माघ मास माहात्म्य– चौदहवाँ अध्याय

माघ मास माहात्म्य, चौदहवाँ अध्याय, माघ स्नान की प्रशंसा


कार्तवीर्य बोले:– श्रेष्ठ व्रत का आचरण करने वाले हे ब्रह्मर्षि !  माघ मास के महान अद्भुत होने का क्या कारण है? इसे भली प्रकार वर्णन की करिये ।।१।। 

जो उन वैश्यों का एक माघ स्नान करने से सब पापों का विनाश हो गया और द्वितीय माघ स्नान करने से स्वर्ग की प्राप्ति हुई। इस कौतूहल के विषय में मुझको सम्यक रूप से वर्णन करिए।।२।। 

दत्तात्रेय जी बोले:– हे पुरुषोत्तम ! जल प्रभाव से ही से पवित्र, निर्मल, स्वच्छ, पाण्डु वर्ण, और दाह का नाश करने वाला और द्रावक है।।३।। 

सब प्राणियों को तारने वाला पोषण करने वाला और जीवन स्वरूप है और जल को सब वेदों में नारायण स्वरूप वर्णन किया गया है।।४।। 

जैसे सब ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा उत्तम है, इसी प्रकार संपूर्ण शुभ कर्मों करने के लिए माघ स्नान सबसे श्रेष्ठ है।।५।।

 माघ के महीने में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हो तब प्रभात समय गौ के खुर मात्र भी निर्मल जल में स्नान करने से पापियों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।।६।। 

हे राजन ! चराचर त्रिलोकी में यह योग बड़ा दुर्लभ है जो। असमर्थ है वह मनुष्य भी इस योग में केवल तीन ही दिन स्नान करें।।७।।

दरिद्रता दूर होने की कामना से जो यहाँ किंचित भी दान करता है वह दीर्घायु और धनी हो जाता है।।८।।

 जब सूर्य मकर राशि के ऊपर उपस्थित होता है, उस पुण्य काल में पाँच, सात, या दो ही दिन में, चंद्रमा के समान पुण्यफल की वृद्धि होती है कारण कि मकर मास अत्यंत पवित्र और मनुष्यों को पुण्य प्रदान करने वाला है।।९।। 

माघ मास की सभी तिथियाँ ऐसी हैं कि उसमें स्नान, दान आदि कर्म करने वाले व्यक्तियों के पापों का विनाश होता है और अक्षय मोक्ष पद की प्राप्ति होती है।।१०।।

 इसलिए जो मनुष्य अपने हित की कामना करता हो, उसे चाहिए कि माघ मास में नगर से बाहर स्नान करें। अब हम माघ स्नान करने की विधि का वर्णन करते हैं।।११।। 

माघ मास में श्रेष्ठ मनुष्यों को कोई ना कोई व्रत रूप नियम अवश्य धारण करना चाहिए, एवं प्रभूत  फल प्राप्त होने के निमित्त बुद्धिमान को कुछ ना कुछ भोज्य पदार्थ को त्याग देना चाहिए।।१२।।

विचारशील को चाहिये की भूमि के ऊपर शयन करे, घृत और तिलों का हवन करें, तथा सनातन श्री विष्णु भगवान की तीनों समय अर्चना करना चाहिए।।१३।।

 देवाधिदेव महादेव श्री विष्णु भगवान के निमित्त अखंड दीप का दान करना चाहिए। ईंधन, कंबल, वस्त्र, जूते, कुमकुम, और घृत ।।१४।।

 तेल, कपास, कोठी, तीसक, कनात, पर्दे और अन्य यह सब, हे राजन ! यथाशक्ति दान करना चाहिए।।१५।। 

हे राजन ! माघ स्नान में रत्ती भर भी स्वर्ण का दान करना भी समुद्र के समान अक्षय होता है।।१६।। 

हे नरनाथ ! दूसरे की अग्नि का सेवन न करें और दान लेने का परित्याग कर दें और माघ के अंत में यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराने।।१७।। 

अपने कल्याण की कामना से उन ब्राह्मणों को दक्षिणा दें तथा एकादशी को विधिपूर्वक माघ स्नान का उद्यापन करना चाहिये।।१८।। 

स्वर्ग प्राप्ति, अनंत पुण्य लाभ और श्री विष्णु भगवान की प्रसन्नता के निमित्त श्रद्धा पूर्वक उक्त कर्म करना चाहिये।।१९।।

