क्या एकादशी के व्रत का उद्यापन जरूरी है?
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एकादशी 'नित्य व्रत' है इसलिए नित्य-कर्म की तरह सभी वैष्णवों को इस व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चन्द्रमा की एकादश (ग्यारह) कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है। चन्द्रमा का प्रभाव शरीर और मन पर होता है, इसलिए इस तिथि में शरीर की अस्वस्थता और मन की चंचलता बढ़ जाती है।
सभी धर्मों में व्रत-उपवास करने का महत्व बहुत होता है और हर व्रत के आने नियम कायदे भी होते हैं. खास कर हिंदू धर्म के अनुसार एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से ही कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना चाहिए. ऐसा करने से उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और व्रत का पूरा फल मिलता है.
ये हैं एकादशी व्रत के महत्वपूर्ण नियम...
- दशमी के दिन मांस, लहसुन, प्याज, मसूर की दाल आदि निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए.
- रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.
- एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उंगली से कंठ साफ कर लें. वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है इसलिए स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें.
- यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें. फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें.
- फिर प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि 'आज मैं चोर, पाखंडी़ और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूंगा और न ही किसी का दिल दुखाऊंगा. रात्रि को जागरण कर कीर्तन करूंगा.'
- तत्पश्चात 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादश मंत्र का जाप करें. राम, कृष्ण, नारायण आदि विष्णु के सहस्रनाम को कंठ का भूषण बनाएं.
- भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करें और कहे कि- हे त्रिलोकीनाथ! मेरी लाज आपके हाथ है इसलिए मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करना।
- इस पावन दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
- स्नान करने के बाद साफ- स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हो सके तो पीले वस्त्र धारण करें ।
- इसके बाद घर के मंदिर की साफ- सफाई करने के बाद गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें ।
- पीले फूल व पीले अक्षत जरूर अर्पित करें ।
- एकादशी के महात्मय में हर एक एकादशी का महात्मय बताया गया है उसका पाठ करें । उसी में एकादशी की व्रत विधि भी है ।
- एकादशी के दिन निराहार रहें और कोई परेशानी है तो एक समय फलाहार कर सकते हैं ।
- एकादशी के दिन घर में चावल नही बनाया जाता है ।
- इस दिन आपके घर कोई ब्राम्हण आ जाएं तो उनकी अच्छे से आवभगत कीजिए ।
- विष्णु भगवान की आरती करें ।
- पीले रंग वाली मिठाई का भोग लगाएं ।
गोपाल जी राठी राधे राधे जी
आपने बहुत ही अच्छा सवाल उठाया है और मैं एक वैष्णव ब्राह्मण होने के नाते शायद आपको जवाब से पुर्णतया संतुष्ट कर पाऊ
हम एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठ कर (रोजाना भी जल्दी ही उठते हैं) नित्य क्रिया से निवृत्त होकर तथा स्नान आदि करके भगवान की जो नित्य पुजा करते है वो करके फिर एकादशी के व्रत का संकल्प लेकर जिस महीने की जो एकादशी है उसका पठन करते है
फिर एकादशी को लगभग तो निर्जल (पुरा दिन बगैर पानी व खाद्यान्न के रहना) व्रत ही करते हैं फिर अगर कोई दिन इधर उधर जाने का काम पड़े या मौसम में गर्मी ज्यादा हो तो एक ग्लास पानी पी सकते है, फिर भी काम न चले तो एक ग्लास गाय का दूध व एक सेव या केला ले सकते है वो भी सूर्यास्त के बाद
इससे ज्यादा का सेवन नहीं करना चाहिए ना ही बार बार पानी पीना चाहिए क्यों कि उपवास में ज्यादा पानी पीने से शरीर में कमजोरी आती है तथा चाय कोफी पान जर्दे का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन सब से व्रत भंग होता है
