माघ मास माहात्म्य – तीसरा अध्याय

माघ मास माहात्म्य, तीसरा अध्याय, मणिपर्वत का वर्णन

राजा बोले :– हे ब्राह्मण ! भृगु  जी ने किस समय मणि पर्वत पर यह ज्ञान उपदेश किया था सो आप मुझसे कहिये।।१।।

वशिष्ठ जी बोले :– हे राजन ! एक समय बारह वर्ष तक मेघ नहीं बरसे, उससे प्रजा उद्विग्न हो गई और सब क्षीण हो गये।।२।।

हे राजन !  मध्य देश, हिमालय और विंध्याचल के खिन्न होने से तथा स्वाहा स्वधा वषट्कार एवं वेद अध्ययन से वर्जित होने पर।।३।।

लोके के उपद्रव ग्रस्त होने पर, धर्म के लुप्त और प्रभा हीन होने, फल मूल जल से महि मंडल के शून्य होने पर भी।।४।।

विंध्य पर्वत रेवा के तटवर्ती होने के कारण वृक्षों से आच्छादित था, तब महर्षि भ्रुगू शिष्यों सहित वहाँ से चलकर हिमालय को गए।।५।।

कैलाश पर्वत के पश्चिमी ओर मणिकूट नामक एक स्वर्ण पर्वत है ।।६।।

नीचे श्वेत स्फटिक और मध्य में नील शिलाओं से युक्त, विभूति से सब ओर से शुक नीलकंठ पारावत के समान शोभित।।७।।

सब ओर नील शिलाओं वाला कहीं सुवर्ण की रेखा से युक्त कृष्ण मेघ से स्फारायमान विद्युत रेखा के  समान सशोभित है।।८।।

शिखर पर नील शिलाओं से युक्त पर्वत नीचे वर्ण की मेखला से पीट वस्त्र पहरे नारायण के समान शोभित होता है।।९।।

मेखला का त्याग कर नीलवर्ण मध्य में श्वेत शिलाओं से यूक्त तारागण सहित आकाश के समान उस पर्वत की शोभा हो रही है।।१०।।

अपने शरीर से शोभायमान दिव्य औषधियों से दीप्त दूसरे चन्द्रमाँ के समान बहूत प्रकाशमान।।११।।

अदित्यकाओं में किन्नर कीचक गान करते हैं। रंभा पत्र और पताकाओं से वह पर्वत सदा सुशोभित होता है।।१२।।

हरित वर्ण के ऊपल,  वैदूर्य मणि पद्मराग, श्वेतप्रस्तर (संगमरमर), श्वेत किरण मंडल से इंद्रधनुष के समान शोभायमान ।।१३।।

संपूर्ण धातु युक्त स्वर्ण और अनेक प्रकार के रत्नों से शोभायमान, अग्नि ज्वाला सदृश्य ऊंचे श्रृंगों से सब और से शोभित और वेष्ठित था ।।१४।।

उसके प्रांत भाग में तृण यूक्त शिलाओं पर काम पीड़ित विद्याधरी अपने पति के साथ शयन करती हैं।।१५।।

अन्तर्वायु को रोकने वाले , कलेश जीतने वाले विरागीजन उनकी गुफाओं में निरंतर ब्रह्म का ध्यान करते हैं।।१६।।

हाथ में रुद्राक्ष माला लिए सिद्धगण अर्द्ध निमीलित नेत्रों से सुंदर गुफाओं में शिव जी का ध्यान करते हैं
।।१७।।

मंदार के फूलों की सुगंधित सुगंधी से दिशाएं सुवासित, झरनों के जल से शब्दायमान, वन में स्थित हाथियों के बच्चे और हाथी।।१८।।

उपत्यकाओं में खेल रहे कस्तूरी वाले मृग यूथ तथा सुंदर विचित्र रंग वाले मृगों के यूथ।।१९।।

जहाँ चंवरी गाय फिरती है, विचित्र स्वापदों से युक्त, चकरो और कोकिल के शब्द से व्याप्त।।२०

राजहंस और मोरों से सदा रमणीय, देवता गुह्यक और अ
अप्सराओं से व्याप्त था।।२१।।

राजा बोले :–हे भगवान ! यह पर्वत अनेको आश्चर्य और सिद्धयों  से युक्त कितना लंबा और कितना चौड़ा है ।।२२।।

ऋषि बोले : – छत्तीस योजन ऊंचा, मस्तक पर दश योजन चौड़ा व विस्तार में मूल रूप से सोलह योजन वाला है ।।२३।।

हरिचंदन, मंदार और आम्रवृक्षों से सुशोभित, देवदारु तथा अर्जुन के सरल वृक्षों से युक्त ।।२४।।

काल, अगर, लवंग निकुंज लतागृहों से विराजित सदा फूलों  पुष्पों से शोभायमान ।।२५।।

इस मनोहर पर्वत को देखकर दुर्भिक्ष पीड़ित भृगुजी निवास करने की इच्छा करने लगे ।।२६।।

उस मनोहर पर्वत की कंदरा और वनों में भृगजी बहुत काल तक तक करते रहे ।।२७।।

।। इतिश्री पद्मपुराण के माघ मास माहात्म्य के अंतर्गत मणिपर्वत का वर्णन नामक तीसरा अध्याय संपूर्ण ।।३।

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