चैत्र मास के व्रत (कृष्णपक्ष)

चैत्र मास के व्रत

कृष्णपक्ष

आरम्भका निवेदन - प्रत्येक प्रयोजनके सभी व्रत मास', पक्ष और तिथि-वारादिके सहयोगसे सम्पन्न होते हैं। मास चार प्रकारके माने गये हैं। वे सौर, सावन, चान्द्र और नाक्षत्र नामोंसे प्रसिद्ध हैं। उनमें सूर्यसंक्रान्तिके आरम्भसे उसकी समाप्तिपर्यन्तका 'सौर', सूर्योदयसे सूर्योदय-पर्यन्तके एक दिन-जैसे ३० दिनका 'सावन'३, शुक्ल और कृष्णपक्षका 'चान्द्र और अश्विनीके आरम्भसे रेवतीके अन्ततकके चन्द्रभोगका 'नाक्षत्र'५ मास होता है। ये सब प्रयोजनके अनुसार पृथक् पृथक् लिये जाते हैं- यथा विवाहादिमें 'सौर', यज्ञादिमें 'सावन', श्राद्ध आदिमें 'चान्द्र' और नक्षत्रसत्र (नक्षत्र-सम्बन्धी यज्ञ, यथा श्लेषा-मूलादिजन्मशान्ति) में 'नाक्षत्र' लिया जाता है। 

मास-गणनामें वैशाख आदिकी अपेक्षा सर्वप्रथम चैत्र क्यों लिया गया ? इसका कारण यह है कि सृष्टिके आरम्भ (अथवा ज्योतिर्गणनाके प्रारम्भ) में चन्द्रमा चित्रापर था (और चित्रा २४ चैत्रीको प्रायः १ होती ही है;) इस कारण अन्य महीनोंकी अपेक्षा चैत्र पहला महीना माना गया है और इसके पीछे वैशाख आदि आते हैं। इस सम्बन्धमें यह भी ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार चैत्रीको चित्रा होना सम्भव माना गया है। 

उसी प्रकार वैशाखीको विशाखा, ज्येष्ठीको ज्येष्ठा, आषाढ़ीको पूर्वाषाढ़ा, श्रावणीको श्रवण, भाद्रीको पूर्वा-भाद्रपद, आश्विनीको अश्विनी, कार्तिकीको कृत्तिका, मार्गशीर्षीको मृगशिरा, पौषीको पुष्य, माघीको मघा और फाल्गुनीको पूर्वाफाल्गुनी होना भी सम्भव सूचित किया गया है। 

'प्रत्येक मासके शुक्ल और कृष्ण दो पक्ष हैं। इनका उपयोग लोकव्यवहारमें दक्षिण प्रान्तमें शुक्ल और कृष्ण और अन्य प्रान्तोंमें कृष्ण और शुक्लके क्रमसे करते हैं। वास्तवमें वह व्रतोत्सवादिमें शुक्लसे और तिथिकृत्यादिमें कृष्णसे प्रारम्भ किया जाता है।………

(१) गौरीव्रत (व्रतविज्ञान) - यह चैत्र कृष्ण प्रतिपदासे चैत्र शुक्ल द्वितीयातक किया जाता है। इसको विवाहिता और कुमारी दोनों प्रकारकी स्त्रियाँ करती हैं। इसके लिये होलीकी भस्म और काली मिट्टी - इनके मिश्रणसे गौरीकी मूर्ति बनायी जाती है और प्रतिदिन प्रातःकालके समय समीपके पुष्पोद्यानसे फल, पुष्प, दूर्वा और जलपूर्ण कलश लाकर उसको गीत- मन्त्रोंसे पूजती हैं। यह व्रत विशेषकर अहिवातकी रक्षा और पतिप्रेमकी वृद्धिके निमित्त किया जाता है।

उत्सव (२) होलामहोत्सव (पुराणसमुच्चय-मुक्तकसंग्रह) – यह होलीके दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदाको होता है। लोकप्रसिद्धिमें इसे धुरेडी, छारंडी, फाग या बोहराजयन्ती कहते हैं। नागरिक नर-नारी इसे रंग, चैत्रके व्रत गुलाल, गोष्ठी, परिहास और गायन-वादनसे और देहातीलोग धूल-धमासा, जलक्रीडा और धमाल आदिसे सम्पन्न करते हैं। आजकल इस उत्सवका रूप बहुत विकृत और उच्छृङ्खलतापूर्ण हो गया है। लोगोंको सभ्यताके साथ भगवद्भावसे भरे हुए गीत आदि गाकर यह उत्सव मनाना चाहिये। इस उत्सवके चार उद्देश्य प्रतीत होते हैं- (१) जनता जानती है कि होलीके जलानेमें प्रह्लादके निरापद निकल जानेके हर्षमें यह उत्सव सम्पन्न होता है। 
(२) शास्त्रोंमें इस दिन इसी रूपमें 'नवान्नेष्टि' यज्ञ घोषित किया गया है, अतः नवप्राप्त नवान्नके सम्मानार्थ यह उत्सव किया जाता है। 
(३) यज्ञकी समाप्तिमें भस्मवन्दन और अभिषेक किया जाता है, किंतु ये दोनों कृत्य विशेषकर कुत्सित रूपमें होते हैं। 
(४) वैसे माघ शुक्ल पञ्चमीसे चैत्रशुक्ल पञ्चमीपर्यन्तका वसन्तोत्सव स्वतः होता ही है।

