माघ मास माहात्म्य– चतुर्थ अध्याय
माघ मास माहात्म्य, चतुर्थ अध्याय, भृगु जी और विद्याधर का संवाद
*ऋषि बोले*– हे राजन इस प्रकार महाऋषि भृगु के शिष्यों सहित स्थित होने पर वहाँ किसी पर्वत से उतार कर दो विद्याधर (पति–पत्नी] आये ।।१।।
और आकर दुखित हो मुनि को नमस्कार किया। इस प्रकार उसको देख ऋषि कोयल वाणी से बोले।।२।।
*भृगु जी बोले* हे विद्याधर ! प्रेम पूर्वक कहो :- तुम आती दुखी क्यों हो ? उन मुनि के वाक्यों को सुनकर विद्याधर बोला ।।३।।
हे तापस श्रेष्ठ ! आप हमारे दुखों का कारण सुने। पुण्य का फल प्राप्त होने से मुझको स्वर्ग मिला है ।।४।।
परंतु देव देह प्राप्त होकर भी मेरा व्याघ्र के समान मुख है, मैं नहीं जानता कि यह किस कर्म का फल मिला है ।।५।।
इस प्रकार बारम्बार विचार करके मेरे मन में शांति नहीं होती। हे ब्राह्मण ! और भी सुने, जिस कारण से मेरे मन व्याकुल है ।।६।।
यह मेरी स्त्री मधुर वाणी बोलने वाली स्वरूपवान है ।।७।।
नृत्य-गीत कला की ज्ञाता संपूर्ण सद्गुणों से युक्त है, जिस समय यह कुमारी थी, उस समय निर्मल चित्त वाली ने सात स्वर युक्त वीणा को बजाकर ।।८।।
वीणा वादन में प्रवीण नारद मुनि को संतुष्ट किया। मुक्त भाव से मनोहर कंठ यह गाती हुई ।।९।।
विचित्र स्वर और नाथ के ज्ञाता नारद मुनि को संतुष्ट किया तथा इस कौतुक से भिन्नांग वाली ने वीणा बजाते हुये ।।१०।।
इसके अनेक प्रकार की वक्र स्निग्ध पंचम स्वर को सुनकर रोमांचित हो जाने से शिव जी प्रसन्न हो गये ।।११।।
शील उदारता गुणों के समूह से युक्त रूप यौवन की संपदा वाली इसके समान अन्य कोई स्त्री नहीं है ।।१२।।
कहाँ तो यह चंद्रमुखी सुंदरी और कहाँ मैं व्यग्र मुख वाला हूँ। हे ब्राह्मण ! ऐसा सदैव विचार करते रहने से मेरे हृदय में दाह होता है ।।१३।।
इस प्रकार विद्याधर के वचन को श्रावण कर त्रिकालज्ञ भृगु जी हंसकर बोले ।।१४।।
हे श्रेष्ठ विद्याधर ! सुनो में कर्म के विचित्र फल हैं, उनको प्राप्त हो बुद्धिमान मोहित नहीं होते, अज्ञानी मोहित होते हैं। मक्खी के पैर में विष के समान छोटे से पाप का फल भी दुखदाई होता है ।।१५ –१६ ।।
तूने माघ महीने की एकादशी का व्रत करके शरीर में तेल लगाया था और द्वादशी तब तक प्राप्त नहीं हुई थी, इस कारण तेरा व्याघ्र मुख हुआ ।।१७।।
एकादशी के दिन व्रत रहकर द्वादशी को तेल लगाने से प्राचीन समय में पुरुरवा को कुरूप शरीर की प्राप्ति हुई थी ।।१८।।
तब वह अपनी कुकाया को देख कर बहुत दुखी हुआ और हिमालय पर्वत पर देव सरोवर के तट पर गया ।।१९।।
स्नान कर परम प्रीति से पवित्र हो कुशासन पर बैठ नवीन मेघ के समान घनश्याम कमल लोचन ।।२०।।
शंख, चक्र, गदा, पद्म लिए पीतांबर धारी कौस्तुभधारी वनमाला पहने श्री हरि का स्मरण करते हुये ।।२१।।
राजा ने संपूर्ण इंद्रिय समूहों को वश में कर तीन महीने निराहार रहकर दारुण तप किया ।।२२।।
सात जन्मों के तक के बराबर राजा के थोड़े ही तप से भगवान प्रसन्न हो गये और उस राजा की भक्ति को विचार कर प्रकट हुये ।।२३।।
माघ के शुक्ल पक्ष द्वादशी के दिन मकर के सूर्य में भगवान ने अपने शंख जल से राजा का अभिषेक किया ।।२४।।
और उसके तेल लगाने की चेष्टा का स्मरण करते हुये भगवान ने उसको सुंदर रूप दिया ।।२५।।
जिसके रूप को देख देव नायिका उर्वशी उस पर मोहित हो गई । इस प्रकार वर पा कृतकृत्य हो राजा अपने नगर को गया ।।२६।।
हे किन्नर ! इस प्रकार कर्म की गति जानकर क्यों खेद करते हो ? जो तुम इस कुरूपता को छुड़ाने की इच्छा रखते हो ।।२७।।
तो शीघ्र प्राचीन पापों को नष्ट करने वाली मणिकूट नदी के जल में माघ में स्नान करो ।।२८।।
जहाँ ऋषि सिद्ध और देवगण निवास करते हैं । मैं इसकी विधि बतलाता हूँ । तेरे भाग्य से पांचवें दिन से माघ प्रारंभ होगा ।।२९।।
