धनतेरस | पंच पर्वों में प्रथम पर्व
धनतेरस | पंच पर्वों में प्रथम पर्व
पंचपर्व में प्रथम पर्व धनतेरस पूजा, मुहूर्त व खरीदारी ?
कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को हमेशा धनतेरस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन धनवंतरी का उदय हुआ था भगवान विष्णु कहते हैं कि धन्वंतरी मेरा ही अंश है वह मेरी तरह ही चक्र संघ अमृत कलश और औषधि धारण करते हैं।
धनवंतरी जी का प्राकट्य देख भगवान शिव ने भी कहा था वह प्रभु आपका कितना सुंदर स्वरूप आज आप अमृत कलश लेकर उत्पन्न हुए हैं और उससे पहले आप विश लेकर उत्पन्न हुए थे आज तो आपके चेहरे की चमक ही दूसरी है।
धनतेरस से जुड़ी कहानी
भगवान विष्णु पृथ्वी लोक पर भ्रमण करने के लिए आ रहे थे तो नाराज जी ने उन्हें देखा और बताया कि माता लक्ष्मी जी उनके पीछे-पीछे आ रही हैं विष्णु जी ने पूछा लक्ष्मी आप कहां जा रहे हैं तो उन्होंने कहा जिधर आप जा रहे हैं मैं आपके चरणों से दूर नहीं रह सकती इसलिए मैं आपके साथ उधर ही जा रही हूं।
श्री हरि बोले हम दक्षिण की ओर जा रहे हैं तुम वापस जाओ लेकिन लक्ष्मी नहीं मानी और जिद करके मैं भी साथ चलूंगी ऐसा कहने लगे भगवान विष्णु आगे आगे चल रहे थे और लक्ष्मी जी पीछे पीछे तभी लक्ष्मी जी ने भूमि पर गन्ने का खेत देखा। इसी बीच भगवान विष्णु आगे निकल गए तब लक्ष्मी जी ने एक गन्ना तोड़ लिया और उसके रस का रसपान करने लगी भगवान विष्णु जब आगे निकल गए तो वह लौट कर देखा तो लक्ष्मी को नहीं पाया भगवान विष्णु वापस आए तो उन्होंने देखा कि लक्ष्मी गन्ने के रस का रसपान कर रही हैं।
इस पर भगवान विष्णु बोले कि आपने बहुत गलत काम किया है आपको चोरी दोष लगा है लक्ष्मी जी बोली जब यह पूरी पृथ्वी ही मेरी और आपकी है तो अपने घर से हम कुछ भी ले तो इसमें हमें चोरी दोष क्यों लगे तब भगवान विष्णु ने कहा कि चोर पांच प्रकार के होते हैं।
एक वे जो भगवान को बिना दिए खाना खा लेते हैं दूसरे वे जो किसी की वस्तु बिना पूछे उठा लेते हैं तीसरे वह जो किसी के घर में बिना पूछे प्रवेश कर जाते हैं और वहां से सामान आदि उठा लेते हैं चार किसी के प्रदेश क्षेत्र में रखा सामान बिना पूछे उठा लेते हैं पांच अपने माता-पिता या बुजुर्गों को बिना अर्पित किए खाने वाले भी चोर के समान ही माने जाते हैं।
धन्वंतरी देव का पूजन की आवश्यक सामग्री
1. देसी गाय के गोबर या गंगाजल युक्त जल
2 सुंदर चौक पूरने के लिए सूखा आटे व हल्दी
3 चौकी रखें
4. लाल वस्त्र बिछाएं।
5. एक चांदी का और एक सामान्य सिक्का ले। सामान्य सिक्का ₹1, ₹2, ₹5, ₹10, ₹20, ₹50, या ₹100 का
6. गीले आटे से बने आठ दीपक , दीपक के लिए देसी घी, तेल आठ लंबी बत्तियां
7. एक थाली
8. कुमकुम रोली,
9. हल्दी पिसी व सात साबुत गांठें
10. अभीर गुलाल,
11. चंदन,
12. लाल धागा या मोली
13. चावल हल्दी से भिगोकर से पीले किए हुए।
14. अमरबेल के साथ टुकड़े
15. सात कमलगट्टे
16. मीठे में मिष्ठान, गुड़, शक्कर, मिश्री, खीर जो भी उपलब्ध हो
17. जो भी वस्तु आप अपने घर में खरीद कर लाए हैं
18. पुष्प या पुष्प मालाएं
धन्वंतरी देव का पूजन कैसे करें?