(३) संकष्टचतुर्थीव्रत (भविष्यपुराण) - यदि निकट भविष्यमें किसी अमिट संकटकी शङ्का हो या पहलेसे ही संकटापन्न अवस्था बनी हुई हो तो उसके निवारणके निमित्त संकटचतुर्थी का व्रत करना चाहिये। यह सभी महीनोंमें कृष्ण चतुर्थीको किया जाता है। इसमें चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी ली जाती है। यदि वह दो दिन चन्द्रोदय-व्यापिनी हो तो प्रथम दिनका व्रत करे। व्रतीको चाहिये कि वह उक्त चतुर्थीको प्रातः स्नानादि करनेके अनन्तर दाहिने हाथमें गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर 'मम वर्तमानागामिसकलसंकटनिरसनपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये 

संकटचतुर्थी- व्रतमहं करिष्ये' यह संकल्प करके दिनभर मौन रहे और सायंकालके समय पुनः स्नान करके चौकी या वेदीपर 'तीव्रायै, ज्वालिन्यै, नन्दायै, भोगदायै, कामरूपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै, सत्यायै च दिक्षु विदिक्षु, मध्ये विघ्ननाशिन्यै सर्वशक्तिकमलासनायै नमः' इन मन्त्रोंसे पीठपूजा करनेके बाद वेदीके बीचमें स्वर्णादिनिर्मित गणेशजीका - 
१ 'गणेशाय नमः' से आवाहन, 
२ 'विघ्ननाशिने नमः' से आसन, 
३ 'लम्बोदराय नमः' से पाद्य, 
४ 'चन्द्रार्धधारिणे नमः' से अर्घ्य, 
५ 'विश्वप्रियाय नमः' से आचमन, 
६ 'ब्रह्मचारिणे नमः' से स्नान, 
७ 'कुमारगुरवे नमः' से वस्त्र, 
८ 'शिवात्मजाय नमः' से यज्ञोपवीत, 
९ 'रुद्रपुत्राय नमः' से गन्ध, 
१० 'विघ्नहर्ते नमः' से अक्षत, 
११ 'परशुधारिणे नमः' से पुष्प, 
१२ 'भवानीप्रीतिकर्ते नमः' से धूप, 
१३ 'गजकर्णाय नमः' से दीपक, 
१४ 'अघनाशिने नमः' से नैवेद्य (आचमन), 
१५ 'सिद्धिदाय नमः' से ताम्बूल और 
१६ 'सर्वभोगदायिने नमः' से दक्षिणा अर्पण करके 'षोडशोपचारपूजन' करे और कर्पूर अथवा घीकी बत्ती जलाकर नीराजन करे। 
इसके पीछे दूर्वाके दो अङ्कुर लेकर 'गणाधिपाय नमः २, उमापुत्राय नमः २, अघनाशाय नमः २, एकदन्ताय नमः २, इभवक्त्राय नमः २, मूषकवाहनाय नमः २, विनायकाय नमः २, ईशपुत्राय नमः २, सर्वसिद्धिप्रदाय नमः २, कुमारगुरवे नमः २ और 'गणाधिप नमस्तेऽस्तु उमापुत्राधनाशन । 

एकदन्तेभवक्त्रेति तथा मूषकवाहन । 
विनायकेशपुत्रेति सर्वसिद्धिप्रदायक । 
कुमारगुरवे तुभ्यं पूजयामि प्रयत्नतः ।।' 

इनमें आरम्भसे १० मन्त्रोंद्वारा दो-दो और अन्तके पूरे मन्त्रसे एक दूर्वा अर्पण करके- 'यज्ञेन यज्ञ०' से मन्त्र-पुष्पाञ्जलि अर्पण करे और 'संसारपीडाव्यथितं हि मां सदा संकष्टभूतं सुमुख प्रसीद । त्वं त्राहि मां मोचय कष्टसंघान्नमो नमो विघ्नविनाशनाय ।।' से नमस्कार करके 'श्रीविप्राय नमस्तुभ्यं साक्षाद्देवस्वरूपिणे । गणेशप्रीतये तुभ्यं मोदकान् वै ददाम्यहम् ॥' से मोदक, सुपारी, मूँग और दक्षिणा रखकर वायन (बायना) दे। इसके बाद चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रमाका गन्ध-पुष्पादिसे विधिवत् पूजन करके 'ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषां पते । नमस्ते रोहिणीकान्त गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥' से चन्द्रमाको अर्घ्य देकर 'नभोमण्डलदीपाय शिरोरत्नाय धूर्जटेः । कलाभिर्वर्धमानाय नमश्चन्द्राय चारवे ।।' से प्रार्थना करे। फिर 'गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक । संकष्टं हर मे देव गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥' से गणेशजीको तीन अर्घ्य देकर 'तिथीनामुत्तमे देवि गणेशप्रियवल्लभे । गृहाणार्थं मया दत्तं सर्वसिद्धिप्रदायिके ।।' से तिथिको अर्घ्य दे। पीछे सुपूजित गणेशजीका 'आयातस्त्वमुमापुत्र ममानुग्रहकाम्यया । पूजितोऽसि मया भक्त्या गच्छ स्थानं स्वकं प्रभो ॥' से विसर्जन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और स्वयं तैलवर्जित एक बार भोजन करे। हाँ, यह व्रत तो गणेशजीका है, फिर इसमें चन्द्रमाका प्राधान्य क्यों माना गया है ? तो इस विषयमें ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है कि पार्वतीने गणेशजीको प्रकट किया, उस समय इन्द्र-चन्द्रादि सभी देवताओंने आकर उनका दर्शन किया; किंतु शनिदेव दूर रहे। कारण यह था कि उनकी दृष्टिसे प्रत्येक प्राणी और पदार्थके टुकड़े हो जाते थे। 