दिन में ज्यादा अनर्गल वार्तालाप न करके ज्यादा से ज्यादा हरि नाम का उच्चारण करने का प्रयास करना चाहिए
जो लोग व्रत का नाम लेकर अन्य तरह के पकवान (सामक, राजगीर का हलवा, आलू चिप्स आदि आदि) बनाकर व्रत को त्योहार जैसा मनाते हैं वो व्रत करने का ढंग नहीं है इससे तो अच्छा है खाना ही खा लिया जाए तो कम से कम व्रत तो बदनाम ना हो
हमारे वैष्णव संप्रदाय में वर्णन है कि "व्रत करे त्योहार सा वो तो व्रति नाय"
व्रत के दिन स्त्री गमन भी वर्जित है, चारपाई पर सोने का भी निषेध है
हो सके तो इस दिन दिन में या रात्रि में सामूहिक संकिर्तन का प्रोग्राम दो या तीन घंटे का (आपकी इच्छा पर निर्भर) रखना चाहिए
"हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्ण कृष्णा हरे हरे " इस महामंत्र का जप करते रहना चाहिए
तथा पंचांग आदि में कभी कभी दो दिन एकादशी लिखा होता है जिसमें पहले दिन में लिखा होता है एकादशी व्रत स्मार्त तथा दूसरे दिन में लिखा होता है एकादशी व्रत निम्बारक वैष्णव
तो जो दूसरे दिन की निम्बारक वैष्णव एकादशी व्रत है शास्त्र में उसका पुण्य ज्यादा बताया गया है
अगर घर में कोई बुजुर्ग महिला या अन्य विधवा महिला हो तो उन्हें यह दूसरी एकादशी निम्बारक वैष्णव एकादशी ही करना चाहिए।
एकादशी व्रत का उद्यापन उस परिस्थिति में जरूरी होता है जब व्रत की शुरुआत एक निश्चय या संकल्प के साथ कि जाती है कि मैं एक वर्ष या निश्चित समय तक व्रत करूँगा या करूँगी।वह अवधि पूर्ण होने पर व्रत के साथ उद्यापन किया जाता है।
पुराणों में एकादशी व्रत करनेवालेको छोड़ने की सलाह नही दी जाती है। अगर व्रत नही रख सकते तो उस दिन अन्न ग्रहण नही करना चाहिए।ऐसी मान्यता है कि एकादशी तिथि को अन्न में पाप का वास् होता है।इस विचारधारा से भी कई लोग उस दिन अन्न ग्रहण नही करते है।
एकादशी का व्रत रखने का क्या महत्व है?
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चन्द्रमा की एकादश (ग्यारह) कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है । चन्द्रमा का प्रभाव शरीर और मन पर होता है, इसलिए इस तिथि में शरीर की अस्वस्थता और मन की चंचलता बढ़ जाती है । इसी तरह कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सूर्य की एकादश कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है । इसी कारण उपवास से शरीर को संभालने और इष्टदेव के पूजन से चित्त की चंचलता दूर करने और मानसिक बल बढ़ाने के लिए एकादशी का व्रत करने का नियम बनाया गया है।
हिन्दू धर्म मे हर माह दो एकादशी आती है और हर एकादशी का अपना महत्व होता है। संक्षेप में हर माह के एकादशी के नाम कुछ ऐसे है...
1. चैत्र-
कृष्ण पक्ष : पापमोचनी एकादशी
शुक्ल पक्ष : कामदा एकादशी
2. वैशाख-
कृष्ण पक्ष : वरूथिनी एकादशी
शुक्ल पक्ष : मोहिनी एकादशी
3. ज्येष्ठ-
कृष्ण पक्ष : अपरा एकादशी
शुक्ल पक्ष : निर्जला एकादशी
4. आषाढ़-
कृष्ण पक्ष : योगिनी एकादशी
शुक्ल पक्ष : देवशयनी एकादशी
5. श्रावण-
कृष्ण पक्ष : कामिका एकादशी
शुक्ल पक्ष : पवित्रा एकादशी
6. भाद्रपद-
कृष्ण पक्ष : अजा एकादशी
शुक्ल पक्ष : पद्मा एकादशी
7. आश्विन-
कृष्ण पक्ष : इंदिरा एकादशी
शुक्ल पक्ष : पापांकुशा एकादशी
8. कार्तिक-
कृष्ण पक्ष : रमा एकादशी
शुक्ल पक्ष : देवप्रबोधिनी एकादशी
9. मार्गशीर्ष-
कृष्ण पक्ष : उत्पत्ति एकादशी
शुक्ल पक्ष : मोक्षदा एकादशी
10. पौष-
कृष्ण पक्ष : सफला एकादशी
शुक्ल पक्ष : पुत्रदा एकादशी
11. माघ-
कृष्ण पक्ष : षट्तिला एकादशी
शुक्ल पक्ष : जया एकादशी
12. फाल्गुन-
कृष्ण पक्ष : विजया एकादशी
शुक्ल पक्ष : आमलकी एकादशी
रमा एकादशी महात्मा कथा | रमा एकादशी महात्मा
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः प्रिय भक्तों पुराणों में बहुत से व्रतों का विस्तार पूर्वक वर्णन मिलता है जिनको करने से मनुष्य अपने कल्याण को प्राप्त होता है परन्तु जिस व्रत का सर्वाधिक महत्व बताया गया है उसे एकादशी
