दीपावली 2023 विशेष नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स

दीपावली 2023 विशेष 
नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स
से साभार
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शुभ दीपावली विधि-विधान से करें पूजन
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दिवाली पूजन की सामग्री
कलावा, रोली, सिंदूर, नारियल, अक्षत (चावल), लाल वस्त्र, फूल, 5 सुपारी, लौंग, पान के पत्ते, घी, कलश, कलश के लिए आम का पत्ते, चौकी, समिधा, हवन कुड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, फल, बताशे, मिठाईया, पूजा में बैठने के लिए आसन, हल्दी, अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, रुई, आरती की थाली, कुशा, चंदन ।

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दिवाली पूजा की तैयारी

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन शुरू करने से पहले गणेश-लक्ष्मी के विराजने की जगह पर रंगोली बनाए। जिस चौकी पर पूजन कर रहे है उसके चारों कोने पर एक-एक दीपक जलाए। इसके बाद प्रतिमा स्थापित करने वाले स्थान पर कच्चे चावल रखें फिर गणेश और लक्ष्मी की प्रतिमा को विराजमान करें। लक्ष्मी जी को गणेश जी के दाहिनी ओर रखें। उनके सामने दो बड़े दीपक रखे, एक में तेल और दूसरे में घी भरे। दिवाली पूजन के मौके पर कुबेर, सरस्वती और काली माता की पूजा भी की जाती है। इनकी मूर्ति हो तो उन्हें भी पूजा की जगह पर विराजमान करें।

पूजन की विधि

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन शुरू करने से पहले गणेश-लक्ष्मी के विराजने की जगह को अच्छे-से साफ करे। वहा रंगोली बनाए और गंगा जल छिड़ककर इस मंत्र का जाप करना चाहिए, 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्था गतोपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्ष सः बाह्याभ्यतर शुचिः । लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी का ध्यान करें और मूर्तियों को चौकी पर आदर और श्रद्धाभाव के साथ बैठाए। अब आचमन करना होगा। इसके लिए दाहिने हाथ मे जल लेकर तीन बार आचमन करे और बोले,
ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः। ॐ गोविन्दाय नमः । हस्त प्रक्षालयामि ।

ऊपर बताए मंत्र पढ़ने के बाद हाथ धो लें। इसके बाद ही दीप प्रज्ज्वलित करना चाहिए। दीप जलाते समय बोले, 'दीप ज्योति महादेवि शुभं भवतु मे 'सदा'। फिर मां लक्ष्मी का आह्वान करे इसके लिए आह्वान की मुद्रा में बैठकर कहे, 'हे महादेवी लक्ष्मी, मै आपका आह्वान करता हूँ। आप मेरा आह्वान स्वीकार करे और पधारे।' पाच फूल हाथ में लेकर अर्पित करे और मां से 'श्री लक्ष्म्यै देव्यै पंच पुष्पाणि समर्पयामि' कहते हुए आसन ग्रहण करने का निवेदन करें। इसके बाद मां लक्ष्मी का यह कहकर

स्वागत करे 'श्री लक्ष्मी देवि स्वागतम्' । स्वागत के बाद मां के चरण प्रक्षालन के लिए 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै पाद्यं समर्पयामि' बोलते हुए उनके चरणो मे जल समर्पित करें। फिर उनके सिर के अभिषेक के लिए 'श्रीलक्ष्मी देव्यै अर्घ्यं समर्पयामि। कहकर अर्घ्य दें। सिर के अभिषेक के बाद स्नान

कराया जाता है। इसके लिये 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै जल समर्पयामि' कहते हुए गंगा जल मिश्रित जल से स्नान करवाएं। अगले चरण में पंचामृत स्नान कराते है। इसका मंत्र है, 
'श्रीलक्ष्मीदेव्यै पंचामृत स्नानं समर्पयामि। 
फिर 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै गंधं समर्पयामि' कहकर कराते हैं ।

गंध स्नान।

इसके बाद शुद्ध जल से स्नान करवाया जाता है। जल स्नान के लिए कहे 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । फिर मां लक्ष्मी को वस्त्र समर्पित किए जाते है। मौली का एक टुकड़ा लेकर 'श्री 'लक्ष्मीदेव्यै वस्त्र समर्पयामि' कहते हुए मा लक्ष्मी को समर्पित कर दें। अब बारी है मधु पर्क समर्पित करने की। मधुपर्क यानी दूध और शहद का मिश्रण समर्पित करने के लिए बोले, 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै मधुपर्क समर्पयामि । मधुपर्क के बाद मां लक्ष्मी को आभूषण समर्पित किया जाता है। इसके लिए बोलते है,
' श्रीलक्ष्मीदेव्यै आभूषणानि समर्पयामि ।
आभूषण के बाद मां को रक्त चंदन यानी लाल चंदन समर्पित करते हैं। इसके लिए कहें, 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै रक्तचंदन समर्पयामि'। इसके बाद मां को सिंदूर चढ़ाते है। 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै सिदूरं समर्पयामि' कहते हुए उन्हें सिंदूर समर्पित करें। फिर 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै कुंकुम समर्पयामि' कहते हुए कुमकुम चढ़ाएं। 

अब होगा षोडशोपचार पूजन। इसके तहत 16 प्रकार के भिन्न-भिन्न पदार्थ मां लक्ष्मी के चरणों में समर्पित किए जाते हैं। इनकी भी प्रक्रिया पहले जैसी है। मंत्र पढ़ते हुए एक-एक पदार्थ मां को समर्पित करते जाए।

सबसे पहले मां के चरणों में अगर गुलाल समर्पित चढ़ाते है। इसका मंत्र है, 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै अबीर गुलाललं समर्पयामि । सुगंधित द्रव्य के लिए कहते हैं, 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै सुगंधिततैल समर्पयामि। सुगंधित