परंतु पार्वतीके रुष्ट होनेसे शनिने गणेशजीपर दृष्टि डाली। फल यह हुआ कि गणेशजीका मस्तक उड़कर अमृतमय चन्द्रमण्डलमें चला गया। दूसरी कथा यह है कि पार्वतीने अपने शरीरके मैलसे गणेशजीको उत्पन्न करके उनको द्वारपर बैठा दिया। जब थोड़ी देर बाद शिवजी आकर अंदर जाने लगे, तब गणेशजीने उनको नहीं जाने दिया। तब उन्होंने अनजानमें अपने त्रिशूलसे उनका मस्तक काट डाला और वह चन्द्रलोकमें चला गया। इधर पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये शिवजीने हाथीके सद्योजात बच्चेका मस्तक मँगवाकर गणेशजीके जोड़ दिया। विज्ञानियोंका विश्वास है कि गणेशजीका असली मस्तक चन्द्रमामें है और इसी सम्भावनासे चन्द्रमाका दर्शन किया जाता है। यह व्रत ४ या १३ वर्षतक करनेका है। अतः अवधि समाप्त होनेपर इसका उद्यापन करे । उसमें सर्वतोभद्रमण्डलपर कलश स्थापन करके उसपर गणेशजीकी स्वर्णमयी मूर्तिका पूजन करे। ऋतुकालके गन्ध-पुष्पादि धारण कराये। उसी जगह चाँदीके चन्द्रमाका अर्चन करे। नैवेद्यमें 'इक्षवः सक्तवो रम्भाफलानि चिमटास्तथा । मोदका नारिकेलानि लाजा द्रव्याष्टकं स्मृतम् ।।' का ग्रहण करे। घी, तिल, शर्करा और बिजोरेके टुकड़ोंको एकत्र करके इनका यथाविधि हवन करे। इसके पीछे २१ मोदक लेकर १ गणञ्जय, २ गणपति, ३ हेरम्ब, ४ धरणीधर, ५ महागणाधिपति, ६ यज्ञेश्वर, ७ शीघ्रप्रसाद, ८ अभङ्गसिद्धि, ९ अमृत, १० मन्त्रज्ञ, ११ किन्नाम, १३ सुमङ्गल, १४ बीज, १२ द्विपद, १७ शिव, १५ आशापूरक, १६ वरद, १८ कश्यप, १९ नन्दन, २० सिद्धिनाथ और २१ दुण्ढिराज - इन नामोंसे एक-एक मोदक अर्पण करे। इसके अतिरिक्त गोदान, शय्यादान आदि देकर और ब्राह्मणभोजन कराकर स्वयं भोजन करे। 
उक्त २१ मोदकोंमें १ गणेशजीके लिये छोड़ दे, १० ब्राह्मणोंको दे और दस अपने लिये रखे।.....
कथाका सार 
यह है कि प्राचीन कालमें मयूरध्वज नामका राजा बड़ा प्रभावशाली और धर्मज्ञ था। एक बार उसका पुत्र कहीं खो गया और बहुत अनुसंधान करनेपर भी न मिला। तब मन्त्रिपुत्रकी धर्मवती स्त्रीके अनुरोधसे राजाके सम्पूर्ण परिवारने चैत्र कृष्ण चतुर्थीका बड़े समारोहसे यथाविधि व्रत किया। तब भगवान् गणेशजीकी कृपासे राजपुत्र आ गया और उसने मयूरध्वजकी आजीवन सेवा की।

