माघ मास महात्म्य– आठवाँ अध्याय
माघ मास महात्म्य, आठवाँ अध्याय
ऋषि बोले :- वह प्रसन्न मन हो मार्ग में दूत से पूछने लगा कि ह्रदय में बड़ा संदेह कर मैं परम विस्मय में को प्राप्त हुआ ।।१।।
मन में विचार करता हूँ कि किस पुण्य के प्रभाव से मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हुई।
विकुण्डल बोला– है श्रेष्ठ दूत! मुझे बड़ा संदेह है, इस कारण तुमसे पूछता हूँ ।।२।।
हम दोनों ने समान कुल में जन्म लिए लेकर समान ही कर्म किए तथा दुर्मृत्यु भी समान ही हुई और समान ही यमराज के दर्शन भी हुआ ।।३।।
फिर समान–कर्मा मेरा भाई किस कारण से नरक को गया और मुझे वर्ग कैसे प्राप्त हुआ यह संदेह तुम दूर करो
हे देवदूत! अपने स्वर्ग आने का कारण मैं नहीं देखता हूँ। यह सुन देवदूत विकुण्डल से बोला ।।५।।
यमदूत बोला!हे विकुण्डल माता, पिता, पुत्री, भगनी, भाई यह संज्ञा तो जन्म के कारण है , जन्म कर्म फल के भोगने को होता है ।।६।।
जैसे वृक्ष पर अनेक पक्षियों का आगमन होता है, इसी प्रकार पुत्र, माता-पिता आदि का समागम होता है ।।७।।
उनके योग से जो पुरुष पूर्व भावित कर्म करता है, उसी कर्म से वह पुरुष सब कर्मों को भोग करता है ।।८।।
हे वैश्य! प्रीति पूर्वक तुझसे मैं सत्य कहता हूँ कि मनुष्य अपना किया हुआ शुभाशुभ कर्म समय-समय पर बारंबार भोगता है ।।९।।
एक ही कर्म करता और एक ही उसका फल भोगता है। हे वैश्य! कोई किसी के कर्म को प्राप्त नहीं होता है ।।१०।।
इस कारण तेरा भ्राता घोर नरक में गया है । हे धर्मात्मान ! तुम धर्म आचरण के कारण स्वर्ग लोक को जाते हो ।।११।।
विकुण्डल बोला :- हम दोनों ने सदा पाप किया, कभी धर्म में मन नहीं लगाया, यदि आप हमारा पुण्य जानते हो तो कृपा करके कहो ।।१२।।
यमदूत ने कहा :– हे वैश्य !जो तूने किया है तो मैं कहता हूँ तू सुन, मैं सब जानता हूँ परंतु तुझको उसकी खबर नहीं ।।१३।।
हर मित्र का पुत्र सुमित्र जो वे पारगामी ब्राह्मण था, उसका पुनीत आश्रम यमुना के तट दक्षिण तट पर है ।।१४
।।
हे वैश्य श्रेष्ठ! वन में उसके साथ तेरी मित्रता हो गई और उस सत्संग के प्रभाव से तूने माघ के महीने में ।।१५।।
यमुना के पाप हरने वाले पवित्र जल में जो सब पाप दूर करने में लोक विख्यात तीर्थ है दो स्नान किये थे ।।१६।।
सो एक बार के स्नान के कारण तू सब पापों से विमुक्त हुआ और दूसरे के पुण्य से स्वर्ग की तुझको प्राप्ति हुई ।।१७।।
इस पुण्य के प्रभाव से तू स्वर्ग में आनंद कर और नर्क में तेरा भाई यम यातना भोगे ।।१८।।
वह असीपत्रों से छेदीत और मुदगरों से भेदित, पत्थरों के प्रहार से चूर्णित,तप्त अंगारों से तपित होगा ।।१९।।
श्री दत्तात्रेय जी बोले :– इस प्रकार दूत के वचन सुनकर भाई के दुख से दुखी सब अंगों से पुलकित दीन हो विनय पूर्वक।।२०।।
देवदूत से मधुर वचन बोला :- हे महात्मन ! सत्पुरुषों का सात पद के साथ होने से मित्रता हो जाती है ।।२१।।
इसलिए मित्रता का भाव विचार कर तुम मेरे ऊपर कृपा करो मैं तुमसे तत्व की बात सुनने की इच्छा करता हूँ, मेरे विचार से तुम सर्वज्ञ हो ।।२२।।
अतः किस कर्म से मनुष्य यमलोक का दर्शन नहीं करते और किससे मनुष्य नरक को जाते हैं, तो कृपा करके मुझसे कहो ।।२३।।
यमदूत बोला हे:– हे सौम्य!तूने भली बात पूछी तू इस समय पाप रहित है, विशुद्ध हृदय होने से पुरुषों की कल्याण मार्ग में बुद्धि लगाती है ।।२४।।
यद्यपि पर सेवा में होने से मुझे अवसर नहीं है, तथापि तेरी प्रीति के कारण मैं तुझसे कहता हूँ ।।२५।।
सब अवस्थाओं में मन, वचन, कर्म से जो किसी को पीड़ा नहीं देता है, वे यमालय को नहीं जाते ।।२६।।