हे गोविंद ! अविनाशी माधव माघ मास में मकर राशि के ऊपर सूर्य के उपस्थित होने पर जो हमें स्नान करते हैं, इसका यथोक्त फल हमें प्रदान करिए ।।२०।।

इस मंत्र उच्चारण करके मौन धारण पूर्वक चित्त को एकाग्र करके स्नान करना चाहिये और फिर वासुदेव हरी, कृष्ण तथा माधव का स्मरण करें ।।२१।।

जल पूर्ण घट को रात्रि में हवा में खुले स्थान में रखकर उसके जल से घर ही में स्नान किया जाये तो वह स्नान भी तीर्थ ही के समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।।२२।। 

फिर सब उपकरण सहित व्रत करके अन्न दान करना चाहिये। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को नर्क में नहीं जाना होता।। २३।।

 जो मनुष्य मकर के सूर्य में घर में ही तप्त जल से स्नान करते हैं, उनको छःवर्ष स्नान करने का फल उपलब्ध होता है।।२४।।

 और बावड़ी आदि के जल में नगर से बाहर स्नान करना बारह  वर्ष स्नान करने का फल प्रदान करता है। तालाब में स्नान करने के दूना और नदी में स्नान करने से चौगुना फल मिलता है ।।२५।।

देव सरोवरों में और नदियों में सौ गुना एवं हे राजन ! महानदी के संगम में स्नान करने से चारसौ गुना फल प्राप्त होता है।।२६।।

 अथवा हे राजन ! मकर के सूर्य में गंगा जी में स्नान मात्र करने से इन  सब से सहस्त्र गुना अधिक फल प्राप्त होता है।।२७।। 

हे नरनाथ ! जो व्यक्ति माघ मास में गंगा स्नान करते हैं, चार सहस्त्र युग पर्यन्त स्वर्ग से निपातित नहीं होते ।।२८।।

हे राजन ! जो मनुष्य माघ में गंगा स्नान करता है, मानो वह प्रतिदिन सहस्त्र पिरमित स्वर्ण मुद्रा दान करता है।।२९।। 

माघ मास में गंगा स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है। गंगा यमुना के संगम में स्नान करने से उससे, सौ गुना अधिक फल प्राप्त होता है, ऐसा मुनियों ने वर्णन किया है।।३०।। 

हे राजन ! प्रजा के हित में तत्पर होकर उस उनके प्रभुत्व पाप राशि का दाह करने के लिए ब्रह्मा जी ने प्रयागराज की सृष्टि की थी।।३१।। 

इस स्थान का सम्यकतया वर्णन सुनो, यहाँ के क्षेत्र श्वेत और कृष्ण वर्ण जल को ब्रह्मा जी ने पापी रूप पशुओं का नाश करने के लिए रचा था।।३२।। 

सैकड़ों पापों का आचरण करने वाला मनुष्य इस श्वेत वर्ण जल में माघ मास और मकर के सूर्य में स्नान करें तो उसे गर्भ में निमग्न नहीं होना होता।।३३।। 

पांच प्रकार की हिंसा करने वाला मनुष्य नर व्याघ्र भी प्रयाग में स्नान करने से हे राजन वह परम पद पाता है।।३४।। 

श्वेत और कृष्ण जल की धारा को जिसके गर्भ में सरस्वती हैं, सृष्टि करता ब्रह्मा जी ने उसी को विष्णु लोक जाने के लिए मार्ग के रूप में निर्माण किया है।।३५।।

 हे नरपाल ! वैष्णवी माया बड़ी दुस्तर है, देवता भी उससे बच नहीं सकते, परंतु माघ मास में प्रयाग के बीच वह भस्म हो जाती है।।३६।। 

जो मनुष्य माघ मास में प्रयाग में स्नान करते हैं, वह तेजोमय लोगों में अनेक प्रकार के भोगों का उपभोग कर के अंत में भगवान में विलीन हो जाते हैं।।३७।। 

माघ मास और मकर के सूर्य में जो प्राणी प्रयाग में गंगा यमुना का स्पर्श करता है, उसके पुण्यों की संख्या करने के ज्ञान को तो चित्रगुप्त भी पूर्णतया नहीं रखते हैं।।३८।। 

जो मकर के सूर्य युक्त माघ मास में प्रयाग में स्नान करें तो उसके पुण्य का माहात्म्य में ब्रह्मा भी ब्रह्मा भी कथन नहीं कर सकते।।३९।। 