का व्रत कहते हैं।एकादशी का व्रत मनुष्य को उसके पापों से तार देता है ,मुक्त कर देता है, उसका परलोक सुधार देता है। आज की कथा में हम आपको रमा एकादशी कि कथा सुनाएंगे। हमें पूर्ण आशा और विश्वास है कि आप सब इस एकादशी के व्रत को ध्यान पूर्वक सुनेंगे, इसकी विधि को समझेंगे, तत्पश्यात इसको करेंगे और अपने कल्याण को प्राप्त होंगे। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः YouTube Link - https://youtu.be/3KUACnLjsnE
फुटनोट
बहुत अच्छा प्रश्न है।शिव शास्त्र के अनुसार प्रदोष व्रत करने से,वो भी मन से नहीं बल्कि शिवभक्ति करने वाले सदगुरु से दीक्षा लेकर, उपयुक्त विधि विधान से प्रदोष याने त्रयोदशी का व्रत प्रभु शिवजी में पूरी श्रद्धा रखते हुए साल भर किया जावे तो व्यक्ति के अनेक पाप कट जाते है,नया भाग्य बनता है,खूब रुपया पैसा और धन आ जाता है,लड़के लड़कियों की शादी में आने वाली बाधा समाप्त जाती है,कई रोग ठीक हो जातेहै नौकरी लग जाती हैजाती है,व्रत केवहुत नियम है इसी प्रकार मासिक चतुर्दर्शी का व्रत निराहार रखनेसे शुभ होता है
कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को रमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह व्रत भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। रमा एकादशी दिवाली के त्यौहार के पहले आती है। इस साल Rama Ekadashi 2019, 24 अक्टूबर को है।
मान्यता के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, यहां तक कि ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी दूर होते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए रमा एकादशी का यह व्रत सुख और सौभाग्यप्रद माना गया है। रमा एकादशी को रम्भा एकादशी भी कहते हैं।
शास्त्रों में एकादशी का बड़ा महत्व है इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है। दिवाली से पहले कार्तिक कृष्ण एकादशी का बड़ा महत्व है क्योंकि यह चातुर्मास की अंतिम एकदशी है। भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी जिनका एक नाम रमा भी हैं उन्हें यह एकादशी अधिक प्रिय है, इसलिए इस एकादशी का नाम रमा एकादशी है। ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी के पुण्य से मनोवांछित फल, सुख ऐश्वर्य को प्राप्त कर मनुष्य उत्तम लोक में स्थान प्राप्त करता है।
सनातन धर्म में दिवाली से पहले मनाई जाने वाली इस रमा एकादशी का बहुत महत्व बताया जाता है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु का जो कोई भक्त रमा एकादशी का व्रत रखकर पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा करता है, उसके जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। इसके अलावा यह व्रत रखने वाले व्यक्ति को धर्म, अर्थ, मोक्ष और पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है।
एकादशी, प्रदोष (त्रयोदशी) और मासिक शिवरात्रि (चतुर्दशी) व्रत का महत्व:
एकादशी व्रत:
* भगवान विष्णु को समर्पित
* महीने में दो बार, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में आती है
* व्रत रखने वाले फल, अनाज और कुछ दालों का सेवन नहीं करते हैं
* पारंपरिक रूप से, एकादशी व्रत को सूर्योदय से सूर्यास्त तक रखा जाता है
* यह व्रत आध्यात्मिक शुद्धि, मोक्ष प्राप्ति और पापों से मुक्ति के लिए किया जाता है
प्रदोष व्रत:
* भगवान शिव को समर्पित
* प्रत्येक सप्ताह में दो बार, सोमवार और शुक्रवार को आता है
* व्रत रखने वाले शाम के समय हल्का भोजन करते हैं
* यह व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने, पापों से मुक्ति पाने और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है
मासिक शिवरात्रि (चतुर्दशी):
* प्रत्येक महीने में एक बार, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आती है
* यह भगवान शिव की सबसे महत्वपूर्ण रात्रियों में से एक है
* व्रत रखने वाले 24 घंटे का उपवास रखते हैं और रात भर भगवान शिव की पूजा करते हैं
* यह व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने, मोक्ष प्राप्ति और पापों से मुक्ति के लिए किया जाता है
त्रयोदशी या चतुर्दशी में कौन सा व्रत करना सही है?
