कार्तिक मास के प्रमुख त्योहार संपूर्ण जानकारी
कार्तिक मास के प्रमुख त्योहार
1. कार्तिक स्नान (हेमाद्रि)
धर्म-कर्मादि की साधना के लिये स्नान करने की सदैव आवश्यकता होती है। इसके सिवा आरोग्य की अभि-वृद्धि और उसकी रक्षा के लिये भी नित्य स्नान से कल्याण होता है। विशेषकर माघ, वैशाख और कार्तिक का नित्य स्नान अधिक महत्त्व का है।
कार्तिकं सकलं मासं नित्य-स्नायी जितेन्द्रियः ।
जपन् हविष्य-भुक्छान्तः सर्व-पापैः प्रमुच्यते ॥
मदन-पारिजात
कार्तिक मास में जितेन्द्रिय रहकर नित्य स्नान करे और हविष्य (जौ, गेहूँ, मूंग तथा दूध, दही और घी आदि) का एक बार भोजन करे तो सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत को आश्विन की पूर्णिमा से प्रारम्भ करके ३१ वें दिन कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को समाप्त करे। इसमें स्नान के लिये घर के बर्तनों की अपेक्षा कुंआ, बावली या तालाब आदि अच्छे होते हैं और कूपादि की अपेक्षा कुरुक्षेत्रादि तीर्थ, अयोध्या आदि पुरियाँ और काशी की पाँचों नदियाँ एक-से-एक अधिक उत्तम हैं। ध्यान रहे कि स्नान के समय जलाशय में प्रवेश करने के पहले हाथ-पाँव और मैल अलग धो ले। आचमन करके चोटी बाँध ले और जल-कुश जल- से संकल्प करके स्नान करे। संकल्प में कुशा लेने के लिये अंगिरा ने लिखा है..
विना दर्भेश्च यत् स्नानं यच्च दानं विनोदकम् ।
असंख्यातं च यज्जप्तं तत् सर्व निष्फलं भवेत् ॥
अंगिरा
स्नान में कुशा, दान में संकल्प का जल और जप में संख्या न हो तो ये सब फल- दायक नहीं होते।
यह लिखने की आवश्यकता नहीं कि धर्म-प्राण भारत के बड़े-बड़े नगरों, शहरों या गाँवों में ही नहीं, छोटे-छोटे टोले तक में भी अनेक नर-नारी (विशेष-कर स्त्रियाँ) बड़े सबेरे उठकर कार्तिक स्नान करतीं, भगवान् के भजन गाती और एकभुक्त, एकग्रास, ग्रास-वृद्धि, नक्तव्रत या निराहारादि व्रत करती हैं और रात्रि के समय देव-मन्दिरों, चौराहों, गलियों, तुलसी के बिरवों, पीपल के वृक्षों और लोकोपयोगी स्थानों में दीपक जलाती और लम्बे बाँस में लालटेन बाँध कर किसी ऊँचे स्थान में आकाशी दीपक' प्रकाशित करती है।
आश्विन शुक्ल निशीथ- व्यापिनी पूर्णिमाको
कोजागरव्रत (कृत्यनिर्णयादि) - आश्विन शुक्ल निशीथ- व्यापिनी पूर्णिमाको ऐरावतपर आरूढ हुए इन्द्र और महालक्ष्मीका पूजन करके उपवास करे और रात्रिके समय घृतपूरित और गन्ध-पुष्पादिसे सुपूजित एक लाख, पचास हजार, दस हजार, एक हजार या केवल एक सौ दीपक प्रज्वलित करके देवमन्दिरों, बाग-बगीचों, तुलसी- अश्वत्थके वृक्षों, बस्तीके रास्ते, चौराहे, गली और वास भवनोंकी छत आदिपर रखे और प्रातःकाल होनेपर स्नानादि करके इन्द्रका पूजनकर ब्राह्मणोंको घी-शक्कर मिली हुई खीरका भोजन कराकर वस्त्रादिकी दक्षिणा और स्वर्णादिके दीपक दे तो अनन्त फल होता है। इस दिन रात्रिके समय इन्द्र और लक्ष्मी पूछते हैं कि 'कौन जागता है ?' इसके उत्तरमें उनका पूजन और दीपज्योतिका प्रकाश देखनेमें आये तो अवश्य ही लक्ष्मी और प्रभुत्व प्राप्त होता है |
शरत्पूर्णिमा (कृत्यनिर्णयामृत)
इसमें प्रदोष और निशीथ दोनोंमें होनेवाली पूर्णिमा ली जाती है। यदि पहले दिन निशीथव्यापिनी हो और दूसरे दिन प्रदोषव्यापिनी न हो तो पहले दिन व्रत करना चाहिये ।
1 - इस दिन काँसीके पात्रमें घी भरकर सुवर्णसहित ब्राह्मणको दे तो ओजस्वी होता है,
2- -अपराह्नमें हाथियोंका नीराजन करे तो उत्तम फल मिलता है और
3- अन्य प्रकारके अनुष्ठान करे तो उनकी सफल सिद्धि होती है। इसके अतिरिक्त आश्विन शुक्ल निशीथव्यापिनी पूर्णिमाको प्रभातके समय आराध्यदेवको सुश्वेत वस्त्राभूषणादिसे सुशोभित करके षोडशोपचार पूजन करे और रात्रिके समय उत्तम गोदुग्धकी खीरमें घी और सफेद खाँड मिलाकर अर्द्धरात्रिके समय भगवान्के अर्पण करे। साथ ही पूर्ण चन्द्रमाके मध्याकाशमें स्थित होनेपर उनका पूजन करे और पूर्वोक्त प्रकारकी खीरका नैवेद्य अर्पण करके दूसरे दिन उसका भोजन करे ।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिकके व्रत
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कृष्णपक्ष
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिकमासकी महिमा
सृष्टिके मूल सूर्यको राश्यान्तर स्थितियोंके आधारपर दक्षिणायन और उत्तरायणका विधान है। भगवान् नारायणके शयन और प्रबोधनसे चातुर्मास्यका प्रारम्भ और समापन होता है। उत्तरायणको देवकाल और दक्षिणायनको आसुरीकाल माना गया है। दक्षिणायनमें देवकाल न होनेसे सतगुणोंके क्षरणसे बचने और बचानेके लिये उपासना तथा व्रत विधान हमारे शास्त्रोंमें वर्णित है। कर्कराशिपर सूर्यके आगमनके साथ ही दक्षिणायन कालका प्रारम्भ हो जाता है और कार्तिकमास इसी दक्षिणायन और चातुर्मास्यकी अवधिमें ही उपस्थित होता है। पुराणादि शास्त्रोंमें कार्तिकमासका विशेष महत्त्व निर्दिष्ट है। हर मासका यूँ तो अलग-अलग महत्त्व है, मगर व्रत एवं तपकी दृष्टिसे कार्तिककी बहुत महिमा बतायी गयी है-
मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनः ।
तीर्थं नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ ॥
(स्कन्दपु० वै० खं० का० मा० १।१४)
भाव यह है कि भगवान् विष्णु एवं विष्णुतीर्थके सदृश ही कार्तिकमासको श्रेष्ठ और दुर्लभ कहा गया है। कार्तिकमास कल्याणकारी मास माना जाता है।
एक दूसरे वचनमें कहा गया है कि कार्तिकके समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्ययुगके समान कोई युग नहीं, वेदके समान कोई शास्त्र नहीं और गङ्गाजीके समान कोई तीर्थ नहीं है-
न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम् ॥
न बेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गङ्गया समम्।
(स्कन्दपु० वै० का० मा० १।३६-३७)
सामान्यरूपसे तुलाराशिपर सूर्यनारायणके आते ही कार्तिकमास प्रारम्भ हो जाता है।
कार्तिकका माहात्म्य पद्मपुराण तथा स्कन्दपुराणमें बहुत विस्तारसे उपलब्ध है। कार्तिकमासमें स्त्रियाँ ब्राह्ममुहूर्तमें स्रानकर राधा-दामोदरकी पूजा करती हैं।
कलियुगमें कार्तिकमास-व्रतको मोक्षके साधनके रूपमें दर्शाया गया है। पुराणोंके मतानुसार इस मासको चारों पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाला माना गया है। स्वयं नारायणने ब्रह्माको, ब्रह्माने नारदको और नारदने महाराज पृथुको कार्तिकमासके सर्वगुणसम्पन्न माहात्यके संदर्भमें बताया है।
इस संसारमें प्रत्येक मनुष्य सुख, शान्ति और परम आनन्द चाहता है। कोई भी यह नहीं चाहता कि उसे अथवा उसके परिवारजनोंको किसी तरहका कोई कष्ट, दुःख एवं अशान्तिका सामना करना पड़े। परंतु प्रश्न यह है कि दुःखोंसे मुक्ति कैसे मिले? हमारे शास्त्रोंमें संत्राससे मुक्ति दिलानेहेतु कई उपाय निर्दिष्ट हैं, उनमें कार्तिकमासके स्रान-व्रतको अत्यन्त महिमा बतायी गयी है और बताया गया है कि इस मासका स्रान-व्रत लेनेवालोंको कई संयम, नियमोंका पालन करना चाहिये तथा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान्की आराधना करनी चाहिये। कार्तिकमें पूरे माह ब्राह्ममुहूर्तमें किसी नदी, तालाब, नहर या पोखरमें स्स्रानकर भगवान्की पूजा की जाती हैं। इस मासमें व्रत करनेवाली स्त्रियाँ अक्षयनवमीको आँवला-वृक्षके नीचे भगवान् कार्तिकेयकी कथा सुनती हैं।
तदुपरान्त जहाँ ब्राह्मणको अन्न-धन दानमें दिये जाते हैं, वहीं भतुआके अंदर गुप्तदान भी दिया जाता है। इसके साथ ही कुँआरों-कुँआरियों एवं ब्राह्मणोंको आँवला-वृक्षके नीचे विधिवत् भोजन कराया जाता है। वैसे तो पूरे कार्तिकमासमें दान देनेका विधान है। कहीं-कहीं तो अक्षयनवमीके दिन मेला भी लगता है।
कार्तिकमास कई अर्थोंमें अन्य मासोंसे अधिक. महत्त्व रखता है। इस मासकी अमावास्याको देशभरमें प्रकाशपर्व मनानेकी प्रथा है। इस प्रकाशपर्वको सभी धूमधामसे मनाते हैं। कहा जाता है कि प्रकाशपर्व अथया दीपावलीके दिन विष्णुप्रिया माता लक्ष्मी सर्वत्र भ्रमण करती हैं और अपने भक्तोंको हर तरहसे धन-धान्यमे
परिपूर्ण करती हैं। स्कन्दपुराणके वैष्णवखण्डमें कार्तिकव्रतके मास्त्रले विषयमें कहा गया है-
रोगापहं पातकनाशकृत्परं सद्बुद्धिदं पुत्रधनादिसाधकम्। मुक्तेर्निदानं नहि कार्तिकव्रताद् विष्णुप्रियादन्यदिहास्ति भूतले ॥
(स्कन्दपु० वै० का० मा० ५।३४)
इस मासको जहाँ रोगापह अर्थात् रोगविनाशक कहा गया है, वहीं सद्बुद्धि प्रदान करनेवाला, लक्ष्मीका साधक तथा मुक्ति प्राप्त करानेमें सहायक बताया गया है।
कार्तिकमासभर दीपदान करनेकी विधि है। आकाश दीप भी जलाया जाता है। यह कार्तिकका प्रधान कृत्य है। कार्तिकका दूसरा प्रमुख कृत्य तुलसीवन-पालन है। वैसे तो कार्तिकमें ही नहीं, हर मासमें तुलसीका सेवन कल्याणमय कहा गया है, किंतु कार्तिकमें तुलसी आराधनाकी विशेष महिमा है। एक ओर आयुर्वेदशास्त्रमें तुलसीको रोगहर कहा गया है, वहीं दूसरी ओर यह यमटतोंके भयसे मुक्ति प्रदान करती है। तुलसी-वन बताया गया है। पाँचवाँ द्विदलवर्जनको माना गया है। उड़द, मूग, मसूर, चना, मटर, राई वगैरहको गणना द्विदलमें की जाती है।
द्विदलं तिलतैलं च पक्वान्नं मूल्यदूषितम्।
अवदुष्टं शब्ददुष्टं वर्जयेत् कार्तिकव्रती ॥
कार्तिकव्रतीको चना, मटर आदि दालों, तिलका तेल, पक्वान्न, भाव तथा शब्दसे दूषित पदार्थोंका त्याग करना चाहिये।
विष्णुसंकीर्तन कार्तिकमासका मुख्य कृत्य है। संकीर्तनसे वाणीको शुद्धता मिलती है। कलियुगमें तो इसका और भी अधिक महत्त्व है-'कली हरिकीर्तनात्।' कथाश्रवणसे पापोंका नाश होता है, बुद्धि सदाचारी बनती है। कार्तिकव्रतीको चाहिये कि वह गीता, श्रीमद्भागवत और श्रीरामचरितमानस आदिका श्रवण करे। इसके अलावा कार्तिकव्रतीके लिये गोदान, अन्नदान, विष्णुपूजन, सत्य, अहिंसा आदि धर्मोका पालन आवश्यक है।
यदि कार्तिकमासके महत्त्वको वर्तमान परिप्रेक्ष्यमें देखें तो यह पायेंगे कि अश्वत्थपूजा, तुलसीवन-पालन एवं पूजन, आँवला-वृक्षका पूजन, गोपूजा, गङ्गाखान तथा पूजन, गोवर्धनपूजा आदिसे पर्यावरण शुद्ध होता है और मनुष्य प्रकृतिप्रिय बनता है। इस व्रतसे इहलोक और परलोक दोनोंमें यश, बुद्धि, बल, धन तथा सत्संगकी प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस मासको श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वाससे उत्सवकी भाँति मनाता है, वह सब तरहसे परिपूर्ण हो जाता है।
परम पावन कार्तिकमासका व्रत-विधान-मानव- जीवनमें कार्तिकमास शुचिता, स्नान और व्रतकी दृष्टिसे मोक्षका सर्वोत्तम साधन माना गया है। स्कन्दपुराणमें कार्तिकमासका महत्त्व भगवान् विष्णुके सदृश दर्लभ और तदनन्तर नाभिपर्यन्त जलमें खड़े होकर विधिपूर्वक ज्ञान करना चाहिये।
गृहस्थ व्यक्तिको काला तिल तथा आँवलेका चूर्ण लगाकर स्रान करना चाहिये, परंतु विधवा तथा संन्यासियोंको तुलसीके पौधेकी जड़में लगी हुई मृत्तिकाको लगाकर स्नान करना चाहिये। सप्तमी, अमावास्या, नवमी, द्वितीया, दशमी तथा त्रयोदशी - इन तिथियोंमें तिल एवं आँवलेका प्रयोग वर्जित है।
तिलामलकचूर्णेन गृही स्नानं समाचरेत्। विधवास्त्रीयतीनां तु तुलसीमूलमृत्सया ॥ सप्तमी दर्शनवमी द्वितीया दशमीषु च। त्रयोदश्यां न च स्नायाद्धात्रीफलतिलैः सह ।
कार्तिकमासमें पितरोंका तर्पण करनेसे पितरोंको अक्षयतृप्तिकी प्राप्ति होती है। तर्पणके पश्चात् व्रतीको जलसे बाहर आकर शुद्ध वस्त्र धारणकर भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये।
किसी प्रकारके तामसी एवं उत्तेजक पदार्थोंका सेवन व्रतीको नहीं करना चाहिये। पराये अन्नका भक्षण, किसीसे द्रोह करना तथा परदेशगमन भी व्रतीको करना उचित नहीं है। कार्तिकव्रतीको ब्रह्मचर्यका पालन, भूमिशयन, दिनके चतुर्थ प्रहरमें पत्तल आदिपर भोजन करना चाहिये।
कार्तिकमासमें स्नान एवं व्रत करनेवालेको केवल नरकचतुर (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) को ही तेल लगाना चाहिये।: दिनोंमें तेल लगाना वर्जित है। इसके अतिरिक्त कार्तिकव्रती लौकी, गाजर, कैथ, बैंगन आदि तथा बासी अन्न, पर अन्न, दूषित अन्नका भी भक्षण नहीं करना चाहिये। व्रती चाहिये कि वह मुनिवृत्तिसे रहे।
कार्तिक करने वाले मानवको देखकर यमदूत प्रकार पलायन कर जाते हैं, जिस प्रकार सिंहसे पीडि हाथी भाग खड़े होते हैं। इस भूतलपर भुक्ति में मुक्तिप्रदायक जितने भी तीर्थस्थान हैं, वे सभी कार्तिकव्रतो देहमें निवास करते हैं।
विष्णुव्रत करनेवाला प्राणी जिस किसी भी स्थान पूजित होकर रहता है, वहाँपर ग्रह-भूत-पिशाच आदि नः रहते-
विष्णुव्रतकरो नित्यं यत्र तिष्ठति पूजितः।
ग्रहभूतपिशाचाद्या नैव तिष्ठन्ति तन्त्र वै॥
उपर्युक्त विधिके अनुसार कार्तिकव्रती प्राणीके पुण्यक चतुर्मुख ब्रह्मा भी कहनेमें समर्थ नहीं हैं। जो भी मानर विष्णुप्रियकारी, समस्त पातकोंके नाशक, सत्पुत्र तथा धन- धान्यवृद्धिकारक कार्तिकव्रतका नियमपूर्वक पालन करता है , उसे तीर्थयात्राके महान् फलकी प्राप्ति होती है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
(1) कार्तिकस्नान (हेमाद्रि)
धर्म-कर्मादिकी साधनाके लिये स्नान करनेकी सदैव आवश्यकता होती है। इसके सिवा आरोग्यकी अभिवृद्धि और उसकी रक्षाके लिये भी नित्य स्नानसे कल्याण होता है। विशेषकर माघ, वैशाख और कार्तिकका नित्य स्नान अधिक महत्त्वका है। मदनपारिजातमें लिखा है कि -
'कार्तिकं सकलं मासं नित्यस्नायी जितेन्द्रियः ।
जपन् हविष्यभुक्छान्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते ।'
कार्तिक मासमें जितेन्द्रिय रहकर नित्य स्नान करे और हविष्य (जौ, गेहूँ, मूँग तथा दूध-दही और घी आदि) का एक बार भोजन करे तो सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रतको आश्विनकी पूर्णिमासे प्रारम्भ करके 31 वें दिन कार्तिक शुक्ल पूर्णिमाको समाप्त करे। इसमें स्नानके लिये घरके बर्तनोंकी अपेक्षा कुँआ, बावली या तालाब आदि अच्छे होते हैं और कूपादिकी अपेक्षा कुरुक्षेत्रादि तीर्थ, अयोध्या आदि पुरियाँ और काशीकी पाँचों नदियाँ एक-से-एक अधिक उत्तम हैं। ध्यान रहे कि स्नानके समय जलाशयमें प्रवेश करनेके पहले हाथ-पाँव और मैल अलग धो ले। आचमन करके चोटी बाँध ले और जल-कुशसे संकल्प करके स्नान करे। संकल्पमें कुशा लेनेके लिये अङ्गिराने लिखा है कि
'विना दर्भैश्च यत् स्त्रानं यच्च दानं विनोदकम् ।
असंख्यातं च यज्जप्तं तत् सर्वं निष्फलं भवेत् ॥'
स्नानमें कुशा, दानमें संकल्पका जल और जपमें संख्या न हो तो ये सब फलदायक नहीं होते। यह लिखनेकी आवश्यकता नहीं कि धर्मप्राण भारतके बड़े-बड़े नगरों, शहरों या गाँवोंमें ही नहीं, छोटे-छोटे टोलेतकमें भी अनेक नर-नारी (विशेषकर स्त्रियाँ) बड़े सबेरे उठकर कार्तिकस्नान करतीं, भगवान्के भजन गातीं और एकभुक्त, एकग्रास, ग्रास- वृद्धि, नक्तव्रत या निराहारादि व्रत करती हैं और रात्रिके समय देवमन्दिरों, चौराहों, गलियों, तुलसीके बिरवों, पीपलके वृक्षों और लोकोपयोगी स्थानोंमें दीपक जलातीं और लम्बे बाँसमें लालटेन बाँधकर किसी ऊँचे स्थानमें 'आकाशी दीपक' प्रकाशित करती हैं।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी
(2) करकचतुर्थी (करवाचौथ) (वामनपुराण)
यह वृत कार्तिक कृष्णकी चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थीको किया जाता है। यदि वह दो दिन चन्द्रोदयव्यापिनी हो या दोनों ही दिन न हो तो 'मातृविद्धा प्रशस्यते' के अनुसार पूर्वविद्धा लेना चाहिये। इस व्रतमें शिव-शिवा, स्वामिकार्तिक और चन्द्रमाका पूजन करना चाहिये और नैवेद्यमें (काली मिट्टीके कच्चे करवेमें चीनीकी चासनी ढालकर बनाये हुए) करवे या घीमें सेंके हुए और खाँड मिले हुए आटेके लड्डू अर्पण करने चाहिये। इस व्रतको विशेषकर सौभाग्यवती स्त्रियाँ अथवा उसी वर्षमें विवाही हुई लड़कियाँ करती हैं और नैवेद्यके 13 करवे या लड्डू और 1 लोटा, 1 वस्त्र और 1 विशेष करवा पतिके माता-पिताको देती हैं। "व्रतीको चाहिये कि उस दिन प्रातः स्नानादि नित्यकर्म करके
'मम सुखसौभाग्यपुत्रपौत्रादिसुस्थिरश्रीप्राप्तये करक- चतुर्थीव्रतमहं करिष्ये ।'
यह संकल्प करके बालू (सफेद मिट्टी) की वेदीपर पीपलका वृक्ष लिखे और उसके नीचे शिव-शिवा और षण्मुखकी मूर्ति अथवा चित्र स्थापन करके
'नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संततिं शुभाम् ।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे ।।'
से शिवा (पार्वती) का षोडशोपचार पूजन करे और 'नमः शिवाय' से शिव तथा 'षण्मुखाय नमः' से स्वामिकार्तिकका पूजन करके नैवेद्यका पक्वान्न (करवे) और दक्षिणा ब्राह्मणको देकर चन्द्रमाको अर्घ्य दे और फिर भोजन करे। इसकी कथाका सार यह है कि—
'शाकप्रस्थपुरके वेदधर्मा ब्राह्मणकी विवाहिता पुत्री वीरवतीने करकचतुर्थीका व्रत किया था। नियम यह था कि चन्द्रोदय के बाद भोजन करे। परंतु उससे भूख नहीं सही गयी और वह व्याकुल हो गयी। तब उसके भाईने पीपलकी आड़में महताब (आतिशबाजी) आदिका सुन्दर प्रकाश फैलाकर चन्द्रोदय दिखा दिया और वीरवतीको भोजन करवा दिया। परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अलक्षित हो गया और वीरवतीने बारह महीनेतक प्रत्येक चतुर्थीका व्रत किया तब पुनः प्राप्त हुआ ।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी
(3) दशरथपूजा (संवत्सरप्रदीप ) – कार्तिक कृष्ण चतुर्थीको दशरथजीका पूजन करे और उनके समीपमें दुर्गाका पूजन करे तो सब प्रकारके सुख उपलब्ध होते हैं।
अखण्ड सुहागका प्रतिमान- 'करवाचौथ '
[ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी ]
भारतीय हिन्दू स्त्रियोंके लिये 'करवाचौथ का व्रत अखण्ड सुहागको देनेवाला माना जाता है। विवाहित स्त्रियाँ इस दिन अपने पतिकी दीर्घ आयु एवं स्वास्थ्यकी मङ्गल कामना करके भगवान् रजनीश (चन्द्रमा) को अर्घ्य अर्पित कर व्रतको पूर्ण करती हैं। स्त्रियोंमें इस दिनके प्रति इतना अधिक श्रद्धाभाव होता है कि वे कई दिन पूर्वसे ही इस व्रतकी तैयारी प्रारम्भ कर देती हैं। यह व्रत कार्तिक कृष्णकी चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थीको किया जाता है, यदि वह दो दिन चन्द्रोदयव्यापिनी हो या दोनों ही दिन न हो तो पूर्वविद्धा लेनी चाहिये। करकचतुर्थीको ही 'करवाचौथ' भी कहा जाता है।
वास्तवमें करवाचौधका त्योहार भारतीय संस्कृतिके उस पवित्र बन्धनका प्रतीक है जो पति-पत्नीके यीच होता है। भारतीय संस्कृतिमें पतिको परमेश्वरकी संज्ञा दी गयो है। करवाचौथ पति और पत्नी दोनोंके लिये नवप्रणय- निवेदन और एक-दूसरेके प्रति अपार प्रेम, त्याग एवं उत्सर्गकी चेतना लेकर आता है। इस दिन स्त्रियाँ पूर्ण सुहागिनका रूप धारण कर, वस्त्राभूषणोंको पहनकर भगवान रजनीशसे अपने अखण्ड सुहागकी प्रार्थना करती हैं। स्त्रियाँ श्रृंगार करके ईश्वरके समक्ष दिनभरके ग्रगरे बाद यह प्रण भी लेती है कि वे मन, वचन एवं कर्मगे पतिके प्रति पूर्ण समर्पणकी भावना रखेंगी।
कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चौथको केवल चन्द्र देवताकी ही पूजा नहीं होती, बल्कि शिव-पार्वती और स्वामिकार्तिकेयको भी पूजा जाता है। शिव-पार्वतीकी पूजाका विधान इस हेतु किया जाता है कि जिस प्रकार शैलपुत्री पार्वतीने घोर तपस्या करके भगवान् शंकरको प्रासकर अखण्ड सौभाग्य प्राप्त किया वैसा ही उन्हें भी मिले। वैसे भी गौरी-पूजनका कुँआरी कन्याओं और विवाहिता स्त्रियोंके लिये विशेष माहात्म्य है।
इस संदर्भमें एक प्रसिद्ध कथाके अनुसार पाण्डवोंके वनवासके समय जब अर्जुन तप करने इन्द्रनील पर्वतकी ओर चले गये तो बहुत दिनोंतक उनके वापस न लौटनेपर द्रौपदीको चिन्ता हुई। कृष्णने आकर द्रौपदीकी चिन्ता दूर करते हुए करवाचौथका व्रत बताया तथा इस सम्बन्धमें जो कथा शिवजीने पार्वतीको सुनायी थी, वह भी सुनायी।
कथा- इन्द्रप्रस्थ नगरीमें वेदशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मणके सात पुत्र तथा एक पुत्री थी जिसका नाम वीरावती था। उसका विवाह सुदर्शन नामक एक ब्राह्मणके साथ हुआ। ब्राह्मणके सभी पुत्र विवाहित थे। एक बार करवाचौधके व्रतके समय वीरावतीकी भाभियोंने तो पूर्ण विधिसे व्रत
किया, किंतु वीरावती सारा दिन निर्जल रहकर भूख न सह सकी तथा निढाल होकर बैठ गयी। भाइयोंकी चिन्तापर भाभियोंने बताया कि वोरावती भूखसे पीडित है। करवाचौथका व्रत चन्द्रमा देखकर ही खोलेगी। यह सुनकर भाइयोंने बाहर खेतोंमें जाकर आग जलायी तथा ऊपर कपड़ा तानकर चन्द्रमा-जैसा दृश्य बना दिया, फिर जाकर बहनसे कहा कि चाँद निकल आया है, अर्घ्य दे दो। यह सुनकर वीरावतीने अर्घ्य देकर खाना खा लिया। नकली चन्द्रमाको अर्घ्य देनेसे उसका व्रत खण्डित हो गया तथा उसका पति अचानक बीमार पड़ गया।
वह ठीक न हो सका। एक बार इन्द्रकी पत्नी इन्द्राणी करवाचौथका व्रत करने पृथ्वीपर आयीं। इसका पता लगनेपर वीरावतीने जाकर इन्द्राणीसे प्रार्थना की कि उसके पतिके ठीक होनेका उपाय बतायें। इन्द्राणीने कहा कि तेरे पतिकी यह दशा तेरी ओरसे रखे गये करवाचौथव्रतके खण्डित हो जानेके कारण हुई है। यदि तू करवाचौथका व्रत पूर्ण विधि-विधानसे बिना खण्डित किये करेगी तो तेरा पति ठीक हो जायगा। वीरावतीने करवाचौथका व्रत पूर्ण विधिसे सम्पन्न किया, फलस्वरूप उसका पति बिलकुल ठीक हो गया। करवाचौथका व्रत उसी समयसे प्रचलित है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक कृष्णाष्टमी
(4) दम्पत्यष्टमी (हेमाद्रि) – पुत्रकी कामनावाले स्त्री-पुरुषोंको चाहिये कि वे कार्तिक कृष्णाष्टमीको डाभकी पार्वती और शिव बनाकर उनका स्नान, गन्ध, अक्षत, पुष्प और नैवेद्यसे पूजन करें और उनके समीपमें ब्राह्मणका पूजन करके उसे दक्षिणा दें। ऐसा करनेसे पुत्रकी प्राप्ति होती है। इस व्रतमें चन्द्रोदयव्यापिनी तिथि लेनी चाहिये । यदि वह दो दिन हो या दोनों ही दिन न हो तो दूसरे दिन व्रत करना चाहिये ।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक कृष्ण एकादशी