लक्ष्मीजी का पूजन केवल दीपावली के दिन ही नहीं होता, इनकी पूजा की शुरुआत धनतेरस से शुरू होती है और पांचों दिन चलती है, तभी माता की पूजा संपूर्ण मानी जाती है। आइए इस भाग में हम आपको त्रयोदशी की पूजा का संपूर्ण तरीका बताने का प्रयास करते हैं।
* भूमि पर देसी गाय के गोबर से लीपे या गंगाजल युक्त जल से लीपें।
* सुंदर चौक पूरे (रंगोली से नहीं) इसमें केवल आटे व हल्दी का प्रयोग करें। आटा समृद्धि को तो हल्दी लक्ष्मी वैभव को बढ़ाती हैं।
* चौक के ऊपर चौकी रखें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएं।
* एक चांदी का और एक सामान्य सिक्का ले। सामान्य सिक्का ₹1, ₹2, ₹5, ₹10, ₹20, ₹50, या ₹100 का हो सकता है। यदि घर में चांदी का सिक्का उपस्थित नहीं है, तो आप सामान्य सिक्के से ही काम चला सकते हैं।
* आटे के आठ दीपक बनाएं और एक अन्य प्लेट में लगा ले । जिनमें से 7 दीपक देसी घी के तथा आठवां दीपक तेल का होगा। सभी में लंबी बत्ती लगेगी क्योंकि माता के पूजन में जो भी बत्ती लगती है, वह लंबी ही लगती है।
* एक थाली ले और कुमकुम को गीला करके इस थाली में एक सुंदर स्वास्तिक बनाएं।
* चांदी के सिक्के व सामान्य सिक्के को ले और उसी थाली में बने स्वास्तिक के ऊपर माता लक्ष्मी का स्मरण करते हुए रख दें।
* थाली में कुमकुम रोली, हल्दी, अभीर गुलाल, चंदन, लाल धागा या मोली से पूजन करें।
* चांदी के सिक्के और अन्य सिक्के का कुमकुम आदि व जल से दोनों का पूजन करें।
* अब दोनों सिक्के उठा ले और इस पर अच्छे से मौली या कलावा लपेट दे। पहले चांदी के सिक्के पर लपेटे फिर दूसरे सिक्के पर लपेटे और दोनों सिक्कों पर जल का सिंचन देकर पुनः पूजन करें।
* हल्दी, रोली, मोली, चंदन आदि से इनका पूजन कर माता लक्ष्मी के ऊपर रख दें।
* चावलों को हल्दी से भिगोकर पीले पीले करके और अपने उल्टे हाथ में लेकर रख लें। इसके उपरांत इन चावलों को माता के ऊपर रखे दोनों सिक्क पर गणेश जी के पूजन के साथ साथ माता का स्मरण करते हुए छोड़ते जाएं।
अब प्रार्थना करें
हे रिद्धि सिद्धि के दाता श्री गणेश जी महाराज आप हमारे घर माता लक्ष्मी, कुबेर भंडारी और भगवान नारायण को लेकर पधारे और हमारे घर में आप सब सदा विराजमान रहे।
माता लक्ष्मी का स्मरण करें और चावल छोड़ते जाएं । शिव नारायण लक्ष्मी और गणेश का स्मरण बराबर करते रहें।
* अब माता का स्मरण करके लक्ष्मी जी के पूजन करें और उन पर अमरबेल के सात टुकड़े चढ़ा दें और उनसे प्रार्थना करें की हे माता जिस प्रकार यह अमरबेल बिना किसी सहायता के बढ़ती और फलती फूलती है उसी प्रकार आप हमारे परिवार की सुख समृद्धि को भी फलने फूलने का आशीर्वाद प्रदान करें।
[लक्ष्मी पूजन में अमरबेल समृद्धि दायक के रूप में प्रयोग की जाती है अमरबेल का उपयोग मकान दुकान वह गृह प्रवेश के समय पर भी माता लक्ष्मी को इसी प्रकार चढ़ाकर प्रदान किया जाता है प्रार्थना की जाती है।]
* हमअमरबेल के टुकड़े के साथ ही हल्दी की सातों गांठें व सातों कमलगट्टों को सुंदर भाव से माता को समर्पित करते हैं।
* अब दोनों हाथों में पिसी हल्दी लेकर सात बार माता लक्ष्मी व उनके ऊपर के सिक्कों पर अपनी मनोकामना बोलते हुए चढ़ाएं और अपने घर में माता लक्ष्मी को विराजे।
* इसके बाद कुमकुम या रोली लेकर माता को समर्पित करें।
* मीठे में मिष्ठान गुड़ शक्कर मिश्री खीर जो भी उपलब्ध हो माता लक्ष्मी को समर्पित करें।
* आठों दीपकों को प्रज्वलित करें यह ध्यान रखें कि घी के दीपक लक्ष्मी जी के सीधे हाथ की तरफ रखे जाते हैं व तेल का दीपक उल्टे हाथ की तरफ रखा जाता है।
