माघ मास माहात्म्य, दूसरा अध्याय

माघ मास माहात्म्य, दूसरा अध्याय, राजा दीलिप और महर्षि विशिष्ट का संवाद

सूत जी बोले :– तब राजा ने कहा हे द्विजश्रेष्ठ ! यह तो मैं नहीं जानता की माघ मास स्नान का  फल है क्या है, सो कृपया विस्तार से कहिए ।।१।।

इस प्रकार राजा के वचन सुनकर
वैखानस मुनि बोले शीघ्र जी सूर्य उदय होना चाहता है ।।२।।

यह हमारे स्नान का समय है, कथा का अवसर नहीं है, तुम स्नान करके जाओ और अपने कुल गुरु वशिष्ट जी से प्रश्न करना ।।३।।

ऐसा कह वे मौनी तपस्वी प्रातः स्नान हेतु चले गए । दिलीप भी लौट कर यथा विधि स्नान करके ।।४।।

प्रसन्न चित्त अपनी नगरी को चले गये और उन वानप्रस्थ ऋषि की कथा अन्तःपुर (रनिवास) में कही ।।५।।

श्वेत घोड़ों के रथ में आसीन श्वेत छत्र से शोभायमान श्वेत चँवर अलंकार सुवस्त्र धारण किये मंत्रियों से संयूक्त ।।६।।

मागध बन्दियों द्वारा उच्चारित जयकार एवं स्तुतियों का श्रवण कर ऋषि के वाक्य स्मरण करते हुये राजा वसिष्ठ जी के आश्रम में आये ।।७।।

वहाँ विनयपूर्वक राजा ने ऋषि को प्रणाम किया और उनके द्वार, अर्घ एवं आशीर्वाद को प्राप्त हो आसन पर बैठे ।।८।।

जब मुनि ने आदरपूर्वक राजा से कुशल पूछी तो राजा मुनि का मन प्रसन्न करते हुए बोले ।।९।।

और वैखानस के वचन के विषय में मधुर स्वर से पूँछने लगे।

दिलीप बोले :– भगवन ! आपके प्रसाद के मैंने विस्तार से ।।१०।।

आचार, धर्म, नीति, राजधर्म, चारों वर्णाश्रमों की क्रिया ।।११।।

दान, उनके विधान और यज्ञ एवं आपके द्वारा कथन किए गए विष्णु भगवान का व्रत आराधना को सुना है।।१२।।

अब माघ स्नान करने से जो फल होता है उसे सुनने की इच्छा है। उसे किस विधान से करना चाहिये, हे मुनिराज ! सो कथन कीजिये ।।१३।।

वशिष्ठ जी बोले :– बहुत अच्छा प्रश्न किया है, इसमें तीनों लोगों का हित होता है। उस वनवासी ने तुम्हारे मन में निर्मल मन को निर्मल करने के निमित्त ही ऐसा कहा है ।।१४।

जो स्त्रियों के नेत्रों के कटाक्ष से खंडित नहीं हुये हैं, वह मकर  स्नान करने की इच्छा करते हैं।।१४।।

बिना अग्नि, बिना यज्ञ, बिना बावड़ी, कूप बनवाये जो सदगति की इच्छा करते हैं। उन्हें माघ स्नान करना चाहिये।।१६।।

जो स्वर्ण, भूमि, माणिक्य, धेनु आदि–बिना दान किये इसके दान का फल चाहते हैं, हे राजन ! हे राजन वे माघ स्नान करें ।।१७।

त्रिसप्ताह व्रत, कृच्छ व्रत , पराक व्रतों द्वारा अपने शरीर बिना शुष्क किये जो फल की इच्छा करते हैं। हे राजन! वे माघ स्नान करें ।।१८।।

वैशाख में हरि की पूजा, कार्तिक में तप और पूजन और माघ मास में होम, टप तथा दान यह तीन वस्तु करनी चाहिये ।।१९।।

निरंतर ऐसा करने से वह पुरुष भूपति होता है। उसे मुक्ति को उत्पन्न करने वाली बुद्धि प्रगट होती है, जिससे वह फिर जन्म नहीं लेता।।२०।।

दिव्यदृष्टि वालों ने कहा है कि माघ मास में तप या दान करने से अनंत फल होता है ।।२१।।