(5) कृष्णैकादशी (ब्रह्मवैवर्त) – कार्तिक कृष्णकी एकादशीका नाम 'रमा' है। इसका व्रत करनेसे सब पापोंका क्षय होता है। इसकी कथाका सार यह है कि-
'प्राचीन कालमें मुचुकुन्द नामका राजा बड़ा धर्मात्मा था। उसके इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर और विभीषण-जैसे मित्र और चन्द्रभागा-जैसी पुत्री थी। उसका विवाह दूसरे राज्यके शोभनके साथ हुआ था । विवाहके बाद वह ससुराल गयी तो उसने देखा कि वहाँका राजा एकादशीका व्रत करवानेके लिये ढोल बजवाकर ढिंढोरा पिटवाता है और उससे उसका पति सूखता है। यह देखकर चन्द्रभागाने अपने पतिको समझाया कि 'इसमें कौन-सी बड़ी बात है। हमारे यहाँ तो हाथी, घोड़े, गाय, बैल, भैंस, बकरी और भेड़तकको एकादशी करनी पड़ती है और एतन्निमित्त उस दिन उनको चारा-दानातक नहीं दिया जाता।' यह सुनकर शोभनने व्रत कर लिया।
(6) कौमुदी-महोत्सव (हेमाद्रि) — उपर्युक्त प्रकारसे हृष्ट-पुष्ट और संतुष्ट होकर दीपक जलाने आदिसे कौमुदी-महोत्सव सम्पन्न होता है। वह्निपुराणके लेखानुसार यह व्रत कार्तिक कृष्ण एकादशीसे आरम्भ होकर अमावास्यातक किया जाता है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक कृष्ण द्वादशी
(7) गोवत्सद्वादशी (मदनरत्नान्तर्गत भविष्योत्तरपुराण) - कार्तिकमासके कृष्णपक्षको द्वादशी 'गोवत्सद्वादशी 'के नामसे जानी जाती है। इस व्रतमें भक्तिपूर्वक गोमाताका पूजन किया जाता है। यह वृत कार्तिक कृष्ण द्वादशीको किया जाता है। इसमें प्रदोषव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो या न हो तो
'वत्सपूजा वटश्चैव कर्तव्यो प्रथमेऽहनि'
के अनुसार पहले दिन व्रत करना चाहिये।
मन्त्रसे पूजन करे-
माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः । प्र नु बोचं चिकितुपे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट नमो नमः स्वाहा ॥ (ऋक्० ८।१०१।१५)
इस प्रकार पूजन कर गीको ग्रास दे तथा निम
उस दिन सायंकालके समय गायें चरकर वापस आयें तब तुल्य वर्णकी गौ और बछड़ेका गन्धादिसे पूजन करके
'क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते ।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ।।'
से उसके (आगेके) चरणोंमें अर्घ्य दे और
‘सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलङ्कृते ।
मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि ॥'
से प्रार्थना करे। इस बातका स्मरण रखे कि उस दिनके भोजनके पदार्थोंमें गायका दूध, दही, घी, छाछ और खीर तथा तेलके पके हुए भुजिया पकौड़ी या अन्य कोई पदार्थ न हों ।
व्रत-विधान- इस व्रतमें प्रदोषव्यापिनी तिथि ग्रहण को जाती है। यदि वह दो दिन हो या न हो तो 'वत्सपूजा व्रतीव कर्तव्यों प्रधमे ज्ञानि' इस व्रतके प्रभावसे व्रती सभी सुखोंको भोगते हुए अन्तमें गौके जितने रोएँ हैं, उतने वर्षोंतक गोलोकमें वास करता है।
कथा - सत्ययुगकी बात है, महर्षि भृगुके आश्रम मण्डलमें भगवान् शंकरके दर्शनकी अभिलाषासे करोड़ों मुनिगण तपस्या कर रहे थे। एक दिन उन तपस्यारत मुनियोंको दर्शन देनेके लिये भगवान् शंकर एक बूढ़े ब्राह्मणका वेश बनाकर हाथमें डंडा लिये काँपते हुए उस आश्रममें आये। उनके साथ सवत्सा गौके रूपमें जगन्माता पार्वतीजी भी थीं। वृद्ध ब्राह्मण बने भगवान् शंकर महर्षि भृगुके पास जाकर बोले- हे मुने ! मैं यहाँ स्रानकर जम्बूक्षेत्रमें जाऊँगा और दो दिन बाद लौदूँगा, तबतक आप इस गायकी रक्षा करें।
मुनियोंके उस गौकी सभी प्रकारसे रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा करनेपर भगवान् शंकर अन्तर्हित हो गये और फिर थोड़ी देर बाद एक व्याघ्रके रूपमें प्रकट होकर बछड़ेसहित गौको डराने लगे। ऋषिगण भी व्याघ्रके भयसे आक्रान्त हो आर्तनाद करते हुए यथासम्भव उसे हटानेका प्रयास कर रहे थे। उधर गाय भी रँभा रही थी। निदान उन शान्तचित्त मुनियोंने क्रुद्ध हो ब्रह्मासे प्राप्त और भयंकर शब्द करनेवाले घंटेको बजाना प्रारम्भ किया। उस शब्दसे व्याघ्र तो भाग गया और उसके स्थानपर भगवान् शंकर प्रकट हो गये, भगवती उमा जगज्जननी पार्वती भी गोरूप त्यागकर वत्सरूपी कार्तिकेय तथा अन्य गणोंके साथ भगवान् भोलेनाथके वामभागमें विराजित हो गयीं। ब्रह्मवादी ऋषियोंने उनका पूजन किया। उस दिन कार्तिकमासके कृष्णपक्षको द्वादशी थी, इसीलिये यह व्रत 'गोवत्सद्वादशी' के रूपमें प्रारम्भ हुआ।
एक अन्य कथाके अनुसार राजा उत्तानपादने पृथ्वीपर इस व्रतको प्रचारित किया। उनकी रानी सुनीति इस व्रतको किया करती थी, जिसके प्रभावसे उन्हें ध्रुव-जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। आज भी माताएँ पुत्ररक्षा और संतान सुखके लिए इस व्रतको करती हैं।
कार्तिक कृष्ण द्वादशी
(8) नीराजनद्वादशी (भविष्योत्तर) –कार्तिक कृष्ण द्वादशीको प्रातःस्नानसे निवृत्त होकर काँसे आदिके उज्ज्वल पात्रमें गन्ध, अक्षत, पुष्प और जलका पात्र रखकर देवता, ब्राह्मण, गुरुजन (बड़े-बूढ़े), माता और घोड़े आदिका नीराजन (आरती) करे तो अक्षय फल होता है। यह नीराजन पाँच दिनतक किया जाता है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी
(9) यम-दीपदान (स्कन्दपुराण) – कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीको सायंकालके समय किसी पात्रमें मिट्टीके दीपक रखकर उन्हें तिलके तेलसे पूर्ण करे। उनमें नवीन रूईकी बत्ती रखे और उनको प्रकाशित करके गन्धादिसे पूजन करे। फिर दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके
'मृत्युना दण्डपाशाभ्यां कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥'
से दीपोंका दान करे तो उससे यमराज प्रसन्न होते हैं। यह त्रयोदशी प्रदोषव्यापिनी शुभ होती है। यदि वह दो दिन हो या न हो तो दूसरे दिन करे।
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी
(9) धनत्रयोदशी (व्रतोत्सव) – कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीको सायंकालके समय एक दीपकको तेलसे भरकर प्रज्वलित करे और गन्धादिसे पूजन करके अपने मकानके द्वारदेशमें अन्नकी ढेरीपर रखे। स्मरण रहे वह दीप रातभर जलते रहना चाहिये, बुझना नहीं चाहिये ।
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी
(10) गोत्रिरात्र (स्कन्दपुराण) - यह व्रत कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीसे दीपावलीके दिनतक किया जाता है। इसमें उदयव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो तो पहले दिन व्रत करे। इस व्रतके लिये गोशाला या गायोंके आने-जानेके मार्गमें आठ हाथ लम्बी और चार हाथ चौड़ी वेदी बनाकर उसपर सर्वतोभद्र लिखे और उसके ऊपर छत्रके आकारका वृक्ष बनाकर उसमें विविध प्रकारके फल, पुष्प और पक्षी बनाये। वृक्षके नीचे मण्डलके मध्य भागमें गोवर्द्धनभगवान्की; उनके वाम भागमें रुक्मिणी, मित्रविन्दा, शैब्या और जाम्बवतीकी; दक्षिण भागमें सत्यभामा, लक्ष्मणा, सुदेवा और नाग्नजितिकी; उनके अग्र भागमें नन्दबाबा, पृष्ठ भागमें बलभद्र और यशोदा तथा कृष्णके सामने सुरभी, सुनन्दा, सुभद्रा और कामधेनु गौ- इनकी सुवर्णमयी सोलह मूर्तियाँ स्थापित करे। उन सबका नाममन्त्र (यथा - गोवर्द्धनाय नमः आदि) से पूजन करके
'गवामाधार गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
गोपगोपीसमोपेत गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥'
से भगवान्को और
'रुद्राणां चैव या माता वसूनां दुहिता च या ।
आदित्यानां च भगिनी सा नः शान्तिं प्रयच्छतु ॥'
से गौको अर्घ्य दे एवं
'सुरभी वैष्णवी माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता ।
प्रतिगृह्णातु मे ग्रासं सुरभी मे प्रसीदतु ॥'
से गौको ग्रास दे। इस प्रकार विविध भाँतिके फल, पुष्प, पक्वान्न और रसादिसे पूजन करके बाँसके पात्रोंमें सप्तधान्य और सात मिठाई भरकर सौभाग्यवती स्त्रियोंको दे। इस प्रकार तीन दिन व्रत करे और चौथे दिन प्रातः स्नानादि करके गायत्रीके मन्त्रसे तिलोंकी 108 आहुति देकर व्रतका विसर्जन करे तो इससे सुत, सुख और सम्पत्तिका लाभ होता है।
धनतेरस
[ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी ]
कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी 'धनतेरस' कहलाती है। इस दिन चाँदीका बर्तन खरीदना अत्यन्त शुभ माना गया है, परंतु वस्तुतः यह यमराजसे सम्बन्ध रखनेवाला व्रत है।
इस दिन सायंकाल घरके बाहर मुख्य दरवाजेपर एक पात्रमें अन रखकर उसके ऊपर यमराजके निमित्त दक्षिणाभिमुख
दीपदान करना चाहिये तथा उसका गन्धादिसे पूजन कर या चाहिये। दीपदान करते समय निम्नलिखित प्रार्थना करन है। चाहिये-
मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यजः प्रीयतामिति ॥
यमुनाजी यमराजकी बहन हैं इसलिये धनतेरसके दिन यमुना-स्नानका भी विशेष माहात्म्य है। यदि पूरे दिनका व्रत रखा जा सके तो अत्युत्तम है, किंतु संध्याके समय दीपदान अवश्य करना चाहिये-
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति ॥
कथा- एक बार यमराजने अपने दूतोंसे कहा कि तुमलोग मेरी आज्ञासे मृत्युलोकके प्राणियोंके प्राण हरण करते हो, क्या तुम्हें ऐसा करते समय कभी दुःख भी में हुआ है या कभी दया भी आयी है? इसपर यमदृनोंने ख कहा- महाराज! हमलोगोंका कर्म अत्यन्त क्रूर है परंतु किसी युवा प्राणीकी असामयिक मृत्युपर उसका प्राण हरण करते समय वहाँका करुणक्रन्दन सुनकर हमलोगोंका पाषाणहृदय भी विगलित हो जाता है। एक बार हमलोगोंको एक राजकुमारके प्राण उसके विवाहके चौथे दिन ही हरण करने पड़े। उस समय वहाँका करुणक्रन्दन, चीत्कार और हाहाकार देख-सुनकर हमें अपने कृत्यसे अत्यन्त घृणा हो गयी। उस मङ्गलमय उत्सवके बीच हमलोगोंका यह कृत्य अत्यन्त घृणित था, इससे हमलोगोंका हृदय अत्यन्त दुःखी हो गया। अतः हे स्वामिन् ! कृपा करके कोई ऐसी युक्ति बताइये जिससे ऐसी असामयिक मृत्यु न हो।
इसपर यमराजने कहा कि जो धनतेरसके पर्वपर मेरे उद्देश्यसे दीपदान करेगा, उसकी असामयिक मृत्यु नहीं होगी।
भगवान् धन्वन्तरिका जन्मोत्सव
[ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी ]
भगवान् धन्वन्तरिका जन्मोत्सव कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको मनाया जाता है। समुद्रमन्थनके समय भगवान् धन्वन्तरिका प्राकट्य माना जाता है। देव दानवोंद्वारा क्षीरसागरका मन्थन करते समय भगवान् धन्वन्तरि संसारके समस्त रोगोंकी औषधियोंको कलशमें भरकर प्रकट हुए थे। उस दिन त्रयोदशी तिथि थी। इसलिये उक्त तिथिमें सम्पूर्ण भारतमें तथा अन्य देशोंमें (जहाँ हिन्दुओंका निवास है) भगवान् धन्वन्तरिका जयन्ती-महोत्सव मनाया जाता है।
विशेषकर आयुर्वेदके विद्वान् तथा वैद्यसमाजकी ओरसे सर्वत्र भगवान् धन्वन्तरिकी प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती है और उनका पूजन श्रद्धाभक्तिपूर्वक किया जाता है एवं प्रसादवितरण करके लोगोंके दीर्घ जीवन तथा आरोग्यलाभके लिये मङ्गलकामना की जाती है। दूसरे दिन संध्यासमय जलाशयोंमें प्रतिमाओंका विसर्जन भजन-कीर्तन करते हुए किया जाता है। इस प्रकार भगवान् धन्वन्तरि प्राणियोंको रोग मुक्त करनेके लिये भव-भेषजावतारके रूपमें प्रकट हुए थे।
गोत्रिरात्र व्रत
[ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीसे अमावास्यातक ]
यह व्रत कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीसे दीपावलीके दिनतक किया जाता है। इसमें उदयव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो तो पहले दिन व्रत करे। इस व्रतके लिये गोशाला या गायोंके आने-जानेके मार्गमें आठ हाथ लम्बी और चार हाथ चौड़ी वेदी बनाकर उसपर सर्वतोभद्र बनाये और उसके ऊपर छत्रके आकारका वृक्ष एवं उसमें विविध प्रकारके फल, पुष्प और पक्षी बनाये। वृक्षके नीचे मण्डलके मध्यभागमें गोवर्धनभगवान्की, उनके वामभागमें रुक्मिणी, मित्रवृन्दा, शैव्या और जाम्बवतीकी, दक्षिणभागमें सत्यभामा, लक्ष्मणा, सुदेवा और नाग्रजितीकी; उनके अग्रभागमें नन्दबाबा; पृष्ठभागमें बलभद्र और यशोदा तथा श्रीकृष्णके सामने सुरभी, सुनन्दा, सुभद्रा और कामधेनु गौ इनकी सुवर्णमयी मूर्तियाँ स्थापित करे। उन सबका नाम-मन्त्र (यथा 'गोवर्धनाय नमः' आदि) से पूजन करके-
गवामाधार गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो।
गोपगोपीसमोपेत गृहाणार्घ्य नमोऽस्तु ते ॥
से भगवान्को और-
रुद्राणां चैव या माता वसूनां दुहिता च या।
आदित्यानां च भगिनी सा नः शान्तिं प्रयच्छतु ।।
से गौको अर्घ्य दे तथा-
सुरभी वैष्णवी माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता ।
प्रतिगृह्णातु मे ग्रासं सुरभी मे प्रसीदतु ॥
से गौको ग्रास दे।
विविध भाँतिके फल, पुष्प, पक्वान्न और रसादिसे पूजन करके बाँसके पात्रोंमें सप्तधान्य और सात मिठाई भरकर सौभाग्यवती स्त्रियोंको दे। इस प्रकार तीन दिन व्रत करे और चौथे दिन प्रातः स्नानादि करके गायत्री मन्त्रसे तिलोंकी १०८ आहुति देकर व्रतका विसर्जन करे तो इससे पुत्र, सुख और सम्पत्तिका लाभ होता है (स्कन्दपुराण)।
भविष्योत्तर-पुराणके अनुसार गोत्रिरात्र व्रतका फल पुत्र-प्राप्ति, सुख-भोग और अन्तमें गोलोककी प्राप्ति बताया गया है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
नरकचतुर्दशी
[ कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी ]
कार्तिकमासके कृष्णपक्षको चतुर्दशी 'नरकचतुर्दशी' कहलाती है। सनत्कुमारसंहिताके अनुसार इसे पूर्वविद्धा लेना चाहिये। इस दिन अरुणोदयसे पूर्व प्रत्यूषकालमें स्नान करनेसे मनुष्यको यमलोकका दर्शन नहीं करना पड़ता। यद्यपि कार्तिकमासमें तेल नहीं लगाना चाहिये, फिर भी इस तिथिविशेषको शरीरमें तेल लगाकर स्नान करना चाहिये। जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदयके बाद स्नान करता है, उसके शुभ कार्योंका नाश हो जाता है। स्नानसे पूर्व शरीरपर अपामार्गका भी प्रोक्षण करना चाहिये। अपामार्गको निम्न मन्त्र पढ़कर मस्तकपर घुमाना चाहिये। इससे नरकका भय नहीं रहता –
सितालोष्ठसमायुक्तं सकण्टकदलान्वितम्।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः ॥
स्नान करनेके बाद शुद्ध वस्त्र पहनकर, तिलक लगाकर दक्षिणाभिमुख हो निम्न नाममन्त्रोंसे प्रत्येक नामसे तिलयुक्त तीन-तीन जलाञ्जलि देनी चाहिये। यह यम-तर्पण कहलाता है। इससे वर्षभरके पाप नष्ट हो जाते हैं।
'ॐ यमाय नमः', 'ॐ धर्मराजाय नमः', 'ॐ मृत्यवे नमः', 'ॐ अन्तकाय नमः', 'ॐ वैवस्वताय नमः', 'ॐ कालाय नमः', 'ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः', 'ॐ औदुम्बराय नमः', 'ॐ दक्षाय नमः', 'ॐ नीलाय नमः', 'ॐ परमेष्ठिने नमः', 'ॐ वृकोदराय नमः', 'ॐ चित्राय नमः', 'ॐ चित्रगुप्ताय नमः'।
इस दिन देवताओंका पूजन करके दीपदान करना चाहिये। मन्दिरों, गुप्तगृहों, रसोईघर, स्नानघर, देववृक्षोंके नीचे, सभाभवन, नदियोंके किनारे, चहारदीवारी, बगीचे, चावली, गली-कूचे, गोशाला आदि प्रत्येक स्थानपर दीपक जलाना चाहिये। यमराजके उद्देश्यसे त्रयोदशीसे अमावास्यातक दीप जलाने चाहिये।
कथा-वामनावतारमें भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण पृथ्वी नाप ली। बलिके दान और भक्तिसे प्रसन्न होकर वामनभगवान्ने उनसे वर माँगनेको कहा। उस समय यलिने प्रार्थना की कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीसहित इन तीन दिनोंमें मेरे राज्यका जो भी व्यक्ति यमराजके उद्देश्यसे दीपदान करे, उसे यमयातना न हो और इन तीन दिनोंमें दीपावली मनानेवालेका घर लक्ष्मीजी कभी न छोड़ें। भगवान्ने कहा- 'एवमस्तु।' जो मनुष्य इन तीन दिनोंमें दीपोत्सव करेगा, उमे छोड़कर मेरी प्रिया लक्ष्मी कहीं नहीं जायेंगी।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी
(11) रूपचतुर्दशी (बहुसम्मत) – कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीकी रात्रिके अन्तमें—जिस दिन चन्द्रोदयके समय चतुर्दशी हो उस दिन प्रभात समयमें दन्तधावन आदि करके 'यमलोक-दर्शन-अभाव-कामोऽहम-अभ्यङ्ग-स्न्नानं करिष्ये ।'
यह संकल्प करे और शरीरमें तिलके तेल आदिका उबटन या मर्दन करके हलसे उखड़ी हुई मिट्टीका ढेला, तुम्बी और अपामार्ग (ऊँगा ) – इनको मस्तकके ऊपर बार-बार घुमाकर शुद्ध स्नान करे। यद्यपि कार्तिकस्नान करनेवालोंके लिये 'तैल-अभ्यङ्गं तथा शय्यां परान्नं कांस्य-भोजनम् ।
कार्तिके वर्जयेद् यस्तु परि-पूर्ण-व्रती भवेत् ॥'
के अनुसार तैलाभ्यङ्ग वर्जित किया है, किंतु
'नरकस्य चतुर्दश्यां तैलाभ्यङ्गं च कारयेत् ।
अन्यत्र कार्तिक-स्नायी तैल-अभ्यङ्गं विवर्जयेत् ॥'
के आदेशसे नरकचतुर्दशी या (रूपचतुर्दशी) को तैलाभ्यङ्ग करनेमें कोई दोष नहीं। यदि रूपचतुर्दशी दो दिनतक चन्द्रोदयव्यापिनी हो तो चतुर्दशीके चौथे प्रहरमें स्नान करना चाहिये। इस व्रतको चार दिनतक करे तो सुख-सौभाग्यकी वृद्धि होती है।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी
(12) हनुमज्जन्म-महोत्सव (व्रतरत्नाकर) -
'आश्विनस्या-असिते पक्षे भूतायां च महा-निशि ।
भौमवारे-ऽञ्जना-देवी हनूमन्तम-जी-जनत् ॥'
अमान्त आश्विन (कार्तिक) कृष्ण चतुर्दशी भौमवारकी महानिशा (अर्धरात्रि) में अञ्जनादेवीके उदरसे हनुमान्जीका जन्म हुआ था । अतः हनुमद्- उपासकोंको चाहिये कि वे इस दिन प्रातः स्नानादि करके
'मम शौर्यो-ओदार्य-धैर्यादि-वृद्ध्यर्थं हनुमत्प्रीति-कामनया हनुमज्जयन्ती-महोत्सवं करिष्ये।'
यह संकल्प करके हनुमान्जीका यथाविधि षोडशोपचार पूजन करें। पूजनके उपचारोंमें गन्धपूर्ण तेलमें सिन्दूर मिलाकर उससे मूर्तिको चर्चित करे। पुन्नाम (पुरुष नामके हजारा-गुलहजारा आदि) के पुष्प चढ़ाये और नैवेद्यमें घृतपूर्ण चूरमा या घीमें सेंके हुए और शर्करा मिले हुए आटेका मोदक और केला, अमरूद आदि फल अर्पण करके वाल्मीकीय रामायणके सुन्दरकाण्डका पाठ करे।
रात्रिके समय घृतपूर्ण दीपकोंकी दीपावलीका प्रदर्शन कराये। यद्यपि अधिकांश उपासक इसी दिन हनुमज्जयन्ती मनाते हैं। और व्रत करते हैं, परन्तु शास्त्रान्तरमें चैत्र शुक्ल पूर्णिमाको हनुमज्जन्मका उल्लेख किया है; अतः इसका चैत्रके व्रतोंमें भी वर्णन मिलेगा और हनुमान्जीका पूजाविधान होगा ।...... कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीको हनुमज्जयन्ती मनानेका यह कारण है कि लङ्काविजयके बाद श्रीराम अयोध्या आये। पीछे भगवान् रामचन्द्रजीने और भगवती जानकीजीने वानरादिको विदा करते समय यथायोग्य पारितोषिक दिया था। उस समय इसी दिन (कार्तिक कृष्ण 14 को) सीताजीने हनुमान्जीको पहले तो अपने गलेकी माला पहनायी (जिसमें बड़े-बड़े बहुमूल्य मोती और अनेक रत्न थे), परंतु उसमें राम-नाम न होनेसे हनुमानजी उससे संतुष्ट न हुए। तब सीताने अपने ललाटपर लगा हुआ सौभाग्यद्रव्य 'सिंदूर' प्रदान किया और कहा कि 'इससे बढ़कर मेरे पास अधिक महत्त्वकी कोई वस्तु नहीं है, अतएव तुम इसको हर्षके साथ धारण करो और सदैव अजरामर रहो।' यही कारण है कि कार्तिक कृष्ण 14 को हनुमज्जन्म महोत्सव मनाया जाता है और तैल-सिंदूर चढ़ाया जाता है ।
हनुमज्जन्म-महोत्सव
[ कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी ]
आश्विनस्यासिते पक्षे भूतायां च महानिशि ।
भौमवारेऽञ्जनादेवी हनूमन्तमजीजनत् ।।
अमान्त आश्विन (कार्तिक) कृष्ण चतुर्दशी भौमवारकी महानिशा (अर्धरात्रि) में अञ्जनादेवीके उदरसे हनुमान्जीका जन्म हुआ था। अतः हनुमत्-उपासकोंको चाहिये कि वे इस दिन प्रातः स्रानादि करके 'मम शौर्योदार्यधैर्यादिवृद्धयर्थ हनुमत्प्रीतिकामनया हनुमज्जयन्तीमहोत्सवमहं करिष्ये' यह संकल्प करके हनुमान्जीका यथाविधि षोडशोपचार पूजन करें। पूजनके उपचारोंमें गन्धपूर्ण तेलमें सिन्दूर मिलाकर उससे मूर्तिको चर्चित करे। पुन्नाम (पुरुष नामके हजारा- गुलहजारा आदि) के पुष्प चढ़ाये तथा नैवेद्यमें घृतपूर्ण चूरमा या घीमें सेंके हुए और शर्करा मिले हुए आटेका मोदक एवं केला, अमरूद आदि फल अर्पण करके 'वाल्मीकीय रामायण'के सुन्दरकाण्डका पाठ करे। रात्रिके समय घृतपूर्ण दीपकोंकी दीपावलीका प्रदर्शन कराये। यद्यपि अधिकांश उपासक इसी दिन हनुमज्जयन्ती मनाते हैं और व्रत करते हैं, परंतु शास्त्रान्तरमें चैत्र शुक्ल पूर्णिमाको हनुमज्जन्मका उल्लेख किया है।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीको हनुमज्जयन्ती मनानेका यह कारण है कि लङ्काविजयके बाद श्रीराम अयोध्या आये। पीछे भगवान् श्रीरामचन्द्रजी और भगवती जानकीजीने वानरादिको विदा करते समय यथायोग्य पारितोषिक दिया था। उस समय इसी दिन (का०कृ० १४ को) सीताजीने हनुमान्जीको पहले तो अपने गलेकी माला पहनायी, जिसमें बड़े-बड़े बहुमूल्य मोती और अनेक रत्न थे, परंतु उसमें राम-नाम न होनेसे हनुमान्जी उससे संतुष्ट न हुए। तब उन्होंने अपने ललाटपर लगा हुआ सौभाग्यद्रव्य सिन्दूर प्रदान किया और कहा- 'इससे बढ़कर मेरे पास अधिक महत्त्वकी कोई वस्तु नहीं है, अतएव तुम इसे हर्षके साथ धारण करो और सदैव अजर-अमर रहो।' यही कारण है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीको हनुमजन्म-महोत्सव मनाया जाता है और तेल- सिन्दूर चढ़ाया जाता है।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी
(13) यम-तर्पण (कृत्यतत्त्वार्णव) – इसी दिन (कार्तिक कृष्ण 14 को) सायंकालके समय दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके जल, तिल और कुश लेकर देवतीर्थसे
'यमाय धर्मराजाय मृत्यवे अनन्ताय वैवस्वताय कालाय सर्वभूत-क्षयाय औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने वृकोदराय चित्राय और चित्र-गुप्ताय ।'