इसे आप इस तरीके से भी समझ सकते हैं कि घी के दीपक आपके सामने आपके उल्टे हाथ की तरफ लगेंगे तथा तेल का दीपक आपके सामने आपके सीधे हाथ की तरफ रहेगा।
* घी के सातों दियो से माता की आरती करें और उनसे विनती या निवेदन माता की तरफ झोली पसार कर करें कि
हे मां आप हमारे यहां सदा विराजमान रहे। मां हम आपके पुत्र हैं आप हमारे घर का रास्ता भूल गई है मां हमें बहुत कष्ट है हम बहुत दुखी हैं हम बहुत बड़ी परेशानी में हैं हम आपकी पूजा आदि सब भूल चुके हैं। भगवान शिव , भगवान कुबेर भंडारी और भगवान नारायण के सुंदर प्रसंगों पर विश्वास करके जैसा हमसे बन पा रहा है हम आपकी प्रसन्नता के लिए वैसी ही पूजा कर रहे हैं।
मां भगवान शंकर का अनुमोदन करके हेमा आप हमारे घर में विराजमान हो हे मां आप हमारा मार्गदर्शन करें। हेमा आप अपने इस अधम पुत्र के घर का द्वार भूल गई हैं। कृपया मां आप इस घर में पधारें, हे मां धनलक्ष्मी, हे मां संतान लक्ष्मी, हे मां वैभवलक्ष्मी आप हमारी मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए हमारे घर में पधारिए और हमारे घर में सदा सदा के लिए विराजमान होएं।
माता को प्रणाम करें उससे पहले झोली को अपनी ओर गिरा ले। इसके उपरांत माता से पुनः निवेदन करें कि
हे अन्नपूर्णा, हे दयासागर, हे कृपा सागर मां आप भगवान विष्णु के साथ हमारे घर में सदा विराजमान रहिए और हम पर कृपा कीजिए। मां मुझे मालूम है कि आप प्रभु के बिना आप सदा मेरे घर में विराजमान नहीं हो सकती अतः हे मां आप अपने एक अंश से हमारे घर में विराजमान होकर हम पर कृपा कीजिए।
फिर माता को प्रणाम करें। इन साथ घी के सातों दीपकों को 7 स्थान पर लगाएं। जैसे आपके घर का हॉल या आंगन, रसोई, जहां आप लक्ष्मी रखते हैं वह स्थान, घर का द्वार, तुलसी जी का क्यारा या गमला और जहां आप पूजा कर रहे थे उस पूजन स्थान पर तेल के दिए के पास रख दें। लेकिन ध्यान रहे कि माता के सीधे या दाएं हाथ पर घी का हाथ पर तेल का दीपक विराजमान होता है।
* घर की देवालय के देवों का भी पूजन व आरती करें।
* जो भी वस्तु आप अपने घर में खरीद कर लाए हैं उसका पूजन मां को समर्पित करके आज ही के दिन इसी वक्त कर लीजिए।
धनतेरस पूजा, मुहूर्त व खरीदारी
धनतेरस हर साल कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व के बारे में मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान धनतेरस के दिन ही भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था इसीलिए इसे धन्वंतरि जयंती के नाम भी जाना जाता है।
धनतेरस की तिथि और शुभ मुहूर्त
इस बार कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी 22 अक्टूबर सायंकाल 06:00pm से लगेगी जो 23 नवम्बर 6:02 pm तक रहेगी।
अतः धनतेरस 23 नवम्बर 2021 को ही मनाई जानी चाहिए।
धनतेरस का पूजन एवं यम दीप दान 23 नवम्बर 2021 को 6:00 pm से पूर्व पूजा करना उत्तम रहेगा।
प्रदोष काल:- सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 की अवधि को प्रदोषकाल के नाम से जाना जाता है। प्रदोषकाल में दीपदान व लक्ष्मी पूजन करना शुभ रहता है। खासकर धनतेरस की पूजा प्रदोष काल में ही की जानी चाहिए।
स्थिर लग्न :- वृषभ काल रहेगा। मुहुर्त समय में होने के कारण घर-परिवार में स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। उपरोक्त समय में पूजन, शुभ काल मुहूर्त की शुभता से धन, स्वास्थ्य व आयु में शुभता आती है।
धनतेरस क्यों मनाया जाता है?