(४) शीतलाष्टमी (स्कन्दपुराण) - इस देशमें शीतलाष्टमीका व्रत केवल चैत्र कृष्ण अष्टमीको होता है; किंतु स्कन्दपुराणमें चैत्रादि ४ महीनोंमें इस व्रतके करनेका विधान है। इसमें पूर्वविद्धा अष्टमी ली जाती है। व्रतीको चाहिये कि अष्टमीको शीतल जलसे प्रातःस्नानादि करके 'मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रवप्रशमनपूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमी-व्रतं करिष्ये ।' यह संकल्प करे। तदनन्तर सुगन्धयुक्त गन्ध-पुष्पादिसे शीतलाका पूजन करके प्रत्येक प्रकारके मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल-भात, लपसी और रोटी-तरकारी आदि कच्चे पक्के, सभी शीतल पदार्थ (पहले दिनके बनाये हुए) भोग लगाये और शीतलास्तोत्रका पाठ करके रात्रिमें जागरण और दीपावली करे। नैवेद्यमें यह विशेषता है कि चातुर्मासी व्रत हो तो - 
१ चैत्रमें शीतल पदार्थ, 
२ वैशाखमें घी और शर्करासे युक्त सत्तू, 
३ जेष्ठमें पूर्व दिनके बनाये हुए अपूप (पूए) और 
४ आषाढ़में घी और शक्कर मिली हुई खीरका नैवेद्य अर्पण करे। इस प्रकार करनेसे व्रतीके कुलमें दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, नेत्रोंके समस्त रोग, शीतलाकी फुंसियोंके चिह्न और शीतलाजनित सर्वदोष दूर होते हैं और शीतला सदैव संतुष्ट रहती है। शीतलास्तोत्रमें शीतलाका जो स्वरूप बतलाया है, वह शीतलाके रोगीके लिये बहुत हितकारी है। उसमें बतलाया है कि 'शीतला दिगम्बरा है, गर्दभपर आरूढ़ रहती है, शूप, मार्जनी (झाडू) और नीमके पत्तोंसे अलङ्कत होती है और हाथमें शीतल जलका कलश रखती है।' वास्तवमें शीतलाके रोगीके सर्वाङ्गमें दाहयुक्त फोड़े होनेसे वह बिलकुल नग्न हो जाता है। 'गर्दभपिण्डी' (गधेकी लीद) की गन्धसे फोड़ोंकी पीड़ा कम होती है। शूपके काम (अन्नकी सफाई आदि) करने और झाड़ लगानेसे बीमारी बढ़ जाती है, अतः इन कामोंको सर्वथा बंद रखनेके लिये शूप और झाड़ बीमारके समीप रखते हैं। नीमके पत्तोंसे तो आवश्यक है ही। शीतलाके फोड़े सड़ नहीं सकते और शीतल जलके कलशका समीप रखना।

(५) संतानाष्टमी (विष्णुधर्मोत्तर) - यह व्रत भी चैत्र कृष्ण अष्टमीको ही किया जाता है। इसमें प्रातःस्नानादिके बाद श्रीकृष्ण भोग लगाये। और देवकीका गन्धादिसे पूजन करे और मध्याह्नमें सात्त्विक पदार्थोंका 

(६) कृष्णैकादशी (नानापुराणस्मृति) - यह व्रत चैत्रादि सभी महीनोंके शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें किया जाता है। फल दोनोंका ही समान है। शुक्ल और कृष्णमें कोई विशेषता नहीं है। जिस प्रकार शिव और विष्णु दोनों आराध्य हैं, उसी प्रकार कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंकी एकादशी उपोष्य है२। विशेषता यह है कि पुत्रवान् गृहस्थ शुक्ल एकादशी और वानप्रस्थ, संन्यासी तथा विधवा दोनोंका व्रत करें तो उत्तम होता है। इसमें शैव और वैष्णवका भेद भी आवश्यक नहीं; क्योंकि जो जीवमात्रको समान समझे, निजाचारमें रत रहे और अपने प्रत्येक कार्यको विष्णु और शिवके अर्पण करता रहे, वही शैव और वैष्णव होता है। अतः दोनोंके श्रेष्ठ बर्ताव एक होनेसे शैव और वैष्णवोंमें अपने-आप ही अभेद हो जाता है। इस  सर्वोत्कृष्ट प्रभावके कारण ही शास्त्रोंमें एकादशीका महत्त्व अधिक माना गया है।''... इसके शुद्धा और विद्धा- ये दो भेद हैं। दशमी आदिसे विद्ध हो, वह 'विद्धा' और अविद्ध हो वह 'शुद्धा' होती है। इस व्रतको शैव, वैष्णव और सौर- सब करते हैं। वेधके विषयमें बहुतोंके विभिन्न मत हैं। उनको शैव, वैष्णव और सौर पृथक् पृथक् ग्रहण करते हैं। 
(१) सिद्धान्त- रूपसे उदयव्यापिनी ली जाती है। परंतु उसकी उपलब्धि सदैव नहीं होती । 
इस कारण (२) कोई पहले दिनकी ४५ घड़ी दशमीको त्यागते हैं। 
(३) कोई ५५ घड़ीका वेध निषिद्ध मानते हैं। 
(४) कई दशमी और द्वादशीके योगकी एकादशीको त्यागकर द्वादशीका व्रत करते हैं। 
(५) कई एकादशीको ही उपोष्य बतलाते हैं। 
(६) मत्स्यपुराणके मतानुसार क्षय एकादशी निषिद्ध होती है। 
(७) जिस दिन दशमी अनुमान १।१५, एकादशी ५७ । २२ और द्वादशी १। २३ हो उस दिन एकादशीका क्षय हो जाता है। 
(८) किसीके मतमें दशमी ४५ से जितनी ज्यादा हो उतना ही ज्यादा बुरा वेध होता है। यथा ४५ का 'कपाल', ५२ का 'छाया', ५३ का 'ग्रासाख्य', ५४ का 'सम्पूर्ण', ५५ का 'सुप्रसिद्ध', ५६ का 'महावेध', ५७ का 'प्रलयाख्य', ५८ का 'महाप्रलयाख्य', ५९ का 'घोराख्य' और ६० का 'राक्षसाख्य' वेध होता है। ये सब साम्प्रदायिक वेध हैं। और 
(९) वैष्णवोंमें ४५ तथा ५५ का वेध त्याज्य होता है... एकादशीके १ उन्मीलिनी, २ वञ्जुली, ३ त्रिस्पृशा, ४ पक्षवर्धिनी, ५ जया, ६ विजया, ७ जयन्ती औरः ८ पापनाशिनी - ये आठ भेद और हैं। इनमें त्रिस्पृशा (तीनोंको स्पर्श करनेवाली) एकादशी (यथा सूर्योदयमें एकादशी, तत्पश्चात् द्वादशी और दूसरे सूर्योदयमें त्रयोदशी हो वह) महाफल देनेवाली मानी गयी है।..... एकादशीके नित्य और काम्य दो भेद हैं। निष्काम की जाय, वह 'नित्य' और धन-पुत्रादिकी प्राप्ति अथवा रोग-दोषादिकी निवृत्तिके निमित्त की जाय, वह 'काम्य' होती है। नित्यमें मलमास या शुक्रास्तादिकी मनाही नहीं; किंतु काम्यमें शुभ समय होनेकी आवश्यकता है। 

