माघ मास माहात्म्य– बारहवाँ अध्याय
माघ मास माहात्म्य, बारहवाँ अध्याय, यमदूत द्वारा विकुण्डल को द्वादशाक्षर मंत्र, अष्टाक्षर मंत्र, शालीग्राम शिला, एकादशी व्रत तथा विभिन्न प्रकार के दानों की महिमा का वर्णन
यमदूत बोले :– हे वैश्य श्रेष्ठ ! धर्म सम्मत और संपूर्ण लोकों को अमृत लाभ कराने वाले इस अद्भुत रहस्य को तुम सुनो ।।१।।
जो मनुष्य विष्णु भगवान की भक्ति का आचरण करते हैं वे लोग यमराज के तथा घोर वाले उसके सब दूतों अथवा किसी यमदूत के दर्शन नहीं करते हैं, यह बात मैं बिल्कुल सत्य कहता हूं ।।२।।
यमुना भ्राता यमराज जी बारंबार हमसे यही कहते हैं कि – तुम लोग वैष्णवों को मत पकड़ना, कारण कि मैं उन्हें देख तक नहीं सकता हूँ ।।३।।
हे दूतों ! जो मनुष्य किसी कारण से एक बार भी विष्णु भगवान का स्मरण कर ले करते हैं, उनके समस्त पाप समूह का विनाश हो जाता है। सुतराम उनको विष्णु भगवान के परमपद मोक्ष की प्राप्ति होती है ।।४।।
जो मनुष्य विष्णु भगवान का भजन करते हैं करता है, वह दुराचारी, दुःशील और सदैव पापाचारण में निरत ही क्यों न हो तथापि तुम्हें उसका सर्वदा ही परित्याग कर देना चाहिए ।।५।।
जिस घर में वैष्णव लोग भजन करते हैं, उनको वैष्णव के संसर्ग का लाभ होता है ।।६।।
अतः तुम तुम्हें उनका भी परित्याग कर देना चाहिए। है वैश्य ! यमराज जी इस प्रकार सदैव हम लोगों को निर्देश करते रहते हैं, उनका यही कारण है कि वैष्णव को यमराज की राजधानी में नहीं जाना होता है ।।७।।
हे वैश्य ! जो पापाचारण करने वाले मनुष्य हैं, उनके संसार सागर से उद्धार हेतु विष्णु भक्ति को छोड़कर अन्य कोई उपाय है कि नहीं ।।८।।
जो ब्राह्मण विष्णु के भक्त नहीं हैं, उनको सांसारिक जन स्वपच (चांडाल) के समान अवलोकन करते हैं और वैष्णव यदि नीच वर्ण का हो तथापि वह तीनों लोगों को पवित्र कर सकता है ।।९।।
पितृपक्ष और मातृपक्ष के पूर्वज जो चिरकाल के नर्क में निपतित हैं जब उनके कुल के पुत्र विष्णु भगवान का पूजन करते हैं तभी वे लोग स्वर्ग को चले जाते हैं ।।१०।।
जो मनुष्य वैष्णव के दास हैं और जो वैष्णव के अन्य का भोजन करते हैं, उन पुरुषों को कभी भी अवश्य ही देवताओं के उत्तम गति का लाभ होता है ।। ११।।
मनुष्य यदि अपने समस्त पापों से मुक्त होना चाहें तो उनको चाहिए कि, वैष्णव ही के अन्न की याचना करें और यदि उनको अन्न न मिले मिल सके तो केवल जल ही पीकर रह जाएं ।।१२।।
जो मनुष्य "गोविंदाय नमो नमः" इस मंत्र का जाप करता हुआ अपने प्राण परित्याग करता है तो उसे यमराज के दर्शन नहीं होते और ना हम ही उसका अवलोकन कर सकते हैं ।।१३।।
जो मनुष्य अंगन्यास, ऋषि, छंद और देवता सहित "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" इस द्वादश अक्षर मंत्र का जाप करता करते हैं ।।१४।।
अथवा जो नरोत्तम समस्त मंत्रों के अधीश्वर स्वरूप "ॐ नमो नारायणाय" इस अष्टाक्षर मंत्र का जाप करते हैं, वे स्वयं वैष्णव हो जाते हैं, अतएव उनके दर्शन करने से ब्रह्मघात करने वाले को भी शुद्धि हो जाती है ।।१५।।
और वे लोग शंख, चक्र धारण कर वनमाला से सुसज्जित होकर विष्णु रूप से ही विष्णु लोक में ब्रह्मा जी की आयु पर्यंत निवास करते हैं ।।१७।।
हृदय, सूर्य, जल, प्रतिमा अथवा स्थण्डिल में जो मनुष्य नारायण की पूजा करते हैं, उन्हें भी वैष्णव पद की प्राप्ति होती है ।।१७।।
अथवा मोक्ष की अभिलाषा करने वाले प्राणियों को शालिग्राम शिला में गोमती चक्र में श्री विष्णु भगवान की पूजा अवश्य ही करनी चाहिये ।।१८।।
क्योंकि वह श्री विष्णु भगवान का निवास स्थान संपूर्ण पापों का नाश करने वाला है अथवा वह सभी को मुक्ति भी देता है ।।१९।।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला में विष्णु भगवान का पूजन करते हैं, मानो वे लोग प्रतिदिन सहस्त्रों राजसूर्य यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं ।।२०।