तेल के बाद मां को अक्षत समर्पित करें। इसके लिए बोलना चाहिए, 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै अक्षतं समर्पयामि'। फिर चंदन समर्पित किया जाता है। 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै 'चंदन समर्पयामि' कहते हुए चंदन चढ़ाएं। चंदन के बाद 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै पुष्पाणि समर्पयामि' कहते हुए उनके चरणों में पुष्प अर्पित करें।
पुष्प समर्पण के बाद मां लक्ष्मी की प्रतिमा के सभी अंगों का पूजन किया जाता है। इसके लिए अपने बायें हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर दाहिने हाथ से मां लक्ष्मी की प्रतिमा के आगे छोड़ते जाएं, 
ॐ चपलायै नमः। पादौ पूजयामि । 
ॐ चंचलायै नमः । जानुनी पूजयामि । 
ॐ कमलायै नमः। कटिं पूजयामि । 
ॐ कात्यायन्यै नमः । नाभि पूजयामि ।  
ॐ जगन्मात्रै नमः । जठरं पूजयामि । 
ॐ विश्व-वल्लभायै नमः। वक्ष स्थलं पूजयामि ।
ॐ कमल-वासिन्यै नमः। हस्तौ पूजयामि ।।
ॐ कमल-पत्राक्ष्यै नमः । नेत्र-त्रयं पूजयामि ।
ॐ श्रियै नमः। शिरः पूजयामि ।

अंग पूजन के बाद अष्ट सिद्धि के पूजन का विधान है। पहले की तरह अपने बाएं हाथ में अक्षत और फूल लेकर मां लक्ष्मी की प्रतिमा के साथ ही इस प्रकार से अष्ट सिद्धि पूजन करें। एक-एक मंत्र के उच्चारण के बाद अक्षत और पुष्प समर्पित करते जाएं,
'ॐ अणिम्ने नमः'
'ॐ महिम्ने नमः'
'ॐ गरिम्णे नमः'
'ॐ लघिम्ने नमः'
'ॐ प्राप्त्यै नमः'
'ॐ प्रकाम्यै नमः'
'ॐ ईशितायै नमः'
'ॐ वशितायै नमः'

अष्ट सिद्धि के लक्ष्मी का पूजन भी करना चाहिए। अष्ट लक्ष्मी के पूजन के लिए भी पहले की तरह ही अक्षत लेकर इन मंत्रों के साथ अक्षत समर्पित करते जाए।

इसके बाद श्रीलक्ष्मी देव्यै धूपं समर्पयामि' कहते हुए उन्हें धूप समर्पित करें। धूप के बाद मां को 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै दीपं समर्पयामि' कहते हुए दीप समर्पित करें। 'श्रीलक्ष्मी देव्यै नैवेद्य समर्पयामि कहते हुए नैवेद्य, 'श्रीलक्ष्मी देव्यै जलं समर्पयामि' मंत्र के साथ जल और 'श्रीलक्ष्मी देव्यै चंदन समर्पयामि' का जाप करते हुए चंदन अर्पित कीजिए। फिर मां के चरणों में 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै मुखवासार्थं पूगीफलयुक्त तांबूलं समर्पयामि' कहते हुए तांबूल यानी पान और सुपारी चढ़ाएं। तांबूल समर्पण के बाद 'श्रीलक्ष्मीदेव्यै सुवर्णपुष्प दक्षिणां समर्पयामि कहते हुए धन समर्पित करे। दक्षिणा के बाद अपने हाथों में फूल लेकर मां की प्रतिमा के बाएं से दाएं ओर प्रदक्षिणा करें और पुष्प समर्पित करें। मन ही मन में मां से कहें कि हे लक्ष्मी माता, मुझसे जितने भी पाप हुए है उनके लिए मैं आपसे क्षमा मांगता हूं। यह कहते हुए पुष्पांजलि समर्पित कर दें और मां के चरणों में साष्टांग प्रणाम करें। आरती करके प्रसाद बांटें।

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पूजन में पढ़ी जाती है दिवाली की यह कथा

किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसकी एक बेटी थी। वह रोजाना घर के सामने लगे पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाती थी। उस पीपल में लक्ष्मी जी का वास था। एक दिन उसी पीपल के पेड़ से लक्ष्मी जी प्रकट हो गई और साहूकार की बेटी से बोली, 'मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हू। इसलिए तुझे सहेली बनाना चाहती हूं।' साहूकार की बेटी बोली, 'क्षमा कीजिए, मैं अपने माता-पिता से पूछकर ही बताऊगी।' उसने घर आकर अपने माता-पिता से सारी बातें कहीं और उनकी आज्ञा से लक्ष्मी जी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस तरह वे दोनों सहेलिया बन गई। लक्ष्मी

जी उससे बहुत प्रेम करती थी। एक दिन लक्ष्मी जी ने उसे भोजन के लिए बुलावा दिया। जब साहूकार की बेटी भोजन करने के लिए पहुची तो लक्ष्मी जी ने उसे सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खिलाया। सोने की चौकी पर बिठाया और उसे बहुत कीमती रेशमी कपड़े ओढ़ने- पहनने के लिए दिए। इसके बाद लक्ष्मी जी ने कहा कि कुछ दिन बाद मै तुम्हारे यहां आऊंगी। साहूकार की बेटी ने 'हा' कर दी और घर चली आई। उसने जब सारी बाते माता-पिता को बताई तो वे बहुत खुश हुए। 

लेकिन बेटी कुछ सोचकर उदास होकर बैठ गई। जब साहूकार ने इसका कारण पूछा तो उसकी बेटी बोली, 'लक्ष्मी जी का वैभव बहुत बड़ा है। मैं उन्हें कैसे सतुष्ट कर सकूगी ?" यह सुनकर पिता ने कहा कि घर की जमीन को अच्छी तरह लीपना और अपनी पूरी श्रद्धा से रूखा-सूखा जैसा भी भोजन बने, उसे बहुत प्रेम से लक्ष्मी जी को खिला देना। पिता बात पूरी ही करने वाले थे कि एक चील कही से उड़ती हुई आई और बेशकीमती नौलखा हार साहूकार के आगन में गिराकर चली गई। यह देखकर साहूकार की बेटी खुश हो गई। उसने पिता की बात मानी और घर को सुंदर तरीके के सजाया। जमीन की सफाई- लिपाई की। चील ने जो हार उनके घर में गिराया था, उसे बेचकर लक्ष्मी जी के लिए अच्छे भोजन का इंतजाम किया। 