सकाम अथवा प्रजा के हित की कामना से अथवा नारायण के निमित्त व अन्य प्रकार से काया शुद्ध कर जो व्रती हो उसको चारों प्रकार के फल की प्राप्ति होती है।।२२।।

बारह वर्ष माघ में अदिति ने बिना अन्न ग्रहण किए स्नान किया उसके फल से उसे त्रिलोक को उज्जवल करने वाले 12 पुत्र उत्पन्न हुये ।।२३।।

माघ स्नान से ही रोहिणी सुभगा और अरुंधति दानशीला हुई और इंद्राणी जैसी स्वरूप वान होकर सैट महले में निवास करती थीं।।२४।।

जिसके विमल शोभा युक्त निर्मल आंगन, नृत्यांगनाओं से शोभायमान थे, जहाँ अनेक दीपक जल रहे थे, रूपवती स्त्रियों स्त्रियों से संकुल ।।२५।।

गीत बाजों के शब्द से संयुक्त मंगलाचारों से शोभित, वेद्ध्वनी से पवित्र विद्वान ब्राह्मणों से युक्त।।२६।।

देवाचरण में तत्पर तथा अतिथियों के शोभित रमणीक  स्थान में निवास मकर के रवि में स्नान करने वाले को प्राप्त होता है।।२७।।

जिसने माघ महीने में बहुत दान दिया तथा भगवान की पूजा, स्तुति की है, इष्ट वस्तु का दान और व्रत नियम का पालन किया वह श्रेष्ठ है।।२८।।

माघ महीना सदा धर्म को उत्पन्न करने वाला और पाप का नाशक है। फल देने से का मूल और निष्काम होने से ज्ञान देने वाला है।।२९।।

ज्ञानियों को और वन में रहकर तप करने वालों को जो लोक मिलते हैं, विष्णु भक्त को जो लोक मिलते हैं, वही लोक सर्वदा माघ स्नान करने वाले को मिलता है।।३०।।

और पुण्यों के क्षीण  होने पर देवलोक से तो यहाँ आना होता है, परंतु माघ स्नान करने वाले वैकुंठ से दोबारा यहाँ नहीं आते।।३१।।

माघ स्नान कर जो मनुष्य दुधारी गाय दान करता है, हे राजन ! गाय के शरीर में जितने रोम हैं ।।३२।।

उतने ही सहस्त्र वर्ष तक वह स्वर्ग में स्थित होता है। माघ स्नान कर जो गुड़ तिल का दान करता है ।।३३।।

वह मनुष्य पाप रहित निर्मल हो जाता है।  विशेषकर सब धान्यों में टिल पाप का नाश करने वाला है।।३४।।

इस कारण यत्न पूर्वक माघ मास में तिल का दान करें।  माघ स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन करवायें।।३५।।

तो वह अपने पितरों को तृप्त कर  पाप रहित हो विष्णु लोक को जाता है, इस कारण सब यत्न करके माघ में दान करें ।।३६।।

हे राजन ! दान के बिना किसी प्रकार भी माघ स्नान को ना जाने दें, अपने वित्त के अनुसार मनुष्य को सदैव माघ में दान करना चाहिये।।३७।।

जो माघ स्नान करके उपनाह  कमंडलु ब्राह्मण को देता है  उसकी स्वर्ग में प्रतिष्ठा होती है।।३८।।

हे राजन! जो माघ में स्नानमय तप करते हैं और दान किए बिना नहीं रहते उनको इस दान के करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।।३९।।

दान से स्वर्ग और सुख प्राप्त होता है और महापाप दूर हो जाते हैं ।।४०।।

बिना दान किए तप की शोभा उसी प्रकार नहीं होती जैसे सूर्य के बिना आकाश, संतान के बिना कुल और अचार के बिना गृह शोभा को प्राप्त नहीं होता।।४१।।

इससे अधिक पवित्र और पाप नाशक कोई नहीं है। यह बात भृगु जी ने मणि पर्वत पर विद्याधरों से कही है।।४२।।

।। इति श्री पद्मपुराणे माघमसमहात्मये दिलीप वसिष्ठ संवादों नाम द्वितीयोध्यायः सामाप्त ।।२।।

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