वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय–13 (अन्तिम)

.                      वैशाखमास-माहात्म्य

                     अध्याय–13 (अन्तिम)

          बैशाख मास की अन्तिम तीन तिथियों की महत्ता तथा ग्रन्थ का उपसंहार

          श्रुतदेवजी कहते हैं–‘राजेन्द्र ! वैशाख के शुक्ल पक्ष में जो अन्तिम तीन त्रयोदशी से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियाँ हैं, वे बड़ी पवित्र और शुभकारक हैं। उनका नाम ‘पुष्करिणी’ है, वे सब पापों का क्षय करने वाली हैं। 
          जो सम्पूर्ण वैशाख मास में स्नान करने में असमर्थ हो, वह यदि इन तीन तिथियों में भी स्नान करे तो वैशाख मास का पूरा फल पा लेता है। 
          पूर्व काल में वैशाख मास की एकादशी तिथि को शुभ अमृत प्रकट हुआ। द्वादशी को भगवान् विष्णु ने उसकी रक्षा की। त्रयोदशी को उन श्रीहरि ने देवताओं को सुधा-पान कराया। चतुर्दशी को देव विरोधी दैत्यों का संहार किया और पूर्णिमा के दिन समस्त देवताओं को उनका साम्राज्य प्राप्त हो गया। 
          इसलिये देवताओं ने सन्तुष्ट होकर इन तीन तिथियों को वर दिया–‘वैशाख मास की ये तीन शुभ तिथियाँ मनुष्यों के पापों का नाश करने वाली तथा उन्हें पुत्र-पौत्रादि फल देने वाली हों। जो मनुष्य इस सम्पूर्ण मास में स्नान न कर सका हो, वह इन तिथियों में स्नान कर लेने पर पूर्ण फल को ही पाता है। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज श्रीजी की चरण सेवा से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          वैशाख मास में लौकिक कामनाओं का नियम करने पर मनुष्य निश्चय ही भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। महीने भर नियम निभाने में असमर्थ मानव यदि उक्त तीन दिन भी कामनाओं का संयम कर सके तो उतने से ही पूर्ण फल को पाकर भगवान् विष्णु के धाम में आनन्द का अनुभव करता है।’
          इस प्रकार वर देकर देवता अपने धाम को चले गये। अत: पुष्करिणी नाम से प्रसिद्ध अन्तिम तीन तिथियाँ पुण्यदायिनी, समस्त पापराशि का नाश करने वाली तथा पुत्र-पौत्र को बढ़ाने वाली हैं। 
          जो वैशाख मास में अन्तिम तीन दिन गीता का पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जो उक्त तीनों दिन विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन करने में इस भूलोक तथा स्वर्गलोक में कौन समर्थ है ? 
          पूर्णिमा को सहस्रनामों के द्वारा भगवान् मधुसूदन को दूध से नहला कर मनुष्य पापहीन वैकुण्ठधाम में जाता है। वैशाख मास में प्रतिदिन भागवत के आधे या चौथाई श्लोक का पाठ करने वाला मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। 
          जो वैशाख के अन्तिम तीन दिनों में भागवतशास्त्र का श्रवण करता है, वह जल से कमल के पत्ते की भाँति कभी पापों से लिप्त नहीं होता। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज श्रीजी की चरण सेवा से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          उक्त तीनों दिनों के सेवन से कितने ही मनुष्यों ने देवत्व प्राप्त कर लिया, कितने ही सिद्ध हो गये और कितनों ने ब्रह्मत्व पा लिया। ब्रह्मज्ञान से मुक्ति होती है। अथवा प्रयाग में मृत्यु होने से या वैशाख मास में नियम पूर्वक प्रात:काल जल में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये वैशाख के अन्तिम तीन दिनों में स्नान, दान और भगवत् पूजन आदि अवश्य करना चाहिये। वैशाख मास के उत्तम माहात्म्य का पूरा-पूरा वर्णन रोग-शोक से रहित जगदीश्वर भगवान् नारायण के सिवा दूसरा कौन कर सकता है।
          तुम भी वैशाख मास में दान आदि उत्तम कर्म का अनुप्ठान करो। इससे निश्चय ही तुम्हें भोग और मोक्ष की प्राप्ति होगी।
          इस प्रकार मिथिलापति जनक को उपदेश देकर श्रुतदेवजी ने उनकी अनुमति ले वहाँ से जाने का विचार किया।
          तब राजर्षि जनक ने अपने अभ्युदय के लिये उत्तम उत्सव कराया और श्रुतदेवजी को पालकी पर बिठाकर विदा किया। वस्त्र, आभूषण, गौ, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि से उनकी पूजा और वन्दना करके राजा ने उनकी परिक्रमा की।
          तत्पश्चात् उनसे विदा हो महातेजस्वी एवं परम यशस्वी श्रुतदेवजी सन्तुष्ट हो प्रसन्नता पूर्वक वहाँ से अपने स्थान को गये। राजा ने वैशाख धर्म का पालन करके मोक्ष प्राप्त किया।
          नारदजी कहते हैं–‘अम्बरीष! यह उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुनाया है, जो कि सब पापों का नाशक तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियों को देने वाला है। इससे मनुष्य भुक्ति, मुक्ति, ज्ञान एवं मोक्ष पाता है।’
          नारदजी का यह वचन सुनकर महायशस्वी राजा अम्बरीष मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बाह्य जगत् के व्यापारों से निवृत्त होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया और अपने सम्पूर्ण वैभवों से उनकी पूजा की। 
          तत्पश्चात् उनसे विदा लेकर देवर्षि नारदजी दूसरे लोक में चले गये; क्योंकि दक्ष प्रजापति के शाप से वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते। 
          राजर्षि अम्बरीष भी नारदजी के बताये हुए सब धर्मों का अनुष्ठान करके निर्गुण परब्रह्म परमात्मा में विलीन हो गये जो इस पापनाशक एवं पुण्यवर्द्धक उपाख्यान को सुनता अथवा पढ़ता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। 
          जिनके घर में यह लिखी हुई पुस्तक रहती है उनके हाथ में मुक्ति आ जाती है। फिर जो सदा इसके श्रवण में मन लगाते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है।
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                   वैशाखमास-माहात्म्य सम्पूर्ण
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