में को विचलित न करे , इसलिये अन्न का निषेध किया गया है ।

हालांकि कई कारण हैं परंतु अभी इतना समझ लीजिए । 

★ एकादशी के विषय में मैंने पहले भी बताया था कि एकादश इन्द्रियों पर नियंत्रण और नियमन के लिए इस व्रत का अनुसंधान किया जाता है ।

अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने के लिए ताकि 1 दिन के लिए हम कुछ जोड़ सके ।

अपनी एकादश इंद्रियों अर्थात पांच कर्मेन्द्रियाँ, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और एक मन पर नियंत्रण, कुल मिलाकर
एकादश या 11 तत्वों को नियंत्रित और संयमित करने हेतु ही इसका प्रावधान संतों महापुरुषों ने किया है ।

लेकिन आज विपुल भोगों के लिए एकादशी की जा रही
है !!
अरे भोगों से मन को मोड़ने के लिए ही यह बनाया गया व्रत
उपवास लेकिन कलियुग में सब उल्टा l

- Sh Shwetabh Pathak Bhaiya Ji
श्री श्वेताभ पाठक भैया जी
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