उन्होंने सोने की चौकी और रेशमी दुशाला खरीदा। जब लक्ष्मी जी घर आई तो साहूकार की बेटी ने उन्हें सोने की चौकी पर बैठने को कहा। इस पर लक्ष्मी जी ने कहा, 'इस पर तो राजा-रानी बैठते है।" इतना कहकर वह साफ जमीन पर ही आसन बिछाकर बैठ गई और बहुत प्रेम से भोजन किया। यह साहूकार के परिवार के आदर-सत्कार से बहुत खुश हुई और उनका घर सुख-संपत्ति से भर गई। हे लक्ष्मी माता। जिस तरह आपने साहूकार के परिवार पर अपनी कृपा बरसाई, उसी तरह सबके घरों को सुख- संपत्ति से भर देना।

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लक्ष्मी जी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। 
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता ॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग माता। 
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख संपत्ति दाता । 
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता ।। 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता | 
कर्म-प्रभाव - प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता ॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

जिस घर में तुम रहती, सब सदण आता। 
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता ॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता । 
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता ॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

शुभ - गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता । 
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता ॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता। 
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता ॥ 
ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
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1. आदि लक्ष्मी
यह जीवन की राह पर हमारा मार्गदर्शन करती है ताकि हम अपनी आध्यात्मिक समृद्धि को बढ़ाते रहे। यह देवी हमें अपने भीतर झांककर आत्मा को खोजने और महसूस करने में सहायता करती हैं। इससे हम भय से मुक्त होकर सतोष और आनंद को पा सकते हैं।

2. संतान लक्ष्मी
यह परिवार को समृद्ध करती हैं। परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, बेटा-बेटी, जीवनसाथी तो आते ही है। हमारे बौद्धिक व आध्यात्मिक मित्र भी शामिल है। समृद्धि से तात्पर्य धन-संपदा, स्वास्थ्य धन, बौद्धिक धन और आध्यात्मिकता से भी है। इससे हम लंबा और सक्रिय जीवन जीते हैं।

3. धन लक्ष्मी
धन लक्ष्मी हमे धन-दौलत देती है ताकि हम उस धन का उपयोग सबके फायदे के लिए कर सकें। जो लोग धन को ही लक्ष्मी मानकर जमा करते जाते हैं, वे दुखी रहते हैं। इसलिए धन का सदुपयोग करना चाहिए। इससे हम अपनी इस दुनिया को सबके लिए बेहतर जगह बना सकते हैं।

4. वीर/ धैर्य लक्ष्मी
हमें साहस और धैर्य देने वाली देवी है वीर लक्ष्मी। यह जीवन में विपरीत परिस्थितियां आने पर उसका सामना करने की हिम्मत देती है। हम भारी बाधाओं के आने पर भी बिना घबराए आगे बढ़ने में सक्षम होते है। इसलिए धैर्य लक्ष्मी होने से ही जीवन में तरक्की मिल सकती है।

5. धान्य लक्ष्मी
धान्य लक्ष्मी खुश होकर हमें खुशहाल जीवन देती है जिससे हम इसे खुलकर जी सके। हमारे खाने- पीने में किसी चीज की कमी न हो। यह अन्न की देवी भी है और हम सबके अन्न के भंडार भरे रखती हैं। इसलिए धन लक्ष्मी के साथ-साथ धान्य लक्ष्मी की जरूरत भी होती है।

6. विद्या लक्ष्मी

इनके पास ज्ञान का खजाना है। इनके पूजन से हमें शिक्षा और ज्ञान का यह खजाना मिलता है। इसके बाद हम जीवन के सभी उतार- चढ़ावों को और हर पक्ष को समता के भाव से संभाल सकते हैं। विद्या के आने पर ही जीवन में स्थिरता आती है और ज्ञान का सही उपयोग किया जा सकता है।

गज लक्ष्मी

अपनी उगली घर ग के प्रकोप से सबकी कि कार्तिक महीने म बल्कि करती है तो जब ब्रज मंडल के की झड़ी लगा दी। को अन्नकूट भी क भोग भगवान को लग विश्वकर्मा पूजन भी

हमे राजसी ठाट-बाट और गरिमापूर्ण जीवन गज लक्ष्मी से मिलता है। यह हमारा खजाना हमेशा भरा रखती है। इससे हम दूसरों का जीवन भी समृद्ध बनाने का काम कर सकते हैं क्योंकि यह उर्वरता और समृद्धि की देवी है। इनकी कृपा से धन वैभव और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

विजय लक्ष्मी

यह लक्ष्मी हमें जीवन के हर मोर्चे पर विजय दिलाती हैं। सबसे जरूरी है कि हम अपने पांचों विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार) पर काबू पाएं। विजय लक्ष्मी ही मनोविकारों और हमारे आध्यात्मिक परिवार को विजय पाने के योग्य बनाती है।

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दिवाली पूजन और अमावस्या

इस साल विक्रम संवत् 2080 मे कार्तिक कृष्ण अमावस्या रविवार 12 नवंबर 2023 को दोपहर 2 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर सोमवार को दोपहर 2 बजकर 56 मिनट तक रहेगी। अमावस्या तिथि, स्वाति नक्षत्र, रविवार का संयोग लुम्बक नामक विराट योग का निर्माण करेगा जो राजा प्रजा के गौरव को बढ़ाएगा। व्यापारी और उद्योगपति को नई ऊर्जा देगा। ब्रह्म पुराण मे प्रदोषकाल से लेकर निशीथकाल तक रहने वाली अमावस्या को श्रेष्ठ कहा गया है।

व्यापारी वर्ग के लिए लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त

■ सुबह 7 बजे से 9:30 बजे तक ऑटोमोबाईल वर्कशॉप, ताबा, पीतल, कासा एवं स्टील का व्यवसाय करने वाले व्यक्ति महालक्ष्मी पूजन करे।

■ सुबह 11 बजकर 28 मिनट से दोपहर 1 बजकर 11 मिनट तक कलकारखानों, ट्रासपोटरी, डॉक्टरों एवं होटल का व्यवसाय करने वालों के लिए लक्ष्मी पूजन का विशेष मुहूर्त। यही अभिजीत मुहूर्त भी है जिसमे पूजन करना चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, पॉपर्टी डीलरों आदि को लाभ देगा।

■ दोपहर 2 बजकर 38 मिनट से 4 बजकर 3 मिनट तक तेजी-मंदी का व्यापार करने वालो, फाइनेंसरो और बैंको को लक्ष्मी पूजन करना चाहिए।