व्रतविधि सकाम और निष्काम दोनोंकी एक है। यदि असामर्थ्य अथवा आपत्तिः आदि अमिट कारणोंसे नित्य व्रत न किया जा सके तो एकभक्त, नक्तव्रत, अयाचित अथवा दूसरेके द्वारा व्रत हो जाय तो कोई दोष नहीं। यद्यपि दिनक्षय, सूर्यसंक्रान्ति और चन्द्रादित्यके ग्रहणमें व्रत करना वर्जित है; किंतु एकादशीके नित्य व्रतके लिये ऐसे अवसरमें भी फल-मूलादिसे परिहार कर लेनेकी आज्ञा है। यदि एकादशीके नित्य-व्रतके दिन (माता-पिता आदिका) नैमित्तिक श्राद्ध आ जाय तो श्राद्ध और उपवास दोनों करे; किंतु श्राद्धीय भोजनको (जिसे पुत्रको भी करना चाहिये) दाहिने हाथमें लेकर सूँघ ले और गौको खिलाकर स्वयं उपवास रखे।... व्रतके दूसरे दिन पारण किया जाता है। उस दिन यदि द्वादशी बहुत कम हो और नित्य-कर्मके पूर्ण करनेमें देर लगे तो प्रातःकाल और मध्याह्नकालके दोनों काम उषःकालमें कर ले। यदि संकटवश पारण न हो सके तो केवल जल पीकर पारण करे। इनके अतिरिक्त अन्य विधान आगे वैशाखादिके व्रतोंमें यथास्थान दिये गये हैं। एकादशीका व्रत करनेवालेको चाहिये कि वह प्रथमारम्भका व्रत मलमन्सादिमें न करे। 

गुरु-शुक्रके उदयके चैत्र, वैशाख, माघ या मार्गशीर्षकी एकादशीसे आरम्भ करके श्रद्धा, भक्ति और सदाचारसहित सदैव करता रहे। व्रतके (दशमी, एकादशी और द्वादशी - इन) तीन दिनोंमें कांस्यपात्र, मसूर, चने, मिथ्याभाषण, शाक, शहद, तैल, मैथुन, द्यूत और अत्यम्बुपान - इनका सेवन न करे। व्रतके पहले दिन (दशमीको) और दूसरे दिन (द्वादशीको) हविष्यान्न (जौ, गेहूँ, मूँग, सेंधा नमक, काली मिर्च, शर्करा और गोघृत आदि) का एक बार भोजन करे। 
दशमीकी रातमें एकादशीके व्रतका स्मरण रखे और एकादशीको प्रातः स्नानादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर 'मम कायिकवाचिकमानसिकसांसर्गिकपातकोपपातक- दुरितक्षयपूर्वकश्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्तये श्रीपरमेश्वरप्रीतिकामनया विजयैकादशीव्रतमहं करिष्ये' यह संकल्प करके जितेन्द्रिय होकर श्रद्धा, भक्ति और विधिसहित भगवान्‌का पूजन करे। उत्तम प्रकारके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि अर्पण करके नीराजन करे । तत्पश्चात् जप, हवन, स्तोत्रपाठ और मनोहर गायन-वादन और नृत्य करके प्रदक्षिणा और दण्डवत् करे। इस प्रकार भगवान्‌की सेवा और स्मरणमें दिन व्यतीत करके रात्रिमें कथा, वार्ता, स्तोत्रपाठ अथवा भजन आदिके साथ जागरण करे। फिर द्वादशीको पुनः पूजन करनेके पश्चात् पारण करे।...यद्यपि 
एकादशीका उपवास अस्सी वर्षकी आयु होनेतक करते रहना आवश्यक है. किंतु असामर्थ्यादिवश सदैव न बन सके तो उद्यापन करके समाप्त करे। 

