कार्तिक की कहानी 01 || पंच भीखू देवता की कहानी || साहूकार की पतिव्रता पुत्रवधू ||
किसी गाँव में एक साहूकार रहता था और उसका एक बेटा व बहू भी थे। साहूकार की बेटी बहुत ही आदर्श और पतिव्रता नारी थी। पूजा पाठ दान आदि में उसकी बहुत रुचि थी। बहू हर वर्ष कार्तिक स्नान किया करती थी। वह कार्तिक माह में रोज सवेरे उठकर गंगा स्नान के लिए जाती थी। उसका नियम था कि वह किसी भी पराए पुरुष का मुँह नही देखती थी। इसलिए वह सुबह ब्रह्म मुहूर्त में ही जल्दी जाकर स्नान कर लिया करती थी।
एक बार उस राज्य के राजा के बेटे ने भी कार्तिक स्नान का प्रण लिया। वह जब भी सुबह सवेरे गंगा स्नान के लिए जाता तो वह हैरान होता कि मैं स्नान के लिए इतनी जल्दी उठता हूँ लेकिन कोई है जो मुझसे भी जल्दी उठकर नहा लेता है।
इस प्रकार कार्तिक माह बीतने में कुछ ही समय रह गया। अब कार्तिक माह के छः दिन ही बचे थे। जब एक दिन साहूकार की बहू स्नान करके वापिस जाने ही वाली थी कि ठीक उसी समय राजा का बेटा स्नान के लिए आ रहा था। आवाज सुनकर वह वहां से जल्दी-जल्दी जाने लगी। इसी जल्दबाजी में उसकी माला और मोजड़ी वहीं छूट गईं।
राजा के बेटे ने जब उसकी माला और मोजड़ी देखीं तो वह समझ गया कि कोई स्त्री है जो उससे पहले आकर स्नान कर लेती है। उसने माला और मोजड़ी उठा ली और सोचने लगा कि जिस स्त्री की यह माला और मोजड़ी इतनी सुंदर हैं वह स्त्री कितनी सुंदर होगी।
उसके मन में पापा आ गया। उसने पूरे गाँव में घोषणा करवा दी कि जिसकी यह माला और मोजड़ी है। वह पाँच रात मेरे पास आएगी। इस घोषणा से राजा की बेटे की सारे में थू थू होने लगी। प्रजा उसे बुरा भला कहने लगी। लेकिन राजा का बेटा है, कोई उसकी बात को कैसे टाल सकता था।
जब यह बात साहूकार के बेटे की बहू के पास पहुंची तो साहूकार के बेटे की बहू ने राजा की बेटी को संदेश भिजवाया कि यह माल और मोजड़ी मेरे हैं। अभी कार्तिक मास की पांच स्नान बाकी है। मैं पाँच रात गंगा स्नान के लिए आऊँगी। वही तुम मुझसे मिल लेना, लेकिन किसी को साख भरने अर्थात साक्षी होने के लिए बैठा लेना। जो यह बता सके की पांच रात्रि में है वहां आई थी।
राजा की बेटी ने सोचा कि उसे परम सुंदरी को तो मैं ही देखना चाहूंगा। राजा के बेटे ने किसी और को साक्षी बनाना उचित नहीं समझा। राजा के बेटे ने बोलने वाले एक शुग्गे अर्थात तोते को पिंजरे में बंद कर गंगा किनारे पेड़ पर टाँग दिया। और खुद बहू के इंतजार में बैठ गया।
बहू सुबह के समय आई, तो उसने राजा के बेटे को इंतजार में बैठे हुए देखा। उसने जैसे ही पहली पैड़ी पर पैर रखा तो वह हाथ जोड़कर बोली – “हे कार्तिक के ठाकुर, राई दामोदर, पाँचों पांडू, छठे नारायण, भीखम राजा, मुझ पर कृपा करो, मेरी लाज रखो। उस पापी को नीँद आ जाए।” उसके कहने के साथी ही राजा के बेटे को नींद आ गई।
बहू नहा-धोकर चलने लगी तो तोते से बोली – “सुग्गा-सुग्गा ! तेरे गल डालूँगी हीरा, मेरी साख भरियो वीरा।”
सुवा बोला, "कभी वीरा भी साख भरता है क्या ?"
वह फिर बोली – “सुग्गा-सुग्गा! सुबह तेरे पग घालूँगी नेवर, साख भरियो मेरे देवर।”
सुग्गा ने कहा – ठीक है भाभी, मैं तेरी साख रखूँगा।
वह तो कहकर चली गई, राजा का बेटा हड़बड़ा कर उठा और सुग्गा से पूछा – सुग्गा-सुग्गा वह आई थी क्या ? कैसी थी?
सुग्गा बोला – “आभा की सी बिजली, होली की सी झल, केले की सी कामिनी, गुलाब का सा रँग।”.
अगले दिन राजा के बेटे ने सोचा कि आज मैं अपनी अँगुली में चीरा लगाऊँगा। दर्द के मारे मुझे नींद नहीं आएगी। अगले दिन राजकुमार अंगुली चीरकर लेट गया। वह आई और भगवान से उसी तरह प्रार्थना करने लगी और राजकुमार को फिर नींद आ गई। वह स्नान कर के फिर से वापिस चली गई।
सुबह राजकुमार ने तोते से फिर पूछा तो उसने वही सारी बातें दोहरा दी। अब राजकुमार बोला कि आज रात मैं अपनी आँखों में मिर्ची डालकर बैठूंगा। फिर देखूंगा कैसे नींद आएगी। रात में वह मिर्ची डालकर बैठ गया। बहू फिर आई और उसने फिर वही प्रार्थना की जिससे उसे फिर से नींद आ गई।
राजकुमार ने तोते से बहू के आने की बात पूछी तो उसने फिर बता दी। राजकुमार अब फिर सोचने लगा कि शायद बस्तर की गर्मी से मुझे नींद आ जाती है इसलिए आज मैं बिना बिस्तरे के ही बैठूंगा, और वह रात को बिना बिस्तरे के ही बैठ गया।
पूनो नहाई, पड़वा नहाई।
पांच रतन पंच तीरथ पंच भीखम नहाई।
एक टका मेरी गाँठ में सुनियो रघुराई।
आधे का लाई आँवला आधे की राई।
राई दामोदर साँवला जिसने सृष्टि रचाई।
राजा के घर उतरी पुतरी बन आई।
राजा लाया ब्याह के रानी बन आई।
चार चक्कर चार मक्कर चार दिए की लौ।
मैं तुझसे पूछूँ श्रीकिशन जी कब निस्तारा होय।
जब आयेगा कार्तिक का महीना तब निस्तारा होय।
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