घर पर कितने बजे करें लक्ष्मी पूजन

शाम 5:27 PM से
रात 8:09 PM तक
प्रदोषकाल का दिवाली महालक्ष्मी पूजन में सबसे ज्यादा महत्व होता है। प्रदोषकाल का मतलब है दिन-रात्रि का संयोग। यह शाम 5 बजकर 27 मिनट से रात 8 बजकर 9 मिनट तक रहेगा। प्रदोषकाल मे ही मेष, वृष लग्न और शुभ अमृत चर के चौघड़िया भी विराजमान रहेंगे। दिन विष्णु रूप और रात्रि लक्ष्मी रूपा है। प्रदोष काल के स्वामी भगवान सदाशिव स्वयं है। इसमे स्वाति नक्षत्र से बना मृदु मैत्र संज्ञक योग व्यापारियों व गृहस्थियो के लिए दिवाली, महालक्ष्मी, कुबेर, दवात-कलम, तराजू, बाट, तिजोरी आदि के पूजन के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा। अगर इस लग्न में पूजन न हो सके तो भी पूजा स्थल में दीपक जलाकर प्रतिज्ञा संकल्प कर लेना चाहिए।

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भगवान महावीर के निर्वाण का दिन है दिवाली
भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थकर है। कहा जाता है कि भगवान महावीर ने बिहार के पावापुरी में कठिन तपस्या करके कार्तिक अमावस्या की शुभ बेला में ही निर्वाण पाया था। एक दिव्य ज्योति परम ज्योति में विलीन हो गई। देवताओं ने भगवान महावीर की पूजा-अर्चना की और पावापुरी को द्रव्य दीपों से जगमग कर दिया। देवताओं और राजाओं ने ज्ञान लक्ष्मी की पूजा की और दीपपर्व शुरू हो गया।
इस साल दिवाली के दिन से भगवान महावीर का 2550वा निर्वाण महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। उनके बताए 5 सिद्धातों पर जितना अमल करेंगे, हमारा जीवन उतना ही सरल हो जाएगा। उन्होंने मानव के प्रति ही प्रेम और मित्रता से रहने का संदेश नहीं दिया बल्कि मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति से लेकर हर जीव के साथ मेलजोल और अहिसक बर्ताव रखने का संदेश दिया।
दुनिया को दिए 5 अनमोल सिद्धांत
अहिंसा 
हमें अपने मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव के साथ हिंसा नहीं करनी चाहिए।

सत्य 
मनुष्य को हमेशा सत्य वचन ही बोलने चाहिए। मानव जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य 'मोक्ष' भी सत्य द्वारा ही पाया जा सकता है।

अपरिग्रह 
धन को जोड़ना, रखना और खोना, ये तीनों ही अवस्थाएं दुख पहुंचाती हैं। इसलिए धन-दौलत को जोड़कर रखने की इच्छा न करना अपरिग्रह है। जरूरत से ज्यादा संचय करना परेशानियों को बुलावा देना होता है।

अचौर्य (अस्तेय)
किसी दूसरे की चीज को बिना उसके दिए हुए ग्रहण नहीं करना चाहिए। जैन ग्रंथ में इसे चोरी कहा गया है।

ब्रह्मचर्य 
कामुक आनंद में लिप्त नही होना चाहिए। साथ ही इस शरीर से भी मोह नहीं रखना चाहिए।

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लक्ष्मी क्यों हैं सबसे चंचल देवी?

देवियों में लक्ष्मी का किरदार अनूठा है। वह जितना सदाचारी के पास दिखती है, उतना ही खल-पात्रों के यहां भी। देवी लक्ष्मी के इसी अनूठे रूप के बारे में बता रहे हैं – देवदत्त पट्टनायक

जब हम लक्ष्मी को उन लोगों के हाथों में पाते है, जिन्हें हम अपराधी और पापी मानते है तो हमें बुरा लगता है। हमें यह बात बहुत अखरती है और गलत लगती है। लेकिन पौराणिक कथाओं को जब आप खगालेंगे तो पाएंगे कि सभी खलनायक धनवान थे। रावण सोने की लंका में रहा। दुर्योधन ताउम्र विलासिता में जिया। राम को वनवास झेलना पड़ा। पांडवों का जन्म और ज्यादातर जीवन वन में ही बीता। वह भी बहुत दरिद्रता में।

तो क्या लक्ष्मी को बुरे लोग पसंद है? या क्या वह नैतिकता, औचित्य और सदाचार की परवाह नहीं करती? लक्ष्मी अर्थ यानी धन का प्रतीक है। आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों का प्रतीक। प्राचीन काल के ऋषि कहते है कि अर्थ, जीवन के चार उद्देश्यों में से एक है। तीन दूसरे उद्देश्य है: धर्म अर्थात सामाजिक व्यवस्था, काम अर्थात खुशी की चाह और मोक्ष अर्थात आध्यात्मिकता की प्राप्ति।

कुछ शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी, धर्म के पालनहार विष्णु का साथ देती है। कहते हैं कि इंद्रिय सुखों के देवता कामदेव लक्ष्मी के पुत्र है। लेकिन लक्ष्मी तो अक्सर विष्णु के शत्रु असुरो के साथ भी दिखाई देती है। सब जानते हैं कि लक्ष्मी के आने से कलह भी होती है। आखिर इसका रहस्य क्या है, आइए इसे समझते है।

लक्ष्मी को समझने के लिए, पहले हमें इस बात को समझना होगा कि धन का सबसे मौलिक रूप पौधों, खनिजों, पानी और पेट्रोल के रूप में धरती के नीचे से आता है। इसलिए लक्ष्मी को पाताल-निवासिनी भी कहते है। पाताल लोक, जहा असुर रहते है। असुरों के राजा पुलोमन है। पुलोमन के गुरु, भार्गव कुल के शुक्राचार्य है। उनकी बेटी होने के नाते लक्ष्मी पुलोमी और भार्गवी के नाम से भी जानी जाती हैं। कुछ शास्त्रों में लक्ष्मी समुद्र के देवता, वरुण की बेटी बताई गई हैं। वेदों में वरुण को भी असुर कहा गया है। असुर उन शक्तियों को कहा जाता था, जो धन को अपने में बद रखते थे, जैसे समुद्र, पाताललोक और पेड़-पौधे अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र और इद्र जैसे देव धरती के ऊपर रहते थे और इस धन को मुक्त करते थे। 

