वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 05 || ब्रह्माजी का यमराज को समझाना और भगवान् विष्णु का उन्हें वैशाख मास में भाग दिलाना
. वैशाखमास-माहात्म्य || अध्याय - 05 || ब्रह्माजी का यमराज को समझाना और भगवान् विष्णु का उन्हें वैशाख मास में भाग दिलाना
ब्रह्माजी ने कहा–‘यमराज! तुमने क्या आश्चर्य देखा है ? क्यों तुम्हें खेद हो रहा है ? भगवान् गोविन्द को एक बार भी प्रणाम कर लिया जाय तो वह सौ अश्वमेध यज्ञों के अवभृथ-स्नान के समान होता है। यज्ञ करने वाला तो पुन: इस संसार में जन्म लेता है , परन्तु भगवान् को किया हुआ प्रणाम पुनर्जन्म का हेतु नहीं बनता-मुक्ति की प्राप्ति करा देता है। जिसकी जिह्वा के अग्रभाग पर ‘हरि’ ये दो अक्षर विद्यमान हैं, उसको कुरुक्षेत्र-तीर्थ के सेवन अथवा सरस्वती नदी के जल में स्नान करने से क्या लेना है ?
जो मृत्युकाल में भगवान् विष्णु का स्मरण करता है, वह अभक्ष्य-भक्षण आदि से प्राप्त हुई पापराशि का परित्याग करके भगवान् विष्णु के सायुज्य को पाता है; क्योंकि भगवान् विष्णु को अपना स्मरण बहुत ही प्रिय है। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
यमराज! इसी प्रकार वैशाख नामक मास भी भगवान् विष्णु को प्रिय है। जिसके धर्म को श्रवण करने मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, उसके अनुष्ठान में तत्पर रहने वाला मनुष्य यदि मुक्ति को प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है ?
वैशाख मास में भगवान् पुरुषोत्तम के नाम और यश का गान किया जाता है, जिससे भगवान् बहुत प्रसन्न होते हैं। पुरुषोत्तम श्रीहरि सम्पूर्ण जगत् के स्वामी और हमारे जनक हैं। यह राजा कीर्तिमान् वैशाख मास में उन्हीं भगवान् के प्रिय धर्मो का अनुष्ठान करता है, जिससे प्रसन्नचित्त होकर भगवान् विष्णु सदा उसकी सहायता में स्थित रहते हैं।
भगवान् वासुदेव के भक्तों का कभी अमंगल नहीं होता; उन्हें जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि का भय भी नहीं प्राप्त होता। कार्य में नियुक्त किया हुआ पुरुष यदि अपनी पूरी शक्ति लगाकर स्वामी के कार्य साधन की चेष्टा करता है तो उतने से ही वह कृतार्थ हो जाता है।
यदि शक्ति के बाहर का कार्य उपस्थित हो जाय तो स्वामी को उसकी सूचना दे दे। उतना कर देने से वह उऋण हो जाता है और सुख का भागी होता है। जिसने उस प्रयोजन को स्वामी से निवेदित कर दिया है, उसके ऊपर न तो कोई ऋण है और न पातक ही लगता है। अपने कर्तव्य-पालन के लिये पूरा यत्न कर लेने पर प्राणी का कोई अपराध नहीं रहता। यह कार्य तुम्हारे लिये असम्भव है। अत: इसके विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।’ ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर यमराज ने दीन वाणी में कहा–‘तात ! मैंने आपके चरणों की सेवा से सब कुछ पा लिया।’
तब ब्रह्माजी ने पुनः समझाते हुए कहा–‘धर्मराज ! राजा कीर्तिमान् विष्णु-धर्म के पालन में तत्पर हैं। चलो हम लोग भगवान् विष्णु के समीप चलें और उन्हें सब बात बताकर पीछे उनके कथनानुसार कार्य किया जायगा। वे ही इस जगत् के कर्ता, धर्म के रक्षक और नियामक हैं।’
इस प्रकार यमराज को आश्वासन देकर ब्रह्माजी उनके साथ क्षीरसागर के तटपर गये। वहाँ उन्होंने सच्चिदानन्द स्वरूप गुणातीत परमेश्वर विष्णु का स्तवन किया। ब्रह्माजी की स्तुति से सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णु वहाँ प्रकट हुए। यमराज और ब्रह्माजी ने तुरन्त ही उनके चरणों में मस्तक झुकाया। तब भगवान् महाविष्णु ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में उन दोनों से कहा–‘तुमलोग यहाँ क्यों आये हो ?’
