माघ मास माहात्म्य– पंद्रहवाँ अध्याय
माघ मास माहात्म्य, पंद्रहवाँ अध्याय, कांचनमालिनी राक्षस संवाद
कार्तवीर्य बोले :– हे भगवन ! वह राक्षस कौन था ? वह कांचनमालिनी को था ? उसने अपना पुण्य किस प्रकार प्रदान किया और उस राक्षस की सदगति किस विधि से हुई ।।१।।
हे अत्रिपुत्र! हे भास्कर !! हे योगेंद्र !!! यदि आप सुनना चाहते हैं तो यह सब वृतांत मेरे प्रति वर्णन करिए, क्योंकि मुझे इसके श्रवण करने का परम कौतूहल है।।२।।
श्री दत्तात्रेय जी बोले – तुम पुरातन विचित्र इतिहास को श्रवण करो, उसके केवल स्मरण मात्र ही वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।।३।।
कांचनमालिनी नाम की एक परम रूपवती अप्सरा माघ मास में प्रयागराज से शिव मंदिर कैलाश को जा रही थी।।४।।
पर्वत के समान विस्तृत देहधारी एक वृद्ध राक्षस गिरिराज के निकुंज में बैठा था उसने उक्त आकाश–चारणी अप्सरा को देखा।।५।।
उस तेजस्विनी का तेज स्वर्ण कांति के समान था, नेत्र बड़े-बड़े थे, उसका मुख चंद्रमा के समान मनोहर, केश सुंदर एवं उसके स्तन पृष्ठ तथा उन्नत थे।।६।।
और सुंदर रूपवती को देखकर
वह राक्षस कहने लगा – हे कमलनयनि ! तुम कौन हो ? और कहाँ से आ रही हो?।।७।।
तुम्हारे वस्त्र और केशपाश गिले क्यों हैं ? हे भीरु ! तुम कहाँ से आ रही हो ? अथवा तुम्हारे आकाश मार्ग से यात्रा करने का क्या प्रयोजन है ?।।८।।
हे भद्रे ! तुमने ऐसे किस पुणे के का आचरण किया है कि जिसके प्रभाव से तुम्हारी देह इतनी तेजोमय हो गई हो रही है और तुम मनोहर रूप संपन्न हो रही हो।।९।।
हे सुनयनी ! तुम्हारे वस्त्र में से एक बिंदु मेरे मस्तक के ऊपर निपतित हुआ उसके प्रभाव से सदा का मेरा क्रूर मन क्षणभर में शान्त हो गया।।१०।।
इस जल की महिमा का वर्णन करने की शक्ति किसी में भी नहीं है, तुम मुझे शीलवती प्रतीत होती हो, इसलिए तुम्हारी आकृति निर्गुण नहीं हो सकती।।११।।
अप्सरा बोली – सुनो राक्षस ! मैं कांचनमालिनी नाम की अप्सरा हूँ। मैं अपना चाहे जैसा रूप बना सकती हूँ और इस समय में प्रयाग से आ रही हूँ ।।१२।।
हे राक्षस ! मैंने गंगा, यमुना के संगम में स्नान किया है। अतएव मेरे वस्त्र आर्द्र (गिले) हैं और अब मैं उत्तम कैलाश पर्वत पर जा रही हूँ।।१३।।
वहाँ देवताओं और दनुजों दोनों के द्वारा पूजित पार्वती–पति महादेव जी विराजमान हैं। हे राक्षस! त्रिवेणी के जल के प्रभाव से तुम्हारी दुष्टता दूर हो गयी है।।१४।।
और जिसके पुण्य के प्रभाव से मैं सुमेधा गंधर्व की सुंदर रूपवती कन्या हुई हूँ, वह भी सब तुम्हारे प्रति वर्णन करती हूँ।।१५।।
पूर्व जन्म में मैं कलिंग अधिपति राजा की वेश्या थी। मैं रूप और लावण्य से संपन्न थी। अतएव मुझे अपने सौभाग्य के मद का अतीव गर्व था।।१६।।
विशेष क्या कहूँ, उस नगर में तो मैं संपूर्ण युवतियों की शिरोमणि थी। हे दैत्य! उस जन्म में मैंने अपनी इच्छा के अनुसार खूब ही भोग भोगे।।१७।।