असुर और देव दोनों ब्रह्मा की सताने है, जो अलग-अलग माओ से जन्मे है। असुर धन का निर्माण करते है और देव उस धन को असुरों से लेते है। इसलिए असुर नहीं, बल्कि देवों को पूजा जाता था। 0 इस तरह लक्ष्मी असुर-पुत्री और देव-पत्नी है। इद्र की सहचारी शची, लक्ष्मी का रूप है। इंद्र और इतर देवता अप्सराओ और गधव से घिरे हुए होते है। वे संगीत, नृत्य और गायन से देवताओं का मनोरंजन करते है। कल्पतरु, कामधेनु, चिंतामणि और अमृत होने के कारण इंद्र के निवास स्थान को स्वर्ग कहते है और वहा किसी चीज की कोई कमी नहीं है। इतना होते हुए भी इंद्र असुरक्षित रहते है। वह इस बात से डरे रहते है कि वह अपना धन खो देंगे। असुरों के विपरीत वह धन केवल जमा कर सकते हैं, उसका निर्माण नहीं कर सकते। 

देव और असुर दोनों सुखी नही है। दे लक्ष्मी को पकड़े रखने की कोशिश करते हैं पर सफल नहीं होते। लक्ष्मी को चचला भी कहा जाता है, जो लगातार अस्थिर रहती है। लक्ष्मी का पीछा सभी करते हैं, लेकिन वह केवल विष्णु के प्रति आकर्षित होती हैं।

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लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा क्यों?

1. दिवाली की रात लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा होती है। यह सवाल उठता है कि लक्ष्मी जी के साथ विष्णु जी की पूजा क्यों नहीं होती? इसके पीछे कई वजहें मानी जाती है। पहली वजह यह है कि लक्ष्मी सिर्फ धन की देवी नहीं बल्कि सौभाग्य, सुख, संपदा, यश और कीर्ति की देवी भी है। ये सारी चीजे अगर हमे बिना शुद्ध बुद्धि के मिल भी जाएं तो नष्ट हो जाती है। इसलिए बुद्धि के देवता गणेश जी की पूजा लक्ष्मी जी के साथ की जाती है जिससे कि सौभाग्य, सुख, संपदा और यश हमारे जीवन में कायम रहे।

2. दूसरी वजह यह है कि देवशयनी एकादशी से लेकर 2 देवोत्थान एकादशी तक भगवान विष्णु योग निद्रा में शयन करते है। ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा के अनुसार मा पार्वती ने तपस्या करके भगवान विष्णु के अश गणेश जी को अपने पुत्र के रूप पाया था। इसलिए भगवान विष्णु की गैरमौजूदगी में उनके अंश बुद्धि के देवता की उपासना लक्ष्मी जी के साथ की जाती है।

3. तीसरी वजह यह है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी को अपनी श्रेष्ठता पर अहकार हो गया था। तब भगवान विष्णु ने उनके अहकार को नष्ट करने के लिए उन्हें संतानहीन होने को लेकर ताना दिया। चूंकि पार्वती के एक पुराने शाप की वजह से कोई भी देवता सतान पैदा नही कर सकते थे इसलिए लक्ष्मी जी ने पार्वती जी से उनके पुत्र गणेश को अपने मानस पुत्र के रूप में मांग लिया ।। लक्ष्मी जी चचला है इसलिए पार्वती जी अपने पुत्र गणेश के लक्ष्मी के साथ जाने की बात पर चितित हो गई। उन्होंने शर्त रखी कि वह जहां भी जाएंगी, उनके साथ हमेशा गणेश जी रहेंगे। दरअसल गणेश जी को भूख ज्यादा लगती है। इसलिए भी पार्वती लक्ष्मी जी से यह आश्वासन चाहती थी कि गणेश कही भूखे न रह जाए। लक्ष्मी जी ने मा पार्वती को यह वचन दिया कि वह जहां भी जाएंगी गणेश उनके साथ ही जाएंगे और जब तक गणेश की उनके पुत्र वरदान नही देगी। के रूप में पूजा नही होगी, मां लक्ष्मी किसी को भी

1 दिवाली की रात लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा होती है। यह सवाल उठता है कि लक्ष्मी जी के साथ विष्णु जी की पूजा क्यों नहीं होती? इसके पीछे कई वजहें मानी जाती है। पहली वजह यह है कि लक्ष्मी सिर्फ धन की देवी नहीं बल्कि सौभाग्य, सुख, संपदा, यश और कीर्ति की देवी भी है। ये सारी चीजे अगर हमे बिना शुद्ध बुद्धि के मिल भी जाएं तो नष्ट हो जाती है। इसलिए बुद्धि के देवता गणेश जी की पूजा लक्ष्मी जी के साथ की जाती है जिससे कि सौभाग्य, सुख, संपदा और यश हमारे जीवन में कायम रहे।

दूसरी वजह यह है कि देवशयनी एकादशी से लेकर 2 देवोत्थान एकादशी तक भगवान विष्णु योग निद्रा में शयन करते है। ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा के अनुसार मा पार्वती ने तपस्या करके भगवान विष्णु के अश गणेश जी को अपने पुत्र के रूप पाया था। इसलिए भगवान विष्णु की गैरमौजूदगी में उनके अंश बुद्धि के देवता की उपासना लक्ष्मी जी के साथ की जाती है।

3 तीसरी वजह यह है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी को अपनी श्रेष्ठता पर अहकार हो गया था। तब भगवान विष्णु ने उनके अहकार को नष्ट करने के लिए उन्हें संतानहीन होने को लेकर ताना दिया। चूंकि पार्वती के एक पुराने शाप की वजह से कोई भी देवता सतान पैदा नही कर सकते थे इसलिए लक्ष्मी जी ने पार्वती जी से उनके पुत्र गणेश को अपने मानस पुत्र के रूप में मांग लिया ।। लक्ष्मी जी चचला है इसलिए पार्वती जी अपने पुत्र गणेश के लक्ष्मी के साथ जाने की बात पर चितित हो गई। उन्होंने शर्त रखी कि वह जहां भी जाएंगी, उनके साथ हमेशा गणेश जी रहेंगे। दरअसल गणेश जी को भूख ज्यादा लगती है। इसलिए भी पार्वती लक्ष्मी जी से यह आश्वासन चाहती थी कि गणेश कही भूखे न रह जाए। लक्ष्मी जी ने मा पार्वती को यह वचन दिया कि वह जहां भी जाएंगी गणेश उनके साथ ही जाएंगे और जब तक गणेश की उनके पुत्र के रूप में पूजा नही होगी, मां लक्ष्मी किसी को भी वरदान नही देगी। 