इनमेंसे प्रत्येक नामका 'नमः' सहित उच्चारण करके जल छोड़े । यज्ञोपवीतको कण्ठीकी तरह रखे और काले तथा सफेद दोनों प्रकारके तिलोंको काममें ले। कारण यह है कि यममें धर्मराजके रूपसे देवत्व और यमराजके रूपसे पितृत्व-ये दोनों अंश विद्यमान हैं।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी
(14) दीपदान (कृत्यचन्द्रिका) – इसी दिन प्रदोषके समय - तिल-तेलसे भरे हुए प्रज्वलित और सुपूजित चौदह दीपक लेकर
'यम-मार्ग-अन्धकार-निवारणार्थे चतुर्दश-दीपानां दानं करिष्ये।'
से संकल्प करके ब्रह्मा, विष्णु और महेशादिके मन्दिर, मठ, परकोटा, बाग, बगीचे, बावली, गली, कूचे, नजरनिवास (हमेशा निगाहमें आनेवाले बाग), घुड़शाला तथा अन्य सूने स्थानोंमें भी यथाविभाग दीपस्थापन करे। इस प्रकारके दीपकोंसे यमराज संतुष्ट होते हैं।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी
(15) नरकचतुर्दशी (लिङ्गपुराण) ) – यह भी इसी दिन होती है। इसके निमित्त चार बत्तियोंके दीपकको प्रज्वलित करके पूर्वाभिमुख होकर
'दत्तो दीपश्-चतुर्दश्यां नरक-प्रीतये मया ।
चतुर्-वर्ति-समायुक्तः सर्व-पापापनुत्तये ।।'
इसका उच्चारण करके दान करे। इस अवसरमें (आतिशबाजी आदिकी बनी हुई) प्रज्वलित उल्का लेकर
'अग्नि-दग्धाश्च ये जीवा येऽप्य-दग्धाः कुले मम ।
उज्ज्वल-ज्योतिषा दग्धास्ते यान्तु परमां गतिम् ॥'
से उसका दान करे तो उल्का आदिसे मरे हुए मनुष्योंकी सद्गति हो जाती है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक कृष्ण अमावास्या
(16) कार्तिकी अमावास्या (भविष्योत्तर) - इस दिन प्रातः - स्नानादि करनेके अनन्तर देव, पितृ और पूज्यजनोंका अर्चन करे और दूध, दही तथा घी आदिसे श्राद्ध करके अपराह्णके समय नगर, गाँव या बस्तीके प्रायः सभी मकानोंको स्वच्छ और सुशोभित करके विविध प्रकारके गायन, वादन, नर्तन और संकीर्तन करे और प्रदोषकालमें दीपावली सजाकर मित्र, स्वजन या सम्बन्धियोंसहित आधी रातके समय सम्पूर्ण दृश्योंका निरीक्षण करे । उसके बाद रात्रिके शेष भागमें सूप (छाजला) और डिंडिम (डमरू) आदिको वेगसे बजाकर अलक्ष्मीको निकाले ।
कार्तिक कृष्ण अमावास्या
(17) लक्ष्मीपूजन - कार्तिक कृष्ण अमावास्या (दीपावलीके दिन) प्रातः स्नानादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर
'मम सर्वापच्छान्तिपूर्वकदीर्घायुष्य- बलपुष्टिनैरुज्यादिसकलशुभफलप्राप्त्यर्थं गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकल- सम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्यर्थम् इन्द्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये ।'
यह संकल्प करके दिनभर व्रत रखे और सायंकालके समय पुनः स्नान करके पूर्वोक्त प्रकारकी 'दीपावली', 'दीपमालिका' और 'दीपवृक्ष' आदि बनाकर कोशागार (खजाने) में या किसी भी शुद्ध, सुन्दर, सुशोभित और शान्तिवर्द्धक स्थानमें वेदी बनाकर या चौकी-पाटे आदिपर अक्षतादिसे अष्टदल लिखे और उसपर लक्ष्मीका स्थापन करके 'लक्ष्म्यै नमः', 'इन्द्राय नमः' और 'कुबेराय नमः' – इन नामोंसे तीनोंका पृथक-पृथक् (या एकत्र) यथाविधि पूजन करके
'नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया।
या 'लक्ष्मी' की; सा मे भूयात्त्वदर्चनात् ॥'
गतिस्त्वत्प्रपन्नानां से ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः ।
शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नमः ॥'
से 'इन्द्र' की और
'धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च ।
भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः ॥'
से 'कुबेर' की प्रार्थना करे। पूजनसामग्रीमें अनेक प्रकारकी उत्तमोत्तम मिठाई, उत्तमोत्तम फल-पुष्प और सुगन्धपूर्ण धूप-दीपादि ले और ब्रह्मचर्यसे रहकर उपवास अथवा नक्तव्रत करे।
कार्तिक कृष्ण अमावास्या
(17) दीपावली (व्रतोत्सव) – लोकप्रसिद्धिमें प्रज्वलित दीपकोंकी पंक्ति लगा देनेसे 'दीपावली' और स्थान-स्थानमें मण्डल बना देनेसे दीपमालिका' बनती है, अतः इस रूपमें ये दोनों नाम सार्थक हो जाते हैं। इस प्रकारकी दीपावली या दीपमालिका सम्पन्न करनेसे
'कार्तिके मास्यमावास्या तस्यां दीपप्रदीपनम् ।
शालायां ब्राह्मणः कुर्यात् स गच्छेत् परमं पदम् ॥'
के अनुसार परमपद प्राप्त होता है। ब्रह्मपुराणमें लिखा है कि 'कार्तिककी अमावास्याको अर्धरात्रिके समय लक्ष्मी महारानी सद्गृहस्थोंके मकानोंमें जहाँ-तहाँ विचरण करती हैं। इसलिये अपने मकानोंको सब प्रकारसे स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित करके दीपावली अथवा दीपमालिका बनानेसे लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उनमें स्थायीरूपसे निवास करती हैं। इसके सिवा वर्षाकालके किये हुए दुष्कर्म (जाले, मकड़ी, धूल-धमासे और दुर्गन्ध आदि) दूर करनेके हेतुसे भी कार्तिकी अमावास्याको दीपावली लगाना हितकारी होता है। यह अमावास्या प्रदोषकालसे आधी राततक रहनेवाली श्रेष्ठ होती है। यदि वह आधी राततक न रहे तो प्रदोषव्यापिनी लेना चाहिये।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
दीपावली
[ कार्तिक अमावास्या ]
भारतवर्षमें मनाये जानेवाले सभी त्योहारोंमें दीपावलीका सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियोंसे अप्रतिम महत्त्व है। सामाजिक दृष्टिसे इस पर्वका महत्त्व इसलिये है कि दीपावली आनेसे पूर्व ही लोग अपने घर-द्वारको स्वच्छतापर ध्यान देते हैं, घरका कूड़ा-करकट साफ करते हैं, दृट- फूट सुधरवाकर घरकी दीवारोंपर सफेदी, दरवाजोंपर रंग रोगन करवाते हैं, जिससे उस स्थानकी न केवल आयु हो बढ़ जाती है, वल्कि आकर्षण भी चढ़ जाता है। वर्षा ऋतुमें आयो अस्वच्छताका भी परिमार्जन हो जाता है।
दीपावलीके दिन धन-सम्पत्तिको अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मीको पूजा करनेका विधान है। शास्त्रोंका कथन है कि जो व्यक्ति दीपावलीको दिन-रात जागरण करके लक्ष्मीको पूजा करता है, उसके घर लक्ष्मीजीका निवास होता है। जो आलस्य और निद्रामें पड़कर दीपावली यूँ ही गँवाता है, उसके घरसे लक्ष्मी रूठकर चली जाती हैं।
ब्रह्मपुराणमें लिखा है कि कार्तिककी अमावास्याको अर्धरात्रिके समय लक्ष्मी महारानी सद्गृहस्थोंके घरमें जहाँ- तहाँ विचरण करती हैं। इसलिये अपने घरको सब प्रकारसे स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित करके दीपावली तथा दीपमालिका मनानेसे लक्ष्मीजी प्रसन्न होती हैं और वहाँ स्थायीरूपले निवास करती हैं। यह अमावास्या प्रदोषकालसे आधी राततक रहनेवाली श्रेष्ठ होती है। यदि आधी राततक न भी रहे, तो प्रदोषव्यापिनी दीपावली माननी चाहिये। प्रायः प्रत्येक घरमें लोग अपने रीति-रिवाजके अनुसार
गणेश-लक्ष्मीपूजन तथा द्रव्यलक्ष्मी पूजन करते हैं। कुछ स्थानोंमें दीवारपर अथवा काष्ठपट्टिकापर खड़ियामिट्टी तथा विभिन्न रंगोंद्वारा चित्र बनाकर या पाटेपर गणेश-लक्ष्मीकी मूर्ति रखकर कुछ चाँदी आदिके सिक्के रखकर इनका पूजन करते हैं तथा थालीमें तेरह अथवा छब्बीस दीपकोंके मध्य तेलसे प्रज्वलित चौमुखा दीपक रखकर दीपमालिकाका पूजन भी करते हैं और पूजाके अनन्तर उन दीपोंको घरके मुख्य-मुख्य स्थानोंपर रख देते हैं। चौमुखा दीपक रातभर जले ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये।
संक्षिप्त दीपावली-पूजनविधि
कार्तिक कृष्ण अमावास्याको भगवती श्रीमहालक्ष्मी एवं भगवान् गणेशकी नूतन प्रतिमाओंका प्रतिष्ठापूर्वक विशेष पूजन किया जाता है। पूजनके लिये किसी चौकी अथवा कपड़ेके पवित्र आसनपर गणेशजीके दाहिने भागमें माता महालक्ष्मीको स्थापित करना चाहिये। पूजनके दिन घरको स्वच्छ कर पूजा-स्थानको भी पवित्र कर लेना चाहिये एवं स्वयं भी पवित्र होकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सायंकाल इनका पूजन करना चाहिये। मूर्तिमयी श्रीमहालक्ष्मीजीके पास ही किसी पवित्र पात्रमें केसरयुक्त चन्दनसे अष्टदल कमल बनाकर उसपर द्रव्य लक्ष्मी (रुपयों) को भी स्थापित करके एक साथ ही दोनोंकी पूजा करनी चाहिये।
सर्वप्रथम पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख हो आचमन, पवित्री-धारण, मार्जन-प्राणायाम कर अपने ऊपर तथा पूजा-सामग्रीपर निम्न मन्त्र पढ़कर जल छिड़के-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।
तदनन्तर जल-अक्षतादि लेकर पूजनका संकल्प करे-
संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य मासोत्तमे मासे कार्तिकमासे कृष्णपक्षे पुण्यायाममावास्यायां तिथ..... वासरे गोत्रोत्पन्नः - शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त- फलावाप्तिकामनया ज्ञाताज्ञातकायिकवाचिकमानसिक- सकलपापनिवृत्तिपूर्वकं स्थिरलक्ष्मीप्राप्तये श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थ महालक्ष्मीपूजनं कुबेरादीनां च पूजनं करिष्ये। तदङ्गत्वेन गौरीगणपत्यादिपूजनं च करिष्ये ।
ऐसा कहकर संकल्पका जल आदि छोड़ दे।
पूजनसे पूर्व नूतन प्रतिमाकी निम्न रीतिसे प्राण-प्रतिष्ठाकर ले।
प्रतिष्ठा
बायें हाथमें अक्षत लेकर निम्नलिखित मन्त्रोंको पढ़ते हुए दाहिने हाथसे उन अक्षतोंको प्रतिमापर छोड़ता जाय-
ॐ मनो जूतिर्नुपतामात्र्यस्य वृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनांत्यरिष्एं यज्ञ: समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामां३म्प्रतिष्ट ॥
ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः शरन्तु च। अस्यै देवत्वमचर्चायें मामहेति च कधन ॥
इस प्रकार' प्रतिष्ठाकर सर्वप्रथम भगवान् गणेशका पूजन करे। तदनन्तर कलश-पूजन तथा षोडशमातृकापूजन करे।
तत्पश्चात् प्रधान पूजामें मन्त्रोंद्वारा भगवती महालक्ष्मीका षोडशोपचार पूजन करे।
'ॐ महालक्ष्म्यै नमः'
इस नाममन्त्रसे भी उपचारोंद्वारा पूजा की जा सकती है।
प्रार्थना
विधिपूर्वक श्रीमहालक्ष्मीका पूजन करनेके अनन्तर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे-
सुरासुरेन्द्रादिकिरीटमौक्तिकै-र्युक्तं सदा यत्तव पादपङ्कजम्।
परावरं पातु वरं सुमङ्गलं नमामि भक्त्याखिलकामसिद्धये ।। भवानि त्वं महालक्ष्मीः सर्वकामप्रदायिनी।
सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये।
या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात् त्वदर्चनात् ।।
'ॐ महालक्ष्म्यै नमः, प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि।' प्रार्थना करते हुए नमस्कार करे।
समर्पण
पूजनके अन्तमें 'कृतेनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम्, न मम।'- यह वाक्य उच्चारण कर समस्त पूजन-कर्म भगवती महालक्ष्मीको समर्पित करे तथा जल गिराये।
भगवती महालक्ष्मीके यथालब्धोपचार पूजनके अनन्तर महालक्ष्मीपूजनके अङ्गरूप, देहलीविनायक, मसिपात्र, लेखनी, सरस्वती, कुबेर, तुला-मान तथा दीपकोंकी पूजा की जाती है।
संक्षेपमें उन्हें भी यहाँ दिया जा रहा है।
सर्वप्रथम देहलीविनायककी पूजा की जाती है-
देहलीविनायक-पूजन
व्यापारिक प्रतिष्ठानादिमें दीवारोंपर 'ॐ श्रीगणेशाय नमः', 'स्वस्तिक चिह्न, 'शुभ- लाभ' आदि माङ्गलिक एवं कल्याणकर शब्द सिन्दूरादिसे लिखे जाते हैं। इन्हीं शब्दोंपर 'ॐ देहलीविनायकाय नमः' इस नाममन्त्रद्वारा गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करे।
श्रीमहाकाली (दावात)-पूजन
स्याहीयुक्त दावातको भगवती महालक्ष्मीके सामने पुष्प तथा अक्षतपुञ्जमें रखकर उसमें सिन्दूरसे स्वस्तिक बना दे तथा मौली लपेट दे। 'ॐ श्रीमहाकाल्यै नमः' इस नाममन्त्रसे गन्ध-पुष्पादि पञ्चोपचारोंसे या पोडशोपचारोंसे दावातमें भगवती महाकालीका पूजन करे और अन्तमें इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक उन्हें प्रणाम करे-
कालिके त्वं जगन्मातर्मसिरूपेण वर्तसे।
उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहारप्रसिद्धये ॥
या कालिका रोगहरा सुवन्द्याभक्तैः समस्तैर्व्यवहारदक्षैः ।
जनैर्जनानां भयहारिणी च सा लोकमाता मम सौख्यदास्तु ॥
लेखनी-पूजन
लेखनी (कलम) पर मौली बाँधकर सामने रख ले और-
लेखनी निर्मिता पूर्व ब्रह्मणा परमेष्ठिना।
लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम् ॥
'ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः' इस नाममन्त्रद्वारा गन्ध- पुष्पाक्षत आदिसे पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करे-
शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्नुयाद्यतः ।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव ॥
सरस्वती (पञ्जिका-बहीखाता)-पूजन
वही बसना तथा थैलीमें रोली या केसरयुक्त चन्दनसे स्वस्तिक चिह्न बनाये एवं थैलीमें पाँच हल्दीकी गाँठें, धनिया, कमलगट्टा, अक्षत, दूर्वा और द्रव्य रखकर उसमें सरस्वतीका पूजन करे।
सर्वप्रथम सरस्वतीजीका ध्यान इस प्रकार करे-
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।
'ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः' - इस नाममन्त्रसे गन्धादि उपचारोंद्वारा पूजन करे।
कुबेर-पूजन
तिजोरी अथवा रुपये रखे जानेवाले संदूक आदिको स्वस्तिकादिसे अलङ्कृत कर उसमें निधिपति
कुबेरका आवाहन करे-
आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरु।
कोशं वर्द्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर ।।
आवाहनके पश्चात् 'ॐ कुबेराय नमः' इस नाममन्त्रसे यथालय्धोपचार पूजन कर अन्तमें इस प्रकार प्रार्थना करे-
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्याधिपाय च।
भगवन् त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पदः ॥
इस प्रकार प्रार्थनाकर पूर्वपूजित हल्दी, धनिया, कमलगट्टा, द्रव्य, दूर्वादिसे युक्त थैली तिजोरीमें रखे।
तुला तथा मान-पूजन
सिन्दूरले तराजू आदिपर स्वस्तिक बना ले। मौली लपेटकर तुलाधिष्ठातृदेवताका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये-
नमस्ते सर्वदेवानां शक्तित्वे सत्यमाश्रिता ।
साक्षीभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना ।।
ध्यानके बाद ' ॐ तुलाधिष्ठातृदेवतायै नमः' इस नाममन्त्रसे गन्धाक्षतादि उपचारोंद्वारा पूजनकर नमस्कार करे।
दीपमालिका (दीपक)
पूजन-किसी पात्रमें ग्यारह, इक्कीस या उससे अधिक दीपकोंको प्रज्वलित कर महालक्ष्मीके समीप रखकर उस दीपज्योतिका 'ॐ दीपावल्यै नमः' इस नाममन्त्रसे गन्धादि उपचारोंद्वारा पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करे-
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः ।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः ॥
दीपमालिकाओंका पूजन कर अपने आचारके अनुसार संतरा, ईख, पानीफल, धानका लावा इत्यादि पदार्थ चढ़ाये।
धानका लावा (खील) गणेश, महालक्ष्मी तथा अन्य सभी देवी-देवताओंको भी अर्पित करे। अन्तमें अन्य सभी दीपकोंको प्रज्वलित कर उनसे सम्पूर्ण गृहको अलङ्कृत करे।
प्रधान आरती
इस प्रकार भगवती महालक्ष्मी तथा उनके सभी अङ्ग प्रत्यङ्गों एवं उपाङ्गोंका पूजन कर लेनेके अनन्तर प्रधान आरती करनी चाहिये। इसके लिये एक थालीमें स्वस्तिक आदि माङ्गलिक चिह्न बनाकर अक्षत तथा पुष्पोंके आसनपर किसी दीपक आदिमें घृतयुक्त बत्ती प्रज्वलित करे। एक पृथक् पात्रमें कर्पूर भी प्रज्वलित कर वह पात्र भी थालीमें यथास्थान रख ले, आरती-थालका जलसे प्रोक्षण कर ले। पुनः आसनपर खड़े होकर अन्य पारिवारिक जनोंके साथ घण्टानादपूर्वक निम्न आरती गाते हुए साङ्गमहालक्ष्मीजीकी मङ्गल आरती करे-
श्रीलक्ष्मीजीकी आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, (मैया) जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसिदिन सेवत हर-विष्णू-धाता ॥ ॐ ॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ ॐ ॥
दुर्गारूप निरञ्जनि, सुख-सम्पति-दाता।
जो कोइ तुमको ध्यावत, ऋधि-सिधि-धन पाता । ॐ ||
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधिकी त्राता ॥ ॐ ॥
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ ॐ ॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।
खान-पानका वैभव सब तुमसे आता ॥ ॐ ॥
शुभ-गुण-मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ।। ॐ ॥
महालक्ष्मी (जी) की आरति, जो कोई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता ॥ ॐ ॥
मन्त्र-पुष्पाञ्जलि
दोनों हाथोंमें कमल आदिके पुष्प लेकर हाथ जोड़े और निम्न मन्त्रका पाठ करे-
ॐ या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः श्रद्धा पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
सतां कुलजनप्रभवस्य लजा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥
ॐ 'श्रीमहालक्ष्म्यै नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।'
ऐसा कहकर हाथमें लिये फूल महालक्ष्मीपर चढ़ा दे।
प्रदक्षिणा कर साष्टाङ्ग प्रणाम करे, पुनः हाथ जोड़कर क्षमा- प्रार्थना करे
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
परमेश्वरि ॥ सुरेश्वरि। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥ सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद महाम् ॥
पुनः प्रणाम करके
'ॐ अनेन यथाशक्त्यर्चनेन श्रीमहालक्ष्मीः प्रसीदतु'
यह कहकर जल छोड़ दे। ब्राह्मण एवं गुरुजनोंको प्रणाम कर चरणामृत तथा प्रसाद वितरण करे।
विसर्जन
पूजनके अन्तमें अक्षत लेकर गणेश एवं महालक्ष्मीकी नूतन प्रतिमाको छोड़कर अन्य सभी आवाहित, प्रतिष्ठित एवं पूजित देवताओंको अक्षत छोड़ते हुए निम्न मन्त्रसे विसर्जित करे-
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकामसमृद्धयर्थ पुनरागमनाय च॥
इस प्रकार संक्षिप्त उदयपुर होली पूजन समारोह संपन्न हुआ।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
पंचपर्व
इनमें सबसे गरिमापूर्ण त्योहार है 'दीपावली'। जहाँ अन्य त्योहार केवल एक-एक दिन मनाये जाते हैं, वहाँ दीपावलीपर्व सतत पाँच दिनतक मनाया जाता है। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीसे कार्तिक शुक्ल द्वितीयातक मनाये जानेवाले इस पर्वको निःसंकोच धर्माश्रित राष्ट्रिय पर्व कहा जा सकता है।
दीपोत्सवका आरम्भ जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीसे होता है। इसे आज धनतेरसके नामसे स्मरण किया जाता है। यह नाम आयुर्वेदप्रवर्तक भगवान् धन्वन्तरिके जयन्ती दिवसके आधारपर ही प्रचलित हुआ है, ऐसा अनुमान किया जाता है।
वस्तुतः यह दिन भगवान् धन्वन्तरि तथा यमराज दोनोंसे सम्बन्ध रखता है। एक ओर इस दिन वैद्यसमुदाय भगवान् धन्वन्तरिका पूजन कर निज राष्ट्रके लिये स्वास्थ्य समृद्धिकी याचना करता है, वहीं दूसरी ओर सामान्य गृहस्थ यमराजके उद्देश्यसे तेलके दीपक जलाकर निज गृहके मुख्य द्वारपर रखते हैं।
पुराणोंके अनुसार कार्तिकमास यमुनास्त्रान दीपदानद्वारा विशेष फलदायी प्रतिपादित हुआ और है। धनतेरसके दिन यमुनास्रान करके, यमराज और धन्वन्तरिका पूजन-दर्शन कर यमराजके निमित्त दीप-दान करना चाहिये। इस दिन यदि उपवास रखा जा सके तो अत्युत्तम है। सन्ध्याके समय दीपदान करना चाहिये। धनतेरसके सम्बन्धमें एक कथा है-
एक बार यमराजने अपने दूतोंसे पूछा कि तुमलोग अनन्त कालसे जीवोंके प्राणहरणका दुःखद कार्य करते आ रहे हो। क्या कभी यह कार्य करते समय तुम्हारे मनमें दया आयी और यह विचार आया कि इस प्राणीके प्राण न लिये जायें? यदि ऐसी स्थिति कभी आयी हो तो मुझे बताओ।
यह सुनकर एक यमदूतने बताया- प्रभो! हंस नामक एक प्रतापी राजा था। एक बार वह आखेटके लिये वनमें गया और मार्ग भटककर दूसरे राजा हेमराजके राज्यमें जा निकला। श्रम-क्लम तथा भूख-प्याससे व्याकुल राजा हंसका हेमराजने बहुत स्वागत किया। उसी दिन राजा हेमराजको पुत्रकी प्राप्ति हुई थी, अतः राजा हंसके आगमनको पुत्रप्राप्तिका निमित्त-कारण मान उसने आग्रहपूर्वक
राजा हंसको कुछ दिनोंके लिये अपने यहाँ रोक लिया। छठीके दिन जब समारोहपूर्वक राजपुत्रका जन्मोत्सव मनाया जा रहा था, किसी भविष्यवेत्ताने बताया कि विवाहके चार दिन बाद बालककी मृत्यु हो जायगी। यह सुनते ही सारा राज्य शोकार्णवमें डूब गया।
राजा हंसको जब यह दुःखदायी समाचार मिला तो उन्होंने राजा हेमराजको आश्वस्त करते हुए कहा-आप पूर्णतः निश्चिन्त रहें, मैं राजकुमारकी प्राणरक्षा करूँगा।
अपने वचनकी रक्षाके लिये राजा हंसने यमुना-तटपर एक गिरिगारमें दुर्गका निर्माण कराकर उसमें गूढरूपसे राजकुमारके रहनेकी व्यवस्था कर दी। वहीं रहते हुए राजकुमार तरुण हुआ। राजा हेमराजके अपने मित्र राजा हंसकी प्रेरणासे उसका विवाह एक अनुपम सुन्दरी कन्यासे कर दिया। वह युगल साक्षात् काम और रतिका अवतार प्रतीत होता था। राजा हंस अपने मित्र-पुत्रकी प्राणरक्षाके लिये विविध उपाय कर रहे थे, परंतु आपके विधानको अन्यथा करनेकी शक्ति उनमें नहीं थी। विवाहके चौथे ही दिन हमें उसके प्राणहरणका अप्रिय कार्य करना पड़ा। प्रभो! जब हम उसके प्राण लेकर चले उस समयका दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकता। विवाहके माङ्गलिक समारोहमें उमङ्गित राजसमाजमें जैसे हमने आग लगा दी थी। इस दुःखद दृश्यको देखकर हम स्वयं रोने लगे थे,
परंतु करते क्या? परवश थे। हम उस कार्यसे विरत हो ही नहीं सकते थे।
यमराज इस घटनाको सुन कुछ देर चुप रहे और फिर बोले- तुम्हारी इस कारुणिक कथासे में स्वयं विचलित हो गया हूँ पर करूँ क्या ? विधिके विधानकी रक्षाके लिये ही हमें और तुम्हें यह अप्रिय कार्य सौंपा गया है।
दूतने यह सुनकर पूछा-स्वामिन् ! क्या ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे इस प्रकारकी दुःखद अकाल मृत्युमे प्राणियोंको मुक्ति मिल सके ?