ज्ञान द्वारा जान लेने के योग्य अविनाशी परब्रह्म को जानने पर जो पुण्य फल प्राप्त होता है, शालिग्राम शिला का पूजन करने से भी उसी फल की प्राप्ति हो जाती है ।। २१।।
जैसे काष्ठ में अग्नि व्याप्त है, और यथा स्थान में उसका प्रदुर्भाव हो जाता है, ऐसे ही यद्यपि भगवान सर्वव्यापक हैं तथापि शालिग्राम शिला में उनका प्रकाश प्रगट होता है।।२२।।
जिन्होंने नरक पापों का आचरण किया है, जिनको शुभ कार्यों का अनुष्ठान करने का अधिकार नही है, ऐसे व्यक्ति भी यदि शालिग्राम शिला की अर्चना करें तो हे वैश्य ! उन्हें यमलोक में जाना नही होता ।।२३।।
श्री विष्णु भगवान बैकुंठ लोक में लक्ष्मी जी के साथ रमण करने से ही ऐसे प्रमुदित नहीं होते, जैसे शालिग्राम और गोमती चक्र में रमण करने से होते हैं।।२४।।
जिस मनुष्य ने शालिग्राम में भगवान का पूजन कर लिया, उसको मानो अग्निहोत्री का आचरण और सागर पर्यंत भूमि का दान कर दिया।।२५।।
जो मनुष्य एक बार भी शालिग्राम शिला की पूजन करता है उसके सब पाप इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य उदय होने पर अंधकार का नाश हो जाता है।। २६।।
हे वैश्य ! शालिग्राम की बारह शिलाओं का जिस व्यक्ति ने पूजन कर लिया हो, अब हम उसके पुण्य को तुम्हारे प्रति वर्णन करते हैं, तुम श्रवण करों ।।२७।।
स्वर्ण निर्मित कमलों के द्वारा बारह कल्प पर्यंत द्वादश लिंग की पूजन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल बारह शालिग्राम शिलाओं का पूजन करने से एक दिन में प्राप्त हो जाता है।।२८।।
और जो व्यक्ति भाव पूर्वक शालिग्राम की शिलाओं की अर्चन करते हैं, वह बैकुंठ धाम में निवास करने के अनन्तर इस लोक में चक्रवर्ती राजा होते हैं।। २९।।
कामी, क्रोधी, अथवा लोभी पुरुष भी यदि शालिग्राम शिला का पूजन करें तो उसे भी हरीलोक की प्राप्ति होती है।।३०।।
जो मनुष्य शालिग्राम शिला में गोविंद भगवान की पूजा करते हैं, प्रलय पर्यंत उसे अधोगति की प्राप्ति नहीं होती।।३१।।
जो नरोत्तम व्यक्ति शालिग्राम शिला की पूजा करते हैं, वे चाहे तीर्थयात्रा न भी करे चाहे वे दान अथवा यज्ञ अनुष्ठान न भी करें एवं उन्हें चाहे इस बात का भी ज्ञान भी न हो तथापि उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।।३२।।
शालिग्राम शिला में श्री विष्णु भगवान की पूजा करने वाले पापी मनुष्य का न तो नरक में निवास होता है और न कीट–पतंग आदि कि कुत्सित योनि ही में जन्म होता है।।३३।।
दीक्षा विधि और मंत्र को जानने वाला जो मनुष्य बली पूजन करता है, उनको वैष्णव धाम की प्राप्ति होती है हमारा यह कथन बिल्कुल सत्य है।।३४।।
जल में अभिषेक करता है, मानव वह सब तीर्थों में स्नान करता है और सभी यज्ञों में दीक्षित होता है ।।३५।।
गोदावरी, गंगा और रेवा आदि जितनी मोक्ष दायनी नदियां हैं वे सब तीर्थों सहित शालिग्राम शिला के जल में निवास करती हैं।।३६।।
गान आदि के द्वारा शालिग्राम शिला का पूजन करते हैं वे सहस्त्रों करोड़ कल्प पर्यन्त भगवान के निकट क्रीड़ा करते हैं ।।३७–३८।।
करोडों शिवलिंगों के दर्शन, पूजन अथवा स्तुति से जिस फल की प्राप्ति होती है, शालिग्राम की एक ही शिला का पूजन करने से उस फल का लाभ हो जाता है।।३९।।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला जनित लिंग में एक बार भी अर्चना करतें करते हैं वह चाहे अध्यात्म ज्ञान से रहित हो तो भी उनकी मुक्ति हो जाती है।।४०।।
जहाँ शालिग्राम शिला रूप से विराजमान रहते हैं। वहाँ ही संपूर्ण यज्ञ, देवता, सिद्ध और चौदह भुवन निवास करते हैं।।४१।।