हिंसा करने वाला वेद, दान, यज्ञ, तप से भी सद्गति को प्राप्त नहीं होते ।।२७।।
अहिंसा ही परम धर्म, अहिंसा ही परम तप, अहिंसा ही परम दान ऐसा मुनि जनों ने सदा कथन किया है ।।२८।।
मशक, डांस, खटमल, लीख, जूं आदि को भी दयालु पुरुष पीड़ा देने की इच्छा नहीं करते वरन अपने समान रक्षा करते हैं ।।२९।।
तपते अंगारों के कील वाले मार्ग में प्रेत की तरंग वाली दुर्गति वे पुरुष नहीं देखते तथा कृतांत का दर्शन नहीं करते हैं।।३०।।
जो जल–थल के प्राणियों की हिंसा करते हैं और अपने भोजन के निमित्त करते हैं, वे काल सूत्र की दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।।३१।।
वहाँ उनको उनके शरीर का ही मांस भोजन करने को मिलता है, राध, रुधिर, फेन, मज़्ज़ा, वसा मिलती है, वहाँ ओंधे मुख करके डाल दिया जाते है, जहाँ उन्हें कीड़े काटते हैं ।।३२।।
अंधकार में परस्पर एक दूसरे को खाते हैं । इस प्रकार दारुण शब्द करते एक कल्प तक वहाँ निवास करना पड़ता है ।।३३।।
हे वैश्य! फिर वे नरक से निकलकर स्थावर योनि को प्राप्त होते हैं, फिर यह क्रूर अनेक त्रियग योनि में निवास करते हैं ।।३४।।
हे वैश्य! फिर वे जन्मांध, काने, कुबड़े, लंगड़े, दरिद्र, अंगहीन होते हैं, जो प्राणियों की हिंसा करते हैं ।।३५।।
हे वैश्य! इस कारण दोनों लोक में सुखार्थी को मन तथा वाणी से पराया द्रोह कभी नहीं करना चाहिये ।।३६।।
हिंसा करने वालों को दोनों लोकों में सुख प्राप्त नहीं होता है। जो किसी की हिंसा नहीं करते उनको कहीं भय नहीं होता ।।३७।।
जिस प्रकार सीधी तथा वक्रगामिनी नदियां समुद्र में प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार से संपूर्ण धर्म अहिंसा द्वारा प्राप्त होते हैं, यह दृढ़ निश्चय है ।।३८।।
।।इस प्रकार श्री पद्म पुराण के अंतर्गत माघ मास महात्मा में विकुण्डल तथा दूत संवाद नामक अष्टम अध्याय समाप्त ।।८।।
मन में विचार करता हूँ कि किस पुण्य के प्रभाव से मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हुई।
विकुण्डल बोला– है श्रेष्ठ दूत! मुझे बड़ा संदेह है, इस कारण तुमसे पूछता हूँ ।।२।।
हम दोनों ने समान कुल में जन्म लिए लेकर समान ही कर्म किए तथा दुर्मृत्यु भी समान ही हुई और समान ही यमराज के दर्शन भी हुआ ।।३।।
फिर समान–कर्मा मेरा भाई किस कारण से नरक को गया और मुझे वर्ग कैसे प्राप्त हुआ यह संदेह तुम दूर करो
हे देवदूत! अपने स्वर्ग आने का कारण मैं नहीं देखता हूँ। यह सुन देवदूत विकुण्डल से बोला ।।५।।
यमदूत बोला!हे विकुण्डल माता, पिता, पुत्री, भगनी, भाई यह संज्ञा तो जन्म के कारण है , जन्म कर्म फल के भोगने को होता है ।।६।।
जैसे वृक्ष पर अनेक पक्षियों का आगमन होता है, इसी प्रकार पुत्र, माता-पिता आदि का समागम होता है ।।७।।
उनके योग से जो पुरुष पूर्व भावित कर्म करता है, उसी कर्म से वह पुरुष सब कर्मों को भोग करता है ।।८।।
हे वैश्य! प्रीति पूर्वक तुझसे मैं सत्य कहता हूँ कि मनुष्य अपना किया हुआ शुभाशुभ कर्म समय-समय पर बारंबार भोगता है ।।९।।
एक ही कर्म करता और एक ही उसका फल भोगता है। हे वैश्य! कोई किसी के कर्म को प्राप्त नहीं होता है ।।१०।।
इस कारण तेरा भ्राता घोर नरक में गया है । हे धर्मात्मान ! तुम धर्म आचरण के कारण स्वर्ग लोक को जाते हो ।।११।।
विकुण्डल बोला :- हम दोनों ने सदा पाप किया, कभी धर्म में मन नहीं लगाया, यदि आप हमारा पुण्य जानते हो तो कृपा करके कहो ।।१२।।
यमदूत ने कहा :– हे वैश्य !जो तूने किया है तो मैं कहता हूँ तू सुन, मैं सब जानता हूँ परंतु तुझको उसकी खबर नहीं ।।१३।।