दूतका कथन सुनकर यमराजने उपर्युक्त विधि धनतेरसके पूजन और दीपदानकी चर्चा करते हुए कहा- इसके करनेसे मनुष्यको कभी अकाल मृत्युका सामना नहीं करना पड़ेगा। यही नहीं, जिस घरमें यह पूजन-विधान किया जायगा, उस घरमें भी कोई अकाल मृत्यु नहीं होगी।
तभीसे धनतेरसके दिन यमराजके निमित्त दीपदानकी प्रथा चली आ रही है। दीपदानके समय इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये-
मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति ।।
(पद्मपु० उत्तरखण्ड १२२।५)
दूसरी कथा देव-दानवोंद्वारा समुद्र-मन्थनसे अमृत कलश लिये प्रकट होनेवाले धन्वन्तरिसे सम्बद्ध है। जिन्होंने यज्ञभाग पानेके लिये भगवान् नारायणसे याचना की थी और भगवान् नारायणने कहा- यज्ञभाग जिन्हें मिलना था मिल चुका। अब कुछ नहीं हो सकता। तुम देवपुत्र हो, तुम्हें दूसरे जन्ममें जीवनकी सार्थकता प्राप्त होगी। तुम्हारे द्वारा आयुर्वेदका प्रचार-प्रसार होगा और तुम उसी शरीरसे देवत्व प्राप्त करोगे।
क्योंकि भगवान् धन्वन्तरिका प्राकट्य धनतेरसके दिन हुआ था, अतः उनको जयन्तीके रूपमें धनतेरसको उनकी पूजा कर रोगविमुक्त स्वस्थ-जीवनको याचना की जाती है।
दीपोत्सवपर्वका दूसरा दिन नरकचतुर्दशी अथवा रूपचौदसके रूपमें मनाया जाता है। इसे 'छोटी दिवाली' भी कहा जाता है। नरक न प्राप्त हो तथा पापोंकी निवृत्ति हो इस उद्देश्यसे प्रदोषकालमें चार बत्तियोंवाला दीपक जलाना चाहिये। दीपदानके समय निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये-
दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया।
चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये ॥
पुराणोंके अनुसार आजहीके दिन भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरका वध कर संसारको भयमुक्त किया था। इस विजयकी स्मृतिमें यह पर्व मनाया जाता है। शास्त्रानुसार धनतेरस, नरकचतुर्दशी तथा दीपावलीका सम्बन्ध विशेषतः यमराजसे जुड़ा है। तीनों दिन उनके निमित्त दीपदान किया जाता है।
नरकचतुर्दशी मनानेकी विधि इस प्रकार हैं-
इस दिन सूर्योदयसे पहले उठकर शौचादिसे निवृत्त हो तेल मालिशकर खान करना चाहिये। कहीं-कहीं हलमें लगी हुई मिट्टी, अपामार्ग, भटकटैया और तुम्बीको मस्तकपर घुमाकर स्नान करनेकी भी परिपाटी है। नानके पश्चात् यमराजके निमित्त तर्पण और जलाञ्जलि देनी चाहिये। जो मनुष्य इस दिन सूर्योदयके पश्चात् स्रान करते हैं अथवा सायंकाल
यमराजके निमित्त दीपदान नहीं करते उनके शुभकर्मोंका नाश हो जाता है।
दीपोत्सवपर्वका तीसरा दिन दीपावलीके नामसे जाना जाता है। भारतमें मनाये जानेवाले सभी त्योहारोंमें इस
पर्वका अपना विशेष स्थान है। इस पर्वके साथ हमारा युग- युगका इतिहास इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि चाहकर भी हम उन सब तथ्योंको विस्मृत नहीं कर सकते जो इतिहास- पुराणादिके माध्यमसे हमतक पहुँचे हैं।
स्कन्दपुराण, पद्मपुराण तथा भविष्यपुराणमें इसकी विभिन्न मान्यताएँ उपलब्ध होती हैं। कहीं महाराज पृथुद्वारा पृथ्वी-दोहन कर देशको धन-धान्यादिसे समृद्ध बना देनेके उपलक्ष्यमें दीपावली मनाये जानेका उल्लेख मिलता है तो कहीं आजके दिन समुद्र-मन्थनसे भगवती लक्ष्मीके प्रादुर्भूत होनेकी प्रसन्नतामें जनमानसके उल्लासका दीपोत्सवरूपमें प्रकटित होना वर्णित है। कहीं कार्तिक कृष्ण चतुदर्शीको भगवान् श्रीकृष्णद्वारा नरकासुरका वध कर उसके बन्दीगृहसे सोलह हजार राजकन्याओंका उद्धार करनेपर दूसरे अर्थात् अमावास्याके दिन भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन करनेके लिये सज्जित दीपमालाके रूपमें तथा कहीं (महाभारत आदिपर्वमें) पाण्डवोंके सकुशल वनवाससे लौटनेपर प्रजाजनोंद्वारा उनके अभिनन्दनार्थ दीपमालासे उनका स्वागत करनेके प्रसंगसे इस पर्वका सम्बन्ध जोड़ा गया है। कहीं श्रीरामके विजयोपलक्ष्यमें अयोध्यामें उनके स्वागतार्थ प्रज्वलित दीपमालासे प्रकृत दीपावलीका सम्बन्ध स्थापित किया गया है। कहीं सम्राट् विक्रमादित्यके विजयोपलक्ष्यमें जनताद्वारा दीपमालिका प्रज्वलित कर उनका अभिनन्दन करनेका उल्लेख है।
सनत्कुमारसंहिताके अनुसार वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीसे अमावास्यातक तीन दिनोंमें दैत्यराज बलिसे सम्पूर्ण लोक ले उसे पाताल जानेपर विवश किया था। सर्वस्व ले लेनेके पश्चात् भगवान् वामनने चलिसे इच्छित वर माँगनेको कहा तो बलिने लोककल्याणके लिये यह वर माँगा - 'प्रभो! आपने मुझसे तीन दिनमें तीनों लोक ग्रहण किये हैं। अतः मैं चाहता हूँ कि उपर्युक्त तीन दिनोंमें जो प्राणी मृत्युके देवता यमराजके उद्देश्यसे दीपदान करे उसे यमकी यातना न भोगनी पड़े और उसका घर कभी लक्ष्मीसे विहीन न हो।' श्रीमन्नारायणने राजा बलिके कथनको स्वीकार किया और तभीसे दीपोत्सव मनाने, यम-निमित्तक दीपदान करनेकी सरणिका प्रचलन हुआ। तीसरा दिन इस पर्वका प्रमुख दिन होता है; क्योंकि इस दिन भगवतीकी आरती दीपमालिका जलाकर की जाती है।
दीपावलीका सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियोंसे अप्रतिम महत्त्व है। सामाजिक दृष्टिसे इस पर्वका महत्त्व इसलिये है कि दीपावली आनेके पर्याप्त समय पूर्वसे ही घर-द्वारकी स्वच्छतापर ध्यान दिया जाने लगता है। घरका कूड़ा-करकट साफ किया जाता है। टूट-फूट सुधरवाकर घरकी दीवारोंपर सफेदी तथा दरवाजोंपर रंग-रोगन किया जाता है। जिससे न केवल उनकी आयु बढ़ जाती है, अपितु आकर्षण भी बढ़ जाता है। वर्षाकालीन अस्वच्छताका परिमार्जन हो जाता है। स्वच्छ और सुन्दर वातावरण शरीर और मस्तिष्कको नवचेतना तथा स्फूर्ति प्रदान करता है। दीपावलीके दिन सम्पन्न धनकुबेरोंके घरोंसे लेकर
श्रमिकोंकी झोपड़ियोंतकमें दीपावलीका प्रकाश किसी-न- किसी रूपमें अपनी प्रभा विकीर्ण करता हुआ अवश्य दृष्टिगोचर होता है। सभी वर्ण अपनी-अपनी क्षमताके अनुरूप इस पर्वकी अगवानी करते हैं और अपनी-अपनी स्थिति तथा मर्यादाके अनुसार इसके सर्वव्यापी आनन्दमें भाग लेते हैं। इसके साथ ही इस पर्वका जो सर्वाधिक आकर्षक सामाजिक महत्त्व है वह यह है कि इस दिन सम्पन्न और निर्धन दोनों ही पुरुषार्थसे प्रसन्न होनेवाली पराम्बा भगवती लक्ष्मीकी समाराधना कर उनकी कृपा प्राप्तिकी आशा करते हैं। दीपावली चिरकालसे ही वर्ण, वर्ग एवं आश्रमकी मर्यादाका अतिक्रमण कर सबको समानरूपसे आनन्द-वितरण करती चली आ रही है। यद्यपि होली और विजयादशमीके समान इसमें आमोद-प्रमोदके विभिन्न साधन एकत्र नहीं हो पाते, तथापि यह कहा जा सकता है कि दीपावली जागरूकता और कर्मठताका जो सुभग संदेश देती है वह अन्य व्रतों और पर्वोकी अपेक्षा कहीं अधिक उपादेय है।
दीपावलीके पर्वपर धनकी प्रभूत प्राप्तिके लिये धनकी अधिष्ठात्री धनदा भगवती लक्ष्मीकी समारोहपूर्वक
इस प्रार्थनाके साथ षोडशोपचार पूजा की जाती है-
अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥
पुत्रपौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्।
प्रजानां भवसि माता आयुष्यन्तं करोतु मे ॥
(श्रीसूक्त १९-२०)
इसके साथ ही उनका आवाहन इस प्रकार किया जाता है-
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्दा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्येस्थितां पद्मवर्णा तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥ (श्रीसूक्त ४)
अर्थात् जिन भगवती लक्ष्मीका स्वरूप मन और वाणीके द्वारा न जान पानेके कारण अवर्णनीय है, जो निज मन्दहास्यसे सबको आह्लादित करनेवाली हैं, हिरण्यादि उपयोगी पदार्थोंद्वारा जो चारों ओरसे आवृत हैं, जो स्नेह तथा आर्द्र हृदयवाली हैं, उन तेजोमयी पूर्णकामा, भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेवाली, कमलपर विराजमान कमलके समान वर्णवाली भगवती लक्ष्मीका में आवाहन करता हूँ।
आर्ष वाङ्मयके अनुसार जो व्यक्ति दीपावलीको रात्रि जागरण कर भगवती लक्ष्मीका शास्त्रीय विधिसे पूजन करता है। उसके गृहमें लक्ष्मीका निवास होता है तथा जो आलस्य और निद्राके वशीभूत हो भगवती धनदाके पूजनसे विमुख रहता है, उसके घरसे लक्ष्मी रूठकर चली जाती हैं। यहाँ जागरणसे अभिप्रेत है अपने उत्कृष्ट पुरुषार्थपर अवलम्बित रहना अथवा पुरुषार्थरत रहना और पुरुषार्थीको लक्ष्मीकी प्राप्ति होना अनिवार्य है; क्योंकि कहा गया है- 'उद्योगिनं पुरुपसिंहमुपैति लक्ष्मीः'
इस प्रकार दीपावलीका भारतीय पॉमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। आवालवृद्ध महीनों पूर्वसे इसके आगमनको उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते हैं और जब यह दीपावली आती है तब सोल्लास उसकी अगवानी करते हैं। इम पर्वको मनानेकी शास्त्रीय विधि इस प्रकार हैं- दीपावलीके दिन मन और विचारोंको पचित्रकर उत्साह और उल्लाससे परिपूर्ण हो भगवती धनदाके समाराधनार्थ प्रस्तुत होना चाहिये। प्रातः ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर दैनिक कृत्योंसे निवृत्त हो पितृगण तथा देवताओंका पूजन करना चाहिये। सम्भव हो तो दूध, दही और घृतसे पितरोंका पार्वणश्राद्ध करना चाहिये। यदि यह सम्भव न हो तो दिनभर उपवास कर गोधूलि वेलामें अथवा वृष, सिंह, वृश्चिक आदि स्थिर लग्नमें (प्रशस्त वृष और सिंह ही हैं) श्रीगणेश, कलश, षोडशमातृका एवं ग्रह-पूजनपूर्वक भगवती लक्ष्मीका षोडशोपचार पूजन करना चाहिये।
इसके अनन्तर महाकालीका दावातके रूपमें, महासरस्वतीका कलम, बही आदिके रूपमें तथा कुबेरका तुलाके रूपमें सविधि पूजन करना चाहिये। इसी समय दीपपूजन कर यमराज तथा पितृगणोंके निमित्त ससंकल्प दीपदान करना चाहिये। तत्पश्चात् घर-द्वार, वाग-बगीचे, स्नानागार, चौराहा आदि स्थानोंपर एवं नदियोंपर तैलपूर्ण प्रज्वलित दीप रखने चाहिये। पावन-पूज्य स्थानों (तुलसीचौरा, मन्दिर आदि) में घीके दीपक जलाने चाहिये। भगवती लक्ष्मीकी पूजा पवित्र वेदीकी रचना कर तथा उसपर रक्ताभ अष्टदल कमल बनाकर लक्ष्मीकी मूर्ति स्थापित करके करनी चाहिये। जिनके घरमें पृथक् पूजनकक्ष हो उन्हें उस कक्षको चित्र-विचित्र वस्त्रों, पत्र-पुष्पादिसे सुसज्जित कर वहाँ पूर्ण श्रद्धा तथा शक्तिके अनुसार एकत्रित पूजन-सामग्रीसे पराम्बा लक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके अनन्तर प्रदक्षिणा कर भगवतीको पुष्पाञ्जलि समर्पित करनी चाहिये। आधी रातके बाद घरकी स्त्रियाँ सूप आदि बजाकर अलक्ष्मी (दरिद्रा)- का निस्सारण करती हैं।
यह विश्वास है कि दीपावलीकी रात्रिमें विष्णुप्रिया लक्ष्मी सद्गृहस्थोंके घरोंमें विचरण कर यह देखती हैं कि हमारे निवासयोग्य घर कौन-कौनसे हैं? और जहाँ-कहीं उन्हें अपने निवासकी अनुकूलता दिखायी पड़ती है, वहीं रम जाती हैं। अतएव मानवको आजके दिन अपना घर ऐसा बनाना चाहिये जो भगवती लक्ष्मीके मनोनुकूल हो और जहाँ पहुँचकर वे अन्यत्र जानेका विचार भी अपने मनमें न लायें। भगवती लक्ष्मीको कौन-कौनसी वस्तुएँ प्रिय अथवा अप्रिय हैं इसका विवेचन अतीव कुशलतापूर्वक महाभारतादि ग्रन्थोंमें किया गया है। महाभारतमें स्पष्टरूपसे बताया गया है कि घरकी स्वच्छता, सुन्दरता और शोभा तो भगवती लक्ष्मीके निवासकी प्राथमिक आवश्यकता है ही, साथ ही उन्हें ये सब भी अपेक्षित हैं। जैसा कि देवी रुक्मिणीके यह पूछनेपर कि हे देवि ! आप किन-किन स्थानोंपर रहती हैं, तथा किन-किनपर कृपाकर उन्हें अनुगृहीत करती हैं? स्वयं देवी लक्ष्मी बताती हैं*-
वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने।
अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्त्वे ॥
स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते।
कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे क्षान्तासु दान्तासु तथावलासु ॥
वसामि नारीषु पतिव्रतासु कल्याणशीलासु विभूषितासु ।
(महा०, अनु०, दानधर्मपर्व ११|६, १०, १४)
इसी प्रकार एक बार महालक्ष्मीने भक्त प्रह्लादको बताया कि रोज, धर्म, सत्य, व्रत, बल एवं शील आदि मानवी गुणींमें मेरा निवास रहता है। इन गुणोंमें भी शील अथवा चारित्र्य मुझे सर्वाधिक प्रिय है। मैं शीलवान् पुरुषोंका वरण करती हूँ। (महा०, शान्ति० १२४)
ऐसे ही एक बार लक्ष्मीने राजा बलिका परित्याग कर दिया था। इसका कारण देवराज इन्द्रको बताते हुए लक्ष्मीजीने कहा-सत्य, दान, व्रत, तपस्या, पराक्रम एवं धर्म जहाँ वास करते हैं. वहाँ मेरा निवास रहता है। (महा०, शान्ति० २२५)
अर्थात् मैं उन पुरुषोंके घरोंमें सतत निवास करती हूँ जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, सच्चरित्र तथा कर्तव्यपरायण हैं। जो अक्रोधी, भक्त, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा सत्त्वसम्पन्न होते हैं। जो स्वभावतः निज धर्म, कर्तव्य तथा सदाचरणमें सतर्कतापूर्वक तत्पर होते हैं। धर्मज्ञ और गुरुजनोंकी सेवामें सतत निरत रहते हैं। मनको वशमें रखनेवाले, क्षमाशील और सामर्थ्यशाली हैं। इसी प्रकार उन स्त्रियोंके घर प्रिय हैं जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय, सत्यपर विश्वास रखनेवाली होती हैं तथा जिन्हें देखकर सबका चित्त प्रसन्न हो जाता है। जो शीलवती, सौभाग्यवती, गुणवती, पतिपरायणा, सबका मङ्गल चाहनेवाली तथा सद्गुणसम्पन्ना होती हैं।
भगवती लक्ष्मी किन व्यक्तियोंके घरोंको छोड़कर चली जाती हैं, इस विषयमें वे स्वयं देवी रुक्मिणीसे कहती हैं-
नाकर्मशीले पुरुषे वसामि न नास्तिके साङ्करिके कृतघ्ने।
न न भिन्नवृत्ते नृशंसवर्णे न चापि चौरे न गुरुष्वसूये ॥
ये चाल्पतेजोबलसत्त्वमानाः न क्लिश्यन्ति कुप्यन्ति च यत्र तत्र । चैव तिष्ठामि तथाविधेषु नरेषु संगुप्तमनोरथेषु ।।
(महा० अनु० दान० ११।७-८)
जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसङ्कर, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनोंके दोष देखनेवाला हो, उसके भीतर मैं निवास नहीं करती हूँ। जिनमें तेज, बल, सत्त्व और गौरवकी मात्रा बहुत थोड़ी है, जो जहाँ-तहाँ हर बातमें खिन्न हो उठते हैं, जो मनमें दूसरा भाव रखते हैं और ऊपरसे कुछ
और ही दिखाते हैं, ऐसे मनुष्योंमें मैं निवास नहीं करती हूँ। इसी प्रकार उन स्त्रियोंके घर भी मुझे प्रिय नहीं–
प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं सदा च भर्तुः प्रतिकूलवादिनीम् ।।
परस्य वेश्माभिरतामलज्जा- मेवंविधां तां परिवर्जयामि।
पापामचोक्षामवलेहिनीं च व्यपेतधैर्या कलहप्रियां च।॥
निद्राभिभूतां सततं शयाना-मेवंविधां तां परिवर्जयामि।
(महा०, अनु०, दान० ११।११-१३)
अर्थात् जो नारियाँ अपने गृहस्थीके सामानोंकी चिन्ता नहीं करतीं, बिना सोचे-विचारे काम करती हैं, पतिके प्रतिकूल बोलती हैं, पराये घरमें अनुराग रखती हैं, निर्लज्ज, पापकर्ममें रुचि रखनेवाली, अपवित्र, चटोरी, अधीर, झगड़ालू तथा सदा सोनेवाली हैं, ऐसी स्त्रियोंके घरको छोड़कर मैं चली जाती हूँ।
उपर्युक्त गुणोंका अभाव होनेपर अथवा दुर्गुणोंकी विद्यमानता होनेपर भले ही कितने ही सँभालके साथ लक्ष्मी पूजन किया जाय, भगवती लक्ष्मीका निवास उनके गृहमें नहीं हो सकता। दीपावलीकी एक कथा इस प्रकार प्राप्त होती है-
एक बार मुनियोंने सनत्कुमारजीसे पूछा- भगवन्! दीपावली लक्ष्मी-पूजाका पर्व है, फिर लक्ष्मी पूजाके साथ अन्यान्य देवी-देवताओंकी पूजाका महत्त्व क्यों प्रतिपादित किया गया है ? सनत्कुमारजीने बताया- राजा वलिका प्रताप जब समस्त भुवनोंमें फैल गया और उसने सभी देवताओंको बन्दी बना लिया था। उसके कारागारमें लक्ष्मीसहित सभी देवी-देवता बंद थे। कार्तिक कृष्णपक्षको अमावास्याको वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने जब बलिको बाँध लिया और सब देवी-देवता उसके कारागारसे मुक्त हुए, तब सबने क्षीरसागरमें जाकर शयन किया था। इसलिये दीपावलीके दिन लक्ष्मीके साथ उन सब देवताओंका पूजन कर उन सबके शयनका अपने घरमें उत्तम प्रबन्ध करना चाहिये, जिससे वे लक्ष्मीके साथ वहीं निवास करें, कहीं और न जायँ। नयी शय्या, नया विस्तर, कमल आदिसे सुसज्जित कर लक्ष्मीको शयन कराना चाहिये जो इस विधिसे लक्ष्मी-पूजन करते हैं, लक्ष्मी उनके यहाँ स्थिरभावसे निवास करती हैं।
इस पर्वका चौथा दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाको मनाया जानेवाला गोवर्धन नामक पर्व है। इस दिन पवित्र होकर प्रातःकाल गोवर्धन तथा गोपेश भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना चाहिये। गौओं और बैलोंको वस्त्राभूषणों तथा मालाओंसे सजाना चाहिये। गोवर्धनकी पूजाके समय
अग्रलिखित मन्त्र बोलना चाहिये-
गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक ।
विष्णुवाहकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव ॥
अर्थात् पृथ्वीको धारण करनेवाले गोवर्धन ! आप गोकुलके रक्षक हैं। भगवान् श्रीकृष्णने आपको अपनी भुजाओंपर उठाया था। आप मुझे करोड़ों गौएँ प्रदान करें। दूसरी बात यह है कि इस समयतक शरत्कालीन उपज परिपक्व होकर घरोंमें आ जाती है। भण्डार परिपूर्ण हो जाते हैं, अतः निश्चिन्त होकर लोग नयी उपजके शस्योंसे विभित्र प्रकारके पदार्थ बनाकर श्रीमन्नारायणको समर्पित करते हैं। गव्य पदार्थोंको भी इस उत्सबमें सजा-सँवारकर निवेदित किया जाता है। गोमयका गोवर्धन (पर्वत) बना उसकी पूजा की जाती है। शारदीय उपजसे जो धान्य प्राप्त होते हैं, उनसे छप्पन प्रकारके भोग बनाकर श्रीमन्नारायणको समर्पित किये जाते हैं।
दीपोत्सवपर्वका समापन दिवस है कार्तिक शुक्ल द्वितीया, जिसे 'भैयादूज' कहा जाता है। शास्त्रोंके अनुसार भैयादूज अथवा यमद्वितीयाको मृत्युके देवता यमराजका पूजन किया जाता है। इस दिन बहनें भाईको अपने घर आमन्त्रित कर अथवा सायं उनके घर जाकर उन्हें तिलक करती हैं और भोजन कराती हैं। व्रजमण्डलमें इस दिन बहनें भाईके साथ यमुना-नान करती हैं, जिसका विशेष महत्त्व बताया गया है। भाईके कल्याण और वृद्धिकी इच्छासे बहनें इस दिन कुछ अन्य माङ्गलिक विधान भी करती हैं। यमुनातटपर भाई-बहनका समवेत भोजन कल्याणकारी माना जाता है। पौराणिक कथाके अनुसार इस दिन भगवान् यमराज अपनी बहन यमुनासे मिलने जाते हैं। उन्हींका अनुकरण करते हुए भारतीय भ्रातृ-परम्परा अपनी बहनोंसे मिलती है और उनका यथेष्ट सम्मान-पूजनादि कर उनसे आशीर्वादरूप तिलक प्राप्तकर कृतकृत्य होती है।
बहनोंको इस दिन नित्य कृत्यसे निवृत्त हो अपने भाईके दीर्घ जीवन, कल्याण एवं उत्कर्षहेतु तथा स्वयंके सौभाग्यके लिये अक्षत, कुंकुमादिसे अष्टदल कमल बनाकर इस व्रतका संकल्प कर मृत्युके देवता यमराजकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसके पश्चात् यम-भगिनी यमुना, चित्रगुप्त और यमदूतोंको पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर भाईको तिलक लगाकर भोजन कराना चाहिये। इस विधिके सम्पन्न होनेतक दोनोंको व्रती रहना चाहिये।
इस पर्वके सम्बन्धमें पौराणिक कथा इस प्रकार मिलती है-सूर्यको संज्ञासे दो संतानें थीं- पुत्र यमराज तथा पुत्री यमुना। संज्ञा सूर्यका तेज सहन न कर पानेके कारण अपनी छाया मूर्तिका निर्माण कर उसे ही अपने पुत्र- पुत्रीको सौंप वहाँसे चली गयीं। छायाको यम और यमुनासे किसी प्रकारका लगाव न था, किंतु यम और यमुनामें बहुत प्रेम था। यमुना अपने भाई यमराजके यहाँ प्रायः जाती और उनके सुख-दुःखकी बातें पूछा करती। यमुना यमराजको अपने वरपर आनेके लिये कहती, किंतु व्यस्तता तथा दायित्वबोझके कारण वे उसके घर न जा पाते थे। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीयाको यमराज अपनी बहन यमुनाके घर अचानक जा पहुँचे। बहन यमुनाने अपने सहोदर भाईका
बड़ा आदर-सत्कार किया। विविध व्यञ्जन बनाकर उन्हें भोजन कराया तथा उनके भालपर तिलक लगाया। यमराज अपनी बहनद्वारा किये गये सत्कारसे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने यमुनाको विविध भेंट समर्पित की। जब वे वहाँसे चलने लगे, तब उन्होंने यमुनासे कोई भी मनोवाञ्छित वर माँगनेका अनुरोध किया। यमुनाने उनके आग्रहको देखकर कहा- भैया! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही बर दीजिये कि आजके दिन प्रतिवर्ष आप मेरे यहाँ आया करें और मेरा आतिथ्य स्वीकार किया करें। इसी प्रकार जो भाई अपनी बहनके घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे तथा उसे भेंट दे, उसकी सब अभिलाषाएँ आप पूर्ण किया करें और उसे आपका भय न हो।
यमुनाकी प्रार्थनाको यमराजने स्वीकार कर लिया। तभीसे बहन-भाईका यह त्योहार मनाया जाने लगा। वस्तुतः इस त्योहारका मुख्य उद्देश्य है भाई-बहनके मध्य सौमनस्य और सद्भावनाका पावन प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखना तथा एक-दूसरेके प्रति निष्कपट प्रेमको प्रोत्साहित करना।
समष्टिरूपमें स्वास्थ्यसम्पद्, रूपसम्पद्, धनसम्पद् शस्यसम्पद्, शक्तिसम्पद् तथा उल्लास और आनन्दको परिवर्धित करनेवाले 'दीपावलीपर्व' का धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रिय महत्त्व अनुपम है और वही इसे पर्वराज बना देता है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