पुरुष शालिग्राम जी की शिला के अगाड़ी श्राद्ध करता है उसके पितृ तृप्त होकर सौ कल्प पर्यंत स्वर्ग लोक में निवास करते हैं।।४२।।
इसलिए जो मनुष्य शालिग्राम शिला का जलपान करते हैं, उन्हें सहस्त्रों बार पंचगव्य प्रशान करने से क्या प्रयोजन है अर्थात सहस्त्रों पंचगव्य का भी आचमन करने से जो मनुष्य जो पूण्य प्राप्त होता है वही पुण्य शालिग्राम शिला का जल पान करने से भी होता है ।।४३।।
जिस स्थान में शालिग्राम शिला स्थित रहती है, तीन कोस पर्यंत वह स्थान तीर्थ के समान समझा जाता है, वहाँ दान अथवा होम जो कुछ भी किया जाये सब करोड़ों गुना अधिक पुण्य दाई होता है।।४४।।
शालिग्राम शिला का जल एवं गोमती चक्र का जल इन दोनों को मिलाकर जो व्यक्ति पान करता है अथवा सिर के ऊपर धारण करता है।।४५।।
उसका देह निसंदेह चक्र अंकित हो जाता है और वह चिन्ह गुप्त रहता है, इसलिए धर्मराज के अतिरिक्त उसके दर्शन अन्य किसी को नहीं होते ।।४६।।
यमराज हरि भक्तों के चरणोदक से भयभीत रहते हैं। अतएव उन्हेंने वैष्णव भक्तों के घरों में जाने का अपने दूतों को निषेध कर दिया है।।४७।।
जो नदियाँ समुद्रगामिनी नहीं है, माघ मास में उन में स्नान करने से त्रिरात्र के फल की प्राप्ति होती है। समुद्रगामिनी नदियों में स्नान करने से एक पक्ष और समुद्र ही में स्नान करने से एक मास के फल का लाभ होता है।।४८।।
गोदावरी में स्नान करने से छः मास और भागीरथी में स्नान करने से एक वर्ष के फल की उपलब्धि होती है। अथवा भगवान का चरणों तक बारह वर्ष माघ स्नान के फल को देता है।।४९।।
यदि माघ मास में स्नान करने के लिए शालिग्राम शिला का पवित्र जल प्राप्त हो जाए तो सहस्त्रों एवं करोड़ों तीर्थों की सेवा करने से भी कोई प्रयोजन नहीं।।५०।।
जो मनुष्य माता के दूध में मिलाकर एक बिंदु मात्र भी शालिग्राम शिला का जलपान करते हैं, उसका मोक्ष हो जाता है।।५१।।
शालिग्राम शिला के निकट एक कोस पर्यंत कोई कीट (कीड़ा) भी मृतक हो जाए तो अवश्य ही बैकुंठ लोक को जाता है।।५२।।
जो मनुष्य शालिग्राम शिला का दान करता है, उसे पर्वत और गहन वन सहित भूमंडल के दान करने का फल उपलब्ध होता है।।५३।।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला का मूल्य लगाता है, और बेचता अथवा विक्रय का अनुमोदन करता है, किंवा जो उसकी परीक्षा का अनुमोदन करता है।।५४।।
वे सभी प्रलय पर्यन्त नरक में निवास करते हैं। अतएव हे वैश्य! चक्र का क्रय-विक्रय नहीं करना चाहिए।।५५।।
विशेष कहने से क्या लाभ ?हे वैश्य! पापों से डरने वाले मनुष्य को श्री वासुदेव भगवान का स्मरण करना चाहिये, क्योंकि हरि स्मरण समस्त पापों को हरने वाला है।।५६।।
इंद्रिय निग्रह पूर्वक वन में घोर तप करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, हरि स्मरण करने से उसी फल का लाभ होता है।।५७।।
अज्ञान के वशीभूत हो बहुत प्रकार के पाप का आचरण करने वाला मनुष्य भी यदि पापों के अपहरण करने वाले नारायण को प्रणाम करें तो उसे नर्क में नहीं जाना पड़ता।।५८।।
पृथ्वी के ऊपर जितने तीर्थ अथवा पवित्र स्थान हैं, श्री विष्णु भगवान के नामों का कीर्तन करने से उसे सबके फल की प्राप्ति हो जाती है ।।५९।।
शार्ङगपाणी शरणागत वत्सल श्री विष्णु भगवान के की शरण में जो व्यक्ति जाते हैं, उन्हें न तो यमराज के निकट जाना होता है और न नरक में निवास ही करना पड़ता है।।६०।।
हे वैश्य! जो वैष्णव पुरुष महादेव जी की निंदा करते हैं, वह विष्णु लोक को नहीं जाता, किंतु अवश्य ही नरकगामी होता है।।६१।।
जो मनुष्य प्रसंग वश भी चाहे किसी एक ही एकादशी का व्रत धारण करता है, उनको उसको यम यातना नहीं भोगनी होती। हमने यमराज ही से ऐसा सुना है कि।।६२।।