उद्यापनमें सर्वतोभद्रमण्डलपर सुवर्णादिका कलश स्थापन करके उसपर भगवान्‌की स्वर्णमयी मूर्तिका शास्त्रोक्त-विधिसे पूजन करे। घी, तिल, खीर और मेवा आदिसे हवन करे। दूसरे दिन द्वादशीको प्रातःस्नानादिके पीछे गोदान, अन्नदान, शय्यादान, भूयसी आदि देकर और ब्राह्मण-भोजन कराकर स्वयं भोजन करे। ब्राह्मण-भोजनके लिये २६ द्विजदम्पतियोंको सात्त्विक पदार्थोंका भोजन कराके सुपूजित और वस्त्रादिसे भूषित २६ कलश (प्रत्येकको एक-एक) दे। चैत्र कृष्ण एकादशी 'पापमोचिनी' है। यह पापोंसे मुक्त करती है। च्यवन ऋषिके उत्कृष्ट तपस्वी पुत्र मेधावीने मनुघोषाके संसर्गसे अपना सम्पूर्ण तप-तेज खो दिया था, किंतु पिताने उससे चैत्र कृष्ण एकादशीका व्रत करवाया। तब उसके प्रभावसे मेधावीके सब पाप नष्ट हो गये और वह यथापूर्व अपने धर्म-कर्म, सदनुष्ठान और तपश्चर्यामें संलग्न हो गया।

(७) वारुणीयोग १ - (वाचस्पति-निबन्ध) - यह पुण्यप्रद महायोग तीन प्रकारका होता है। पहला चैत्र कृष्ण त्रयोदशीको वारुण नक्षत्र (शतभिषा) हो तो 'वारुणी', दूसरा उसी दिन शतभिषा और शनिवार हो तो 'महावारुणी' और तीसरा शतभिषा, शनिवार और शुभ योग हो तो 'महामहावारुणी' होता है। इस योगमें गङ्गादि तीर्थस्थानोंमें स्नान, दान और उपवासादि करनेसे शतशः सूर्यग्रहणोंके समान फल होता है। उस दिनका पुण्यकाल पञ्चाङ्गसे ज्ञात हो सकता है। 

(उदाहरणार्थ तीनों योग इस प्रकार हैं। चैत्र कृष्ण त्रयोदशी १३।७, शतभिषा १७ । ५- इस दिन प्रातः १३।७ तक 'वारुणी'; चैत्र कृष्ण १३ शनिवार ५।१५, शतभिषा ३० । ३२ - इस दिन ५।१५ तक महावारुणी; और चैत्र कृष्ण १३ शनिवार ५० । ५५, शतभिषा २२ । २० और शुभयोग १३।७- इस दिन पूर्वाह्नमें १३ घड़ी ७ पलतक महामहावारुणी मानना चाहिये। त्रयोदशीमें नक्षत्रादि जितनी देर रहें उतनी घड़ीतक वारुणी आदि रहते हैं।) 

(८) प्रदोषव्रत (स्कन्दपुराण) - यह व्रत शिवजीकी प्रसन्नता और

प्रभुत्वकी प्राप्तिके प्रयोजनसे प्रत्येक मासके कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंमें त्रयोदशीको किया जाता है। शिवपूजन और रात्रि-भोजनके अनुरोधसे इसे 'प्रदोष' कहते हैं। इसका समय सूर्यास्तसे दो घड़ी रात बीतनेतकर है। जो मनुष्य प्रदोषके समय परमेश्वर (शिवजी) के चरण कमलका अनन्य मनसे आश्रय लेता है उसके धन-धान्य, स्त्री-पुत्र, बन्धु-बान्धव और सुख-सम्पत्ति सदैव बढ़ते रहते हैं। यदि कृष्ण पक्षमें सोम और शुक्ल पक्षमें शनि हो तो  उस प्रदोषका विशेष फल होता है' । कृष्ण-प्रदोषमें प्रदोषव्यापिनी परविद्धा त्रयोदशी ली जाती है। उस दिन सूर्यास्तके समय पुनः स्त्रान करके शिवमूर्तिके समीप पूर्व या उत्तरमुख होकर बैठे और हाथमें जल, फल, पुष्प और गन्धाक्षत लेकर 'मम शिवप्रसादप्राप्तिकामनया प्रदोषव्रताङ्गीभूतं शिवपूजनं करिष्ये' यह संकल्प करके भालपर भस्मके भव्य तिलक और गलेमें रुद्राक्षकी माला धारण करे। उत्तम प्रकारके गन्ध, पुष्प और बिल्व-पत्रादिसे उमा-महेश्वरका पद्धतिके अनुसार पूजन करे। यदि साक्षात् शिवमूर्तिका सांनिध्य प्राप्त न हो सके तो भीगी हुई चिकनी मिट्टीको 'हराय नमः' से ग्रहण करके 'महेश्वराय नमः' से कुक्कुटाण्ड अथवा कराङ्गुष्ठके प्रमाणकी मूर्ति बनाये। फिर 'शूलपाणये नमः' से प्रतिष्ठा और 'पिनाकपाणये नमः' से आवाहन करके 'शिवाय नमः' से स्नान कराये और 'पशुपतये नमः' से गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पण करे। तत्पश्चात् 'जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन । 
जय दुस्तरसंसार- सागरोत्तारण प्रभो ॥ 
प्रसीद मे महाभाग संसारार्तस्य खिद्यतः । 
सर्वपापक्षयं कृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ।' से प्रार्थना करके 'महादेवाय नमः' से पूजित मूर्तिका विसर्जन करे। इस व्रतकी पूर्ण अवधि २१ वर्षकी है, परंतु समय और सामर्थ्य न हो तो उद्यापन करके इसका विसर्जन करे। विशेष विधान आगे वैशाखादिके व्रतोंसे जान सकते हैं।