शुक्लपक्ष
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
(1) गोवर्धनपूजा (हेमाद्रि) — दीपावलीके दूसरे दिन प्रभातके समय मकानके द्वारदेशमें गौके गोबरका गोवर्धन बनाये। शास्त्रमें उसको शिखरप्रयुक्त, वृक्ष-शाखादिसे संयुक्त और पुष्पादिसे सुशोभित बनानेका विधान है; किंतु अनेक स्थानोंमें उसे मनुष्यके आकारका बनाकर पुष्पादिसे भूषित करते हैं। चाहे जैसा हो, उसका गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करके
'गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक।
विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव ॥'
से प्रार्थना करे। इसके पीछे भूषणीय गौओंका आवाहन करके उनका यथाविधि पूजन करे और
'लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता ।
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु ।।'
से प्रार्थना करके रात्रिमें गौसे गोवर्धनका उपमर्दन कराये।
अन्नकूट-महोत्सव
[ कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा ]
कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको अन्नकूट- महोत्सव मनाया जाता है। इस दिन गोवर्धनकी पूजा कर अन्नकूटका उत्सव मनाना चाहिये। इससे भगवान् विष्णुकी प्रसन्नता प्राप्त होती है-
कार्तिकस्य सिते पक्षे अन्नकूटं समाचरेत्।
गोवर्धनोत्सवं चैव श्रीविष्णुः प्रीयतामिति ।।
इस दिन प्रातःकाल घरके द्वारदेशमें गौके गोबरका गोवर्धन बनाये तथा उसे शिखरयुक्त बनाकर वृक्ष-शाखादिसे संयुक्त और पुष्पोंसे सुशोभित करे। अनेक स्थानोंमें इसे मनुष्यके आकारका भी बनाते हैं। इसके बाद गन्ध- पुष्पादिसे गोवर्धनभगवान्का षोडशोपचारपूर्वक पूजन कर निम्न प्रार्थना करनी चाहिये-
गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक ।
विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव ॥
इसके बाद आभूषणोंसे सुसज्जित गौओंका यथाविधि पूजन करे और निम्न मन्त्रसे उनकी प्रार्थना करे-
लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता ।
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु ॥
इस दिन यथासामर्थ्य छप्पन प्रकारके व्यञ्जन बनाकर गोवर्धनरूप श्रीभगवान्को भोग लगाया जाता है। इसके बाद प्रसादरूपमें भक्तोंमें वितरित किया जाता है। रातमें गौसे गोवर्धनका उपमर्दन कराया जाता है, मन्दिरोंमें विविध प्रकारके पक्वान्न, मिठाइयाँ, नमकीन और अनेक प्रकारको सब्जियाँ, मेवे, फल आदि भगवान्के समक्ष सजाये जाते हैं तथा अन्नकूटका भोग लगाकर आरती होती है, फिर भक्तोंमें प्रसाद वितरण किया जाता है। व्रजमें इसकी विशेषता है। काशी, मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, बरसाना, नाथद्वारा आदि भारतके प्रमुख मन्दिरोंमें लड्डुओं तथा पक्वान्नोंके पहाड़ (कूट) बनाये जाते हैं, जिनके दर्शनके लिये विभिन्न स्थानोंसे यात्री पधारते हैं।
इस महोत्सवकी कथा इस प्रकार है- द्वापरमें व्रजमें अन्नकूटके दिन इन्द्रकी पूजा होती थी। श्रीकृष्णने गोप-ग्वालोंको समझाया कि गायें और गोवर्धन प्रत्यक्ष देवता हैं, अतः तुम्हें इनकी पूजा करनी चर्चा क्योंकि इन्द्र तो कभी यहाँ दिखायी भी नहीं देते अबतक उन्होंने कभी आपलोगोंके बनाये पक्वान्न ग्रहण नहीं किये। फलस्वरूप उनकी प्रेरणासे सभी ब्रजवासि गोवर्धनका पूजन किया। स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने गोवर्ध रूप धारणकर उस पक्वान्नको ग्रहण किया।
जब इन्द्रको यह बात ज्ञात हुई तो वे अत्य क्रुद्ध होकर प्रलयकालके सदृश मुसलाधार वृष्टि क लगे। यह देख श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको अपनी अँगुली धारण किया, उसके नीचे सव व्रजवासी, ग्वाल बाल, गायें-बछड़े आदि आ गये। लगातार सात दिनर वर्षासे जब व्रजपर कोई भी प्रभाव न पड़ा तो इन्द्र बड़ी ग्लानि हुई। ब्रह्माजीने इन्द्रको श्रीकृष्णके परमन्न परमात्मा होनेकी बात बतायी तो लज्जित हो इन्द्रने ग्र आकर श्रीकृष्णसे क्षमा माँगी। इस अवसरपर ऐरावत आकाशगङ्गाके जलसे और कामधेनुने अपने दृध भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक किया, जिससे वे 'गोविन्द कहे जाने लगे। इस प्रकार गोवर्धन पूजन स्वयं श्रीभगवान पूजन है।
गोवर्धन-पूजनका रहस्य
जीवमें जैसे-जैसे अहंकार जड़ जमाता जाता है, वैसे वैसे उसे पतनकी गहराईकी ओर घसीटता जाता है और वञ्चित जीवको उसका पतातक नहीं होता। देवताओंके राजा इन्द्र भी इस अहंकारकी चपेटमें आ गये थे। परिणाम यह हुआ कि वे परब्रह्म परमात्माको मरणधर्मा 'मनुष्य', उनके चिन्मय तत्त्वोंको 'जड' और लीला सहचरोंको 'जंगली' मान बैठे थे। इस तरह देवराजमें असुरताके बीज अहंकारका स्तर अत्यन्त उग्र होता गया।
दयावश भगवान् श्रीकृष्णने एक ओर तो इन्द्रके इस रोगकी चिकित्सा करनी चाही और दूसरी ओर गोवर्धनगिरिकी 'चिन्मयता' भी व्यक्त कर देनेकी उनकी इच्छा हुई। अतः नन्दबाबासे कहकर उन्होंने 'इन्द्रयाग' पर रोक लगा दी और उन्हीं समस्त पूजन-सम्भारोंसे गोवर्धनकी पूजा करायी। भगवान्की यह योजना शंकरजीको बहुत अच्छी लगी। वे दल-बल-सहित इस गिरिपूजनमें सम्मिलित हुए-
धत्तूरभङ्गाविषपानविह्वलो हिमाद्रिपुत्रीसहितो गणावृतः ।
नन्दीश्वरमादिवाहनं आरुह्य समाययौ श्रीगिरिराजमण्डलम् ॥
(गर्गसंहिता, गिरि० खं० २।१४)
गोवर्धनपूजाका यह औचित्य राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों और सिद्धोंसे भी छिपा न था। वे भी बड़ी प्रसन्नतासे इस समारोहमें उपस्थित हुए। देवगिरि सुमेरु और नगाधिराज हिमालयके लिये भी गोवर्धनगिरिकी चिन्मयता व्यक्त ही थी। इसलिये उनमें जातिगत ईर्ष्या या द्वेष नहीं जगा और वे भी बड़ी प्रसन्नतासे गोवर्धनके पूजन समारोहमें
उपस्थित हुए। पूजनके समय स्वयं भगवान्ने एक विशाल रूप धारण कर अपनेको 'गोवर्धन' घोषित किया और इस तरह उन्होंने गोवर्धनगिरिसे अपनी ' अभिन्नता' प्रकट की। देवता और मनुष्य भी इससे कम प्रसन्न नहीं हुए। इन्होंने फूलों और खीलोंकी मुक्तहस्त वर्षा प्रारम्भ कर दी। किंतु देवराजके अहंकारका पर्दा इतना घना हो चुका था कि वे गिरिराजकी भगवद्रूपता तनिक भी आँक न पाये, प्रत्युत ईर्ष्या और क्रोधसे जल उठे। प्रलयकारी मेघोंको आज्ञा दे बैठे कि वे व्रजको ध्वंस कर दें। स्वयं भी ऐरावतपर चढ़कर मरुद्गणोंके साथ मेघोंकी सहायतामें आ डटे। इधर, भगवान्ने गोवर्धन पर्वत एक ही हाथपर उठा इन्द्रकी सम्पूर्ण प्रलयङ्करी वर्षा निरर्थक कर दी। भगवान्ने मनसे ही शेष और सुदर्शनको आज्ञा दी और वे दोनों तत्क्षण वहाँ आकर उपस्थित हुए। चक्रने पर्वतके ऊपर स्थित हो जलसम्पात पी लिया और नीचे कुण्डलाकार हो शेषजीने सारा जलप्रवाह रोक दिया। गड्डेके भीतर एक बूँद भी जल न जा सका-
जलौघमागतं वीक्ष्य भगवांस्तद्गिरेरधः ।
सुदर्शनं तथा शेषं मनसाज्ञां चकार ह।
कोटिसूर्यप्रभं चाद्रेरूर्ध्वं चक्रं सुदर्शनम्। धारासम्पातमपिबदगस्त्य इव मैथिल ॥
अधोऽधस्तं गिरिं शेषः कुण्डलीभूत आस्थितः ।
रुरोध तज्जलं दीर्घ यथा वेला महोदधिम् ।।
(गर्गसंहिता, गिरि० खं० ३१२०-२२)
जब इन्द्रने अपनी सारी शक्ति लगाकर देख लिया कि मनकी बात नहीं हुई, तब उनका अहंकार जाता रहा और उन्हें वस्तुस्थितिका ठीक-ठीक बोध हुआ। फिर तो वे अपनेको ही अपराधी पाकर भयभीत भी हो उठे और सीधे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर आ गिरे। अब उन्हें श्रीकृष्णके शुद्ध सत्त्वमय ज्ञानधन स्वरूपका परिज्ञान हुआ और वे यह भी जान सके कि किस प्रकार उनके भीतर अहंकार विध्वंसका कार्य कर रहा था। भगवान् श्रीकृष्णने इन्द्रको क्षमा कर दिया और इन्द्रने भी आकाश-गङ्गाके जलसे श्रीकृष्णका अभिषेक किया। इस प्रकार गोकुलकी की गयी रक्षासे कामधेनु भी बहुत प्रसन्न हुई और उसने अपनी दुग्धधारासे भगवान्का अभिषेक किया। इन अभिषेकोंको देखकर गिरिराज गोवर्धनके हर्षका ठिकाना न रहा और वह द्रवीभूत हो बह चला। तब भगवान्ने प्रसन्न होकर अपना करकमल उसपर रखा, जिसका चिह्न आज भी दीखता है-
तद्धस्तचिह्नमद्यापि दृश्यते तगिरौ नृप। (गर्गसंहिता, गिरि० खं० ४।१२)
गोवर्धनकी चिन्मयताका स्पष्टीकरण गर्गसंहितामें हुआ है। अवतारके समय भगवान्ने राधासे साथ चलनेको कहा था। उसपर राधाजीने कहा था कि बृन्दावन, यमुना और गोवर्धनके बिना मेरा मन पृथिवीपर न लगेगा। यह सुन श्रीकृष्णने अपने हृदयकी ओर दृष्टि डाली थी, जिससे तत्क्षण एक सजल तेज निकलकर 'रासभूमि' पर जा गिरा था और वही पर्वतके रूपमें परिणत हो गया था। यह रत्नमय शृङ्गों, सुन्दर झरनों, कदम्ब आदि वृक्षों एवं कुञ्जोंसे सुशोभित था। उसमें अन्य भी नाना प्रकारकी दिव्य सामग्रियाँ उपस्थित थीं, जिन्हें देखकर राधाजी बहुत प्रसन्न हुई।
इसी संदर्भमें एक और कथा है। भगवान्को प्रेरणासे शाल्मलीद्वीपमें द्रोणाचलकी पल्लीमें गोवर्धनका जन्म हुआ। भगवान्के जानुसे वृन्दावन और उनके वामस्कन्धसे यमुना प्रकट हुई। गोवर्धनको भगवद्रूप जानकर ही सुमेरु, हिमालय आदि पर्वतोंने उसकी पूजा की और उसे गिरिराज
बना उसका स्तवन भी किया।
एक समय तीर्थयात्राके प्रसंगमें पुलस्त्यजी वहाँ आये। वे गिरिराज गोवर्धनको देख मुग्ध हो उठे और द्रोणके पास जाकर उन्होंने कहा-'मैं काशीनिवासी हूँ। एक याचना लेकर आपके पास आया हूँ। आप अपने इस पुत्रको मुझे दे दें। मैं इसे काशीमें स्थापित कर वहीं तप करूँगा।' इसपर द्रोण पुत्रके स्नेहसे कातर तो हो उठे, पर वे ऋषिकी माँग ठुकरा न सके। तब गोवर्धनने मुनिसे कहा- 'मैं दो योजन ऊँचा और पाँच योजन चौड़ा हूँ। आप मुझे कैसे ले चल सकेंगे।' मुनिने कहा- 'मैं तुम्हें हाथपर उठाये चला चलूँगा'-
उपविश्य करे मे त्वं गच्छ पुत्र यथासुखम्। वाहयामि करे त्वां वै यावत् काशीसमागमः ।।
(गर्गसंहिता, वृन्दावनखं० २०३१)
गोवर्धनने कहा-'महाराज! एक शर्त है। यदि आप मार्गमें मुझे कहीं रख देंगे तो मैं उठ नहीं सकूँगा।' मुनिने यह शर्त स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् पुलस्त्य मुनिने हाथपर गोवर्धन उठाकर काशीके लिये प्रस्थान किया। मार्गमें व्रजभूमि मिली, जिसपर गोवर्धनको पूर्वस्मृतियाँ जाग उठीं। वह सोचने लगा कि भगवान् श्रीकृष्ण राधाके साथ यहीं अवतीर्ण हो बाल्य और कैशोर आदिकी बहुत- सी मधुर लीलाएँ करेंगे! उस अनुपम रसके चिना में रह न सकूँगा। ऐसे विचार उत्पन्न होते ही वह भारी होने लगा, जिससे मुनि थक गये। इधर, लघुशंकाकी भी प्रवृत्ति हुई। पश्चात् स्नान आदिसे निवृत्त होकर जब वे गोवर्धनको पुनः उठाने लगे, तब वह न उठा। गोवर्धनने मुनिको अपनी शर्तको याद दिलायी और कहा- अब मैं यहाँसे डिगनेका नहीं।' इसपर मुनिको क्रोध हो आया और वे उसे शाप दे बैठे-'तुमने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया, इसलिये तुम प्रतिदिन तिल- तिल घटते जाओगे।' उसी शापसे गिरिराज गोवर्धन आज भी तिल-तिल घटता ही जा रहा है-
नित्यं संक्षीयते नन्द तिलमात्रं दिने दिने ॥
(गर्गसंहिता, पृन्दावनखं० २४)
इतना होनेपर भी, जबतक गङ्गा और गोवर्धन पृथिवीपर है, तबतक पृथिवीमें कलिका प्रभाव पूर्णरूपसे न जम सकेगा। इस तरह गिरिराजकी 'चिन्मयता' सुस्पष्ट हो जानेसे उसकी महत्ता स्वयं व्यक्त हो जाती है।
एक कथा है कि एक ब्राह्मण अपना ऋण वसूल करने मथुरा आया। लौटते समय उसने गिरिराजका एक गोल पत्थर भी साथ ले लिया। मार्गमें एक भयानक राक्षसने उसे घेरा। इसपर वह ब्राह्मण काँप उठा। वह इतना अधिक घबरा गया कि उसका हिलना-डोलना भी कठिन हो गया और वह रो पड़ा। राक्षस मुँह बाये सामने खड़ा था। ब्राह्मणने गोवर्धनका वह पाषाणखण्ड ही उसपर दे मारा। गोवर्धनके इस पाषाणखण्डकी 'चिन्मयता' का ही यह अद्भुत प्रभाव था कि उसके स्पर्शमात्रसे राक्षसको नीच योनिसे छुटकारा मिल गया और उसकी काया दिव्य हो गयी। साथ ही, नभोमार्गसे तत्क्षण एक दिव्य विमान उतरा, जिसमें चढ़कर वह राक्षस 'गोलोक' चला गया। अतः गन्धमादनकी यात्रा अथवा अन्य नाना प्रकारके पुण्यों एवं तपस्याओंका जो फल प्राप्त होता है, उससे भी कोटिगुण अधिक फल गोवर्धनके दर्शनमात्रसे होना शास्त्रोंमें लिखा है।
[काननौकसाम् । कृष्णे मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२५।३)
२-देवेषु तर्पत्सु च पुष्पवर्ष जनेषु वत्सु च लाजसंधम्।]
(गर्गसंहिता, गिरि० २७० २१२०-२१)
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
(2) अन्नकूट (भागवत और व्रतोत्सव) – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाको भगवान् के नैवेद्यमें नित्यके नियमित पदार्थोंके अतिरिक्त यथासामर्थ्य (दाल, भात, कढ़ी, साग आदि 'कच्चे'; हलवा, पूरी, खीर आदि 'पक्के'; लड्डू, पेड़े, बर्फी, जलेबी आदि 'मीठे'; केले, नारंगी, अनार, सीताफल आदि 'फल'-फूल; बेंगन, मूली, साग-पात, रायते, भुजिये आदि 'सलूने' और चटनी, मुरब्बे, अचार आदि खट्टे-मीठे-चरपरे) अनेक प्रकारके पदार्थ बनाकर अर्पण करे और भगवान्के भक्तोंको यथाविभाग भोजन कराकर शेष सामग्री आशार्थियोंमें वितरण करे । अन्नकूट यथार्थमें गोवर्धनकी पूजाका ही समारोह है। प्राचीन कालमें व्रजके सम्पूर्ण नर-नारी अनेक पदार्थोंसे इन्द्रका
पूजन करते और नाना प्रकारके षडरस पूर्ण (छप्पन भोग, छत्तीसों व्यञ्जन) भोग लगाते थे। किंतु श्रीकृष्णने अपनी बालकावस्थामें ही इन्द्रकी पूजाको निषिद्ध बतलाकर गोवर्धनका पूजन करवाया और स्वयं ही दूसरे स्वरूपसे गोवर्धन बनकर अर्पण की हुई सम्पूर्ण भोजन-सामग्रीका भोग लगाया। यह देखकर इन्द्रने व्रजपर प्रलय करनेवाली वर्षा की, किंतु श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठाकर और व्रजवासियोंको उसके नीचे खड़े रखकर बचा लिया।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
(3) मार्गपाली (आदित्यपुराण) – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाको सायंकालके समय कुश या काँसका लम्बा और मजबूत रस्सा बनाकर उसमें जहाँ-तहाँ अशोक (आशापाला) के पत्ते गूँथकर बंदनवार बनवाये और राजप्रासादके प्रवेश-द्वारपर अथवा दरवाजेके आकारके दो अति उच्चस्तम्भोंपर इस सिरेसे उस सिरेतक बँधवा दे और गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करके
'मार्गपालि नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखप्रदे।
विधेयैः पुत्रदाराद्यैः पुनरेहि व्रतस्य मे ।। '
से प्रार्थना करे। इसके बाद सर्वप्रथम नराधिप (या बस्तीका कोई भी प्रधान पुरुष) और राजपरिवार और उनके पीछे नगरके नर-नारी और हाथी, घोड़े आदि हर्षध्वनिके साथ जयघोष करते हुए प्रवेश करें और राजा यथास्थान स्थित होकर सौभाग्यवती स्त्रियोंके द्वारा नीराजन करायें और हो सके तो रात्रिके समय बलिराजाका पूजन करके
'बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो ।
भविष्येन्द्र सुराराते पूजेयं प्रतिगृह्यताम् ॥'
से प्रार्थना करे। जिस समय बलिने वामनभगवान्के लिये तीन पैंड पृथ्वीके दानको पूर्ण करनेके लिये आकाश और पातालको दो पैंडमें मानकर तीसरे पैंडके लिये अपना मस्तक दिया, उस समय भगवान्ने कहा था कि 'हे' दानवीर ! भविष्यमें इसी प्रतिपदाको तेरा पूजन होगा और उत्सव मनाया जायगा।' इसी कारण उस दिन बलिका पूजन किया जाता है और करना चाहिये। मार्गपाली और बलिकी पूजा करनेसे और विशेषकर, मार्गपालीकी बंदनवारके नीचे होकर निकलनेसे उस वर्षमें सब प्रकारकी सुख-शान्ति रहती है और कई रोग दूर हो जाते हैं। अनेक बार देखने में आता है कि मनुष्योंमें जनपदनाशक महामारी और पशुओंमें बीमारी होती है, तब देहातके अनक्षर और साक्षर सामूहिकरूपमें सलाह करके सन, सूत या खींपका बहुत लम्बा रस्सा बनवाकर उसमें नीमके पत्ते गूँथ देते हैं और बीचमें 5 या 7 पाली नीचे-ऊपर लगाकर उसको गाँवमें प्रवेश करनेकी जगह बाँध देते हैं। ताकि उसके नीचे होकर निकलनेवाले नर-नारी और पशु (गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि) रोगी नहीं होते और सालभर प्रसन्न रहते हैं।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल द्वितीया
(4) यमद्वितीया-कार्तिक शुक्ल द्वितीयाको यमका पूजन किया जाता है, इससे यह 'यमद्वितीया' कहलाती है। इस दिन वणिक्-वृत्ति- वाले व्यवहारदक्ष वैश्य मसिपात्रादिका पूजन करते हैं, इस कारण इसे 'कलमदानपूजा' भी कहते हैं और इस दिन भाई अपनी बहिनके घर भोजन करते हैं, इसलिये यह 'भइया दूज' नामसे भी विख्यात है। हेमाद्रिके मतसे यह द्वितीया मध्याह्नव्यापिनी पूर्वविद्धा उत्तम होती है। स्मार्तमतमें आठ भागके दिनके पाँचवें भागकी श्रेष्ठ मानी है और स्कन्दके कथनानुसार अपराह्णव्यापिनी अधिक अच्छी होती है। यही उचित है। व्रतीको चाहिये कि प्रातः स्नानादिके अनन्तर कर्मकालके समय अक्षतादिके अष्टदलकमलपर गणेशादिका स्थापन करके
'मम यमराजप्रीतये यमपूजनम् - व्यवसाये व्यवहारे वा सकलार्थसिद्धये मसिपात्रादीनां पूजनम् - भ्रातुरायुष्यवृद्धये मम सौभाग्यवृद्धये च भ्रातृपूजनं च करिष्ये ।'
यह संकल्प करके गणेशजीका पूजन करनेके अनन्तर यमका, चित्रगुप्तका, यमदूतोंका और यमुनाका पूजन करे तथा
'धर्मराज नमस्तुभ्यं नमस्ते यमुनाग्रज ।
पाहि मां किङ्करैः सार्धं सूर्यपुत्र नमोऽस्तु ते ॥'
से 'यम' की—
'यमस्वसर्नमस्तेऽस्तु यमुने लोकपूजिते ।
वरदा भव मे नित्यं सूर्यपुत्रि नमोऽस्तु ते ॥'
से 'यमुना' की और
'मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम् ।
लेखनीपट्टिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम् ॥'
से 'चित्रगुप्त' की प्रार्थना करके शङ्खमें या ताँबेके अर्घ्यपात्रमें अथवा अञ्जलिमें जल, पुष्प और गन्धाक्षत लेकर
'एह्येहि मार्तण्डज पाशहस्त यमान्तकालोकधरामरेश। भ्रातृद्वितीयाकृतदेवपूजां गृहाण चार्घ्यं भगवन्नमोऽस्तु ते ॥'
से यमराजको 'अर्घ्य' दे।.....उसी जगह मसिपात्र (दावात), लेखनी (कलम) और राजमुद्रा (मुख्य मुहर) स्थापन करके
'मसिपात्राय नमः ।' 'लेखन्यै नमः ।'
और
'राजमुद्रायै नमः ।'
इन नाममन्त्रोंसे उनका पूजन करके
'मसि त्वं लेखनीयुक्तचित्रगुप्तशयस्थिता ।
सदक्षराणां पत्रे च लेख्यं कुरु सदा मम ॥' से 'मसिपात्र' की;
'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणा वरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥' 'तरुणशकलमिन्दोर्बिभ्रती शुभ्रकान्तिः कुचभरनमिताङ्गी संनिषण्णा सिताब्जे ।
निजकर- कमलोद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः सकलविभवसिद्ध्यै पातु वाग्देवता नः ॥ '
'कृष्णानने कृष्णजिह्वे चित्रगुप्तशयस्थिते ।
प्रार्थनेयं गृहाण त्वं सदैव वरदा भव ॥'
से 'लेखनी' की और
'हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदाम्भोजसंनिभे । प्रार्थनेयं गृहाणेमां नमस्ते राजमुद्रिके॥'
से 'राजमुद्रा' (मुहर) की प्रार्थना करके सफेद कागजपर श्रीरामजी,
'श्रीरामो जयति, गणपतिर्जयति, शारदायै नमः और लक्ष्म्यै नमः'
आदि लिखे। इसके अतिरिक्त छोटी भगिनीके घर जाकर बहिनकी की हुई पूजा ग्रहण करे। बहिनको चाहिये कि वह भाईको शुभासनपर बिठाकर उसके हाथ-पैर धुलाये। गन्धादिसे उसका पूजन करे और दाल, भात, फुलके, कढ़ी, सीरा, पूरी, चूरमा अथवा लड्डू, जलेबी, घेवर आदि यथासामर्थ्य उत्तम पदार्थोंका भोजन कराये और
'भ्रातस्तवानुजाताहं भुङ्क्ष्व भक्तमिमं शुभम् ।
प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः ॥'
से उसका अभिनन्दन करे। इसके बाद भाई बहिनको यथासामर्थ्य अन्न-वस्त्र-आभूषण और सुवर्ण-मुद्रादि द्रव्य देकर उससे शुभाशिष प्राप्त करे। यदि सहजा (सगी) बहिन न हो तो पितृव्य-पुत्री (काकाकी कन्या), मातुल-पुत्री (मामाकी बेटी) या मित्रभगिनी (मित्रकी बहिन) – इनमें जो हो उसके यहाँ भोजन करे। यदि यमद्वितीयाको यमुनाके किनारेपर बहिनके हाथका बनाया भोजन करे तो उससे भाईकी आयुवृद्धि [0610] ब्र० प० 6और बहिनके अहिवात (सौभाग्य) की रक्षा होती है।
यमद्वितीया ( भैयादूज )
[ कार्तिक शुक्ल द्वितीया ]
कार्तिकमासके शुक्लपक्षको द्वितीया 'यमद्वितीया' या 'भैयादूज' कहलाती है। इसे अपराह्नव्यापिनी ग्रहण करना चाहिये। इस दिन यमुना-स्नान, यम-पूजन और बहनके घर भाईका भोजन विहित है और शास्त्रीय मतके अनुसार मृत्युदेवता यमराजकी पूजा होती है।
आजके दिन व्रती बहनोंको प्रातः खानादिके अनन्तर अक्षतादिसे निर्मित अष्टदल कमलपर गणेशादिका स्थापन करके यम, यमुना, चित्रगुप्त तथा यमदूतोंके पूजनके अनन्तर निम्न मन्त्रसे यमराजको प्रार्थना करनी चाहिये-
धर्मराज नमस्तुभ्यं नमस्ते यमुनाग्रज ।
पाहि मां किङ्करैः सार्ध सूर्यपुत्र नमोऽस्तु ते ॥
निम्न मन्त्रसे यमुनाजीकी प्रार्थना करे-
यमस्वसर्नमस्तेऽस्तु यमुने लोकपूजिते।
वरदा भव में नित्यं सूर्यपुत्रि नमोऽस्तु ते ।।
निम्न मन्त्रसे चित्रगुप्तको प्रार्थना करनी चाहिये- मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महावलम्।
