वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 12 ||बैशाख की अक्षय तृतीया और द्वादशी की महत्ता, द्वादशी के पुण्यदान से एक कुतिया का उद्धार

वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 12  || बैशाख की अक्षय तृतीया और द्वादशी की महत्ता, द्वादशी के पुण्यदान से एक कुतिया का उद्धार

          वैशाख की अक्षय तृतीया और द्वादशी की महत्ता, द्वादशी के पुण्यदान से एक कुतिया का उद्धार

          श्रुतदेवजी कहते हैं–‘जो मनुष्य अक्षय तृतीया को सूर्योदय काल में प्रात:स्नान करते हैं और भगवान् विष्णु की पूजा करके कथा सुनते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं। जो उस दिन श्रीमधुसूदन की प्रसन्नता के लिये दान करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म भगवान् की आज्ञा से अक्षय फल देता है। 
          वैशाख मास की पवित्र तिथियों में शुक्ल पक्ष की द्वादशी समस्त पापराशि का विनाश करने वाली है। शुक्ला द्वादशी को योग्य पात्र के लिये जो अन्न दिया जाता है, उसके एक-एक दाने में कोटि-कोटि ब्राह्मण-भोजन का पुण्य होता है। 
          शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि में जो भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये जागरण करता है, वह जीवन्मुक्त होता है। जो वैशाख की द्वादशी तिथि को तुलसी के कोमल दलों से भगवान् विष्णु की पूजा करता है, वह समूचे कुल का उद्धार करके वैकुण्ठलोक का अधिपति होता है। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          जो मनुष्य त्रयोदशी तिथि को दूध, दही, शक्कर, घी और शुद्ध मधु-इन पाँच द्रव्यों से भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये उनकी पूजा करता है तथा जो पंचामृत से भक्तिपूर्वक श्रीहरि को स्नान कराता है, वह सम्पूर्ण कुल का उद्धार करके भगवान् विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है। 
          जो सायंकाल में भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये शर्बत देता है, वह अपने पुराने पाप को शीघ्र ही त्याग देता है। वैशाख शुक्ला द्वादशी में मनुष्य जो कुछ पुण्य करता है, वह अक्षय फल देने वाला होता है।
          प्राचीन काल में काश्मीर देश में देवव्रत नामक एक ब्राह्मण थे। उनके सुन्दर रूपवाली एक कन्या थी, जो मालिनी के नाम से प्रसिद्ध थी। ब्राह्मण ने उस कन्या का विवाह सत्यशील नामक बुद्धिमान् द्विज के साथ कर दिया। 
          मालिनी कुमार्ग पर चलने वाली पुंश्चली होकर स्वच्छन्दता पूर्वक इधर-उधर रहने लगी। वह केवल आभूषण धारण करने के लिये पति का जीवन चाहती थी, उसकी हितैषिणी नहीं थी। 
          उसके घर में काम-काज करने के बहाने उपपति रहा करता था। सभी जाति के मनुष्य जार के रूप में उसके यहाँ ठहरते थे। वह कभी पति की आज्ञा का पालन करने में तत्पर नहीं हुई। इसी दोष से उसके सब अंगों में कीड़े पड़ गये, जो काल, अन्तक और यम की भाँति उसकी हड्डियों को भी छेदे डालते थे। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          उन कीड़ों से उसकी नाक, जिह्वा और कानों का उच्छेद हो गया, स्तन तथा अंगुलियाँ गल गयीं, उसमें पंगुता भी आ गयी। इन सब क्लेशों से मृत्यु को प्राप्त होकर वह नरक की यातनाएँ भोगने लगी। एक लाख पचास हजार वर्षों तक वह ताँबे के भाण्ड में रखकर जलायी गयी, सौ बार उसे कुत्ते की योनि में जन्म लेना पड़ा। 
          तत्पश्चात् सौवीर देश में पद्मबन्धु नामक ब्राह्मण के घर में वह अनेक दु:खों से घिरी हुई कुतिया हुई। उस समय भी उसके कान, नाक, पूँछ और पैर कटे हुए थे, उसके सिर में कीड़े पड़ गये थे और योनि में भी कीड़े भरे रहते थे। 
          राजन्! इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये एक दिन वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पद्मबन्धु का पुत्र नदी में स्नान करके पवित्र हो भीगे वस्त्र से घर आया। उसने तुलसी की वेदी के पास जाकर अपने पैर धोये। दैवयोग से वह कुतिया वेदी के नीचे सोयी हुई थी। 
          सूर्योदय से पहले का समय था, ब्राह्मण कुमार के चरणोदक से वह नहा गयी और तत्काल उसके सारे पाप नष्ट हो गये। फिर तो उसी क्षण उसे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण हो आया। 
          पहले के कर्मो की याद आने से वह कुतिया तपस्वी के पास जाकर दीनता पूर्वक पुकारने लगी–‘हे मुने! आप हमारी रक्षा करें।’ 