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रोशनी न कम हो, न ज्यादा

कुछ लोग कहते है कि दिवाली बाजार का त्योहार है। हफ्तों तक खरीदारी चलती है। कभी घर के लिए कोई नया सामान लाना होता है तो कभी अपने या परिवार के लिए। कु परसों लक्ष्मी-गणेश और दीये खरीदने मार्केट गई तो देखा कि हर तरफ रंग-बिरंगी बिजली की लड़ियों की नुमाइश लगी थी। लड़िया भी एक से एक कुछ साल पहले कम रोशनी वाली झिलमिलाती लड़ियां होती थी जो जलती- बुझती रहती थी लेकिन अब तो लंबे-लंबे एलईडी पाइप आ गए है। इन्हें रोप लाइट भी कहते है जो भरपूर रोशनी देते है। कुछ ऐसी ही लड़िया हमारी सोसाइटी में भी लगा दी गई है जिनसे इतनी रोशनी हो गई कि लगता है जैसे चांद-तारे जमीं पर उतर आए है।

• मुझे दो दर्जन मिट्टी के छोटे दीये और दो बड़े दीये खरीदने थे। मार्केट में एक बुजुर्ग किसी कोने में जमीन पर बैठे दिखे। झुर्रियोवाले चेहरे पर बिलकुल सफेद दाढी, सफेद कुर्ता और रंगीन पगड़ी। ऐसा लगा कि जैसे कोई राजस्थान से एनसीआर में दीये लेकर आया है। पूछने पर बताया कि 10 रुपये के 12 मिलेंगे। कुछ दीयों के किनारे झड़ गए थे। मैने संभालकर दो दर्जन दीये चुनकर अलग कर दिए। फिर पूछा कि आप बनाकर लाए है ये दीये? वह बोले, 'नहीं, मैं सिर्फ बेचने आया हूं। मेरा परिवार बनाता है लेकिन इस चार तो सब फीका है। अब तक देर ऐसा ही पड़ा है। 100 दीये भी नहीं बिके। सबको बिजली वाले और मोम के दीये चाहिए। कौन तेल-बत्ती वाले दीये जलाए ?' यह बताते हुए वह खुद ही सवाल करके अपनी बात का जवाब दे रहे थे। मैं यह सोचते हुए आगे बढ़ गई कि हजारो रुपयों की बिजली वाली लड़ियां खरीदने वाले हम, मिट्टी वाले दीयो की परम्परा कब भूल गए पता ही नहीं चला।

हफ्ते भर पहले अहोई थी। उस व्रत में तारों को देखकर जल चढ़ाया जाता है। लेकिन पलूशन से भरे आसमान में मेरे लिए तारों को खोजना बहुत बड़ा काम था। मुश्किल से दो तारे दिखाई दिए तो जल चढ़ाया। यह पराली का पलूशन था। लेकिन यह नहीं भी होता तो रोशनी का पलूशन होता। इस आर्टिफिशल रोशनी में जुगनू की चमक खो गई है, तारे हमसे और दूर हो गए है। यह सच है कि अब शहरों की तेज दूधिया रोशनी में बच्चों को तारों भरा आसमान नहीं दिखता। उनकी नजरें चांद के अलावा कुछ नहीं देख पातीं। चांद भी अब अपनी चांदनी बिखेरता हुआ वैसा नहीं दिखता, जैसा कभी हम अपने बचपन में देखा करते थे। हमें रोशनी की भी एक सीमा तय करनी ही होगी। रोशनी की अति नहीं होनी चाहिए। तारों को देखने के लिए थोड़ा अंधेरा भी चाहिए। जुगनू को अंधेरे में अपनी रोशनी बिखेरना अच्छा लगता है। जंगल कटने और शहर बसने के अलावा जुगनू की प्रजाति घटने की एक वजह यह भी है कि उसे इतनी रोशनी में अपना साथी ही नहीं दिखता। इससे उसका जीवन खतरे में पड़ गया है। सोचिए जरा, जो जीव डायनासोर के युग से धरती पर रह रहा था, उसे हम शहरों की बेशुमार रोशनी से खत्म कर रहे है। हमें बेवजह इतनी आर्टिफिशल रोशनी क्यों चाहिए? बाहरी रोशनी से सराबोर हम अपने मन को रोशन करने के बारे में क्यों नहीं सोचते? रोशनी के कई रूप होते है। अच्छाई की रोशनी और सच की रोशनी भी होती है। किसी को खुश करके उसकी आंखों में जो चमक आती है, वह हमारे मन को भी रोशन करती है। तब हम खुद रोशनी बन जाते है। कुछ दिन पहले एक टेड टॉक सुन रही थी जिसमें लेखक और म्यूजिशन रेयान ब्रोलियर कहते हैं, 'ज़रा कल्पना करें कि हम सबके अंदर एक रोशनी है।। लेकिन सबकी रोशनी एक जैसी नहीं होती। कुछ ज्यादा तेज होती है, कुछ रंगीन और कुछ हल्की। अगर हम सिर्फ अपनी रोशनी के बारे में सोचेंगे तो अकेले पड़ जाएंगे। जब हम सबकी रोशनी के बारे में सोचेंगे तो दूसरों की जिंदगी में उजाला भर सकते हैं। हम सबके पास यह ताकत है। यह ताकत है अच्छाई की।' रेयान ने ही 'द म्यूजिक इज मेडिसन टूर' की शुरुआत की है। इसके बारे में बताते हुए वह कहते हैं, 'साल 2015 में मुझे यह खबर मिली थी कि मेरी रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर है। वह शरीर में फैल रहा था। । उस लम्हे में मुझे लगा कि कुछ करना चाहिए। कभी-कभी जिंदगी में ऐसे लम्हे आते है जब आप खुद से बात करते है। आंखें बंद करके अपने मन में झांकते है और पहली बार मेरी जिंदगी में वह वक्त आया था। मेरे सपने और लक्ष्य सब कुछ थम गया। मुझे लगा कि वह ट्यूमर मेरे अंदर है तो मुझे ही उससे पार पाना होगा। मैने खुद से प्यार करना शुरू किया। मैं इतना ही समझ सका था कि अगर में खुद से प्यार नहीं करूंगा तो कौन करेगा? मेरे अंदर जैसे कोई ताकत आ गई। खैर, ट्यूमर का ऑपरेशन कर दिया गया। अब मेरे पास एक मकसद था। मुझे शांति चाहिए थी। मैं चाहता था कि उस शांति की खोज में निकलूं और दुनिया घूम लूं। मैं उस सच और शांति की तलाश में 13 देशों में घूमा, जहां के लोगों ने शांति और प्रेम को अपनी जिंदगी का मकसद बनाया है। ये ऐसी जगहें थी जहां दुनिया के 5 महान धर्मो की शुरुआत हुई। नेपाल से मैंने सफर शुरू किया और चीन तक गया। वहां मैने बौद्ध धर्म को जाना।