लेखनीपट्टिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम् ॥
इसके बाद शङ, ताम्रपात्र या अञ्जलिमें जल, पुष्प और गन्धाक्षत लेकर यमराजके निमित्त लिन मन्त्रसे अर्घ्य दे-
एोहि मार्तण्डज पाशहस्त यमान्तकालोकधरामरेश। भाद्वितीयाकृतदेवपूजां गृहाण चायं भगवन्त्रमस्ते ॥
तत्पश्चात् बहनको चाहिये कि वह भाईको एक शुभ आसनपर बैठाकर उसके हाथ-पैर धुलाये। गन्धादिसे उसका पूजन करे और विभिन्न प्रकारके उत्तम व्यञ्जन परोसकर उसका अभिनन्दन करे।
इसके बाद भाई बहनको यथासामर्थ्य अत्र-वस्त्र-आभूषणादि देकर उसका शुभाशिष प्राप्त करे। इस व्रतसे भाईकी आयुवृद्धि और बहनको सौभाग्यसुखको प्राप्ति होती है। भारतीय संस्कृतिमें बहन दयाकी मूर्ति मानी गयी है। अतः शुभाशीर्वादपूर्वक उसके हाथसे भोजन करना आयुवर्धक तथा आरोग्यकारक है। शुद्ध प्रेमके प्रतीक इस उत्सवको बड़े प्रेमसे मनाना चाहिये।
कथा
यम और यमुना भगवान् सूर्यको संतान हैं। दोनों भाई-चहनोंमें अतिशय प्रेम था। परंतु यमराज यमलोकको शासन-व्यवस्थामें इतने व्यस्त रहते कि यमुनाजीके घर ही न जा पाते। एक बार यमुनाजी यमसे मिलने आयी। वहनको आया देख यमदेव बहुत प्रसन्न हुए और बोले-वहन! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे जो भी वरदान माँगना चाहो, माँग लो। यमुनाने कहा- भैया ! आजके दिन जो मुझमें नान करे. उसे यमलोक म जाना पड़े। यमराजने कहा-यहन! ऐसा ही होगा। उस दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया थी। इसीलिये
इस तिथिको यमुनानका विशेष महन्त्र है। कार्तिकमासके शुक्लपक्षको द्वितीया तिथिको यमुनाने अपने घर अपने भाई यमको भोजन कराया और यमलोकमें बड़ा उत्सव हुआ, इसलिये इस तिथिका नाम 'यमद्वितीया' है। अतः इस दिन भाईको अपने घर भोजन न कर बहनके घर जाकर प्रेमपूर्वक उसके हाथका बना हुआ भोजन करना चाहिये। इससे बल और पुष्टिकी वृद्धि होती है। इसके बदले बहनको स्वर्णालंकार, वस्त्र तथा द्रव्य आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। यदि अपनी सगी बहन न हो तो पितारे भाईकी कन्या, मामाकी पुत्री, मौसी अथवा बुआकी बेटी- ये भी बहनके समान हैं, इनके हाथका बना भोजन करे जो पुरुष यमद्वितीयाको बहनके हाथका भोजन करता है, उसे धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुखर्क प्राप्ति होती है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी
(5) नागव्रत (कूर्मपुराण) – कार्तिक शुक्ल चतुर्थीको मध्याह्नके समय शेषसहित शङ्खपालादि नागोंका पूजन करे, दूधसे स्नान कराये, गन्ध-पुष्प अर्पण करे और दुग्धका पान (भोजन) कराये तो विषजन्य बीमारियोंका भय नहीं होता और न सर्प डसते हैं। यह चतुर्थी मध्याह्नव्यापिनी ली जाती है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल पञ्चमी
(6) जयापञ्चमी (भविष्योत्तर) – यह व्रत कार्तिक शुक्ल पञ्चमीको किया जाता है। एतन्निमित्त तिलोद्वर्तनपूर्वक गङ्गादि तीर्थोक स्मरणसहित शुद्ध स्नान करके शुद्धासनपर बैठकर भगवान् 'हरि' का और उनके वाम भागमें 'जया' का स्थापन करे। विविध प्रकारके गन्ध-पुष्पादिसे प्रीतिपूर्वक पूजन करे और हरिके चरण, घुटने, ऊरु, मेढ्र, उदर, वक्षःस्थल, कण्ठ, मुख और मस्तक इनमें पद्मनाभ, नरसिंह, मन्मथ और दामोदर आदि नामोंसे अङ्गपूजा करके
'जयाय जयरूपाय जय गोविन्दरूपिणे ।
जय दामोदरायेति जय सर्व नमोऽस्तु ते ॥'
से अर्घ्य दे और बाँसके पात्रमें सप्तधान्य भरकर लाल वस्त्रसे ढँककर
'यथा वेणुफलं दृष्ट्वा तुष्यते मधुसूदनः ।
तथा मेऽस्तु शुभं सर्वं वेणुपात्रप्रदानतः ।।'
से ब्राह्मणोंको दे फिर एक वस्त्रमें गन्ध, अक्षत, पुष्प, सरसों और दूर्वा रखकर 'रक्षापोटलिका' तैयार करके
'येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥'
से रक्षाबन्धन करे। इस व्रतके करनेसे ब्रह्महत्या जैसे पापोंकी निवृत्ति होती है और सब प्रकारके सुख उपलब्ध होते हैं।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्लपक्षकी भौमयुक्त षष्ठी
(7) वह्निमहोत्सव (मत्स्यपुराण) – कार्तिक शुक्लपक्षकी भौमयुक्त षष्ठीको अग्निका और स्वामी कार्तिकका पूजन करे और दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके घी, शहद, जल और पुष्पादि लेकर
'सप्तर्षिदारज स्कन्द सेनाधिप महाबल ।
रुद्रोमाग्निज षड्वक्त्र गङ्गागर्भ नमोऽस्तु ते ॥'
से अर्घ्य दे और ब्राह्मणको आमान्न (भोजनयोग्य आटा, दाल आदि) देकर आप भोजन करे तथा रात्रिमें भूमिपर सोये तो रोग-दोषादि दूर हो जाते हैं।
सूर्यषष्ठी-महोत्सव
[ कार्तिक शुक्ल षष्ठी]
भारतके बिहार प्रान्तका सर्वाधिक प्रचलित एवं पर्व है-सूर्यषष्ठी। 'सूर्यषष्ठी' प्रमुखरूपसे भगवान् सूर्यका व्रत है। इस व्रतमें सर्वतोभावेन भगवान् सूर्यकी पूजा की जाती है। पुराणों तथा धर्मशास्त्रोंमें विभिन्न रूपोंमें ईश्वरकी उपासनाके लिये प्रायः पृथक् पृथक् दिन एवं तिथियोंका निर्धारण किया गया है। जैसे गणेशकी पूजाके लिये चतुर्थी तिथिकी प्रसिद्धि है। श्रीविष्णुके लिये एकादशी तिथि प्रशस्त मानी गयी है। इसी प्रकार सूर्यके साथ सप्तमी तिथिकी संगति है। यथा-सूर्यसप्तमी, रथसप्तमी, अचलासप्तमी इत्यादि। किंतु बिहारके इस व्रतमें सूर्यके साथ षष्ठी तिथिका समन्वय विशेष महत्त्वका है।
हमारी परम्पराओंकी जड़ें बहुत गहरी हैं। अतः जितनी भी भारतीय परम्पराएँ प्रचलित हैं, प्रायः उन सभीका मूल स्रोत कहीं-न-कहीं पौराणिक कथाओंमें अवश्य उपलब्ध होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद्में परमात्माकी मायाको 'प्रकृति' और मायाके स्वामीको 'मायी' कहा गया है। यह प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, मायामयी और सनातनी है। ब्रह्मवैवर्तपुराण प्रकृतिखण्डके अनुसार परमात्माने सृष्टिके लिये योगका अवलम्बन लेकर अपनेको दो भागोंमें विभक्त किया। दक्षिणभागसे पुरुष और वामभागसे प्रकृतिका आविर्भाव हुआ। यहाँ 'प्रकृति' शब्दकी व्याख्या कई प्रकारसे की गयी है। प्रकृतिके 'प्र' का अर्थ है प्रकृष्ट और 'कृति' का अर्थ है सृष्टि अर्थात् प्रकृष्ट सृष्टि। दूसरी व्याख्याके अनुसार 'प्र' का सत्त्वगुण, 'कृ' का रजोगुण और 'ति' का तमोगुण अर्थ किया गया है। इन्हीं तीनों गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है-
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता।
प्रधानसृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते ॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड १।६)
उपर्युक्त पुराणके अनुसार सृष्टिकी अधिष्ठात्री ये ही प्रकृतिदेवी स्वयंको पाँच भागोंमें विभक्त करती हैं-दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। ये पाँच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती हैं। इन्हीं प्रकृतिदेवीके अंश, कला, कलांश और कलांशांश भेदसे अनेक रूप हैं, जो विश्वकी समस्त स्त्रियोंमें दिखायी देते हैं।
मार्कण्डेयपुराणका भी यही उद्घोष है- 'स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।' प्रकृतिदेवीके एक प्रधान अंशको 'देवसेना' कहते हैं, जो सबसे श्रेष्ठ मातृका मानी जाती हैं। ये समस्त लोकोंके बालकोंकी रक्षिका देवी हैं। प्रकृतिका छठा अंश होनेके कारण इन देवीका एक नाम 'पष्ठी' भी है।
षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।
बालकाधिष्ठातृदेवी विष्णुमाया च बालदा ॥
आयुःप्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी।
सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्धियोगिनी ॥
(ब्राह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड ४३१४, ६)
ब्रह्मवैवर्तपुराणके इन श्लोकोंसे ज्ञात होता है कि विष्णुमाया पष्ठीदेवी वालकोंकी रक्षिका एवं आयुप्रदा है। षष्ठीदेवीके पृजनका प्रचार पृथ्वीपर कवसे हुआ, इम संदर्भमें एक कथा इस पुराणमें आयी है- 'प्रथम मनु स्वायम्भुवके पुत्र प्रियव्रतको कोई संतान न थी। एक बार महाराजने महर्षि कश्यपसे अपना दुःख व्यक्त किया और पुत्रप्राप्तिका उपाय पूछा। महर्षिने महाराजको पुत्रेष्टियज्ञ करनेका परामर्श दिया। यज्ञके फलस्वरूप महाराजकी मालिनी नामक महारानीने यथावसर एक पुत्रको जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था। महारानीको मृत-प्रसव हुआ है, इस समाचारसे हर्षका स्थान अवसादने ले लिया। पूरे नगरमें शोक व्याप्त हो गया। महाराज प्रियव्रतके ऊपर तो मानो वज्रपात ही हुआ हो । वे शिशुके मृत शरीरको अपने वक्षसे लगाये उन्मत्तोंकी भाँति प्रलाप कर रहे थे। परिजन किंकर्तव्यविमूढ खड़े थे। किसीमें इतना भी साहस नहीं था कि वह और्ध्वदैहिक क्रियाके लिये बालकके शवको राजासे अलग कर सके। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सभीने देखा कि आकाशसे एक ज्योतिर्मय विमान पृथ्वीकी ओर आ रहा है। विमानके समीप आनेपर स्थिति और स्पष्ट हुई, उस विमानमें एक दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी। राजाके द्वारा यथोचित स्तुति करनेपर देवीने कहा- मैं ब्रह्माकी मानसपुत्री षष्ठीदेवी हूँ। मैं विश्वके समस्त बालकोंकी रक्षिका हूँ एवं अपुत्रोंको पुत्र प्रदान करती हूँ- 'पुत्रदाऽहम् अपुत्राय ।' इतना कहकर देवीने शिशुके मृत शरीरका स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा। महाराजके प्रसन्नताकी सीमा न रही। वे अनेक प्रकारसे षष्ठीदेवीकी स्तुति करने लगे। देवीने भी प्रसन्न होकर राजासे कहा- तुम ऐसी व्यवस्था करो, जिससे पृथ्वीपर सभी हमारी पूजा करें।
इतना कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर राजाने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक देवीकी इस आज्ञाको शिरोधार्य किया और अपने राज्यमें 'प्रतिमासके शुक्लपक्षको 'षष्ठी' तिथिको पष्ठी-महोत्सवके रूपमें मनाया जाय'- ऐसी राजाज्ञा प्रसारित करायी। तभीसे लोकमें बालकोंके जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन इस पौराणिक प्रसंगसे यह पूर्णतया स्पष्ट होता है कि षष्ठी शिशुओंके संरक्षण एवं संवर्धनसे सम्बन्धित देवी हैं तथा इनकी विशेष पूजा षष्ठी तिथिको होती है, वह चाहे बच्चोंके जन्मोपरान्त छठा दिन हो या प्रत्येक चान्द्रमासके शुक्लपक्षकी षष्ठी। पुराणोंमें इन्हीं देवीका एक नाम 'कात्यायनी' भी मिलता है, जिनकी पूजा नवरात्रमें षष्ठी तिथिको होती है-
'षष्ठं कात्यायनीति च।'
ब्रह्मवैवर्तपुराणमें वर्णित इस आख्यानसे षष्ठीदेवीका माहात्म्य, पूजन विधि एवं पृथ्वीपर इनकी पूजाका प्रसार आदि विषयोंका सम्यक् ज्ञान होता है, किंतु सूर्यके साथ षष्ठीदेवीके पूजनका विधान तथा 'सूर्यषष्ठी' नामसे पर्वके रूपमें इसकी ख्याति कबसे हुई ? यह विचारणीय विषय है। भविष्यपुराणमें प्रतिमासके तिथि-व्रतोंके साथ षष्ठीव्रतका भी उल्लेख मिलता है। यहाँ कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पष्ठीका उल्लेख स्कन्द षष्ठीके नामसे किया गया है, किंतु इस व्रतके विधानमें और लोकमें प्रचलित सूर्यषष्ठी-व्रतके विधानमें पर्याप्त अन्तर है। मैथिल 'वर्षकृत्यविधि' में 'प्रतिहार-पष्ठी' के नामसे बिहारमें प्रसिद्ध 'सूर्यषष्ठीव्रत' की चर्चा की गयी है।
इस ग्रन्थमें व्रत, पूजाको पूरी विधि, कथा तथा फलश्रुतिके साथ ही तिथियोंके क्षय एवं वृद्धिकी दशामें कौन-सी पष्ठी तिथि ग्राह्य है, इस विषयपर भी धर्मशास्त्रीय दृष्टिसे साङ्गोपाङ्ग चर्चा की गयी है और अनेक प्रामाणिक स्मृतिग्रन्थोंसे पुष्कल प्रमाण भी दिये गये हैं। सम्प्रति इस व्रतके अवसरपर लोकमें जिन परम्परागत नियमोंका अनुपालन किया जाता है, उनमें इसी ग्रन्थका सर्वथा अनुसरण दृष्टिगत होता है। कथाके अन्तमें 'इति श्रीस्कन्दपुराणोक्तप्रतिहारषष्ठीव्रतकथा समाप्ता' लिखा है। इससे ज्ञात होता है कि 'स्कन्दपुराण' के किसी संस्करणमें इस व्रतका उल्लेख अवश्य हुआ होगा। अतः इस व्रतकी
व्रतका माहात्म्य, विधि तथा कथाका उपदेश करते हैं। यहाँ उक्त कथाके अनुसार एक राजा हैं, जो कुष्ठरोगग्रस्त एवं राज्यविहीन हैं, वे किसी विद्वान् ब्राह्मणके आदेशानुसार इस व्रतको करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे रोगमुक्त होकर पुनः राज्यारूढ एवं समृद्ध हो जाते हैं। पञ्चमीयुक्त षष्ठीका यहाँ सर्वथा निषेध किया गया है। यथा स्कन्दपुराणमें 'नागविद्धा न कर्तव्या षष्ठी चैव कदाचन' इसके प्रमाणस्वरूप राजा सगरकी कथाका भी उल्लेख किया गया है। सगरने एक बार पञ्चमीयुक्त सूर्यषष्ठी व्रतको किया था, जिसके फलस्वरूप कपिलमुनिके शापसे उनके सभी पुत्रोंका विनाश हो गया। उक्त दृष्टान्तसे इस व्रतकी प्राचीनता भी द्योतित होती है। व्रतकी विधिमें बताया गया है कि कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें सात्त्विक रूपसे रहना चाहिये। पञ्चमीको एक बार भोजन करे। वाक्संयम रखे, षष्ठीको निराहार रहे तथा फल-पुष्प, घृतपक्व नैवेद्य, धूप, दीप आदि सामग्रीको लेकर नदीतटपर जाय और गीत वाद्य आदिसे हर्षोल्लासपूर्वक महोत्सव मनाये। भगवान् सूर्यका पूजन कर भक्तिपूर्वक उन्हें रक्तचन्दन तथा रक्तपुष्प अक्षतयुक्त अर्घ्य निवेदित करे-
कार्तिके शुक्लपक्षे तु निरामिषपरो भवेत्।
पञ्चम्यामेकभोजी स्याद् वाक्यं दुष्टं परित्यजेत् ॥
षष्ठयां चैव निराहारः फलपुष्पसमन्वितः ।
सरित्तटं समासाद्य गन्धदीपैर्मनोहरैः ।। धूपैर्नानाविधैर्दिव्यैर्नैवेद्यैर्वृतपाचितैः
गीतवाद्यादिभिश्चैव महोत्सवसमन्वितैः ॥
समभ्यर्च्य रविं भक्त्या दद्यादर्घ्य विवस्वते ।
रक्तचन्दनसम्मिश्र रक्तपुष्पाक्षतान्वितम् ॥
इसी ग्रन्थमें आगे अर्घ्य, प्रदक्षिणा एवं नमस्कारके मन्त्र भी उल्लिखित हैं। सम्प्रति इस व्रतका सर्वाधिक प्रचार बिहार राज्यमें दिखायी पड़ता है। सम्भव है, इसका आरम्भ भी यहींसे हुआ हो और अब तो बिहारके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रोंमें भी इसका व्यापक प्रसार हो गया है। इस व्रतको सभी लोग अत्यन्त भक्ति-भाव, श्रद्धा एवं उल्लाससे मनाते हैं। सूर्यायके बाद व्रतियोंके पैर छूने और उनके गीले वस्त्र धोनेवालोंमें प्रतिस्पर्धाकी भावना देखते ही बनती है। इस व्रतका प्रसाद माँगकर खानेका विधान है। सूर्यषष्ठी व्रतके प्रसादमें ऋतु-फलके अतिरिक्त आटे और गुड़से शुद्ध घीमें बने 'ठेकुआ' का होना अनिवार्य है, ठेकुआपर लकड़ीके साँचेसे सूर्यभगवान्के रथका चक्र भी अङ्कित करना आवश्यक माना जाता है।
षष्ठीके दिन समीपस्थ किसी पवित्र नदी या जलाशयके तटपर मध्याह्नसे ही भीड़ एकत्र होने लगती है। सभी व्रती महिलाएँ नवीन वस्त्र एवं आभूषणादिकोंसे सुसज्जित होकर फल, मिष्टान्न और पक्वात्रोंसे भरे हुए नये बाँससे निर्मित सूप और दौरी (डलिया) लेकर षष्ठीमाता और भगवान् सूर्यके लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घरोंसे निकलती हैं। भगवान्के अर्घ्यका सूप और डलिया ढोनेका भी महत्त्व है। यह कार्य पति, पुत्र या घरका कोई पुरुष सदस्य ही करता है। घरसे घाटतक लोकगीतोंका क्रम चलता ही रहता है और यह क्रम तबतक चलता है जबतक भगवान् भास्कर सायंकालीन अर्घ्य स्वीकार कर अस्तांचलको न चले जाय।
सूपों और डलियोंपर जगमगाते हुए घीके दीपक गङ्गाके तटपर बहुत ही आकर्षक लगते हैं। पुनः ब्राहामुहूर्तमें ही नूतन अर्घ्य सामग्रीके साथ सभी व्रती जलमें खड़े होकर हाथ जोड़े हुए भगवान् भास्करके उदयाचलारूढ होनेकी प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही क्षितिजपर अरुणिमा दिखायी देती है वैसे ही मन्त्रोंके साथ भगवान् सविताको अर्घ्य समर्पित किये जाते हैं। यह व्रत विसर्जन, ब्राह्मण-दक्षिणा एवं पारणाके पश्चात् पूर्ण होता है।
सूर्यषष्ठी-व्रतके अवसरपर सायंकालीन प्रथम अर्घ्यसे पूर्व मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर षष्ठीदेवीका आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्यके पूर्व पष्ठीदेवीका पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पञ्चमीकं सायंकालसे ही घरमें भगवती षष्ठीका आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान् सूर्यके इस पावन व्रतमें शक्ति और ब्रह्म दोनोंकी उपासनाका फल एक साथ प्राप्त होता है। इसीलिये लोकमें यह पर्व 'सूर्यषष्टी' के नाममे विख्यात है।
सांसारिक जनोंकी तीन एषणाएँ प्रसिद्ध हैं- पुत्रैषणा, वित्तैषणा तथा लोकैषणा। भगवान् सविता प्रत्यक्ष देवता हैं, वे समस्त अभीष्टोंको प्रदान करनेमें समर्थ हैं- 'किं किं न सविता सूते ।' समस्त कामनाओंकी पूर्ति तो भगवान् सवितासे हो जाती है, किंतु वात्सल्यका महत्त्व मातासे अधिक और कौन जान सकता है? परब्रह्मकी शक्तिस्वरूपा प्रकृति और उन्हींके प्रमुख अंशसे आविर्भूता देवी षष्ठी, संतति प्रदान करनेके लिये ही मुख्यतया अधिकृत हैं। अतः पुत्रकी कामना भगवती षष्ठीसे करना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। इन्हीं पुराणोक्त कथाओंके भाव सूर्यषष्ठी-पर्वके अवसरपर बिहारमें महिलाओंद्वारा गाये जानेवाले लोकगीतोंमें भी देखनेको मिलते हैं-
काहे लागी पूजेलू तुहूं देवलघरवा (सूर्यमन्दिर) हे।
काहे लागी, कर ह छठी के बरतिया हे,
काहे लागी अन-धन सोनवा लागी पूजी देवलघरवा है,
पुत्र लागी, करीं हम छठीके बरतिया हे, पुत्र लागी"
इस गीतमें समस्त वैभवोंकी कामना तो भगवान् भास्करसे की गयी है, किंतु पुत्रकी कामना भगवती षष्ठीसे ही की जा रही है। इन पुराणसम्मत तथ्योंको हमारी ग्रामीण साधु महिलाओंने गीतोंमें पिरोकर अक्षुण्ण रखा है।
सविता और षष्ठी दोनोंकी एक साथ उपासनासे अनेक वाञ्छित फलोंको प्रदान करनेवाला यह सूर्यषष्ठी- व्रत वास्तवमें बहुत महत्त्वपूर्ण है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल सप्तमी
(8) शाकसप्तमी - कार्तिक शुक्ल सप्तमीको उपलब्ध शाक- पत्रादिका दान करके रात्रिमें स्वयं भी शाकमात्रका भोजन करे और फिर प्रत्येक शुक्ल सप्तमीको वर्षपर्यन्त करता रहे तो सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल अष्टमी
(9) गोष्ठ (गोप-) अष्टमी (निर्णयामृत, कूर्मपुराण) – कार्तिक शुक्ल अष्टमीको प्रातःकालके समय गौओंको स्नान करावे । गन्ध-पुष्पादिसे उनका पूजन करे और अनेक प्रकारके वस्त्रालंकारसे अलंकृत करके उनके गोपालों (ग्वालों) का पूजन करे, गायोंको गोग्रास देकर उनकी परिक्रमा करे और थोड़ी दूरतक उनके साथ जाय तो सब प्रकारकी अभीष्टसिद्धि होती है। इसी गोपाष्टमीको सायंकालके समय गायें चरकर वापस आवें उस समय भी उनका आतिथ्य, अभिवादन और पञ्चोपचार पूजन करके कुछ भोजन करावे और उनकी चरणरजको मस्तकपर धारण करके ललाटपर लगावे तो उससे सौभाग्यकी वृद्धि होती है।
गोपाष्टमी-महोत्सव
[ कार्तिक शुक्ल अष्टमी ]
गौका माहात्म्य एवं महत्त्व बतानेकी आवश्यकता नहीं है तथा यह भी चतानेको आवश्यकता नहीं कि भगवान् श्रीकृष्णका अतिप्रिय 'गोविन्द' नाम गायोंकी रक्षा करनेके कारण ही पड़ा। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदासे लेकर सप्तमीतक गो-गोप-गोपियोंको रक्षाके लिये श्रीकृष्ण गोवर्धनपर्वतको धारण किये रहे। आठवें दिन इन्द्रकी आँख खुली और वे अहंकाररहित होकर भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये। कामधेनुने भगवान्का अभिषेक किया और उसी दिन भगवान्का 'गोविन्द' नाम पड़ा।
उसी समयसे कार्तिक शुक्ल अष्टमीको गोपाष्टमीका उत्सव मनाया जाने लगा, जो अवतक चला आ रहा है। कार्तिक शुक्ल अष्टमीको प्रातःकाल गौओंको स्रान कराये, गन्ध-पुष्पादिसे उनका पूजन करे और अनेक प्रकारके वस्त्रालंकारोंसे अलंकृत करके मोपालों (ग्वालों) का पूजन करे, गायोंको गोग्रास देकर उनकी परिक्रमा करे और थोड़ी दूरतक उनके साथ जाय तो सब प्रकारकी अभीष्ट- सिद्धि होती है। गोपाष्टमीको सायंकाल गायें चरकर जब वापस आयें, उस समय भी उनका आतिथ्य, अभिवादन और पञ्चोपचार पूजन करके कुछ भोजन कराये और उनको चरणरजको मस्तकपर धारण करे उससे सौभाग्यकी वृद्धि होनी है।
भारतवर्षक प्रायः सभी भागोंमें गोपाष्टमीका उन्म बड़े ही उल्लास मनाया जाना है विशेष गणनाओं तथा पिंजरापोलोंके लिये यह बड़े महत्त्वका उत्सव है। गोशालाओंमें तो गोपाष्टमीके दिन एक मेला-जैसा ही लग जाता है-खाने-पीनेकी दूकानें आ जाती हैं, बड़ी भीड़ होती है। उसमें घूमनेके अतिरिक्त लोग गौओंके दर्शन करते हैं, उनको कुछ खिलाते हैं और गोशालाकी संस्थाको कुछ दान करते हैं। यह तो होना ही चाहिये, किंतु इतना ही काफी नहीं है, कुछ और भी करना होगा। जिन गो-गोपोंकी यह अष्टमी मनायी जाती है तथा जो गोप गोपालन करते हैं उनके उत्साहवर्धनके लिये उन्हें पारितोषिक भी देना चाहिये। गोपाष्टमी केवल किसी एक गाँवका या गोशालाओंका ही उत्सव नहीं होना चाहिये, वरन् गाँव-गाँव और घर-घरमें यह उत्सव बड़े समारोहसे मनाया जाना चाहिये। आवश्यकता इस बातकी है कि यह उत्सव अखिल भारतवर्षीय गो- दिवसका रूप धारण कर ले।
गोपाष्टमीके दिन क्या-क्या करें ?