बहुत समय पूर्व जब देव और दानवों के द्वारा समुद्र मंथन हो रहा था, उसी समय भगवान धनवंतरि चौदहवें और अंतिम रत्न अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, यह दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी थी, इसलिए धनतेरस के दिन धनवंतरि की पूजा की जाती है।
धनतेरस से ही पंच दिवसीय त्योहार अर्थात पंचपर्व दीपावली की शुरुआत हो जाती है इस तेरस को धनत्रयोदशी भी कहते हैं।
इसे दिन को अबूझ मुहूर्त का दिन भी कहा जाता है। जिसमें बिना प्रहर और काल का ध्यान किए किसी भी समय मंत्र जाप या खरीदारी करना शुभकारी और चिरकाल तक लाभ देने वाला माना जाता है।
धन तेरस पूजन
मान्यता है कि कुबेर की पूजा से प्रसन्न होकर इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने उन्हें कोषाध्यक्ष का पद भी दिया था। अतः इस दिन के पूजक कुबेर भगवान शिव के परम भक्त हैं, इसलिए हमें भी इस दिन प्रात:काल भगवान शिव की विधि पूर्वक पूजा अवश्य करनी चाहिए।
इस दिन प्रभु श्री गणेश, माता लक्ष्मी, भगवान धनवंतरि और कुबेर जी की पूजा की जाती है।
धन त्रयोदशी के दिन समुद्र से आयुर्वेद के जनक देव धनवंतरी देव का जन्म हुआ था। धनवंतरी देव, देवताओं के चिकित्सकों के देव है। यही कारण है कि इस दिन चिकित्सक वर्ग इनकी कृपा के लिए इनकी पूजा-अर्चना करता है।
संध्याकाल के समय अर्थात प्रदोष काल में पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। पूजा के स्थान पर उत्तर दिशा की तरफ भगवान कुबेर और धन्वन्तरि की मूर्ति स्थापना के साथ ही माता लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की पूजा का विधान है।
1. पूजा करने से पहले स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।
2. इसके बाद एक साफ चौकी पर गंगाजल छिड़क कर उस पर पीला या लाल रंग का कपड़ा बिछाएं।
3. इस कपड़े पर प्रभु श्री गणेश, माता लक्ष्मी, मिट्टी का हाथी, भगवान धनवंतरि और भगवान कुबेर जी की मूर्तियां स्थापित करें।
4. कुबेर को सफेद फूल व मिठाई तथा धन्वंतरी को पीले फूल और मिठाई चढ़ाएं।
धन तेरस की पूजा शुभ मुहुर्त में ही करनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहले तेरह दीपक जला कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करें।
धनतेरस के दिन कुबेर मंत्र का जाप धनकुबेर रूपी खजाने का स्वामी बनाने वाला माना गया है।
बहुत अधिक अर्थात अकूत धन संपत्ति प्राप्त करने के लिए हमें धन के स्वामी कुबेर का ध्यान और पूजन करना चाहिए।
देव कुबेर का ध्यान करते हुए, भगवान कुबेर को फूल चढाएं और ध्यान करें, और कहें,
"हे श्रेष्ठ विमान पर विराजमान रहने वाले, गरूडमणि के समान आभावाले, दोनों हाथों में गदा व वर धारण करने वाले, सिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृ्त शरीर वाले, भगवान शिव के प्रिय मित्र देव कुबेर का मैं ध्यान करता हूँ।"
इसके बाद धूप, दीप, नैवैद्ध से पूजन करें. और निम्न मंत्र का जाप करें.
'यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ।'
कुबेर को भगवान शिव का परम भक्त माना गया है, इसलिए इस दिन सुबह भगवान शिव की विधि पूर्वक पूजा अवश्य करें। मध्य रात्रि में आगे दिए गए इस कुबेर मंत्र का 108 बार जाप करें।
।। ऊं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम: ।।
यह कुबेर का महामंत्र भी कहा जाता है जिसके जाप से आपकी धन संबंधी हर परेशानी दूर हो सकती है, साथ ही धन प्राप्ति के इतने स्रोत मिलेंगे कि व्यक्ति अकूत संपत्ति का स्वामी बन सकता है।
ऐसी मान्यता है कि भगवान कुबेर को सफेद मिठाई, जबकि धनवंतरि को पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए क्योंकि धन्वन्तरि को पीली वस्तु अधिक प्रिय है।
पूजा में फूल, फल, चावल, रोली, चंदन, धूप व दीप का इस्तेमाल करना फलदायक होता है।
धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरि की पूजा-अर्चना की जाती है।
धनतेरस पर दक्षिण दिशा में दीप जलाने का महत्त्व
धनतेरस के अवसर पर यमदेव के नाम से एक दीपक निकालने की भी प्रथा है। धनतेरस पर यह दीप दक्षिण दिशा में जलाया जाता है। दीप जलाकर अर्थात दीपदान के उपरांत श्रद्धाभाव से यमराज को नमन करना चाहिए।
कहा जाता है कि एक दिन दूत ने बातों ही बातों में यमराज से प्रश्न किया कि अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है?