फिर भारत गया और हिंदू धर्म को जाना। उसके बाद मिडल ईस्ट में गया और ओमान व कतर में इस्लाम की स्टडी की। आखिर में इस्राइल में जाकर यहूदी और ईसाई धर्म के बारे में जाना। फिर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि हमें प्यार और शांति की तलाश में दुनिया घूमने की जरूरत नहीं है।

हर धर्म में प्रेम और शांति की बात की गई है। यह आपको हर शख्स के भीतर मिल जाएगी।' वह आगे बताते हैं कि एक दिन मेरी दोस्त का फोन आया जो कैंसर स्पेशलिस्ट है। उसने बताया कि बच्चों के अस्पताल में गिटार बजाने के लिए एक वॉलंटियर की जरूरत है। इससे बच्चे खुश हो जाएंगे। मैं तैयार हो गया। वहां एक महिला ने आकर कहा कि क्या मैं उसकी बेटी के लिए गिटार बजा सकता हूं। वह 12 साल की बच्ची थी जो सर्जरी के लिए गई थी लेकिन उसे गंभीर इन्फेक्शन हो गया था। मैने उसके कमरे में जाकर गिटार बजाया। मैं बच्ची के फेवरेट गाने बजाते हुए उसकी खुशी महसूस कर रहा था। मैंने इससे पहले कभी किसी के लिए ऐसा नहीं किया था। मुझे नहीं पता था कि इतना छोटा-सा काम किसी की जिंदगी में इतनी होनी पहुंचा सकता है।

अब आप सोच रहे होंगे कि हम और आप क्या कर सकते हैं। सबसे पहले तो यही जान लें कि हमें जरूरत भर की बाहरी रोशनी की जरूरत होती है। आर्टिफिशल रोशनी बच सकें तो बढ़िया और मन की रोशनी को बढ़ाएं। हमें अपने आसपास की बाहरी रोशनी को सीमित करना होगा। अपने शुद्ध मन की रोशनी से हम दूसरों के जीवन का अंधकार मिटा सकते है। आप चाहे जिस भी धर्म को मानते हों, ऐसा कर सकते हैं। हर धर्म में अपने भीतर की रोशनी को बढ़ाने के उपाय बताए गए हैं। हम उन उपायों को अपने जीवन में अपनाएं। मन को सकारात्मक कामों की तरफ ले जाएं। इस खुशी के मौके पर बिजली की लड़ियां भी लगाएं लेकिन किसी टिमटिमाते दीये का तेल कम न हो, हमें इसका भी ध्यान रखना होगा। हमें सूर्य की रोशनी भी चाहिए और चांद की चांदनी भी। इस संतुलन के साथ ही मनेगी हैपी दिवाली।




त्योहार पर भगवान की पीतल की मूर्ति साफ करें चुटकियों में

दिवाली के समय घर में रखी एक-एक चीज को साफ किया जाता है। क्योंकि मान्यता यह है कि मां लक्ष्मी उसी घर में आती है, जहां साफ-सफाई हो । अब ऐसे में पूजा रूम में रखी भगवान की मूर्ति को गंदा छोड़ने की गलती कैसे की जा सकती है। यदि यह मूर्तियां पीतल की हैं, तो इसके कालेपन को हटाने के लिए हम यहां कुछ नुस्खे बता रहे है।

इमली और पानी का प्रयोग

इमली से पीतल की खोई हुई चमक को वापस लाना बहुत आसान है। इसके लिए, इमली को पानी में 15 मिनट के लिए भिगोकर छोड़ दें। अब इसे मूर्ति पर अच्छी तरह घिसे, इसके लिए आप सॉफ्ट स्क्रब भी प्रयोग कर सकते है। अब इसे 10 मिनट के लिए ऐसी छोड़ने के बाद साफ पानी से धो लें।

नींबू और बेकिंग सोडा
सबसे पहले नीबू के रस और बेकिंग सोडा को मिक्स करके पेस्ट तैयार करें। अब इसमें सूती के कपड़े को भिगो ले और मूर्ति को रगड़कर साफ कर लें। 20 मिनट इसे ऐसे ही छोड़ने के बाद साफ पानी से मूर्ति को धोकर अच्छे से पोछ लें।

आटा और विनेगर
पोतल की काली मूर्ति को दोबारा चमकाने के लिए आप आटा और विनेगर का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए दोनों को बराबर मात्रा में मिलाकर पेस्ट तैयार करें। यदि आपके पास सेधा नमक है तो इसे भी पेस्ट में मिला लें। फिर इसे मूर्तियों पर लगाकर 30-40 मिनट के लिए छोड़ दें। अब गर्म पानी में इसे रगड़ते हुए साफ कर ले।

यह तरीका भी है जबरदस्त
पीतल की गदी मूर्तियों को साफ करने के लिए आप ऊपर बताई गई चीजों के अलावा आप टोमेटो केचअप, या नीबू और नमक का पेस्ट भी यूज कर सकते है। इसे मूर्ति पर लगाकर कुछ देर छोड़ने से पीतल का सारा कालापन दूर हो जाता है।