गोपाष्टमी मनानेका सुन्दर ढंग और उस दिन किये जानेवाले कार्य नीचे लिखे अनुसार हों तो उत्तम है-
१-गायोंको नहला-धुलाकर स्वच्छ करना और उन्हें भाँति-भाँतिसे सजाना, २-गायोंके रहनेके स्थानकी भलीभाँति सफाई करना, ३-गाय और ग्वालोंकी विधिवत् पूजा करना और स्वादिष्ठ भोजनसे उन्हें संतुष्ट करना, ४-उस दिन अपने व्यवसाय-व्यापारको बन्द रखकर गोशाला और पिंजरापोलोंमें जाकर वहाँके उत्सवों और कार्यक्रमोंमें भाग लेते हुए गोपालनके सम्बन्धमें विचार-विमर्श करना, ५-गोशाला और पिंजरापोलोंमें यथासाध्य दान देना, ६-गाँव-गाँव और नगर-नगरमें सभाएँ हों, जिनमें गो-सम्बन्धी इन बातोंपर विचार हो
(अ) देशमें सर्वत्र गो-हत्याका निवारण कैसे हो सकता है?
(आ) गायोंकी वर्तमान स्थितिमें, उनकी नस्लमें और दुग्धोत्पादनमें किन साधनोंसे सुधार हो सकता है?
(इ) गोमय और गोमूत्रका खादके रूपमें अधिक से-अधिक उपयोग कैसे किया जा सकता है?
(ई) गोपालकोंको आवश्यक सुविधाएँ कैसे मिल सकती हैं?
७-उस दिन लोगोंको ठीक-ठीक समझाकर और उनके भावोंको जाग्रत् कर यह प्रतिज्ञा करनी-करानी चाहिये-
क) हम उस आदमीके हाथ गौ कभी नहीं
बेचेंगे, जिसपर यह सन्देह हो कि वह घरमें गौका पालन न कर सीधे कसाईको या कसाईके हाथमें देनेवाले
किसीको बेच देगा।
(ख) हम उन चमड़े, चर्बी तथा हड्डी आदिका अपने लिये व्यवहार और व्यापार कदापि नहीं करेंगे, जिनके कारण गायोंकी हत्या होती है।
(ग) वनस्पति-तैल (नकली घी) का व्यवहार नहीं करेंगे।
८-जहाँ अच्छे साँड़ न हों, वहाँ अच्छे साँड़ोंकी व्यवस्थापर विचार करना, ९-जहाँ उत्तम साँड़ हों, वहाँ
उनके भरपूर चारे-दाने और संरक्षणका प्रबन्ध करना, १०- स्थानीय गाय, बैल, बछिया और बछड़ोंकी संख्याका पता लगाकर लिखना, ११-सुविधा हो तो अच्छी-से-अच्छी गाय रखनेवालोंको पुरस्कार देना, १२-गायें स्वस्थ और सबल कैसे रहें तथा उन्हें संक्रामक रोगोंसे कैसे बचाया जा सकता है-यह समझना समझाना, १३-अगली गोपाष्टमीतकके लिये गो-वंशकी उन्नतिका कार्यक्रम बनाना, १४-गतवर्ष गोवंशकी उन्नतिके लिये क्या किया गया-इसकी जाँच करना और १५-ऐसे अवसरोंपर सहृदय मुसलमान और ईसाई आदि सज्जनोंको भी बुलाया जाय और बड़े प्रेम तथा सम्मानका व्यवहार किया जाय, जिससे वे भी इसे सार्वजनिक मेला समझें और सभामें गौके महत्त्वत्को जानकर गोरक्षाके पक्षपाती वनें।
इस प्रकार उस दिनका सारा समय गो-चर्चामं ही लगाना चाहिये। ऐसा करनेसे ही गोवंशको सगी उन्नति हो सकेगी, जिसपर हमारी उन्नति सोलहीं आने निर्भर है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल नवमी
(10) नवमीव्रत (हेमाद्रि, देवीपुराण) – कार्तिक शुक्ल नवमीको व्रत, पूजा, तर्पण और अन्नादिका दान करनेसे अनन्त फल होता है। इसमें पूर्वाह्णव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो या न हो तो
'अष्टम्या नवमी विद्धा कर्तव्या फलकाङ्क्षिणा ।
न कुर्यान्नवमीं तात दशम्या तु कदाचन ॥'
इस ब्रह्मवैवर्तके वचनके अनुसार पूर्वविद्धा लेनी चाहिये। इस दिनका किया हुआ पूजा-पाठ और दिया हुआ दान-पुण्य अक्षय हो जाता है, इस कारण इसका नाम 'अक्षयनवमी' है। इस दिन गो, भू, हिरण्य और वस्त्राभूषणादिका दान किया जाय तो यथाभाग्य इन्द्रत्व, शूरत्व या नराधिपत्वकी प्राप्ति होती है और ब्रह्महत्या जैसे महापाप मिट जाते हैं। यही (कार्तिक शुक्ल नवमी) 'धात्रीनवमी' और 'कूष्माण्डनवमी' भी है। अतः इस दिन प्रातःस्नानादि करके धात्रीवृक्ष (आँवला) के नीचे पूर्वाभिमुख बैठकर 'ॐ धात्र्यै नमः' से उसका आवाहनादि षोडशोपचार' अथवा स्नान- गन्धादि
'पञ्चोपचार पूजन करके 'पिता पितामहाश्चान्ये अपुत्रा ये च गोत्रिणः । ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेऽक्षयं पयः ॥ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः । ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेऽक्षयं पयः ॥'
इन मन्त्रोंसे उसके मूलमें दूधकी धारा गिराये, फिर 'दामोदरनिवासायै धात्र्यै देव्यै नमो नमः ।
सूत्रेणानेन बध्नामि धात्रि देवि नमोऽस्तु ते ।।'
इस मन्त्रसे उसको सूत्रसे आवेष्टित करे (सूत लपेटे) और कर्पूर या घृतपूर्ण बत्तीसे नीराजन करके 'यानि कानि च पापानि' से परिक्रमा करे। तदनन्तर सुपक्व कूष्माण्ड (अच्छा पका हुआ कोहला—कुम्हड़ा) लेकर उसके अंदर रत्न, सुवर्ण, रजत या रुपया आदि रखकर उसका गन्धादिसे पूजन करके
'कूष्माण्डं बहुबीजाढ्यं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।
दास्यामि विष्णवे तुभ्यं पितॄणां तारणाय च ॥'
से प्रार्थना करे और दानपात्र ब्राह्मणके तिलक करके
'मम-अखिल-पापक्षय-पूर्वकसुख-सौभाग्यादी-नाम-उत्तरोत्तर-अभिर-वृद्धये कूष्माण्ड-दानं-करिष्ये ।'
यह संकल्प करके ब्राह्मणको दे दे।
कार्तिक शुक्ल नवमी (या किसी भी शुक्ल नवमी)
(13) आरोग्यव्रत (गरुडपुराण) – कार्तिक शुक्ल नवमी (या किसी भी शुक्ल नवमी) को उपवास करे। दशमीको स्नान करके हरिका ध्यान करे। फल, पुष्प और मधुरान्न-पानादिका भोग लगावे। साथ ही चक्र, गदा, मूसल, धनुष और खड्ग-इन आयुधोंका लाल पुष्पोंसे पूजन करके गुडानका नैवेद्य अर्पण करे। इसके अतिरिक्त अजिन (मृगचर्म) पर द्रोणपरिमित तिलोंका कमल बनाकर उसपर सुवर्णका अथवा अच्छे वर्णका अष्टदल स्थापित करके उसकी प्रत्येक पँखुड़ीपर पूर्वादिक्रमसे मन, श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, प्राण और बुद्धि – इनका पूजन करके
'अनामयानीन्द्रियाणि प्राणश्च चिरसंस्थितः ।
अनाकुला च मे बुद्धिः सर्वे स्युर्निरुपद्रवाः ।
मनसा कर्मणा वाचा मया जन्मनि जन्मनि ।
संचितं क्षपयत्वेनः कालात्मा भगवान् हरिः ॥'
से इनकी प्रार्थना करे तो रोगी नीरोग और सदैव सुस्वस्थ रहता है।
अक्षयनवमी
[ कार्तिक शुक्ल नवमी ]
कार्तिकमासके शुक्लपक्षको नवमी 'अक्षयनवमी' कहलाती है। इस दिन खान, पूजन, तर्पण तथा अन्नादिक दानसे अक्षय फल प्राप्त होता है। इसमें पूर्वाह्वव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो या न हो तो
'अष्टम्या नवमी विद्धा कर्तव्या फलकाक्षिणा।
न कुर्यान्नवमीं तात दशम्यां तु कदाचन ॥'
- ब्रह्मवैवर्तपुराणके इस वचनके अनुसार अष्टमीविद्धा नवमी ग्रहण करनी चाहिये। दशमीविद्धा नवमी त्याज्य है।
व्रत-विधान
प्रातःकाल स्रानादिके अनन्तर दाहिने हाथमें जल, अक्षत, पुष्प आदि लेकर निम्न प्रकारसे व्रतका संकल्प करे-
अद्येत्यादि अमुकगोत्रोऽमुक शर्माहं (वर्मा गुप्तो वा) ममाखिलपापक्षयपूर्वकधर्मार्थकाममोक्षसिद्धिद्वारा श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं धात्रीमूले विष्णुपूजनं धात्रीपूजनं च करिष्ये ।
ऐसा संकल्पकर धात्रीवृक्ष (आँवले) के नीचे पूर्वाभिमुख बैठकर 'ॐ धात्र्यै नमः' मन्त्रसे आवाहनादि पोडशोपचार- पूजन करके निम्नलिखित मन्त्रोंसे आँवलेके वृक्षकी जड़में दूधकी धारा गिराते हुए पितरोंका तर्पण करे-
पिता पितामहाश्चान्ये अपुत्रा ये च गोत्रिणः।
ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेऽक्षयं पयः ॥
आब्रहास्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः ।
ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेऽक्षयं पयः ॥
इसके बाद आँवलेके वृक्षके तनेमें निप्त मन्त्रसे सूत्रवेष्टन करे-
दामोदरनिवासार्य धार्थ देव्यै नमो नमः ।
सूत्रेणानेन वध्नामि धात्रि देवि नमोऽस्तु ते ॥
इसके बाद कपूर या घृतपूर्ण दीपसे आँवलेके वृक्षको आरती करे तथा निम्न मन्त्रसे उसको प्रदक्षिणा करे-
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥
इसके अनन्तर आँवलेके वृक्षके नीचे ब्राह्मण-भोजन भी कराना चाहिये और अन्तमें स्वयं भी आँवलेके वृक्षके सन्निकट बैठकर भोजन करना चाहिये। एक पका हुआ कुम्हड़ा (कृप्माण्ड) लेकर उसके अंदर रत्न, सुवर्ण, रजत या रुपया आदि रखकर निम्न संकल्प करे-
ममाखिलपापक्षयपूर्वक सुखसी भाग्यादीनामुत्त- रोत्तराभिवृद्धये कृष्माण्डदानमहं करिष्ये ।
तदनन्तर विद्वान् तथा सदाचारी ब्राह्मणको तिलक करके दक्षिणासहित कृष्माण्ड दे दे और निम्न प्रार्थना करे-
कूष्माण्डं बहुबीजादयं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।
दास्यामि विष्णवे तुभ्यं पितृणां तारणाय च ॥
पितरोंके शीतनिवारणके लिये यथाशक्ति कम्बल आदि ऊर्णवस्त्र भी सत्पात्र ब्राह्मणको देना चाहिये।
यह अक्षयनवमी 'धात्रीनवमी' तथा 'कृष्माण्डनवमी' भी कहलाती है। घरमें आँवलेका वृक्ष न हो तो किसी यगीचे आदिमें आँवलंक वृक्षके समीप जाकर पूजा, दानादि करनेकी भी परम्परा है अथवा गमलेमें आँवलेका पौधा रोपित कर घरमें यह कार्य सम्पन्न कर लेना चाहिये।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल दशमी
(11) सार्वभौमव्रत (वराहपुराण) – कार्तिक शुक्ल दशमीको प्रातः स्नान करके नक्तव्रत करनेकी प्रतिज्ञा करे और विविध प्रकारके चित्र-विचित्र गन्ध- पुष्पादिसे दिशाओंका पूजन करके दध्योदनादिकी शुद्ध बलि दे । उस समय -
'सर्वा भवत्यः सिध्यन्तु मम जन्मनि जन्मनि ।'
यह प्रार्थना करे और अर्धरात्रिमें दध्योदन (दही और भात) का भोजन करे। इस प्रकार प्रत्येक मासकी शुक्ल दशमीको वर्षभर करे तो दिग्विजयी (अथवा सर्वत्र विजयी) होता है।
कार्तिक शुक्ल दशमी
(12) आशादशमी (भविष्योत्तर) –धन, राज्य, खेती, वाणिज्य या पुत्रादि प्राप्त होनेकी आशा पूर्ण होनेके लिये कार्तिक शुक्ल दशमी (या किसी भी शुक्ल दशमी) को स्नान करके शुद्ध स्थानमें जौके चूर्णसे सायुध और स्वस्वरूपयुक्त इन्द्रादि दिक्पालोंको लिखकर उनका पूजन करे। गन्ध- पुष्पादि चढ़ाये। घीसे भलीभाँति भीगा हुआ भोजन और कालजात (उस ऋतुके) फल अर्पण करे। दीपक जलाये और
'आशाः स्वाशाः सदा सन्तु सिद्ध्यन्तां मे मनोरथाः ।
भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति ॥'
से प्रार्थना करे। इस प्रकार वर्षपर्यन्त करे तो धनार्थी पुत्रार्थी, सुखार्थी, राज्यार्थी या अन्यकामार्थी आदिकी धन, पुत्र, सुख, राज्य और काम आदिकी आशा सफल हो जाती है।
कार्तिक शुक्ल दशमी
(14) राज्यप्राप्तिव्रत (विष्णुधर्मोत्तर) — इस व्रतके निमित्त 1. ऋतु (यज्ञ), 2. दक्ष, 3. वसु, 4. सत्य, 5. काल, 6. काम, 7. मुनि, 8. कुरुवान्मनुज, 9. परशुराम और 10. विश्वेदेव ।
इनका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और अन्नादिसे पूजन करके 'पारणान्ते' (व्रतके अन्तमें) सुवर्णादि सामग्री ब्राह्मणको दे। यह व्रत कार्तिक शुक्ल दशमीसे आरम्भ किया जाता है और उपर्युक्त क्रतु-दक्षादि दस देव केशवके आत्मा हैं, अतः इनके अर्चनसे अवश्य ही राज्यलाभ होता है।
कार्तिक शुक्ल दशमी
(15) ब्रह्मप्राप्ति व्रत (विष्णुधर्मोत्तर) - कार्तिक शुक्ल दशमी (या किसी भी शुक्ल दशमी) को 1. आत्मा, 2. आयु, 3. मन, 4. दक्ष, 5. मद, 6. प्राण, 7. हविष्मान् 8. गविष्ठ (स्वर्गस्थ), 9. दत्त और 10. सत्य ।
इनका तथा अङ्गिरसका यथाविधि पूजन करके उपवास करे तो ब्रह्मत्वकी प्राप्ति होती है।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल एकादशी
(16) शुक्लैकादशी (वराहपुराण) – कार्तिक शुक्ल एकादशी 'प्रबोधिनी' के नामसे मानी जाती है। इसके निमित्त स्नान-दान और उपवास यथापूर्व किये जाते हैं । विशेषता यह है कि एक वेदीपर सोलह आर (कोण या पत्ती) का कमल बनाकर उसपर सागरोपम, जलपूर्ण, रत्नप्रयुक्त, मलयागिरिसे चर्चित, कण्ठप्रदेशमें नालसे आबद्ध और सुश्वेत वस्त्रसे आच्छादित चार कलश स्थापित करे और उनके बीचमें पीताम्बर धारण किये हुए शङ्ख-चक्र-गदाधारी चतुर्भुज और शेषशायी भगवान्की सुवर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करके उसका 'सहस्रशीर्षा' आदि ऋचाओंसे अङ्गन्यासपूर्वक यथाविधि पूजन करे और रात्रिमें जागरण करके दूसरे दिनके प्रभातमें वेदपाठी पाँच ब्राह्मणोंको बुलाकर उक्त चार कलश चारको और योगेश्वर भगवान्की (स्वर्णमयी) मूर्ति पाँचवेंको देकर उनको भोजन करवाकर स्वयं भोजन करे तो गङ्गादि तीर्थों, सुवर्णादि दानों और भगवान् आदिकी पूजाके समान फल होता है।
आषाढ़ शुक्लसे कार्तिक शुक्लपर्यन्त
(17) प्रबोधैकादशीकृत्य (मदनरत्न) - यह तो प्रसिद्ध ही है कि आषाढ़ शुक्लसे कार्तिक शुक्लपर्यन्त ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वरुण, कुबेर, सूर्य और सोमादि देवोंसे वन्दित, जगन्निवास, योगेश्वर क्षीरसागरमें शेषशय्यापर चार मास शयन करते हैं और भगवद्भक्त उनके शयनपरिवर्तन और प्रबोधके यथोचित कृत्य दत्तचित्त होकर यथासमय करते हैं। उनमें दो कृत्य आषाढ़ और भाद्रपदके व्रतोंमें प्रकाशित हो चुके हैं और तीसरे (प्रबोध) का विधान यहाँ प्रकट किया जाता है। यद्यपि भगवान् क्षणभर भी कभी सोते नहीं, तथापि 'यथा देहे तथा देवे' माननेवाले उपासकोंको शास्त्रीय विधान अवश्य करना चाहिये। यह कृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशीको रात्रिके समय किया जाता है। उस समय शयन करते हुए हरिको जगानेके लिये (1) सुभाषित स्तोत्रपाठ, भगवत्कथा और पुराणादिका श्रवण और भजनादिका 'गायन', (2) घंटा, शङ्ख, मृदंग, नगारे और वीणा आदिका 'वादन' और (3) विविध प्रकारके देवोपम खेल-कूद, लीला और नाच आदिके द्वारा भगवान्को जगाये और साथ ही 'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां भगवान्को जगाये और साथ ही
'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते ।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम् ।।'
'उस्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव ।
गता मेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः ॥'
'शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।'
इन मन्त्रोंका उच्चारण करे। अनन्तर भगवान्के मन्दिर ( अथवा सिंहासन) को नाना प्रकारके लता-पत्र, फल-पुष्प और बंदनवार आदिसे सजावे और 'विष्णुपूजा' या 'पञ्चदेव- पूजाविधान' अथवा 'रामार्चनचन्द्रिका' आदिक अनुसार भली प्रकार पूजन (आरती) करे। करे और समुज्ज्वल घृतवर्तिका या कर्पूरादिको प्रज्वलित करके नीराजन अनन्तर
'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन ।
तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥'
से पुष्पाञ्जलि अर्पण करके
'इयं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता ।
त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थं शेषशायिना ।।' '
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो ।
न्यूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ।'
से प्रार्थना करे और प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुक, शौनक और भीष्मादि भक्तोंका स्मरण करके चरणामृत, पञ्चामृत या प्रसादका वितरण करे। इसके पीछे एक रथमें भगवान्को विराजमान करके नरवाहनद्वारा उसे संचालित कर नगर, ग्राम या गलियोंमें भ्रमण कराये। जो मनुष्य उस रथके वाहक बनकर उसको चलाते हैं, उनको प्रत्येक पदपर यज्ञके समान फल होता है। जिस समय वामनभगवान् तीन पद भूमि लेकर विदा हुए थे, उस समय सर्वप्रथम दैत्यराज (बलिराजा) ने वामनजीको रथमें विराजमान कर स्वयं उसे चलाया था। अतः इस प्रकार करनेसे
'समुत्थिते ततो विष्णौ क्रियाः सर्वाः प्रवर्तयेत्' ।
के अनुसार विष्णुभगवान् योगनिद्राको त्यागकर प्रत्येक प्रकारकी क्रिया करनेमें प्रवृत्त हो जाते हैं और प्राणिमात्रका पालन-पोषण और संरक्षण करते हैं। प्रबोधिनीकी पारणामें रेवतीका अन्तिम तृतीयांश हो तो उसको त्यागकर भोजन करना चाहिये ।
देवोत्थापनी एकादशी
[ कार्तिक शुक्ल एकादशी ]
यद्यपि भगवान् क्षणभर भी सोते नहीं हैं, फिर भी भक्तोंकी भावना- 'यथा देहे तथा देवे' के अनुसार भगवान् चार मास शयन करते हैं। भगवान् विष्णुके क्षीरशयनके विषयमें यह कथा प्रसिद्ध है कि भगवान्ने भाद्रपदमासकी शुक्ल एकादशीको महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षसको मारा था और उसके बाद थकावट दूर करनेके लिये क्षीर- सागरमें जाकर सो गये। वे वहाँ चार मासतक सोते रहे और कार्तिक शुक्ल एकादशीको जगे। इसीसे इंस एकादशीका नाम 'देवोत्थापनी' या 'प्रबोधिनी एकादशी' पड़ गया। इस दिन व्रतके रूपमें उपवास करनेका विशेष महत्त्व है।
उपवास न कर सके तो एक समय फलाहार करना चाहिये और संयम-नियमपूर्वक रहना चाहिये। एकादशीको भगवन्नाम- जप-कीर्तनकी विशेष महिमा है। कार्तिक शुक्ल एकादशीको भगवत्प्रीतिके लिये पूजा-पाठ, व्रत-उपवास आदि किया जाता है।
इस तिथिको रात्रि जागरणका विशेष महत्त्व है। रात्रिमें भगवत्सम्बन्धी कीर्तन, वाद्य, नृत्य और पुराणोंका पाठ करना चाहिये। धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, गन्ध, चन्दन, फल और अर्घ्य आदिसे भगवान्की पूजा करके घंटा, शङ्ख, मृदंग आदि वाद्योंकी माङ्गलिक ध्वनि तथा निम्न मन्त्रोंद्वारा भगवान्से जागनेकी प्रार्थना करे-
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम् ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे ।
हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मङ्गलं कुरु ॥
इसके बाद भगवान्की आरती करे और पुष्पाञ्जलि करके निम्न मन्त्रोंसे प्रार्थना करे-
अर्पण इयं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता।
त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थं शेषशायिना ॥
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो।
न्यूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ।।