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यमदेव ने कहा कि जो प्राणी धनतेरस की शाम यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दिया जलाकर रखता है, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती।
इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम को भक्तजन आँगन में यम देवता के नाम पर उनकी दिशा दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं। उसमें कुछ सिक्के भी डाल देनी चाहिए। यदि संभव हो तो यह दीपक पूरी रात्रि जलाना चाहिए। इस दीपक के दान से भगवान यमराज प्रसन्न होते हैं और फलस्वरूप उपासक और उसके परिवार को मृत्युदेव यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। विशेषरूप से यदि घर की लक्ष्मी इस दिन यह दीपदान करें तो पूरा परिवार संपूर्ण वर्ष स्वस्थ रहता है।
धनतेरस का महत्व
इस दिन नये उपहार, सिक्के, बर्तन, गहनों, धान्य आदि की खरीदारी करना शुभ रहता है.
सात धान्यों की पूजा
भारत एक कृषि प्रधान देश है अतः धन-धान्य की वृद्धि के लिए इस दिन शुभ मुहूर्त में सात धान्यों की पूजा की जाती है। यह ध्यान नहीं भारत की आर्थिक स्थिति के पर्याय रहे हैं।
ये सात धान्य "गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर" है।
सात धान्यों के साथ ही भगवती का पूजन करना लाभकारी रहता है। इस दिन भगवती पूजा में भोग लगाने के लिये नैवेद्ध के रुप में श्वेत मिष्ठान्न का प्रयोग किया जाता है।
साथ ही इस दिन स्थिर लक्ष्मी का पूजन करने का विशेष महत्व है।
धनतेरस में क्या खरीदें
लक्ष्मी जी व गणेश जी की चांदी की प्रतिमाओं को इस दिन घर लाना, घर- कार्यालय, व्यापारिक संस्थाओं में धन, सफलता व उन्नति को बढाता है।
इस दिन भगवान धनवन्तरी समुद्र से कलश रूपी बर्तन लेकर प्रकट हुए थे, इसलिये इस दिन खास तौर से बर्तनों की खरीदारी की जाती है। इस दिन बर्तन, चांदी खरीदने से इनमें 13 गुणा वृ्द्धि होने की संभावना होती है।
प्राचीन काल में इस दिन किसान सूखे धनिया के बीज खरीद कर घर में रखते भी परिवार की धन संपदा में वृ्द्धि करता है।
दीपावली के दिन इन बीजों को बाग में या खेतों या क्यारियों में लागाया जाता है। ये बीज व्यक्ति की उन्नति व धन वृ्द्धि के प्रतीक होते है।
धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा काफी प्राचीन है। स्टील भी लोहा का ही दूसरा रूप है। लोहे को निकृष्ट धातु में गिना जाता है जबकि ताबे व कांसे (कॉपर या ब्रॉन्ज) को उत्कृष्ट धातुओं में इसलिए कहा जाता है कि स्टील के बर्तन भी धनतेरस के दिन नहीं खरीदने चाहिए। स्टील के बजाए ताबे व कांसे (कॉपर या ब्रॉन्ज) के बर्तन खरीदे जाने चाहिए।
धनतेरस में कलश, हल्दी की गांठ, झाड़ू खरीदना बहुत शुभ होता है। झाड़ू खरीदने के पीछे कहा जाता है कि धनतेरस के दिन घर की सफाई कर पुरानी झाड़ू की जगह नई झाड़ू लानी चाहिए इससे झाड़ू की शुभता और माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। इसलिए इस दिन झाड़ू खरीदना शुभ माना जाता है।
इस दिन पीला धन्य जैसे धनिया के बीज, पीली धातु जैसे सोना व चांदी, पीली धातु के बर्तन खासकर पीतल के बर्तन खरीदना भी बहुत शुभ होता है। इस दिन धन्वंतरी कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए इस दिन कलश खरीदना भी अच्छा रहता है।
धनतेरस के दिन अगर आप बर्तन लाते हैं तो उन्हें खाली नहीं रखना चाहिए। पूजा से पहले उनमें जलभरकर रखना चाहिए।
चिकित्सा जगत में बडी-बडी योजनाएं प्रारम्भ की जाती है।
राशि के अनुसार निम्न वस्तुएं खरीदें
धनतेरस के दिन अपनी राशि के अनुसार निम्न वस्तुएं खरीदें और दीपावली पूजा में रखें और दीपावली पूजा के पश्चात लाल कपड़े में बांध कर अगली धनतेरस तक पूजा स्थान पर रखें
मेष 250 ग्राम धनिया
वृषभ 7 कौड़ी
मिथुन बर्तन
कर्क शंख
सिंह बर्तन
कन्या 7 सुपारी
तुला चांदी की पायल 【पूजा के पश्चात दीपावली के दिन घर की किसी महिला को देदें, पूजा स्थान में ना रखें】
वृश्चिक 7 हल्दी की गांठ
धनु केसर की डिब्बी
मकर चांदी की सिंदूर दानी जिसमें सिंदूर भरा हो
कुंभ 7 चांदी के सिक्के
मीन 7 बर्तन चम्मच
झाडू क्यों खरीदते हैं?