यह आपकी व्यक्तिगत श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करता है। यदि आप भगवान विष्णु की भक्ति करना चाहते हैं, तो आप एकादशी व्रत रख सकते हैं। यदि आप भगवान शिव की भक्ति करना चाहते हैं, तो आप प्रदोष या मासिक शिवरात्रि व्रत रख सकते हैं। आप अपनी सुविधानुसार किसी भी व्रत का चयन कर सकते हैं।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है:
* किसी भी व्रत को शुरू करने से पहले, आपको अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
* व्रत के दौरान, आपको पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए और हल्का और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
* व्रत का उद्देश्य केवल भोजन से परहेज करना नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और आत्म-शुद्धि प्राप्त करना भी है।
अंत में, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप श्रद्धा और भक्ति के साथ व्रत रखें।
हिंदू धर्म में ''एकादशी व्रत'' महत्वपूर्ण तिथि है। एकादशी व्रत की बड़ी महिमा है। एक ही दशा में रहते हुए अपने आराध्य देव का पूजन व वंदन करने की प्रेरणा देने वाला व्रत ही एकादशी व्रत कहलाता है। पद्म पुराण के अनुसार स्वयं महादेव ने नारद जी को उपदेश देते हुए कहा था, एकादशी महान पुण्य देने वाली होती है। कहा जाता है कि जो मनुष्य एकादशी का व्रत रखता है उसके पितृ और पूर्वज कुयोनि को त्याग स्वर्ग लोक चले जाते हैं। हिन्दू धर्म के पंचांग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। एकादशी संस्कृत भाषा से लिया गया शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘ग्यारह’। प्रत्येक महीने में एकादशी दो बार आती है–एक शुक्ल पक्ष के बाद और दूसरी कृष्ण पक्ष के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना अलग महत्व है। वैसे तो सनातन धर्म में ढेर सारे व्रत आदि किए जाते हैं लेकिन इन सब में एकादशी का व्रत सबसे पुराना माना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत की बहुत मान्यता है।
एकादशी का महत्व :-
एकादशी को ‘हरी दिन’ और ‘हरी वासर’ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एकादशी व्रत हवन, यज्ञ, वैदिक कर्म-कांड आदि से भी अधिक फल देता है। इस व्रत को रखने की एक मान्यता यह भी है कि इससे पूर्वज या पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है उनके लिए एकादशी के दिन गेहूं, मसाले और सब्जियां आदि का सेवन वर्जित होता है। भक्त एकादशी व्रत की तैयारी एक दिन पहले यानि कि दशमी से ही शुरू कर देते हैं। दशमी के दिन श्रद्धालु प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करते हैं और इस दिन वे बिना नमक का भोजन ग्रहण करते हैं।
निर्जला एकादशी व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे बिना जल के रखा जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत भक्तों के लिए अत्यंत कठिन माना जाता है क्योंकि इसमें जल तक का सेवन वर्जित है।
निर्जला एकादशी व्रत कैसे करते हैं:
1. तैयारी: व्रत से एक दिन पहले सात्विक भोजन ग्रहण करें और मानसिक व शारीरिक रूप से व्रत के लिए तैयार हो जाएं।
2. संकल्प: व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
3. पूजा: भगवान विष्णु की पूजा करें, जिसमें तुलसी पत्र, पुष्प, धूप, दीप और प्रसाद का अर्पण करें। व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।
4. उपवास: इस दिन जल सहित कुछ भी ग्रहण न करें। अगर स्वास्थ्य कारणों से यह संभव न हो, तो फलाहार कर सकते हैं।
5. रात्रि जागरण: रात्रि में जागरण करना शुभ माना जाता है और भजन-कीर्तन करना चाहिए।
6. व्रत पारण: अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें। इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें।
निर्जला एकादशी व्रत के लाभ:
1. पुण्य की प्राप्ति: इस व्रत को करने से कई एकादशियों के व्रतों का फल मिलता है, जिससे व्यक्ति को अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।