          उसने पद्मबन्धु मुनि के पुत्र से अपने पूर्वजन्म के दुराचारपूर्ण वृत्तान्त सुनाये और यह भी कहा–‘ब्रह्मन्! जो कोई भी दूसरी युवती पति के ऊपर वशीकरण का प्रयोग करती है, वह दुराचारिणी मेरी ही तरह ताँबे के पात्र में पकायी जाती है। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          पति स्वामी है, पति गुरु है और पति उत्तम देवता है। साध्वी स्त्री उस पति का अपराध करके कैसे सुख पा सकती है ? पति का अपराध करने वाली स्त्री सैकड़ों बार तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियों की योनि) में और अरबों बार कीड़े की योनि में जन्म लेती है। इसलिये स्त्रियों को सदैव अपने पति की आज्ञा पालन करनी चाहिये। 
          ब्रह्मन्! आज मैं आपकी दृष्टि के सम्मुख आयी हूँ। यदि आप मेरा उद्धार नहीं करेंगे, तो मुझे पुनः इसी यातनापूर्ण घृणित योनि का दर्शन करना पड़ेगा। अत: विप्रवर! मुझ पापाचारिणी को वैशाख शुक्ल पक्ष में अपना पुण्य प्रदान करके उबार लीजिये। 
          आपने जो पुण्य की वृद्धि करने वाली द्वादशी की है, उसमें स्नान, दान और अन्न भोजन कराने से जो पुण्य हुआ है, उससे मुझ दुराचारिणी का भी उद्धार हो जायगा। महाभाग! दीनवत्सल! मुझ दु:खिया के प्रति दया कीजिये। 
          आपके स्वामी जगदीश्वर जनार्दन दीनों के रक्षक हैं। उनके भक्त भी उन्हीं के समान होते हैं। दीनवत्सल! मैं आपके दरवाजे पर रहने वाली कुतिया हूँ। मुझ दीना के प्रति दया कीजिये, मेरा उद्धार कीजिये अन्तर में मैं आप द्विजेन्द्र को नमस्कार करती हूँ।’
          उसका वचन सुनकर मुनि के पुत्र ने कहा–‘कुतिया! सब प्राणी अपने किये हुए कर्मो के ही सुख-दुःखरूप फल भोगते हैं। जैसे साँप को दिया हुआ शर्करा मिश्रित दूध केवल विष की वृद्धि करता है, उसी प्रकार पापी को दिया हुआ पुण्य उसके पाप में सहायक होता है।’
          मुनिकुमार के ऐसा कहने पर कुतिया दुःख में डूब गयी और उसके पिता के पास जाकर आर्तस्वर से क्रन्दन करती हुई बोली–‘पद्मबन्धु बाबा ! मैं तुम्हारे दरवाजे की कुतिया हूँ। मैंने सदा तुम्हारी जूठन खायी है। मेरी रक्षा करो, मुझे बचाओ। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
          गृहस्थ महात्मा के घर पर जो पालतू जीव रहते हैं, उनका उद्धार करना चाहिये, यह वेदवेत्ताओं का मत है। चाण्डाल, कौवे, कुत्ते–ये प्रतिदिन गृहस्थों के दिये हुए टुकड़े खाते हैं; अतः उनकी दया के पात्र हैं। जो अपने ही पाले हुए रोगादि से ग्रस्त एवं असमर्थ प्राणी का उद्धार नहीं करता, वह नरक में पड़ता है, यह विद्वानों का मत है। 
          संसार की सृष्टि करने वाले भगवान् विष्णु एक को कर्ता बनाकर स्वयं ही पत्नी, पुत्र आदि के व्याज से समस्त जन्तुओं का पालन करते हैं; अत: अपने पोष्यवर्ग की रक्षा करनी चाहिये, यह भगवान् की आज्ञा है। दयालु होने के कारण आप मेरा उद्धार कीजिये।’
          दुःख से आतुर हुई कुतिया की यह बात सुनकर घर में बैठा हुआ मुनिपुत्र तुरन्त घर से बाहर निकला। इसी समय दयानिधान पद्मबन्धु ने कुतिया से पूछा–‘यह क्या वृत्तान्त है ?’ तब पुत्र ने सब समाचार कह सुनाया। 
          उसे सुनकर पद्मबन्धु बोले–‘बेटा ! तुमने कुतिया से ऐसा वचन क्यों कहा ? साधु पुरुषों के मुँह से ऐसी बात नहीं निकलती। वत्स! देखो तो, सब लोग दूसरों का उपकार करने के लिये उद्यत रहते हैं। चन्द्रमा, सूर्य, वायु, रात्रि, अग्नि, जल, चन्दन, वृक्ष और साधु पुरुष सदा दूसरों की भलाईमें लगे रहते हैं। 
          दैत्यों को महाबली जानकर महर्षि दधीचि ने देवताओं का उपकार करने के लिये दयापूर्वक उन्हें अपने शरीर की हड्डी दे दी थी। महाभाग! पूर्वकाल में राजा शिवि ने कबूतर के प्राण बचाने के लिये भूखे बाज को अपने शरीर का मांस दे दिया था। 
          पहले इस पृथ्वी पर जीमूतवाहन नामक राजा हो गये हैं। उन्होंने एक सर्प का प्राण बचाने के लिये महात्मा गरुड़ को अपना जीवन समर्पित कर दिया था। इसलिये विद्वान् ब्राह्मण को दयालु होना चाहिये; क्या इन्द्रदेव शुद्ध स्थान में ही वर्षा करते हैं, अशुद्ध स्थान में जल नहीं बरसाते ? क्या चन्द्रमा चाण्डालों के घर में प्रकाश नहीं करते ? अत: बार-बार प्रार्थना करने वाली इस कुतिया का मैं अपने पुण्यों से उद्धार करूँगा।’
          इस प्रकार पुत्र की मान्यता का निराकरण करके परम बुद्धिमान् पद्मबन्धु ने संकल्प किया–‘कुतिया! ले, मैंने द्वादशी का महापुण्य तुझे दे दिया।’
          ब्राह्मण के इतना कहते ही कुतिया ने सहसा अपने प्राचीन शरीर का त्याग कर दिया और दिव्य देह धारणकर दिव्य वस्त्र-आभूषणों से विभूषित हो, दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई ब्राह्मण की आज्ञा ले स्वर्गलोक को चली गयी। 
          वहाँ महान् सुखों का उपभोग करके इस पृथ्वी पर भगवान् नर-नारायण के अंश से ‘उर्वशी’ नाम से प्रकट हुई।
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