विशेष क्या कहूँ, मैंने अपने यौवन की संपदा से उस समस्त नगर भर को मोहित कर लिया था। विचित्र रत्न, आभूषण, धन।।१८।।
विचित्र प्रकार के वस्त्र, कपूर और अगर, चंदन, मुझ मनोहर रूपवती ने यह सब वस्तुये भली प्रकार उपार्जित किया।।१९।।
हे निशाचर! मैं अपने निवास स्थान में स्वर्ण का अंत नहीं देखती थी, कारण कि –युवा जन कामदेव के पीड़ित हो मेरे चरणों की सेवा करते थे।।२०।।
मैंने अपनी माया द्वारा उनका सर्वस्य ही ठग लिया। अथवा कोई कामी पुरुष तो एक दूसरे की स्पर्धा में मर गये।।२१।।
उस सुन्दर नगर में सर्वत्र ही मेरी पहुंच थी और पर जब मेरी वृद्धावस्था आई, तब मैं हृदय में सोच करने लगी।।२२।।
ना मैंने दान किया, न हवन किया और न मैंने जप ही किया। किसी व्रत का आचरण भी मुझसे नहीं बन पड़ा। धर्म, अर्थ, और मोक्ष का देने वाला भगवान कि मैंने आराधना भी नहीं की।।२३।।
कठिन और घने कलेशों का विनाश करने वाली दुर्गा देवी को भी मैंने कभी नहीं पूजा, नित्य भोगों का उपभोग करने के लोभ से मैंने सब पापों का नाश करने वाले श्री विष्णु भगवान का स्मरण तक नहीं किया।।२४।।
न ब्राह्मणों को भोजन वस्त्र आदि से संतुष्ट किया और न प्राणियों का कुछ भी हित साधन किया, असावधानी में पड़ी रहकर मैंने अणुमात्र भी पुण्य नहीं किया।।२५।।
हे भद्र ! मैंने पातक तो बहुत से किए थे अतएव मेरे मन को पीड़ा होने लगी। इस प्रकार बहुत विलाप करके में।।२६।।
शुद्ध और चैतन्य ज्ञान सम्पन्न, दैवज्ञ, उसी राजा के ब्राह्मण पुरोहित के निकट गई और कहा – हे विप्र ! इस पाप से निस्तार प्रकार मुझे सदगति किस प्रकार प्राप्त हो सकती है ? मैं बिचारी दीन हीन हो अपने ही कर्मों से संतप्त हो रही हूँ ।।२७–२८।।
हे विप्र ! मैं पाप के पंक (कीचड़) में निमग्न हो रही हूँ । अतएव केश पकड़कर उससे मुझे उबारिये, अथवा हे द्विज ! प्रसन्न होकर करुणा का जल मेरे ऊपर बरसाइये ।।२९।।
सज्जनों के लिए तो सभी सज्जन होते हैं । महात्मा लोग सज्जनों के प्रति भी दुष्टता का बर्ताव नहीं करते। उन्होंने मेरे ऐसे वचन सुन मेरे ऊपर अनुग्रह किया।।३०।।
फिर वह द्विज ! सब धर्मों से परिपूर्ण मुझे प्रसन्न करने वाले वाक्य कहने लगा। ब्राह्मण बोले – हे सुमुखि ! मैं तेरे संपूर्ण निषेध आचरणों को जानता हूँ। तू मेरा कहना मान कर प्रजापति के क्षेत्र में जा।।३१।।
वहाँ जाकर स्नान करने से तुम्हारे पापों का क्षय हो जाएगा, क्योंकि मुझे तुम्हारे पापों के विनाश का और कोई उपाय नहीं सूझता।।३२।।
तीर्थ में स्नान करने को महाऋषियों ने सर्वोत्तम प्रायश्चित वर्णन किया है। परंतु हे भीरु! तीर्थ में जाकर अशुभ क्रियाओं का मन से भी परित्याग कर देना चाहिये ।।३३।।
प्रयाग में स्नान करने से शुद्ध होकर तू अवश्य ही स्वर्ग को चली जाएगी, कारण की प्रयागराज में स्नान करने से मनुष्यों को निश्चय ही स्वर्ग का लाभ होता है।।३४।।
तीर्थ स्थान को छोड़ अन्य स्थान में किये हुये जितने पाप हैं वह सभी, हे भामिनी ! प्रयागराज में तत्काल नष्ट हो जाते हैं।।३५।।