यह एकादशी का दिन जैसे पापों का नाश करने वाला है, त्रिलोकी में ऐसा पवित्र करने वाला और कोई भी नहीं है।।६३।।
हे वैश्य राज ! जब तक प्राणी विष्णु भगवान के शुभ दिन एकादशी का व्रत धारण नहीं करता है, तभी तक उसके देह में पापों का निवास रहता है।।६४।।
सहस्त्रों अश्वमेघ और सैकड़ों राज सूर्य यज्ञ एकादशी व्रत की सोलहवीं कला की भी बराबरी नहीं कर सकते।।६५।।
हे वैश्य ! ग्यारह हो इंद्रियों के द्वारा किए हुए मनुष्य के सब पाप एकादशी का व्रत करने से निश्चय ही विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।। ६६।।
एकादशी के व्रत के समान लोक में और कुछ भी पुण्य पवित्र नहीं है, जो किसी निम्मित से भी एकादशी का व्रत का आचरण करते हैं, उन्हें यम यातना नहीं भोगनी पड़ती।।६७।।
यह एकादशी संपूर्ण भागों को देने वाली है, शरीर को निरोग रखने वाली, उत्तम स्त्री और दीर्घ जीवी पुत्र को देने वाली है।।६८।।
हे वैश्य! क्या गंगा, क्या काशी, क्या गया, क्या पुष्कर, क्या कुरुक्षेत्र, क्या रेवा और क्या वेणिका ।।६९।।
क्या यमुना, क्या चंद्रभागा, इसमें से कोई भी एकादशी के समान पवित्र नहीं है, कारण कि इसके द्वारा अनायास बिना परिश्रम ही विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।।७०।।
जो मनुष्य एकादशी के दिन उपवास कर रात्रि में जागरण करता है, वह मातृ, पितृपक्ष के दस ।।७१।।
और पत्नी के पक्ष के भी दस पूर्वजों का अवश्य ही उद्धार करता है और वह समस्त पूर्वज, समस्त संघ से मुक्त होकर गरुड़ जी के ऊपर अरुण हो।।७२।।
माला और पीतांबर धारण कर नारायण के लोक में जाते हैं। हे वैश्य! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में चाहे जब एकादशी का व्रत किया जाए।।७३।।
एकादशी उपवास कर के महा पापी भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। तीन रात्रि पर्यंत व्रत का आचरण और तीर्थों में स्नान करके।। ७४।।
स्वर्ण, तिल, और गौ दान करने से मनुष्यों को स्वर्ग की गति का लाभ होता है। हे वैश्य ! जो प्राणी तीर्थ में स्नान नहीं करते, जो स्वर्ण का दान नहीं करते।।७५।।
और जिन्होंने तप का भी कुछ आचरण नहीं किया है, वे सर्वत्र ही दुःखित होते हैं। नर्क से बचने वाले धर्म को संक्षेप रीति से तुम्हारे प्रति वर्णन करता हूँ।।७६।।
वाणी मन और शरीर के द्वारा किसी प्राणी के साथ द्रोह न करें, इंद्रियों का निग्रह रखें, दान दें और हरी की सेवा करें।।७७।।
चारों वर्णों और चारों आश्रमों के मनुष्यों को इन धर्मों का सदैव विधि पूर्वक पालन करना चाहिए, हे वैश्य ! स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा वाले प्राणी को तप और दान का आचरण सर्वदा करना चाहिए करना कर्तव्य है।।७८।।
जो व्यक्ति अपने हित की इच्छा करता हो, उसी यथाशक्ति जूता, छत्र, वस्त्र, अन्न,मूल, फल अथवा जल इसका दान अवश्य करना चाहिए ।।७९।।
दरिद्र मनुष्य तो ऐसा नहीं कर सकते, किंतु समर्थन को चाहिये कि बिना दान किये दिन को खाली ना जाने दें, कारण कि इस लोक अथवा परलोक में बिना दिए कुछ भी प्राप्त नहीं होता।।८०।।
ऐसा मानकर अपनी शक्ति के अनुसार सदैव दान करना कर्तव्य है, क्योंकि दान करने वालों को यम यात्रा अवलोकन नहीं करना होता।।८१।।
दानी लोग बारंबार दीर्घायु और धनाढ्य होते हैं, विशेष कहने से क्या होता है। अधर्म करने वालों को दुर्गति की प्राप्ति होती है।।८२।।
धर्म के आधार से मनुष्य सदा स्वर्गारोहण करता है। अतएव बचपन से ही धर्म का संग्रह करना चाहिये ।।८३।।
यह सब वृत्तांत हमने तुम्हारी प्रति प्रति वर्णन किया, अब और क्या श्रवण करना करने की तुम्हारी इच्छा है ।।८४।।