मत्स्य पुराण के अनुसार झाड़ू को माता लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है वही वृक्ष संहिता में झाड़ू को सुख शांति बढ़ाने और दर्जा हटाने वाली माना जाता है यही नहीं मान्यता तो यह है कि धनतेरस के दिन अगर झाड़ू नहीं झाड़ू लगाई जाए तो धन संबंधी परेशानियां में राहत मिलती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार धनतेरस के दिन जब भी झाड़ू खरीदे तो उसकी संख्या का विशेष ख्याल रखें कह दें कि धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदना शुभ होता है लेकिन जोड़े में झाड़ू खरीदने से बचें।
धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदे और दीपावली के दिन सूरज निकलने से पहले किसी मंदिर में दान करें अच्छा माना जाता है। इससे घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है।
दीप जलाने की कथा
राजा हेम संतान हीन थी उनको देव कृपा से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। कुंडली जांचने के दौरान पंडितों ने बताया कि बालक शादी के ठीक 4 दिन बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। राजा बहुत दुखी हुए और उन्होंने राजकुमार को श स्त्री की परछाई से भी दूर भेज दिया।
एक दिन वहां से एक राजकुमारी निकली, राजकुमार-राजकुमारी पर मोहित हो गया और उसने गंधर्व विवाह कर लिया। विवाह के 4 दिन बाद जब दूत राजकुमार के प्राण लेने आए जब राजकुमार के प्राण जमदूत ले रहे थे तो राजकुमारी विलाप करने लगी।
यमदूतों का मन विचलित हो उठा। उन्होंने यमराज से विनती करते हुए कहा कि कुछ ऐसा करें कि अकाल मृत्यु से राजकुमार मुक्त हो जाए दूत के अनुरोध पर यमराज बोले कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेंट करेगा। उसे और उसके परिवार को अकाल मृत्यु का भय नहीं होगा।
यही वजह है कि धनतेरस पर दक्षिण की ओर मुख कर दीप जलाया जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार यमराज ने यमदूतों से पूछा कि तुम लोग अनंत काल से प्राणियों के शरीर से प्राण का हरण कर निष्प्राण करने का दुखदायी कार्य कर रहे हो। प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय, समय क्या तुम्हारे मन में कभी दया का भाव नहीं आता? यदि कभी ऐसा हुआ है तो मुझसे कहो, आज मैं तुम्हारी पीड़ा सुनने को उत्सुक हूं। लेकिन दूत यम देवता के भय से बार-बार यही कहते रहे कि हे स्वामी हम तो अपना कर्तव्य निभाते हैं, आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। तब यमदेवता समझ गए कि दूत ये बातें किसी दंड के भय से या कर्तव्यविमुख घोषित कर दिए जाने के भय से ही कह रहे हैं। तब उन्होंने यमदूतों के साथ प्रेम पूर्वक बात करके उनके मन में व्याप्त भय दूर किया और पुन: वहीं प्रश्न किया।
कथा के अनुसार यमदेव के प्रेम पूर्वक बात करने पर दूतों ने एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यमदेवता एक बार वह राजा हेम के पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया था। इच्छा हो रही थी कि उसके प्राण न लें क्योंकि वह तो अल्पायु था। मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में उसके प्राण शरीर से बाहर आ रह थे लेकिन विधि के विधान के अनुसार हम चाहकर भी कुछ न कर सके। यह सुनकर यमराज ने कहा कि मुझे पूरो प्रसंग विस्तार से सुनाओ।
यमराज का आदेश पाकर दूत ने प्रसंग बताना शुरू किया उसने बताया कि एक बार हंस नामक एक प्रतापी राजा शिकार के लिए वन में निकले और भटकते हुए दूसरे राजा हेमराज के राज्य में पहुंच गए। भूख-प्यास से व्याकुल राजा हंस का हेमराज ने बड़ा स्वागत किया। उसी दिन हेमराज को पुत्र की प्राप्ति हुई थी। कई वर्ष की प्रतीक्षा के बाद उसके यहां पुत्ररूप में संतान की प्राप्ति हुई तो इस मौके पर उत्सव का आयोजन किया गया था, जहां एक परंपरा के अनुसार ज्योतिषी को भी बुलाया गया था, जिन्होंने यह भविष्यवाणी की कि हे राजन! अपने पुत्र का विवाह मत करना क्योंकि विवाह के चौथे ही दिन सर्प के काटने से इसकी अकाल मृत्यु हो जाएगी। यह सुनते ही सारा राज्य शोक में डूब गया। अतिथि के रूप में वहां उपस्थित राजा हंस को भी बहुत शोक हुआ।
उसने हेमराज को सांत्वना देते हुए कहा कि महाराज आप चिंता न करें। मैं राजकुमार के प्राणों की रक्षा करूंगा। अपने वचन का निर्वाह करने के लिए राजा हंस ने यमुना तट पर एक ऐसे किले का निर्माण कराया, जिसमें बिना अनुमति के तो पवन भी प्रवेश नहीं कर सकती थी। उसी किले में सुरक्षा के बीच राजकुमार तरूण हुआ। राजकुमार ने कभी कोई स्त्री नहीं देखी थी। लेकिन देवयोग से उसे एक दिन एक राजकुमारी दिख गई। दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गए और उन्होंने आपस में गंधर्व विवाह कर लिया। दोनों साक्षात कामदेव औऱ रतिदेवी के युगल के समान प्रतीत होते थे। राजा हंस को पता चला तो उसे ज्योतिषी की भविष्यवाणी याद आई। हंस और राजा हेमराज दोनों ने ही विधि के विधान को बदलने का निश्चय किया। विवाह के चौथे दिन मुझे उसके प्राण हरण के लिए जाना था। मैं अपना कर्तव्य पूरा करने पहुंचा। उन लोगों ने भांति-भांति के यत्न किए ताकि मेरा प्रवेश न हो सके और चौथा दिन बीत जाए पर आपके प्रताप से आपके दूतों का प्रवेश कहीं कोई रोक ही नहीं सकता।