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केसर का सेवन रखेगा एनर्जी से भरपूर

त्यो हार में बनने वाले पकवानो में केसर का इस्तेमाल एक आम बात है, लेकिन केसर सबसे शक्तिशाली जड़ी बूटियों में से एक है। इसके सेवन से कई फायदे मिलते हैं। # कैंसर में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान देते है। यह प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स जैसे- कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, और फॉस्फोरस का खजाना है। 
★ कैंसर में भारी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं। केसर की चाय पीने से कैंसर की कोशिकाओं को खत्म करने में मदद मिलती है।
★ केसर में दो रसायन, क्रोसिन और क्रोमेटिन होते हैं। यह केमिकल दिमाग के कामकाज को बढ़ावा देते है जिससे आपको सीखने और स्मृति को बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

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दिवाली होगी मजेदार अगर घर में बनाएंगे ये लजीज रेसिपी

दि वाली का त्योहार हो और घर वालो के लिए कुछ मीठा ना बनाया जाए, भला ऐसा कैसे हो सकता है। वैसे तो खुशी के मौके पर लोग खीर और सेवई बनाना ज्यादा पसंद करते है, मगर आज चलिए कोई नई चीज ट्राय करते हैं। इस मौके पर अगर आप पनीर की खीर बनाकर सबका मुंह मीठा करेंगे तो आप यकीन मानिए वे सब अपनी उंगलियां चाटते रह जाएंगे।

सामग्री

★ 1 लीटर दूध (4 कप)
★ 200 ग्राम पनीर
★ 1/2 कप चीनी
★ 10 केसर के धागे
★ 1/2 चम्मच इलायची पाउडर
★ 2 बड़े चम्मच कटे हुए

पनीर की खीर बनाने का तरीका

सबसे पहले पनीर को कद्दूकस करके अलग रख ले। एक सॉस पैन में दूध डाले। केवल फुल क्रीम दूध का उपयोग करें। दूध को उबाल कर धीमी आंच पर पकाए। इसे तब तक पकाएं जब तक कि दूध लगभग आधा न रह जाए। अब चीनी डालें। फिर केसर के धागे डालें। इसे अच्छी तरह मिलाएं, फिर से कुछ मिनट तक धीमी आंच पर पका कसा हुआ पनीर डालें। अच्छे से मिलाकर 2-3 मिनट तक पकाए। ऊपर से इलायची पाउडर और मेवे डालें। अच्छी तरह मिलाए और गैस को बंद कर दे। आपकी पनीर खीर तैयार है। इसे ठंडा या गर्म परोसे। याद रखे यह खीर तभी स्वादिष्ट बनेगी जब आप इसमें फुल फैट वाला दूध प्रयोग करेंगे। आप चाहे तो गाय का दूध या पैकेट वाला दूध इस्तेमाल कर सकते हैं।

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अयोध्या बनेगी विश्व की सबसे सुंदर नगरी: योगी
एनबीटी ब्यूरो, अयोध्याः उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अयोध्या भगवान श्रीराम को प्रिय नगरी है। और इसे दुनिया की सबसे सुंदर नगरी के रूप में विकसित करने के लिए डबल इंजन की सरकार संकल्पबद्ध है। आज अयोध्या मे जितने पर्यटक आ रहे है, उससे 10 गुना पर्यटक आगामी मकर संक्रांति और 22 जनवरी 2024 को भव्य राम मंदिर के उद्घाटन के बाद यहां आने लगेंगे। अयोध्यावासी अभी से 'अतिथि देवो भवः' के संकल्प के साथ जुड़ जाऐ। उस ऐतिहासिक कार्यक्रम के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दें। मुख्यमंत्री योगी शनिवार को दीपोत्सव के अवसर पर रामकथा पार्क में प्रभु औराम, माता जानकी और लक्ष्मण जी के वंदन अभिनंदन और प्रतीकात्मक राज्याभिषेक कार्यक्रम के उपरांत संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि 2017 में जब दीपोत्सव का कार्यक्रम यहाँ शुरू हुआ था तब अयोध्यावासियो में उत्साह के साथ तमन्ना भी दिखती थी। आज 500 वर्षों के बलिदानों, आंदोलनो अभियानों के उपरांत प्रभु श्रीराम अपने भव्य मंदिर में विराजमान होने जा रहे हैं। अब अयोध्यावासियों को जिम्मेदारी बनती है कि 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भगवान श्रीराम को उनके भव्य मंदिर में विराजमान करने के लिए आएं, तब अयोध्या मे उनका स्वागत भी ऐतिहासिक होना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने सभी को दीपावली की हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि हम सब सौभाग्यशाली है कि हम यहां दीपोत्सव के साक्षी बने। यह दीपोत्सव दुनिया के 100 से अधिक देशों में लाइव हुआ। हमने सात साल पहले इस कार्यक्रम को जब शुरू किया तो असमंजस की स्थिति थी। उस वक्त पूज्य संतो और जनप्रतिनिधियों के सहयोग से यह जिस कार्यक्रम को शुरू किया गया. वो आज प्रधानमंत्री के एक भारत श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को साकार कर रहा है। हम सब नई अयोध्या को बनते हुए देख रहे है। अयोध्या में इस वक्त 30 हजार 500 करोड़ से विकास की 178 परियोजनाओं पर काम हो रहा है। अगर निजी क्षेत्र की भी भारीदारी जोड़ से तो आने वाले वक्त में यहां 50 हजार करोड़ की परियोजनाएं मूर्त रूप लेती दिखेंगी। 

भारत के अतीत में बसे हैं प्रभु श्रीरामः राज्यपाल
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि यह दिव्य दीपोत्सव भगवान राम की अयोध्या को पूरी दुनिया में प्रतिष्ठापित कर रहा है। भगवान श्रीराम और रामायण भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के वाहक है। हर घर में रामायण होती है। भारत सहित विश्व के अतीत में किसी ना किसी रूप में प्रभु श्रीराम रचे बसे हुए हैं। भगवान श्रीराम आदिवासियों और वनवासियों के भी पूज्यनीय है। यहां अयोध्या में मंदिर निर्माण के फलस्वरूप यहां रोजगार और आर्थिक रूप से बड़ा बदलाव आएगा।

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