हे भीरु पूर्व समय में इंद्र महर्षि गौतम की पत्नी को देखकर काम के वशीभूत हो गुप्त रूप से उनके साथ समागम किया।।३६।।
ऐसा उग्र पाप करने से उसी समय ऋषि पत्नी गामी इंद्र को उसका फल प्राप्त हो गया।।३७।।
उस स्त्री के पति ने श्राप दिया तो उसी के प्रभाव से इंद्र का शरीर सहस्त्र भग से चिह्नित कुरूप निंदित अतएव लज्जा जनक हो गया।।३८।।
तब तो देवराज नीचे को मुख करके निकला और वह तिरस्कृत एवं लज्जित होकर अपने कर्म की निंदा करने लगा।।३९।।
सुमेरु पर्वत के ऊपर जल से लबालब भरे हुये, सौ योजन पर्यंत विस्तृत एक सरोवर में स्वर्ण कमल की कलिका में प्रविष्ट हो अपनी निंदा करने लगा।।४०।।
जिस कामना से मनुष्य समस्त लोक में नंदिता हो नरकगामी होता है। काम चेष्टा जनित वह पाप वासना, आयु, कीर्ति, यश और धर्म का नाश करने वाली है।।४१।।
दुराचारी, आपत्तियों के अचल स्थान स्वरूप, और देह ही में उपस्थित रहने वाले विकट शत्रु कामदेव को धिक्कार है, यह दुष्ट वश में कभी नहीं होता और न इसे कभी संतुष्ट होता है।।४२।।
हे भीरु ! इधर जिस समय इंद्र कमल में बैठे-बैठे गुप्त रूप इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय बिना इंद्र के इंद्रलोक की शोभा भी नष्ट हो गई ।।४३।।
तब देवता, गंधर्व, लोकपाल और किन्नर इंद्राणी के साथ बृहस्पति जी के पास आकर पूछने लगे।।४४।।
हे भगवान ! हमें देवराज इंद्र की कुछ भी खबर नहीं है, कि–वे कहाँ गये, वे कहाँ हैं? और हम उन्हें कहाँ ढूंढे।।४५।।
जैसे सुपुत्र के बिना लक्ष्मी और गुण संपन्न कुल की शोभा नहीं होत। इसी प्रकार इंद्र के बिना देव गणों सहित भी देवलोक की शोभा नहीं है ।।४६।।
हे नाथ ! ऐसा उपाय सोचना चाहिए कि जिससे लक्ष्मी और स्वामी से युक्त होकर स्वर्ग लोक शोभित हो, इनमें विलंब करना उचित नहीं है ।।४७।।
उनके ऐसे वाक्य श्रवण करके
सुर गुरु बृहस्पति जी बोले – कि इंद्र अपने किए हुए अपराध की लज्जा से लज्जित होकर जहाँ स्थित है, उसे मैं जानता हूँ।।४८।।
इंद्र ने बिना सोचे समझे जो कार्य कर डाला, उसी के फल को भोग रहा है। जब मनुष्य नीति का परित्याग कर देते हैं, तब उन्हें बड़ा भयंकर दुख भोगने पड़ते हैं।।४९।।
आश्चर्य की बात है कि राज्य मद से उन्मत्त हो उसने अपने कर्तव्य–अकर्तव्य का कुछ भी विचार नहीं किया, किंतु क्षय करने वाले गुप्त और प्रगट अनेक नंदित कर्म करता रहा ।।५०।।
जैसे कि देव के द्वारा जिनकी बुद्धि नष्ट हो गई है, ऐसे मूर्ख कर्म करते हैं, जिन अपराधों के करने से इस लोक और परलोक दोनों स्थानों में जन्म निष्फल होता है।।५१।।
और अब वहाँ ही चलते हैं, जहाँ इंद्र की स्थिति है, यूँ कहकर बृहस्पति जी सब देवता आदि को ले वहाँ से चले।।५२।।
और विस्तृत सरोवर में स्वर्ण से शोभायमान कमलों के वन का अवलोकन कर देवराज इंद्र की इस प्रकार स्तुति करने लगे जिससे कि–उसे ज्ञान की प्राप्ति हो ।।५३।।