एक सौ वर्ष पर्यंत निराहार व्रत धारण करने का जो फल होता है, माघ मास में प्रयाग में केवल तीन दिन ही दिन स्नान करने से उस फल की प्राप्ति हो जाती है।।४०।।

सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में सहस्त्र भार स्वर्ण दान करने से जिस पुण्य का लाभ होता है, माघ मास में त्रिवेणी में प्रतिदिन स्नान करने से भी उसी फल की प्राप्ति होती है।।४१।। 

हे राजन ! माघ मास में गंगा यमुना के संगम में स्नान करने से सहस्त्र राजसूर्य यज्ञ के अविकल फल की प्राप्ति होती है।।४२।।

हे नृपश्रेष्ठ ! भूमि के ऊपर जितने तीर्थ और सप्तपुरियाँ हैं, वे सब माघ मास में त्रिवेणी जी में स्नान करने को आते हैं।।४३।। 

पापियों के संसर्ग जन्य दोष से सब तीर्थों का वर्ण कृष्ण हो जाता है, फिर माघ स्नान में करने से ही उन्हें शुक्ल वर्ण की प्राप्ति होती है।।४४।। 

जो मनुष्य प्रयागराज में तीन दिन भी स्नान कर लेता है, उसके कल्प भर के जन्मों के संचित पाप विनष्ट हो जाते हैं।।४५।। 

जैसे सर्प अपनी पुरानी केंचुली को छोड़ देता है, उसी प्रकार माघ मास में तीन दिन स्नान करने वाला मनुष्य पापों का परित्याग करके स्वर्ग को चला जाता है ।।४६–४७।।

 गंगा जी में चाहे जहाँ स्नान किया जाए, उसको कुरुक्षेत्र के समान पुण्य प्रद माना गया है और उससे दस गुना फल विंध्य पर्वत से संगत हुई गंगा स्नान का होता है।। ४८।। 

और काशी में उत्तरवाहिनी गंगा का स्नान उसकी अपेक्षा शत गुना अधिक है।।४९।। 

और गंगा यमुना के संगम में काशी की अपेक्षा शत गुना अधिक है और पश्चिम वाहिनी गंगा उन सब से सहस्र गुना अधिक फल देने वाली है। हे राजन ! उनके केवल दर्शन मात्र से ही करने से ब्रह्महत्या जनित पापों का अपहरण हो जाता है।।५०।।

जहाँ पश्चिम वाहिनी गंगा यमुना से मिलती है, हे राजन ! उस दुर्लभ स्नान की यदि माघ मास में प्राप्ति हो जाये, तो करोड़ों पापों का नाश हो जाता है ।।५१।।

हे राजन भूमि के ऊपर त्रिवेणी को ही अमृत कहना चाहिये। माघ मास में मुहूर्त मात्र के लिए भी उसकी प्राप्ति देवताओं को भी दुर्लभ है।।५२।। 

ब्रह्मा, विष्णु, महेश, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण, गंधर्व, लोकपाल, यक्ष, किन्नर, सर्प ।।५३।। 

अणिमा आदि गुणों सहित सिद्ध गण एवं अन्यान्य तत्वादि तथा ब्राह्मण, पार्वती, लक्ष्मी,  इंद्राणी, मैना, अदिति और ज्योति।।५४।।

 हे राजन ! समस्त देव पत्नियाँ तथा नाग पत्नियाँ, घृताची, मेनका रंभा, उर्वशी, तिलोत्तमा।।५५।।

इत्यादि अप्सराओं के समुदाय और पितृगण माघ मास में त्रिवेणी में स्नान करने को आते हैं।।५६।।

 सतयुग में अपने स्वरूप से और कलयुग में प्रच्छन्न रूप से आते हैं। प्रयाग में माघ स्नान में जो तीन दिन स्नान का फल है।।५७।।

 वह फल सहस्त्र अश्वमेध से भी प्राप्त नहीं होता है। पहले कांचन–मालिनी ने माघ मास में केवल तीन ही दिन का फल राक्षस को दिया था, उससे वह पापात्मा मुक्त हुआ।।५८।।

 ।।इस प्रकार श्रीपदमपुरण उत्तर खंड में माघ मास के अंतर्गत माघ स्नान की प्रशंसा नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त।।१४।।

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