।। इस प्रकार श्री पद्म पुराण के अंतर्गत उत्तरखंड में माघ मास महत्त्व के अंतर्गत यमदूत द्वारा विकुण्डल को द्वादशाक्षर मंत्र, अष्टाक्षर मंत्र, शालीग्राम शिला, एकादशी व्रत तथा विभिन्न प्रकार के दानों की महिमा का वर्णन नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।।१२।।
जो मनुष्य विष्णु भगवान की भक्ति का आचरण करते हैं वे लोग यमराज के तथा घोर वाले उसके सब दूतों अथवा किसी यमदूत के दर्शन नहीं करते हैं, यह बात मैं बिल्कुल सत्य कहता हूं ।।२।।
यमुना भ्राता यमराज जी बारंबार हमसे यही कहते हैं कि – तुम लोग वैष्णवों को मत पकड़ना, कारण कि मैं उन्हें देख तक नहीं सकता हूँ ।।३।।
हे दूतों ! जो मनुष्य किसी कारण से एक बार भी विष्णु भगवान का स्मरण कर ले करते हैं, उनके समस्त पाप समूह का विनाश हो जाता है। सुतराम उनको विष्णु भगवान के परमपद मोक्ष की प्राप्ति होती है ।।४।।
जो मनुष्य विष्णु भगवान का भजन करते हैं करता है, वह दुराचारी, दुःशील और सदैव पापाचारण में निरत ही क्यों न हो तथापि तुम्हें उसका सर्वदा ही परित्याग कर देना चाहिए ।।५।।
जिस घर में वैष्णव लोग भजन करते हैं, उनको वैष्णव के संसर्ग का लाभ होता है ।।६।।
अतः तुम तुम्हें उनका भी परित्याग कर देना चाहिए। है वैश्य ! यमराज जी इस प्रकार सदैव हम लोगों को निर्देश करते रहते हैं, उनका यही कारण है कि वैष्णव को यमराज की राजधानी में नहीं जाना होता है ।।७।।
हे वैश्य ! जो पापाचारण करने वाले मनुष्य हैं, उनके संसार सागर से उद्धार हेतु विष्णु भक्ति को छोड़कर अन्य कोई उपाय है कि नहीं ।।८।।
जो ब्राह्मण विष्णु के भक्त नहीं हैं, उनको सांसारिक जन स्वपच (चांडाल) के समान अवलोकन करते हैं और वैष्णव यदि नीच वर्ण का हो तथापि वह तीनों लोगों को पवित्र कर सकता है ।।९।।
पितृपक्ष और मातृपक्ष के पूर्वज जो चिरकाल के नर्क में निपतित हैं जब उनके कुल के पुत्र विष्णु भगवान का पूजन करते हैं तभी वे लोग स्वर्ग को चले जाते हैं ।।१०।।
जो मनुष्य वैष्णव के दास हैं और जो वैष्णव के अन्य का भोजन करते हैं, उन पुरुषों को कभी भी अवश्य ही देवताओं के उत्तम गति का लाभ होता है ।। ११।।
मनुष्य यदि अपने समस्त पापों से मुक्त होना चाहें तो उनको चाहिए कि, वैष्णव ही के अन्न की याचना करें और यदि उनको अन्न न मिले मिल सके तो केवल जल ही पीकर रह जाएं ।।१२।।
जो मनुष्य "गोविंदाय नमो नमः" इस मंत्र का जाप करता हुआ अपने प्राण परित्याग करता है तो उसे यमराज के दर्शन नहीं होते और ना हम ही उसका अवलोकन कर सकते हैं ।।१३।।
जो मनुष्य अंगन्यास, ऋषि, छंद और देवता सहित "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" इस द्वादश अक्षर मंत्र का जाप करता करते हैं ।।१४।।
अथवा जो नरोत्तम समस्त मंत्रों के अधीश्वर स्वरूप "ॐ नमो नारायणाय" इस अष्टाक्षर मंत्र का जाप करते हैं, वे स्वयं वैष्णव हो जाते हैं, अतएव उनके दर्शन करने से ब्रह्मघात करने वाले को भी शुद्धि हो जाती है ।।१५।।
और वे लोग शंख, चक्र धारण कर वनमाला से सुसज्जित होकर विष्णु रूप से ही विष्णु लोक में ब्रह्मा जी की आयु पर्यंत निवास करते हैं ।।१७।।
हृदय, सूर्य, जल, प्रतिमा अथवा स्थण्डिल में जो मनुष्य नारायण की पूजा करते हैं, उन्हें भी वैष्णव पद की प्राप्ति होती है ।।१७।।
अथवा मोक्ष की अभिलाषा करने वाले प्राणियों को शालिग्राम शिला में गोमती चक्र में श्री विष्णु भगवान की पूजा अवश्य ही करनी चाहिये ।।१८।।
क्योंकि वह श्री विष्णु भगवान का निवास स्थान संपूर्ण पापों का नाश करने वाला है अथवा वह सभी को मुक्ति भी देता है ।।१९।।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला में विष्णु भगवान का पूजन करते हैं, मानो वे लोग प्रतिदिन सहस्त्रों राजसूर्य यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं ।।२०।