(९) केदारदर्शन (पृथ्वीचन्द्रोदय) - चैत्र कृष्ण चतुर्दशीको केदारनाथका ध्यान और मानसोपचार पूजन करके व्रत करे और बन सके तो गङ्गास्नान करके एकभुक्त व्रत करे तो इस व्रतके करनेसे केदारनाथके दर्शनोंके समान फल होता है और जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

(१०) चैत्री अमा (हेमाद्रि)- चैत्र कृष्ण अमावस्याको प्रातः- स्नानादिके पीछे यथासामर्थ्य अन्न, गौ, सुवर्ण और वस्त्रादिका दान, पितरोंका श्राद्ध और देवताओंके समीप जप-ध्यान और पूजन करके ब्राह्मण-भोजन कराये तो बहुत पुण्य होता है। यदि इस दिन सोम, भौम अथवा गुरुवार हो तो ऐसे योगके दान-पुण्य, ब्राह्मण-भोजन और व्रतसे सूर्यग्रहणके समान फल होता है।

(११) वह्निव्रत (विष्णुधर्मोत्तर) - यह चैत्र कृष्ण अमावस्याको किया जाता है। इसमें परविद्धा अमा लेनी चाहिये। व्रतके पहले दिन (चैत्र कृष्ण चतुर्दशीको) नित्यके स्नानादिसे निवृत्त होकर अग्निदेवकी सुवर्णनिर्मित मूर्तिका गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करे और अमावस्याको 'ॐ अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे तिल, घी और शर्कराका हवन करे। इस प्रकार वर्षपर्यन्त करनेके पश्चात् वह्निकी मूर्ति ब्राह्मणको दे दे। (१२) पितृव्रत (विष्णुधर्म)- चैत्र कृष्ण प्रतिपदासे अमावस्यातक प्रभास्वर, बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, क्रव्याद, भूत, आज्यपति और सुकालिन् नामके पितरोंका पूजन करनेसे पित्रीश्वर प्रसन्न होते हैं।

🌺🌺🌺🌺🪷🪷 व्रत और त्योहार 🪷🪷🌺🌺🌺🌺

1. मस्यन्ते परिमीयन्ते चन्द्रवृद्धिक्षयादिना ।(मदनरत्न)
2. अर्कसंक्रान्त्यवधिः सौरः ।
3. त्रिंशद्दिनः सावनः ।
4. पक्षयुक्तश्चान्द्रः । (माधवीय)
5. सर्वर्क्षपरिवर्तेस्तु नाक्षत्रो मास उच्यते ।(विष्णु)
6. सौरो मासो विवाहादौ ।
7. यज्ञादौ सावनः स्मृतः ।
8. आब्दिके पितृकार्ये च चान्द्रो मासः प्रशस्यते ।(गर्ग)
9. नक्षत्रसत्राण्यन्यानि नाक्षत्रे च प्रशस्यते । (विष्णु)
10. 'चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि ।(बृहन्नारदीय)
11. व्रतोत्सवे च शुक्लादि ।
12. कृष्णादि तिथिकर्मणि ।(ब्रह्म)
13. यदा संक्लेशितो मर्यो नानादुःखैश्च दारुणैः । 
तदा कृष्णे चतुर्थ्यां वै पूजनीयो गणाधिपः ॥(भविष्यपुराण)
14. चतुर्थी गणनाथस्य मातृविद्धा प्रशस्यते । 
मध्याह्रव्यापिनी चेत् स्यात् परतश्चेत् परेऽहनि ॥ (बृहस्पति)
15. व्रतमात्रेऽष्टमी कृष्णा पूर्वा शुक्लाष्टमी परा।
16. भक्षयेद् वटकान् पूपांश्चैत्रे शीतजलान्वितान् । वैशाखे सक्तुकं तावत् साज्यं शर्करयान्वितम् ॥ एवं या कुरुते नारी व्रतं वर्षचतुष्टयम् । तत्कुले नोपसर्पन्ति गलगण्डग्रहादयः ॥ विष्फोटकभयं घोरं कुले तस्य न जायते। शीतले ज्वरदग्धस्य पूतगन्धगतस्य च ॥ प्रणष्टचक्षुषः पुंसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम् । (स्कन्द०)
17. वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कतमस्तकाम् ॥ (शीतलास्तोत्र)

18. एकादशी सदोपोष्या पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः । (सनत्कुमार)