2. पापों का नाश: माना जाता है कि निर्जला एकादशी व्रत करने से समस्त पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
3. स्वास्थ्य लाभ: शरीर और मन की शुद्धि होती है। जल रहित उपवास शरीर के टॉक्सिन्स को निकालने में मदद करता है।
4. आध्यात्मिक उन्नति: यह व्रत व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है, जिससे मन शांत और संतुलित रहता है।
5. ईश्वर की कृपा: इस व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
निर्जला एकादशी व्रत कठिन अवश्य है, लेकिन इसके लाभ अत्यंत महत्वपूर्ण और जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाले होते हैं। यह व्रत श्रद्धा, भक्ति और संकल्प के साथ करना चाहिए।
फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को विजया एकादशी कहते है। इस बार यह एकादशी 19 फरवरी, बुधवार को मनाई जाएगी। इसे समस्त पापों का हरण करने वाली तिथि भी कहा जाता है।
विजया एकादशी व्रत/पूजा विधि
- विजया एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। स्नान के जल में गंगाजल और केसर मिलाकर नहाना चाहिए। स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें।
- इस दिन प्रात: स्नान करने के बाद उगते हुए सूर्य नारायण को जल में केसर डाल कर अर्घ्य दें।
- पीले फूलों से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और उन्हें पीले ऋतुफल और वस्त्र अर्पण करने चाहिए। इस दिन केसर का तिलक भगवान विष्णु को लगाएं और उसी तिलक का प्रयोग प्रसाद के रूप में करें। भगवान विष्णु की पूजा अर्चना कर धूप-दीप से आरती उतारें।
- ऋतुफल, नेवैद्य, पंचामृत और अन्य पकवानों का भोग लगाएं। भोग में तुलसी के पत्ते जरूर डालें।
- श्री रामचरितमानस और श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करना भी शुभ फलदायी है।
- ब्राह्मणों और गरीबों को पीले रंग के वस्त्र, भोजन इत्यादि का दान देना चाहिए। दान करने से पूर्व इन्हें भगवान विष्णु काे अर्पित अवश्य करें। इससे आपके दान का पुण्य दोगुना हो जाएगा।
- एकादशी के दिन, संध्याकाल में गाय के घी का दीपक तुलसी के समक्ष जलाएं। ऐसा करने से परिवार में सुख शांति आएगी।
- पूरी रात्रि भगवान के भजन और संकीर्तन करें और मंत्रों ‘ॐ नमो नारायणाय’, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करें।
- अगले दिन द्वादशी (20 फरवरी) को भगवान विष्णु की पुन: पूजा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इसके बाद ब्राह्मणों को दान और दक्षिणा देकर सम्मान विदा करें। बाद में स्वयं भोजन कर व्रत पूर्ण करें।
इस तरह विधि-विधान से व्रत करने से हर काम में सफलता मिलती है। श्रद्धा तथा समर्पण पूर्वक व्रत तथा पूजा से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति करवाते हैं।
विजया एकादशी व्रत का महत्व
- इस व्रत के विषय में पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि जब जातक शत्रुओं से घिरा हो तब विकट से विकट परिस्थिति में भी विजया एकादशी के व्रत से सफलता सुनिश्चित की जा सकती है।
- विजया एकादशी के महात्म्य के पठन व श्रवण मात्र से ही व्यक्ति के समस्त पापों का विनाश हो जाता है। साथ ही आत्मबल बढ़ जाता है।
- शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन व्रत करने से स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्नदान और गौदान से अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
- विजया एकादशी व्रत करने से जीवन में शुभ कर्मों में वृद्धि, मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और कष्टों (अशुभता) का नाश होता है। जो भी साधक इस एकादशी का व्रत विधि विधान और सच्चे मन से करता है, वह भगवान विष्णु का कृपापात्र बन जाता है।
- पद्मपुराण के अनुसार विजया एकादशी के व्रत से धन-धान्य का लाभ और मोक्ष की प्राप्ति होती है। कठिन तपस्या से आप जितना फल प्राप्त कर सकते हैं, उतना ही पुण्यफल आप विजया एकदाशी का व्रत करने से कर सकते हैं। व्रतधारी को बैकुंठ धाम की प्राप्ती होती है।
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