ज्ञान द्वारा जान लेने के योग्य अविनाशी परब्रह्म को जानने पर जो पुण्य फल प्राप्त होता है, शालिग्राम शिला का पूजन करने से भी उसी फल की प्राप्ति हो जाती है ।। २१।।
जैसे काष्ठ में अग्नि व्याप्त है, और यथा स्थान में उसका प्रदुर्भाव हो जाता है, ऐसे ही यद्यपि भगवान सर्वव्यापक हैं तथापि शालिग्राम शिला में उनका प्रकाश प्रगट होता है।।२२।।
जिन्होंने नरक पापों का आचरण किया है, जिनको शुभ कार्यों का अनुष्ठान करने का अधिकार नही है, ऐसे व्यक्ति भी यदि शालिग्राम शिला की अर्चना करें तो हे वैश्य ! उन्हें यमलोक में जाना नही होता ।।२३।।
श्री विष्णु भगवान बैकुंठ लोक में लक्ष्मी जी के साथ रमण करने से ही ऐसे प्रमुदित नहीं होते, जैसे शालिग्राम और गोमती चक्र में रमण करने से होते हैं।।२४।।
जिस मनुष्य ने शालिग्राम में भगवान का पूजन कर लिया, उसको मानो अग्निहोत्री का आचरण और सागर पर्यंत भूमि का दान कर दिया।।२५।।
जो मनुष्य एक बार भी शालिग्राम शिला की पूजन करता है उसके सब पाप इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य उदय होने पर अंधकार का नाश हो जाता है।। २६।।
हे वैश्य ! शालिग्राम की बारह शिलाओं का जिस व्यक्ति ने पूजन कर लिया हो, अब हम उसके पुण्य को तुम्हारे प्रति वर्णन करते हैं, तुम श्रवण करों ।।२७।।
स्वर्ण निर्मित कमलों के द्वारा बारह कल्प पर्यंत द्वादश लिंग की पूजन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल बारह शालिग्राम शिलाओं का पूजन करने से एक दिन में प्राप्त हो जाता है।।२८।।
और जो व्यक्ति भाव पूर्वक शालिग्राम की शिलाओं की अर्चन करते हैं, वह बैकुंठ धाम में निवास करने के अनन्तर इस लोक में चक्रवर्ती राजा होते हैं।। २९।।
कामी, क्रोधी, अथवा लोभी पुरुष भी यदि शालिग्राम शिला का पूजन करें तो उसे भी हरीलोक की प्राप्ति होती है।।३०।।
जो मनुष्य शालिग्राम शिला में गोविंद भगवान की पूजा करते हैं, प्रलय पर्यंत उसे अधोगति की प्राप्ति नहीं होती।।३१।।
जो नरोत्तम व्यक्ति शालिग्राम शिला की पूजा करते हैं, वे चाहे तीर्थयात्रा न भी करे चाहे वे दान अथवा यज्ञ अनुष्ठान न भी करें एवं उन्हें चाहे इस बात का भी ज्ञान भी न हो तथापि उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।।३२।।
शालिग्राम शिला में श्री विष्णु भगवान की पूजा करने वाले पापी मनुष्य का न तो नरक में निवास होता है और न कीट–पतंग आदि कि कुत्सित योनि ही में जन्म होता है।।३३।।
दीक्षा विधि और मंत्र को जानने वाला जो मनुष्य बली पूजन करता है, उनको वैष्णव धाम की प्राप्ति होती है हमारा यह कथन बिल्कुल सत्य है।।३४।।
जल में अभिषेक करता है, मानव वह सब तीर्थों में स्नान करता है और सभी यज्ञों में दीक्षित होता है ।।३५।।
गोदावरी, गंगा और रेवा आदि जितनी मोक्ष दायनी नदियां हैं वे सब तीर्थों सहित शालिग्राम शिला के जल में निवास करती हैं।।३६।।
गान आदि के द्वारा शालिग्राम शिला का पूजन करते हैं वे सहस्त्रों करोड़ कल्प पर्यन्त भगवान के निकट क्रीड़ा करते हैं ।।३७–३८।।
करोडों शिवलिंगों के दर्शन, पूजन अथवा स्तुति से जिस फल की प्राप्ति होती है, शालिग्राम की एक ही शिला का पूजन करने से उस फल का लाभ हो जाता है।।३९।।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला जनित लिंग में एक बार भी अर्चना करतें करते हैं वह चाहे अध्यात्म ज्ञान से रहित हो तो भी उनकी मुक्ति हो जाती है।।४०।।
जहाँ शालिग्राम शिला रूप से विराजमान रहते हैं। वहाँ ही संपूर्ण यज्ञ, देवता, सिद्ध और चौदह भुवन निवास करते हैं।।४१।।
पुरुष शालिग्राम जी की शिला के अगाड़ी श्राद्ध करता है उसके पितृ तृप्त होकर सौ कल्प पर्यंत स्वर्ग लोक में निवास करते हैं।।४२।।