ब्रह्माजी ने कहा–‘प्रभो! आपके श्रेष्ठ भक्त राजा कीर्तिमान् के शासन काल में सब मनुष्य वैशाख-धर्म के पालन में संलग्न हो आपके अविनाशी पद को प्राप्त हो रहे हैं। इससे यमपुरी सूनी हो गयी है।’
उनके ऐसा कहने पर भगवान् विष्णु हँसते हुए बोले–‘मैं लक्ष्मी को त्याग दूँगा। अपने प्राण, शरीर, श्रीवत्स, कौस्तुभमणि, वैजयन्ती माला, श्वेतद्वीप, वैकुण्ठधाम, क्षीरसागर शेषनाग तथा गरुड़जी को भी छोड़ दूँगा, परन्तु अपने भक्त का त्याग नहीं कर सकूँगा। जिन्होंने मेरे लिये सब भोगों का त्याग करके अपना जीवन तक मुझे सौंप दिया है, जो मुझमें मन लगाकर मेरे स्वरूप हो गये हैं, उन महाभाग भक्तों को मैं कैसे त्याग सकता हूँ.? ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
राजा कीर्तिमान् को इस पृथ्वी पर मैंने दस हजार वर्षों की आयु दी है। उसमें से आठ हजार वर्ष तो बीत गये। शेष आयु और बीत जाने पर उसे मेरा सायुज्य प्राप्त होगा। उसके बाद पृथ्वी पर बेन नामक दुष्टात्मा राजा होगा, जो सम्पूर्ण वेदोक्त महाधर्मो का लोप कर देगा। उस समय वैशाख मास के धर्म भी छिन्न-भिन्न हो जायँगे बेन अपने ही पाप से भस्म हो जायगा।
तत्पश्चात् में पृथु होकर पुन: सब धर्मो का प्रचार करूँगा। उस समय लोगों में वैशाख मास के धर्म को भी प्रसिद्ध करुँगा। सहस्रों मनुष्यों में कोई ऐसा होता है, जो मुझमें अपने मन-प्राण अर्पित करके अपना सर्वस्व मुझे समर्पित कर दे और मेरा भक्त हो जाय। जो ऐसा होता है. वही मेरे धर्मो का प्रचार करता है।
इस वैशाख मास में से भी मैं वैशाख धर्म में तत्पर रहने वाले महात्मा पुरुषों तथा राजा के द्वारा समयानुसार तुम्हारे लिये भाग दिलाऊँगा। लोक में जो कोई भी वैशाख मास का व्रत करेंगे, वे तुम्हें भाग देने वाले होंगे उनके वैशाख मास में बताये हुए महाधर्म के पालन में तुम कभी विघ्न न उपस्थित करना।’
यमराज को इस प्रकार आश्वासन देकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये ब्रह्माजी भी अपने सेवकों के साथ सत्यलोक को चले गये उनके बाद यमराज भी अपनी पुरी को पधारे।
वैशाख मास की पूर्णिमा को पहले धर्मराज के उद्देश्य से जल से भरा हुआ घड़ा, दही और अन्न देना चाहिये उसके बाद पितरों, गुरुओं और भगवान् विष्णु के उद्देश्य से शीतल जल, दही, अन्न, पान और दक्षिणा फल के साथ काँसी के पात्र में रखकर ब्राह्मण को देना चाहिये। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें।
भगवान् विष्णु की दिव्य प्रतिमा वैशाख मास की माहात्म्य कथा सुनाने वाले दीन ब्राह्मण को देनी चाहिये। उस धर्म वक्ता ब्राह्मण को अपने धन से भी पूजित करना चाहिये। राजा कीर्तिमान् ने सब कुछ उसी प्रकार किया। उन्होंने पृथ्वी पर मनोवांछित भोग भोगकर शेष आयु पूर्ण होने के पश्चात् पुत्र- पौत्र आदि के साथ श्रीविष्णुधाम को प्रस्थान किया।’
मिथिलापति ने कहा–‘महामते ! दुरात्मा राजा बेन प्रथम (स्वायम्भुव) मन्वन्तर में हुआ था और ये राजा इक्ष्वाकुकुलभूषण कीर्तिमान् वैवस्वत मन्वन्तर के व्यक्ति हैं। यह बात पहले मैंने आपके मुख से सुन रखी है। परन्तु इस समय आपने और ही बात कही है कि यह राजा जब वैकुण्ठवासी हो जायँगे, उसके बाद राजा बेन उत्पन्न होगा। मेरे इस संशय को आप निवृत्त कीजिये।’
श्रुतदेव ने कहा–‘राजन्! पुराणों में जो विषमता प्रतीत होती है, वह युगभेद और कल्पभेद की व्यवस्था के अनुसार है। (किसी कल्प में ऐसा ही हुआ होगा कि पहले राजा कीर्तिमान् और पीछे बेन हुआ होगा) इसलिये कहीं कथा में समय की विपरीतता देखकर उसके अप्रामाणिक होने की आशंका नहीं करनी चाहिये।’
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