19. यथा विष्णुः शिवश्चैव तथैवैकादशी स्मृता । (वराहपुराण)

20. विधवाया वनस्थस्य यतेश्चैकादशीद्वये ।
उपवासो गृहस्थस्य शुक्लायामेव पुत्रिणः ॥ (कालादर्श)

21. समात्मा सर्वभूतेषु निजाचाराद‌विप्लुतः ।
विष्ण्वर्पिताखिलाचारः स हि वैष्णव उच्यते। (शैवः खलूच्यते) ।। (स्कन्द)

१. एकादशी सदोपोष्या पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः । (सनत्कुमार)

२. यथा विष्णुः शिवश्चैव तथैवैकादशी स्मृता । (वराहपुराण)

३. विधवाया वनस्थस्य यतेश्चैकादशीद्वये ।
उपवासो गृहस्थस्य शुक्लायामेव पुत्रिणः ॥ (कालादर्श)

४. समात्मा सर्वभूतेषु निजाचाराद‌विप्लुतः ।
विष्ण्वर्पिताखिलाचारः स हि वैष्णव उच्यते। (शैवः खलूच्यते) ।। (स्कन्द)

१. संसाराख्यमहाघोरदुःखिनां सर्वदेहिनाम् । एकादश्युपवासोऽयं निर्मितं परमौषधम् ॥ (वसिष्ठ)
एकादशीं परित्यज्य योऽन्यद्वतमुपासते । 
स करस्थं महारत्नं त्यक्त्वा लोष्ठं हि याचते ।। (स्मृत्यन्तर)
अष्टवर्षाधिको मयों ह्यपूर्णाशीतिवत्सरः ।
 एकादश्यामुपवसेत् पक्षयोरुभयोरपि ।। (कात्यायन)
२. वैष्णवो वाथ शैवो वा सौरोऽप्येतत् समाचरेत् । (सौरपुराण)
१. अरुणोदय आद्या स्याद् द्वादशी सकले दिनम् ।
अन्ते त्रयोदशी प्रातस्त्रिस्पृशा सा हरेः प्रिया ॥ (ब्रह्मवैवर्त०)
२. एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च। 
उपवासेन दानेन न निर्धादशिको भवेत् ॥ (मार्कण्डेय)
३. दिनक्षयेऽर्कसंक्रान्तौ ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः । 
उपवासं न कुर्वीत पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥ (मत्स्यपुराण)
४. उपवासो यदा नित्यः श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत् । 
उपवासं तदा कुर्यादाघ्राय पितृसेवितम् ॥(कात्यायन)
१. स्नात्वा सम्यग् विधानेन सोपवासो जितेन्द्रियः । 
सम्पूज्य विधिवद् विष्णुं श्रद्धया सुसमाहितः ॥

१. पुष्पैर्गन्धैस्तथा धूपैर्दपिनैवेद्यकैः परैः।
उपचारैर्बहुविधैर्जपहोमप्रदक्षिणैः
स्तोत्रैर्नानाविधैर्दिव्यैर्गीतवाद्यमनोहरैः
दण्डवत् प्रणिपातैश्च गीतैर्वाद्यैः जयशब्दैस्तथोत्तमैः ।।
संस्तवैश्च पुराणश्रवणादिभिः ।
एवं सम्पूज्य विधिवद् रात्रौ कृत्वा प्रजागरम् ॥
याति विष्णोः परं स्थानं नरो नास्त्यत्र संशयः ।(ब्रह्मपुराण)
१. चैत्रासिते वारुणऋक्षयुक्ता त्रयोदशी सूर्यसुतस्य वारे। योगे शुभे सा महती महत्या गङ्गाजलेऽर्कग्रहकोटितुल्या ।। (त्रिस्थलीसेतु)

१. शिवपूजानक्तभोजनात्मकं प्रदोषम् ।(हेमाद्रि)
२. प्रदोषोऽस्तमयादूर्ध्वं घटिकाद्वयमिष्यते ।(माधव)
प्रदोषोऽस्तमयादूर्ध्वं घटिकात्रयमिष्यते ।(गौड़ग्रन्थ)
३. ये वै प्रदोषसमये परमेश्वरस्य कुर्वन्त्यनन्यमनसोऽङ्घ्रिसरोजसेवाम् ।
नित्यं प्रवृद्धधनधान्यकलत्रपुत्रसौभाग्यसम्पदधिकास्त इहैव लोकाः ॥(स्कन्द०)

१. यदा त्रयोदशी यदा त्रयोदशी कृष्णा सोमवारेण संयुता । शुक्ला मन्दवारेण संयुता ॥ 
तदातीव फलं प्राप्तं धनपुत्रादिकं लभेत् । (हेमाद्रि)
२. शुक्लत्रयोदशी पूर्वा परा कृष्णा त्रयोदशी । (माधव)
यदा तु कृष्णपक्षे परविद्धा न लभ्यते तदा पूर्वविद्धा ग्राह्या । (वसिष्ठ)
३. हरो महेश्वरश्चैव शूलपाणिः शिवः पशुपतिश्चैव पिनाकधृक् । महादेवेति पूजयेत् ॥ (शिवपूजा)



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