इसलिए जो मनुष्य शालिग्राम शिला का जलपान करते हैं, उन्हें सहस्त्रों बार पंचगव्य प्रशान करने से क्या प्रयोजन है अर्थात सहस्त्रों पंचगव्य का भी आचमन करने से जो मनुष्य जो पूण्य प्राप्त होता है वही पुण्य शालिग्राम शिला का जल पान करने से भी होता है ।।४३।।
जिस स्थान में शालिग्राम शिला स्थित रहती है, तीन कोस पर्यंत वह स्थान तीर्थ के समान समझा जाता है, वहाँ दान अथवा होम जो कुछ भी किया जाये सब करोड़ों गुना अधिक पुण्य दाई होता है।।४४।।
शालिग्राम शिला का जल एवं गोमती चक्र का जल इन दोनों को मिलाकर जो व्यक्ति पान करता है अथवा सिर के ऊपर धारण करता है।।४५।।
उसका देह निसंदेह चक्र अंकित हो जाता है और वह चिन्ह गुप्त रहता है, इसलिए धर्मराज के अतिरिक्त उसके दर्शन अन्य किसी को नहीं होते ।।४६।।
यमराज हरि भक्तों के चरणोदक से भयभीत रहते हैं। अतएव उन्हेंने वैष्णव भक्तों के घरों में जाने का अपने दूतों को निषेध कर दिया है।।४७।।
जो नदियाँ समुद्रगामिनी नहीं है, माघ मास में उन में स्नान करने से त्रिरात्र के फल की प्राप्ति होती है। समुद्रगामिनी नदियों में स्नान करने से एक पक्ष और समुद्र ही में स्नान करने से एक मास के फल का लाभ होता है।।४८।।
गोदावरी में स्नान करने से छः मास और भागीरथी में स्नान करने से एक वर्ष के फल की उपलब्धि होती है। अथवा भगवान का चरणों तक बारह वर्ष माघ स्नान के फल को देता है।।४९।।
यदि माघ मास में स्नान करने के लिए शालिग्राम शिला का पवित्र जल प्राप्त हो जाए तो सहस्त्रों एवं करोड़ों तीर्थों की सेवा करने से भी कोई प्रयोजन नहीं।।५०।।
जो मनुष्य माता के दूध में मिलाकर एक बिंदु मात्र भी शालिग्राम शिला का जलपान करते हैं, उसका मोक्ष हो जाता है।।५१।।
शालिग्राम शिला के निकट एक कोस पर्यंत कोई कीट (कीड़ा) भी मृतक हो जाए तो अवश्य ही बैकुंठ लोक को जाता है।।५२।।
जो मनुष्य शालिग्राम शिला का दान करता है, उसे पर्वत और गहन वन सहित भूमंडल के दान करने का फल उपलब्ध होता है।।५३।।
जो व्यक्ति शालिग्राम शिला का मूल्य लगाता है, और बेचता अथवा विक्रय का अनुमोदन करता है, किंवा जो उसकी परीक्षा का अनुमोदन करता है।।५४।।
वे सभी प्रलय पर्यन्त नरक में निवास करते हैं। अतएव हे वैश्य! चक्र का क्रय-विक्रय नहीं करना चाहिए।।५५।।
विशेष कहने से क्या लाभ ?हे वैश्य! पापों से डरने वाले मनुष्य को श्री वासुदेव भगवान का स्मरण करना चाहिये, क्योंकि हरि स्मरण समस्त पापों को हरने वाला है।।५६।।
इंद्रिय निग्रह पूर्वक वन में घोर तप करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, हरि स्मरण करने से उसी फल का लाभ होता है।।५७।।
अज्ञान के वशीभूत हो बहुत प्रकार के पाप का आचरण करने वाला मनुष्य भी यदि पापों के अपहरण करने वाले नारायण को प्रणाम करें तो उसे नर्क में नहीं जाना पड़ता।।५८।।
पृथ्वी के ऊपर जितने तीर्थ अथवा पवित्र स्थान हैं, श्री विष्णु भगवान के नामों का कीर्तन करने से उसे सबके फल की प्राप्ति हो जाती है ।।५९।।
शार्ङगपाणी शरणागत वत्सल श्री विष्णु भगवान के की शरण में जो व्यक्ति जाते हैं, उन्हें न तो यमराज के निकट जाना होता है और न नरक में निवास ही करना पड़ता है।।६०।।
हे वैश्य! जो वैष्णव पुरुष महादेव जी की निंदा करते हैं, वह विष्णु लोक को नहीं जाता, किंतु अवश्य ही नरकगामी होता है।।६१।।
जो मनुष्य प्रसंग वश भी चाहे किसी एक ही एकादशी का व्रत धारण करता है, उनको उसको यम यातना नहीं भोगनी होती। हमने यमराज ही से ऐसा सुना है कि।।६२।।
यह एकादशी का दिन जैसे पापों का नाश करने वाला है, त्रिलोकी में ऐसा पवित्र करने वाला और कोई भी नहीं है।।६३।।
हे वैश्य राज ! जब तक प्राणी विष्णु भगवान के शुभ दिन एकादशी का व्रत धारण नहीं करता है, तभी तक उसके देह में पापों का निवास रहता है।।६४।।