तदनन्तर प्रह्लाद, नारद, परशुराम, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुक, शौनक और भीष्मादि भक्तोंका स्मरण करके चरणामृत और प्रसादका वितरण करना चाहिये। प्रबोधिनी एकादशीकी पारणामें रेवती (नक्षत्र)-का अन्तिम तृतीयांश हो तो उसे त्यागकर भोजन करना चाहिये।
तुलसी-विवाह
[ कार्तिक शुक्ल एकादशी ]
कार्तिक शुक्ल एकादशीके दिन ही लोग तुलसी विवाहका भी आयोजन करते हैं। तुलसी वैष्णवोंके लिये परमाराध्य पौधा है। कोई-कोई तो भगवान्के श्रीविग्रहके साथ तुलसीजीका विवाह बड़े धूमधामसे करते हैं। साधारणतया लोग तुलसीजीके पौधेका गमला, गेरु आदिसे सजाकर उसके चारों ओर ईखका मण्डप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहागकी प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं। गमलेको साड़ीमें लपेटकर तुलसीको चूड़ी पहनाकर उनका शृङ्गार करते हैं।
गणपत्यादि देवताओंका तथा श्रीशालग्रामजीका विधिवत् पूजन करके श्रीतुलसीजीकी षोडशोपचार पूजा 'तुलस्यै नमः' नाममन्त्रसे करते हैं।
तत्पश्चात् एक नारियल दक्षिणाके साथ टीकाके रूपमें रखते हैं तथा भगवान् शालग्रामकी मूर्तिका सिंहासन हाथमें लेकर तुलसीजीकी सात परिक्रमा कराये और आरतीके पश्चात् विवाहोत्सव पूर्ण करे। विवाहके समान ही अन्य कार्य होते हैं तथा विवाहके मङ्गल-गीत भी गाये जाते हैं। राजस्थानमें इस तुलसी-विवाहको 'बटुआ- फिराना' कहते हैं।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिककी प्रबोधिनीसे प्रारम्भ होकर पूर्णिमा
(18) भीष्मपञ्चक (पद्मपुराण) – यह व्रत कार्तिककी प्रबोधिनीसे प्रारम्भ होकर पूर्णिमाको पूर्ण होता है। इस निमित्त काम-क्रोधादिका त्याग कर ब्रह्मचर्य धारण करके क्षमा, दया और उदारतायुक्त होकर सोने या चाँदीकी लक्ष्मीनारायणकी मूर्ति बनवाकर वेदीपर स्थापित करे। ऋतुकालमें प्राप्त होनेवाले गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्यादिसे पूजन करके पाँच दिनपर्यन्त निराहार, फलाहार, एकभुक्त, मिताहार या नक्तव्रतादिमें जो बन सके, व्रत करे। प्रतिदिन पद्मपुराणोक्त कथा सुने। पूजनमें सामान्य पूजाके सिवा- पहले दिन भगवान्के हृदयका कमलके पुष्पोंसे, दूसरे दिन कटिप्रदेशका बिल्वपत्रोंसे, तीसरे दिन घुटनोंका केतकी (केवड़े) के पुष्पोंसे, चौथे दिन चरणोंका चमेलीके पुष्पोंसे और पाँचवें दिन सम्पूर्ण अङ्गका तुलसीकी मंजरियोंसे पूजन करे। नित्यप्रति 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' के सौ, हजार, दस हजार या जितने बन सके जप करे और व्रतान्तमें पारणाके समय ब्राह्मणदम्पतिको भोजन करवाकर स्वयं भोजन करे। इस देशमें अधिकांश स्त्रियाँ एकादशी और द्वादशीको निराहार, त्रयोदशीको शाकाहार और चतुर्दशी तथा पूर्णिमाको फिर निराहार रहकर प्रतिपदाके प्रभातमें द्विजदम्पतिको जिमाकर स्वयं भोजन करके 'पँचभीखण' नहाती हैं।
भीष्मपञ्चकव्रत
[ कार्तिक शुक्ल एकादशीसे पूर्णिमातक ]
यह व्रत कार्तिकमासके शुक्लपक्षको प्रबोधिनी एकादशीसे प्रारम्भ होता है और पूर्णिमाको पूर्ण होता है।
इसे भीष्मजीने भगवान् वासुदेवसे प्राप्त किया था, इसीलिये यह व्रत 'भीष्मपञ्चक' के नामसे प्रसिद्ध है। व्रत-विधान-इसके निमित्त काम, क्रोधादि त्यागकर ब्रह्मचर्यपूर्वक पाँच दिनका व्रत किया जाता है। व्रती मनुष्यको चाहिये कि मौन भावसे स्नानकर देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करे तथा निम्न मन्त्र से
वैयाघ्रपदगांत्राप सांकृत्यप्रयगय च।
अनपत्याय भीष्माय उदकं भीप्नवनंगे ॥
वसूनामवताराय शान्ननांगमय ।
आध्यं ददामि भीष्माय आजन्मत्यचारिणे ।।
इसमें यथाशक्ति सोने या चाँदीकी भगवान् लक्ष्मी नारायणकी मूर्ति बनवाकर उसकी प्रतिष्ठाकर षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त पहले दिन भगवान्के हृदयका कमलपुष्पोंसे, दूसरे दिन कटिप्रदेशका बिल्वपत्रोंसे, तीसरे दिन घुटनोंका केतकीपुष्पोंसे, चौथे दिन चरणोंका चमेलीपुष्पोंसे तथा पाँचवें दिन सम्पूर्ण अङ्गका तुलसीकी मञ्जरियोंसे पूजन करना चाहिये।
नित्यप्रति 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्रका १०८ बार या अधिक-से-अधिक जितना सम्भव हो, जप करना चाहिये तथा मन्त्रमें 'स्वाहा' पद जोड़कर उससे घृतमिश्रित तिल, चावल और जौसे अग्निमें हवन करना चाहिये। व्रतके पाँच दिनोंमें सामर्थ्यानुसार निराहार, फलाहार, एकभुक्त, मिताहार या नक्तव्रत करना चाहिये, इस व्रतमें पञ्चगव्यपानकी विशेष महिमा है। व्रतान्तमें पारणाके समय ब्राह्मण दम्पतिको भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिये। इस व्रतमें पद्मपुराणोक्त कार्तिक- मासके माहात्म्यका पाठ या श्रवण करना चाहिये।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल नवमी
(19) तुलसीविवाह (विष्णुयामल) – पद्मपुराणमें कार्तिक शुक्ल नवमीको तुलसीविवाहका उल्लेख किया गया है; किंतु अन्य ग्रन्थोंके अनुसार प्रबोधिनीसे पूर्णिमापर्यन्तके पाँच दिन अधिक फल देते हैं। व्रतीको चाहिये कि विवाहके तीन मास पूर्व तुलसीके पेड़को सिंचन और पूजनसे पोषित करे। प्रबोधिनी या भीष्मपञ्चक अथवा ज्योतिःशास्त्रोक्त विवाह- मुहूर्तमें तोरण-मण्डपादिकी रचना करके चार ब्राह्मणोंको साथ लेकर गणपति-मातृकाओंका पूजन, नान्दीश्राद्ध और पुण्याहवाचन करके मन्दिरकी साक्षात् मूर्तिके साथ सुवर्णके लक्ष्मीनारायण और पोषित तुलसीके साथ सोने और चाँदीकी तुलसीको शुभासनपर पूर्वाभिमुख विराजमान करे और सपत्नीक यजमान उत्तराभिमुख बैठकर 'तुलसी-विवाह-विधि' के अनुसार गोधूलीय समयमें 'वर' (भगवान्) का पूजन, 'कन्या' (तुलसी) का दान, कुशकण्डीहवन और अग्नि-परिक्रमा आदि करके वस्त्राभूषणादि दे और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं भोजन करे।
कार्तिक शुक्ल नवमी
(२०) तुलसीवास (स्कन्दपुराण) - कार्तिक शुक्ल नवमीको प्रातः- स्नानादि करके मकानके अंदर बालूकी वेदी बनाये। उसपर तुलसीका प्रत्यक्ष पेड़ और चाँदीकी सपत्र शाखा तथा सोनेकी मंजरीयुक्त निर्मित पेड़ रखके यथाविधि पूजन करे। ऋतुकालके फल-पुष्पादिका भोग लगाये। एक दीपकको घीसे पूर्ण करके लम्बी बातीसे उसे अखण्ड प्रज्वलित रखे और निराहार रहकर रात्रिमें कथावार्ता श्रवण करनेके अनन्तर जमीनपर शयन करे। इस प्रकार नवमी, दशमी और एकादशीका उपवास करनेके अनन्तर द्वादशीको (रेवतीके अन्तिम तृतीयांशकी 20 घड़ियाँ हों तो उनको त्यागकर) ब्राह्मणदम्पतिको दान-मानसहित भोजन कराकर स्वयं भोजन करे ।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी
(21) ब्रह्मकूर्च (हेमाद्रि) – कार्तिक शुक्ल चतुर्दशीको स्नानादिके अनन्तर उपवासका संकल्प करके देवोंको तोयाक्षतादिसे और पितरोंको तिलतोयादिसे तृप्त करके कपिला गौका 'गोमूत्र', कृष्ण गौका 'गोमय', श्वेत गौका 'दूध', पीली गौका 'दही' और कर्वुर (कबरी) गौका घी लेकर वस्त्रसे छान करके एकत्र करे। उसमें थोड़ा कुशोदक (डाभका पानी) भी मिला दे और रात्रिके समय उक्त 'पञ्च गव्य' पीये तो उससे तत्काल ही सब पाप-ताप और रोग-दोष दूर होकर अद्भुत प्रकारके बल, पौरुष और आरोग्यकी वृद्धि होती है ।
कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी
(22) पाषाणचतुर्दशी (देवीपुराण) – उसी चतुर्दशीको जौके चूर्णकी चौकोर रोटी बनाकर गौरीकी आराधना करे और उक्त रोटीका नैवेद्य अर्पण करके स्वयं उसीका एक बार भोजन करे तो सुख-सम्पत्ति और सुन्दरता प्राप्त होती है।
कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी
(23) वैकुण्ठचतुर्दशी (सनत्कुमारसंहिता) – हेमलम्ब संवत्सरकी कार्तिक शुक्ल अरुणोदयव्यापिनी चतुर्दशीको 'मणिकर्णिक' ब्राह्ममुहूर्तमें प्रातःस्नानादिके पश्चात् विश्वेश्वरी और विश्वेश्वरका पूजन करके व्रत करे तो वैकुण्ठवास होता है।
वैकुण्ठचतुर्दशी
[ कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी ]
कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी 'नरकचतुर्दशी' और शुक्लपक्षकी चतुर्दशी 'वैकुण्ठचतुर्दशी' कहलाती है। नरकचतुर्दशीको नरकके अधिपति यमराजको और वैकुण्ठ चतुर्दशीको वैकुण्ठाधिपति भगवान् श्रीविष्णुकी पूजा की जाती है। यह तिथि अरुणोदयव्यापिनी ग्रहण करनी चाहिये।
व्रत-विधान
प्रातःकाल स्रानादिसे निवृत्त होकर दिनभरका व्रत रखना चाहिये और रात्रिमें भगवान् विष्णुकी कमलपुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् भगवान् शंकरकी यथाविधि पूजा करनी चाहिये-
विना यो हरिपूजां तु कुर्याद् रुद्रस्य चार्चनम्।
वृथा तस्य भवेत्पूजा सत्यमेतद्वचो मम ॥
रात्रिके बीत जानेपर दूसरे दिन शिवजीका पुनः पूजन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिये। वैकुण्ठचतुर्दशीका यह पावन व्रत शैवों एवं वैष्णवोंकी पारस्परिक एकता और भगवान् विष्णु तथा शिवके ऐक्यका प्रतीक है।
कथा
एक बार भगवान् विष्णु देवाधिदेव महादेवका पूजन करनेके लिये काशी आये। यहाँ मणिकर्णिकाघाटपर स्नान करके उन्होंने एक हजार स्वर्ण कमलपुष्पोंसे भगवान् विश्वनाथके पूजनका संकल्प किया। अभिषेकके बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिवजीने उनकी भक्तिकी परीक्षाके उद्देश्यसे एक कमलपुष्प कम कर दिया। भगवान् श्रीहरिको अपने संकल्पकी पूर्तिके लिये एक हजार कमल पुष्प चढ़ाने थे। एक पुष्पकी कमी देखकर उन्होंने सोचा मेरी आँखें कमलके ही समान हैं, इसीलिये मुझे 'कमलनयन' और 'पुण्डरीकाक्ष' कहा जाता है। एक कमलके स्थानपर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूँ ऐसा सोचकर वे अपनी कमलसदृश आँख चढ़ानेको उद्यत हो गये।
भगवान् विष्णुको इस अगाध भक्तिसे प्रसन्न हो देवाधिदेव महादेव प्रकट होकर बोले- हे विष्णो ! तुम्हारे समान संसारमें दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है, आजकी यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अव बैकुण्ठचतुर्दशीके नामसे अभिहित होगी। इस दिन व्रतपूर्वक पहले आपका पूजन कर जो मेरा पूजन करेगा, उसे वैकुण्ठलोककी प्राप्ति होगी। भगवान् शिवने विष्णुको करोड़ों सूर्योकी प्रभाके समान कान्तिमान् सुदर्शन चक्र दिया और कहा कि यह राक्षसोंका अन्त करनेवाला होगा। त्रैलोक्यमें इसकी समता करनेवाला कोई अस्त्र नहीं होगा।
(24) कार्तिकी (बहुसम्मत) — इसको ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अङ्गिरा और आदित्य आदिने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। अतः इसमें किये हुए स्नान, दान, होम, यज्ञ और उपासना आदिका अनन्त फल होता है। इस दिन कृत्तिका हो तो यह 'महाकार्तिकी' होती है,¹ भरणी हो तो विशेष फल देती है² और रोहिणी हो तो इसका महत्त्व बढ़ जाता है।³ इसी दिन सायंकालके समय मत्स्यावतार हुआ था। इस कारण इसमें दिये हुए दानादिका दस यज्ञोंके समान फल होता है।⁴ यदि इस दिन कृत्तिकापर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह 'महापूर्णिमा' होती है।⁵ इस दिन कृत्तिकापर चन्द्रमा और विशाखापर सूर्य हों तो 'पद्मक' योग होता है। यह पुष्करमें भी दुर्लभ है।⁶ कार्तिकीको संध्याके समय 'त्रिपुरोत्सव' करके
'कीटाः पतङ्गा मशकाश्च वृक्षे जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः ।
दृष्ट्वा प्रदीपं न हि जन्मभागिनस्ते मुक्तरूपा हि भवन्ति तत्र ॥'
से दीपदान करे तो पुनर्जन्मादिका कष्ट नहीं होता।⁷ यदि इस दिन कृत्तिकामें स्वामी (विश्वस्वामी) का दर्शन किया जाय तो ब्राह्मण सात जन्मतक वेदपारग और धनवान् होता है।⁸ इस दिन चन्द्रोदयके समय शिवा, सम्भूति, प्रीति, संतति, अनसूया और क्षमा- इन छः तपस्विनी कृत्तिकाओंका पूजन करे (क्योंकि ये स्वामिकार्तिककी माता हैं) और कार्तिकेय, खड्गी (शिवा), वरुण, हुताशन और सशूक (बालियुक्त) धान्य — ये निशागममें द्वारके ऊपर शोभित करनेयोग्य हैं; अतः इनका उत्कृष्ट गन्धादिसे पूजन करे तो शौर्य, वीर्य और धैर्यादि बढ़ते हैं।⁹ कार्तिकीको नक्तव्रत करके वृषदान करे तो शिवपद प्राप्त होता है।¹⁰ यदि गौ, गज, रथ, अश्व और घृतादिका दान किया जाय तो सम्पत्ति बढ़ती है¹¹। कार्तिकीको सोपवास हरिस्मरण करे तो अग्निष्टोमके समान फल होकर सूर्य- लोककी प्राप्ति होती है¹² । कार्तिकीको अपनी या परायी अलंकृता कन्याका दान करे तो 'संतानव्रत' पूर्ण होता है¹³ । कार्तिकीको सुवर्णका मेष दान करे तो ग्रहयोगके कष्ट नष्ट हो जाते हैं?¹⁴ और कार्तिकी पूर्णिमासे प्रारम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमाको नक्तव्रत करे तो उससे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होते हैं ।¹⁵
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
कार्तिक-पूर्णिमा
कार्तिक पूर्णिमा बड़ी पवित्र तिथि है। इस तिथिको ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य आदिने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। अतः इसमें किये हुए स्रान, दान, होम, यज्ञ और उपासना आदिका अनन्त फल होता है। इस दिन गङ्गा-स्नान तथा सायंकाल दीपदानका विशेष महत्त्व है, इसी पूर्णिमाके दिन सायंकाल भगवान्का मत्स्यावतार हुआ था, इस कारण इसमें किये गये दान, जपादिका दस यज्ञोंके समान फल होता है।
वरान् दत्त्वा यतो विष्णुर्मत्स्यरूपोऽभवत् ततः।
तस्यां दत्तं हुतं जप्तं दशयज्ञफलं स्मृतम् ॥ (पद्मपुराण)
इस दिन यदि कृत्तिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है।
जो व्यक्ति पूरे कार्तिकमास स्रान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमाको पूरा हो जाता है। कार्तिक- पूर्णिमाके दिन प्रायः श्रीसत्यनारायणव्रतकी कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मन्दिरों, चौराहों, गलियों, पीपलके वृक्षों तथा तुलसीके पौधोंके पास दीपक जलाये जाते हैं और गङ्गाजीको भी दीपदान किया जाता है। काशीमें यह तिथि देवदीपावली-महोत्सवके रूपमें मनायी जाती है।
चान्द्रायणव्रतकी समाप्ति भी आजके दिन होती है। कार्तिक पूर्णिमासे आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमाको व्रत और जागरण करनेसे सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। कार्तिक पूर्णिमाके दिन गङ्गा आदि पवित्र नदियोंके समीप स्नानके लिये सहस्रों नर-नारी एकत्र होते हैं, जो बड़े भारी मेलेका रूप बन जाता है। सिक्ख धर्मावलम्बी इस दिन गुरुनानकदेवकी जयन्तीका उत्सव मनाते हैं।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
(25) कार्तिकीका उद्यापन (व्रतोद्यापन-प्रकाश) – कार्तिक शुक्ल चतुर्दशीको गणपति-मातृका, नान्दीश्राद्ध, पुण्याहवाचन, सर्वतोभद्र, ग्रह और हवनकी यथापरिमित वेदी बनवाकर रात्रिके समय उनपर उक्त देवोंका स्थापन और पूजन करे। इसके लिये अपनी सामर्थ्यके अनुसार सुवर्णकी भगवान्की सायुध-मूर्ति बनवाकर व्रतोद्यापनकौमुदी या व्रतोद्यापन- प्रकाशादिके अनुसार सर्वतोभद्रमण्डल स्थापित किये हुए सुवर्णादिके कलशपर उक्त मूर्तिका यथाविधि स्थापन, प्रतिष्ठा और पूजन करके रात्रिभर जागरण करे और पूर्णिमाके प्रभातमें प्रातः स्नानादि करके गोदान, अन्नदान, शय्यादान, ब्राह्मणभोजन (30 जोड़ा-जोड़ी) और व्रतविसर्जन करके जाति- बान्धवोंसहित भोजन करे।
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
1. आग्नेयं तु यदा ऋक्षं कार्तिक्यां भवति क्वचित् ।
महती सा तिथिज्ञेया स्नानदानेषु चोत्तमा ॥ (यम)
2. यदा याम्यं तु भवति ऋक्षं तस्यां तिथौ क्वचित् ।
तिथिः सापि महापुण्या मुनिभिः परिकीर्तिता ॥ (स्मृत्यन्तर)
3. प्राजापत्यं यदा ऋक्षं तिथौ तस्यां नराधिप ।
स योगः पद्मको नाम पुष्करे त्वतिदुर्लभः ॥ (स्मृतिसार)
4. वरान् दत्त्वा यतो विष्णुर्मत्स्यरूपोऽभवत् ततः ।
तस्यां दत्तं हुतं जप्तं दशयज्ञफलं स्मृतम् ॥ (पद्मपुराण)
5. पूर्णा महाकार्तिकी स्याज्जीवेन्द्वोः कृत्तिकास्थयोः । (ब्राह्म)
6. विशाखासु यदा भानुः कृत्तिकासु च चन्द्रमाः ।
स योगः पद्मको नाम पुष्करे त्वतिदुर्लभः ॥ (पद्मपुराण)
7. पौर्णमास्यां तु संध्यायां कर्तव्यस्त्रिपुरोत्सवः ।
दद्यात् पूर्वोक्तमन्त्रेण सुदीपांश्च सुरालये ॥ (भविष्य०)
8. कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे यः कुर्यात् स्वामिदर्शनम् ।
सप्त जन्म भवेद् विप्रो धनाढ्यो वेदपारगः ॥ (काशीखण्ड)
9. ततश्चन्द्रोदये पूज्यास्तापस्यः कृत्तिकास्तु षट् ।
कार्तिकेयस्तथा खड्गी वरुणश्च हुताशनः ॥
धान्यैः सशूकैर्द्वारोर्ध्वं भूषितव्यं निशामुखे ।
माल्यैर्धूपैस्तथा दीपादिभिः पूजयेत् ॥ (ब्रह्मपुराण)
10. कार्तिक्यां तु वृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत् ।
शैवं पदमवाप्नोति शैवव्रतमिदं स्मृतम् ॥ (मत्स्यपुराण)
11. गजाश्वरथदानं घृतधेन्वादयस्तथा ।
प्रदेयाः पुण्यकृद्धिस्तु ................. ।। (निर्णयामृत)
12. कार्तिक पौर्णमास्यां तु सोपवासः स्मरेद्धरिम् ।
अग्निष्टोमफलं विन्देत् सूर्यलोकं च विन्दति ॥ (ब्रह्मपुराण)
13. कार्तिक्यामुपवासी यः कन्यो दद्यात् स्वलंकृताम् ।
स्वकीयां परकीयां वा अनन्तफलदायिनी ॥ (हेमाद्रि)
14. कार्तिक्यां नक्तभुग् दद्यान्मेषं हेमविनिर्मितम् ।
एतद् राशिवतं नाम ग्रहोपद्रवनाशनम् ॥ (भविष्य०)
15. कार्तिक्यां तु समारभ्य सम्पूर्ण शशलक्षणम् ।
पूजयेदुदये राजन् सदा नक्ताशनो भवेत् ॥ (हेमाद्रि)
🌺🌺🌺🌺🌺🪷🪷🪷🪷🪷🌺🌺🌺🌺🌺
Comments
Post a Comment