तू पौष की शुक्ल पक्ष की एकादशी से माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी तक भूमि पर शयन करते हुए एक महीना निराहार रहकर त्रिकाल स्नान कर ।।३०।।
भोग त्याग कर जितेंद्रिय हो त्रिकाल विष्णु भगवान का पूजन कर, ।।३१।।
तब तू पाप रहित होकर पवित्र हो जाएगा और माघ शुक्ल पक्ष द्वादशी के पुण्य अवसर पर मंत्रपूत जल से अभिसिंचित कर ।।३२।।
हम तेरा मुख कामदेव के समान कर देंगे। हे विद्याधर श्रेष्ठ ! तुम देवमुख होकर ।।३३।।
इस वर वारिणी के साथ सुख पूर्वक गिरा करो । माघ के प्रभाव को जानकर सदा माघ स्नान करो ।।३४।।
तब तुम्हारे मनोरथ की प्राप्ति सदैव होगी । इस प्रकार महात्मा सर्वज्ञ भृगु जी ने ।।३५।।
विद्याधर से फिर गाथा कहि कि माघ स्नान से विपत्ति का नाश और माघ स्नान से पाप का मेष होता है ।।३६।।
माघ संपूर्ण यज्ञों से अधिक और सभी दान के फल को देने वाला है । माघ यज्ञों से योगों से ।।३७।।
और तीव्र तप से भी अधिक फलदाई है । पुष्कर क्षेत्र, कुरुक्षेत्र, ब्रह्मावर्त, पृथुदक ।।३८।।
काशी, प्रयाग, गंगासागर संगम में जो फल दस वर्षों के नियम करने से मिलता है ।।३९।।
वह फल माघ में तीन दिन स्नान करने से प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं हैं । जिन्होंने मन में चिरकाल तक स्वर्ग में रहने की इच्छा है ।।४०।।
उनको मकर के सूर्य में कहीं भी जल में स्नान करना चाहिये । इससे आयु, आरोग्य, संपत्ति, रूप, सौभाग्य आदि गुणों की प्राप्ति होती है ।।४१।।
जिनके ऐसे मनोरथ हैं, उनको माघ स्नान कभी त्यागना नहीं चाहिए । जो नर्क और दरिद्रता से डरते है ।।४२।।
वह सदा प्रयत्न पूर्वक माघ स्नान करें । दरिद्रता, पाप और दुर्भाग्य रूपी कीच धोने को हे राजन ! माघ स्नान के समान अन्य कोई उपाय नही है, श्रद्धाहीन कर्म अल्प फल वाले हैं ।।४३–४४।।
परंतु माघ स्नान चाहे जैसा करें, पूर्ण फल प्राप्त होता है, अकाम हो या सकाम कहीं बाहर जल में ।।४५।।
माघ स्नान करने वाला दोनों लोकों में दुःख नहीं पाता। जिस प्रकार दोनों पक्ष में चंद्रमा घटता–बढ़ता है ।।४६।।
इस प्रकार माघ में स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं और पुण्य बढ़ता है । जैसे खान से अनेक प्रकार के रत्न प्रकट होते हैं ।।४७।।
उसी प्रकार माघ स्नान से विभिन्न प्रकार के पुण्य प्रकट होते हैं, आयु, वित्त,कलत्र, संपत्ति की प्राप्ति होती है ।।४८।।
जैसे कामधेनु कामना की पूर्ति और चिंतामणि अभीष्ट फल देती है, उसी प्रकार माघ स्नान सब मनोरथ पूर्ण करता है।।४९।।
सतयुग में तप से, त्रेता में यज्ञ करने से जो पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है वही परम ज्ञान द्वापर और कलयुग में माघ स्नान से प्राप्त होता है, वैसे यह तो सब युगों में परम ज्ञान देने वाला है।।५०।।
हे राजन सब वर्ण और आश्रम वालों के लिए माघ स्नान धर्म की धाराओं की वर्षा करता है ।।५१।।
*वशिष्ठ जी बोले* भृगु जी का यह वाक्य सुनकर वह विद्याधर माघ मास में महर्षि भृगु जी के साथ ही पर्वत के झरने में ।।५२।।
भार्या के साथ यथोक्त विधि से स्नान किया और भृगु जी के अनुग्रह से उसको मनोरथ की प्राप्ति हुई ।।५३।।
और देव मुख होकर मणि पर्वत पर आनंद करने लगा। उस पर अनुग्रह कर प्रसन्न हो भृगु जी विंध्य पर्वत पर आए ।।५४।।
मणिमय गिरिराज पर माघ स्नान मात्र से ही विद्याधर कामरूप हो गया तब नियम आदि से निश्चिंत हो पर्वत से उतर भृगु जी शिष्यों के साथ रेवा तट पर आए ।।५५।।
यह माघ माहात्म्य संपूर्ण जगत का सार तत्व है, जो भृगु जी ने विद्याधर से कहा। जो नित्य इसका श्रवण करता है, उसको अनेक प्रकार के विचित्र फल प्राप्त होते हैं और देवताओं के समान संपूर्ण अभीष्ट की सिद्धि होती है ।।५६।।
*।। इस प्रकार पद्मपुराण के अंतर्गत माघ मास माहात्म्य भृगु जी और विद्याधर का संवाद नामक चौथा अध्याय संपूर्ण ।।४।।*
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