सहस्त्रों अश्वमेघ और सैकड़ों राज सूर्य यज्ञ एकादशी व्रत की सोलहवीं कला की भी बराबरी नहीं कर सकते।।६५।।
हे वैश्य ! ग्यारह हो इंद्रियों के द्वारा किए हुए मनुष्य के सब पाप एकादशी का व्रत करने से निश्चय ही विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।। ६६।।
एकादशी के व्रत के समान लोक में और कुछ भी पुण्य पवित्र नहीं है, जो किसी निम्मित से भी एकादशी का व्रत का आचरण करते हैं, उन्हें यम यातना नहीं भोगनी पड़ती।।६७।।
यह एकादशी संपूर्ण भागों को देने वाली है, शरीर को निरोग रखने वाली, उत्तम स्त्री और दीर्घ जीवी पुत्र को देने वाली है।।६८।।
हे वैश्य! क्या गंगा, क्या काशी, क्या गया, क्या पुष्कर, क्या कुरुक्षेत्र, क्या रेवा और क्या वेणिका ।।६९।।
क्या यमुना, क्या चंद्रभागा, इसमें से कोई भी एकादशी के समान पवित्र नहीं है, कारण कि इसके द्वारा अनायास बिना परिश्रम ही विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।।७०।।
जो मनुष्य एकादशी के दिन उपवास कर रात्रि में जागरण करता है, वह मातृ, पितृपक्ष के दस ।।७१।।
और पत्नी के पक्ष के भी दस पूर्वजों का अवश्य ही उद्धार करता है और वह समस्त पूर्वज, समस्त संघ से मुक्त होकर गरुड़ जी के ऊपर अरुण हो।।७२।।
माला और पीतांबर धारण कर नारायण के लोक में जाते हैं। हे वैश्य! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में चाहे जब एकादशी का व्रत किया जाए।।७३।।
एकादशी उपवास कर के महा पापी भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। तीन रात्रि पर्यंत व्रत का आचरण और तीर्थों में स्नान करके।। ७४।।
स्वर्ण, तिल, और गौ दान करने से मनुष्यों को स्वर्ग की गति का लाभ होता है। हे वैश्य ! जो प्राणी तीर्थ में स्नान नहीं करते, जो स्वर्ण का दान नहीं करते।।७५।।
और जिन्होंने तप का भी कुछ आचरण नहीं किया है, वे सर्वत्र ही दुःखित होते हैं। नर्क से बचने वाले धर्म को संक्षेप रीति से तुम्हारे प्रति वर्णन करता हूँ।।७६।।
वाणी मन और शरीर के द्वारा किसी प्राणी के साथ द्रोह न करें, इंद्रियों का निग्रह रखें, दान दें और हरी की सेवा करें।।७७।।
चारों वर्णों और चारों आश्रमों के मनुष्यों को इन धर्मों का सदैव विधि पूर्वक पालन करना चाहिए, हे वैश्य ! स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा वाले प्राणी को तप और दान का आचरण सर्वदा करना चाहिए करना कर्तव्य है।।७८।।
जो व्यक्ति अपने हित की इच्छा करता हो, उसी यथाशक्ति जूता, छत्र, वस्त्र, अन्न,मूल, फल अथवा जल इसका दान अवश्य करना चाहिए ।।७९।।
दरिद्र मनुष्य तो ऐसा नहीं कर सकते, किंतु समर्थन को चाहिये कि बिना दान किये दिन को खाली ना जाने दें, कारण कि इस लोक अथवा परलोक में बिना दिए कुछ भी प्राप्त नहीं होता।।८०।।
ऐसा मानकर अपनी शक्ति के अनुसार सदैव दान करना कर्तव्य है, क्योंकि दान करने वालों को यम यात्रा अवलोकन नहीं करना होता।।८१।।
दानी लोग बारंबार दीर्घायु और धनाढ्य होते हैं, विशेष कहने से क्या होता है। अधर्म करने वालों को दुर्गति की प्राप्ति होती है।।८२।।
धर्म के आधार से मनुष्य सदा स्वर्गारोहण करता है। अतएव बचपन से ही धर्म का संग्रह करना चाहिये ।।८३।।
यह सब वृत्तांत हमने तुम्हारी प्रति प्रति वर्णन किया, अब और क्या श्रवण करना करने की तुम्हारी इच्छा है ।।८४।।
।। इस प्रकार श्री पद्म पुराण के अंतर्गत उत्तरखंड में माघ मास महत्त्व के अंतर्गत यमदूत द्वारा विकुण्डल को द्वादशाक्षर मंत्र, अष्टाक्षर मंत्र, शालीग्राम शिला, एकादशी व्रत तथा विभिन्न प्रकार के दानों की महिमा का वर्णन नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।।१२।।
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