दूत ने कहा कि मैंने उसके प्राण हर लिए। जहां कुछ पल पूर्व तक उत्सव का वातावरण था वहां चीख-पुकार मच गई। नवविवाहिता राजकुमारी तो ऐसा दारूण विलाप कर रही थी कि मेरा कठोर मन भी उसे सुनकर विचलित हो गया। हे महाराज मैं स्वयं भी रोने लगा परंतु कर्तव्य की डोर से बंधा होने के कारण मैं विवश होकर वहां से उसके प्राण लेकर चला आया। इतनी कथा सुनाकर यमदूत चुप हो गया। वहां एकदम से शांति हो गई। स्वयं यमराज भी इसे सुनकर भावुक हो गए। कुछ देर चुप रहने के बाद बोले- तुम्हारी इस करूण कथा को सुनकर मैं भी विचलित हो गया हूं पर क्या करूं। विधाता ने मुझे यही उत्तरदायित्व सौंपा है। विधि के विधान की रक्षा के लिए हमें यह कार्य करना ही होता है अन्यथा पृथ्वी पर असंतुलन हो जाएगा।
यह सुनकर दूत ने साहस करके पूछा- महाराज आपकी बात सर्वथा सत्य है। यदि प्राणियों के प्राण न हरे गए तो पृथ्वी पर स्थान ही नहीं बच जाएगा। उसकी संपदा एक दिन में ही समाप्त हो जाएगी परंतु हे महाराज क्या यह नहीं हो सकता कि किसी के भी प्राण असमय न लिए जाएं। उस राजकुमार की अवस्था तो मात्र सोलह वर्ष की थी। उसने अपना जीवन देखा ही नहीं था। यदि उसे जीवन में कुछ वर्ष मिल जाते और वह जीवन के सुखों का उपभोग करने के उपरांत काल कवलित होता तो संभवतः ऐसा दुख न होता। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं हो सकता जिससे प्राणी असमय मृत्यु के शिकार न हो जाए। आप इतना तो कर ही सकते हैं। कृपया ऐसा उपाय बताइए जिससे प्राणियों को अकाल मृत्यु नो भोगनी पड़े। इस पर यमराज ने कहा- तुम उचित कहते हो। इसका एक रास्ता मैं बताता हूं।
यमदेव ने कहा कि जो प्राणी कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात में मेरा पूजन करके दीप माला से दक्षिण दिशा की ओर मुंह वाला दीपक जलाएगा, उसे कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। साथ ही दीपक जलाते समय उस जीव को जीवनभर धर्ममार्ग पर चलने का वचन भी देना होगा। जो ऐसा करेगा उसे कभी भी अकाल मृत्यु नहीं होगी। वह समस्त सुखों का उपभोग करने के उपरांत ही मृत्यु को प्राप्त होगा। मान्यता है कि तब से ही कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानी कि धनतेरस के दिन यमराज की पूजा का विधान शुरू हुआ।
पाँच दिन पाँच महापर्वो में पहला दिन 👇
"धनतेरस"
उत्तरी भारत में कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन यह पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जाता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धन्वन्तरी का जन्म हुआ था। इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है।
धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे, तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरी क्योंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं-कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनिया के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।
धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी प्रथा है। अगर सम्भव न हो तो कोई बर्तन खरीदें। इसके पीछे यह कारण माना जाता है, कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है, जो शीतलता प्रदान करता है, और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है, वह स्वस्थ है, सुखी है और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं, उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं।
धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आँगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे, जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई, तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा, उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दु:खी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहाँ किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी, और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये, और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।
विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया, और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुँचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे, उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परन्तु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे, उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की "हे यमराज ! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए ?" दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले, "हे दूत ! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है। इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूँ, सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।" यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।
धनवंतरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है। कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया। तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूँ तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान ली और भगवान विष्णु के साथ भूमंडल पर आ गयीं।
कुछ देर बाद एक जगह पर पहुँचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊँ तुम यहाँ ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए। लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं। उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।
एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो माँगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनन्द से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं।
विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इन्कार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है, यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठपूर्वक बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूँगा। तब लक्ष्मीजी ने कहा कि हे किसान तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूँ वैसा करो। कल तेरस है। तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सायंकाल मेरा पूजन करना और एक ताँबे के कलश में रुपए भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करूँगी। किन्तु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूँगी। इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊँगी। यह कहकर वह दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। इसी वजह से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी।
"पूजन विधि"
धनतेरस की पूजा दीपावली के पहले कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है साथ हीं यमराज के लिए घर के बाहर दीप जला कर रखा जाता है जिसे यम दीप कहते हैं। कहा जाता है की यमराज के लिए दीप जलने से अकाल मृत्यु का भय नष्ट हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन के बाद, धनवंतरी जी, अमृत के कलश हाथ मे धारणकिये हुए समुद्र से बाहर आए थे । इस कारण धनतेरस को धनवंतरी जयंती भी कहा जाता है। धनतेरस के इस शुभ दिन पर, देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है और प्रार्थना की जाती है कि भकजनों पर माँ हमेशा समृद्धि और सुख की वर्षा करते रहे । इस दिन भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की मूर्तियों भी बाजार से खरीदी जाती है जिसका पूजन दीवाली के दिन किया जाता है।
धनतेरस पूजा में सबसे पहले संध्या को यम दीप की पूजा की जाती है उसके बाद भगवान धन्वन्तरि की पूजा होती है और फिर गणेश लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
यम दीप पूजन विधि
चौकी को धो कर सुखा लें। उस चौकी के बीचोंबीच रोली घोल कर 卐(स्वास्तिक या सतिया) बनायें। अब इस 卐(स्वास्तिक या सतिया) पर सरसों तेल का दीपक (गेहूँ के आटे से बना हुआ) जलायें। उस दीपक में छेद वाली कौड़ी को डाल दें। अब दीपक के चारों ओर गंगा जल से तीन बार छींटा दें। अब हाथ में रोली लें और रोली से दीपक पर तिलक लगायें। अब रोली पर चावल लगायें। अब दीपक के अंदर थोड़ी चीनी/शक्कर डाल दें। अब एक रुपए का सिक्का दीपक के अंदर डाल दें। दीपक पर फूल समर्पित करें। सभी उपस्थित जन दीपक को हाथ जोड़कर प्रणाम करें - "हे यमदेव हमारे घर पे अपनी दयादृष्टि बनाये रखना और परिवार के सभी सदस्यों की रक्षा करना।" फिर सभी सदस्यों को तिलक लगाएँ। अब दीपक को उठा कर घर के मुख्य दरवाजे के बाहर दाहिनी ओर रख दे (दीपक का लौ दक्षिण दिशा की ओर होनी चाहिए)।
धन्वन्तरि पूजन विधि
यम दीप की पूजा के बाद धन्वन्तरि पूजा की जाती है।
अब पूजा घर में बैठ कर धूप, दीप (घी का दिया मिट्टी की दिये में), अक्षत, चंदन और नैवेद्य के द्वारा भगवान धन्वन्तरि का पूजन करें। पूजन के बाद धन्वन्तरि के मंत्र का 108 बार जप करें:- “ॐ धं धन्वन्तरये नमः”
जाप के पूर्ण करने के बाद दोनों हाथों को जोड़कर प्रार्थना करें कि - “हे भगवान धन्वन्तरि ये जाप मैं आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। कृप्या हमें उत्तम स्वास्थ प्रदान करे।“
धन्वन्तरि की पूजा हो जाने पर अंत में लक्ष्मीजी का घी का दीपक जला कर पूजन करें ताकि श्रीलक्ष्मीजी की कृपा अदृश्य रूप में आपके घर परिवार पर वर्षभर बनी रहे।
आवश्यक सामग्री
एक आटे का दीपक,तीन मिट्टी के दीपक (धन्वन्तरि, यम और लक्ष्मी जी के लिये), बत्ती रूई की, सरसों का तेल/घी, माचिस, एक छेद वाली कौड़ी, फूल, चावल, रोली, गंगाजल, चम्मच, चीनी/शक्कर, आसन, मिठाई/नैवैद्य, धूप और धूपदान तथा एक चौकी।
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