तब तो गुरु जी महाराज के ज्ञान उपदेश को पाया इंद्र कमल की कली में से प्रादुर्भूत हुआ। उस समय उसके मुख्य मलिन एवं रूप कुरूप हो रहा था, तब लज्जा के मारे उसकी आंखें भी झापी जाती थी ।।५४।।
तब इंद्र ने अग्र जन्मा बृहस्पति जी महाराज के चरणों का स्पर्श किया और कहा–हे ब्रह्स्पते ! मेरी रक्षा करिये एवं इस पाप से उद्धार होने का उपाय बताइए।।५५।।
देवराज इंद्र के ऐसे वचन सुनकर
द्विजोत्तम ब्रहस्पति जी बोले – सुनो देवेंद्र! हम पाप नष्ट होने का उपाय वर्णन करते है ।।५६।।
हे देवराज ! प्रयागराज में केवल स्नान मात्र करने से तत्काल ही तुम पापों से मुक्त हो जाओगे। इसलिये हम तुम्हें साथ लेकर वहाँ ही चलते हैं।।५७।।
यह सुनते ही अपने पुरोहित बृहस्पति जी को साथ ले गंगा-यमुना के संगम में स्नान किया और उसी समय पापों से उसकी मुक्ति हो गई ।।५८।।
तब देवगुरू ब्रहस्पति ने प्रसन्न होकर उसे वर दिया और कहा – हे अनघ! तुमने प्रयागराज में स्नान करके अपने पापों का नाश कर दिया है।।५९।।
हे इंद्र ! इस समय तुम्हारे पापों का क्षय हो गया है। अतएव हमारी कृपा से इस समय इन सहस्त्र योनियों के चिन्ह तुम्हारे सहस्त्र नेत्र हुए जाते हैं।।६०।।
ब्राह्मण के ऐसे वाक्य कहते ही सहस्त्र नेत्रों से इंद्र की ऐसी शोभा होने लगी जैसे कमलों के द्वारा मानसरोवर की शोभा होती है।।६१।।
इसके पश्चात सब देवताओं और ऋषियों ने इंद्र की पूजा की तथा गंधर्वों के द्वारा स्तुति किये जाने के अनंतर देवराज अमरावती को गए।। ६२।।
इस प्रकार प्रयाग में स्नान करने से इंद्र के पाप शीघ्र ही नष्ट हो गये। अतएव हे कल्याणी तुम भी देवताओं से सेवित प्रयाग में जाओ।।६३।।
वहाँ जाने से शीघ्र ही तुम्हारे पापों का नाश होकर अचल स्वर्ग की प्राप्ति होगी। जब मैंने यह इतिहास और मंगलकारी ऐसे वचन सुने।।६४।।
तब मुझे अत्यंत संभ्रम की प्राप्ति हुई और मैंने उक्त ब्राह्मण के चरणों में प्रणाम किया, एवं बन्धु–बान्धवों, सम्पूर्ण दास दासियों और घर को छोड़ ।।६५।।
अथवा हे राक्षस ! समस्त विषयों को विष के ग्रास के सदृश जान और शरीर को क्षण भंगुर समझ के मैं घर से निकाल चली ।।६६।।
नरक में गिरने वाली चिंता की दारुण अग्नि से मेरा हृदय उस समय संतप्त हो रहा था।।६७।।
तब मैंने प्रयाग में जाय गंगा यमुना के संगम में स्नान किया। हे वृद्ध निशाचर ! उसमें स्नान करने के महत्व को सुनो।।६८।।
तीन दिन में तो मेरे सब पापों का विनाश हो गया और शेष सत्ताइस दिन स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त उससे देवयोनि का लाभ हुआ है।।६९।।
इसलिए मैं पार्वती जी की प्रिय सखी होकर कैलाश के ऊपर क्रीड़ा करती हूँ और प्रयागराज में स्नान करने के प्रभाव से मुझे अपने पूर्व जन्मों का स्मरण बना हुआ है।।७०।।
प्रयागराज के महत्व को स्मरण कर में प्रत्येक माघ में वहाँ जाती हूं।।७१।।
।। इस प्रकार श्री पद्म पुराण उत्तरखंड माघ मास के अंतर्गत कांचन मालिनी राक्षस संवाद नामक पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त।।१५।।
Comments
Post a Comment