हर मित्र का पुत्र सुमित्र जो वे पारगामी ब्राह्मण था, उसका पुनीत आश्रम यमुना के तट दक्षिण तट पर है ।।१४
।।
हे वैश्य श्रेष्ठ! वन में उसके साथ तेरी मित्रता हो गई और उस सत्संग के प्रभाव से तूने माघ के महीने में ।।१५।।
यमुना के पाप हरने वाले पवित्र जल में जो सब पाप दूर करने में लोक विख्यात तीर्थ है दो स्नान किये थे ।।१६।।
सो एक बार के स्नान के कारण तू सब पापों से विमुक्त हुआ और दूसरे के पुण्य से स्वर्ग की तुझको प्राप्ति हुई ।।१७।।
इस पुण्य के प्रभाव से तू स्वर्ग में आनंद कर और नर्क में तेरा भाई यम यातना भोगे ।।१८।।
वह असीपत्रों से छेदीत और मुदगरों से भेदित, पत्थरों के प्रहार से चूर्णित,तप्त अंगारों से तपित होगा ।।१९।।
श्री दत्तात्रेय जी बोले :– इस प्रकार दूत के वचन सुनकर भाई के दुख से दुखी सब अंगों से पुलकित दीन हो विनय पूर्वक।।२०।।
देवदूत से मधुर वचन बोला :- हे महात्मन ! सत्पुरुषों का सात पद के साथ होने से मित्रता हो जाती है ।।२१।।
इसलिए मित्रता का भाव विचार कर तुम मेरे ऊपर कृपा करो मैं तुमसे तत्व की बात सुनने की इच्छा करता हूँ, मेरे विचार से तुम सर्वज्ञ हो ।।२२।।
अतः किस कर्म से मनुष्य यमलोक का दर्शन नहीं करते और किससे मनुष्य नरक को जाते हैं, तो कृपा करके मुझसे कहो ।।२३।।
यमदूत बोला हे:– हे सौम्य!तूने भली बात पूछी तू इस समय पाप रहित है, विशुद्ध हृदय होने से पुरुषों की कल्याण मार्ग में बुद्धि लगाती है ।।२४।।
यद्यपि पर सेवा में होने से मुझे अवसर नहीं है, तथापि तेरी प्रीति के कारण मैं तुझसे कहता हूँ ।।२५।।
सब अवस्थाओं में मन, वचन, कर्म से जो किसी को पीड़ा नहीं देता है, वे यमालय को नहीं जाते ।।२६।।
हिंसा करने वाला वेद, दान, यज्ञ, तप से भी सद्गति को प्राप्त नहीं होते ।।२७।।
अहिंसा ही परम धर्म, अहिंसा ही परम तप, अहिंसा ही परम दान ऐसा मुनि जनों ने सदा कथन किया है ।।२८।।
मशक, डांस, खटमल, लीख, जूं आदि को भी दयालु पुरुष पीड़ा देने की इच्छा नहीं करते वरन अपने समान रक्षा करते हैं ।।२९।।
तपते अंगारों के कील वाले मार्ग में प्रेत की तरंग वाली दुर्गति वे पुरुष नहीं देखते तथा कृतांत का दर्शन नहीं करते हैं।।३०।।
जो जल–थल के प्राणियों की हिंसा करते हैं और अपने भोजन के निमित्त करते हैं, वे काल सूत्र की दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।।३१।।
वहाँ उनको उनके शरीर का ही मांस भोजन करने को मिलता है, राध, रुधिर, फेन, मज़्ज़ा, वसा मिलती है, वहाँ ओंधे मुख करके डाल दिया जाते है, जहाँ उन्हें कीड़े काटते हैं ।।३२।।
अंधकार में परस्पर एक दूसरे को खाते हैं । इस प्रकार दारुण शब्द करते एक कल्प तक वहाँ निवास करना पड़ता है ।।३३।।
हे वैश्य! फिर वे नरक से निकलकर स्थावर योनि को प्राप्त होते हैं, फिर यह क्रूर अनेक त्रियग योनि में निवास करते हैं ।।३४।।
हे वैश्य! फिर वे जन्मांध, काने, कुबड़े, लंगड़े, दरिद्र, अंगहीन होते हैं, जो प्राणियों की हिंसा करते हैं ।।३५।।
हे वैश्य! इस कारण दोनों लोक में सुखार्थी को मन तथा वाणी से पराया द्रोह कभी नहीं करना चाहिये ।।३६।।
हिंसा करने वालों को दोनों लोकों में सुख प्राप्त नहीं होता है। जो किसी की हिंसा नहीं करते उनको कहीं भय नहीं होता ।।३७।।
जिस प्रकार सीधी तथा वक्रगामिनी नदियां समुद्र में प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार से संपूर्ण धर्म अहिंसा द्वारा प्राप्त होते हैं, यह दृढ़ निश्चय है ।।३८।।
।।इस प्रकार श्री पद्म पुराण के अंतर्गत माघ मास महात्मा में विकुण्डल तथा दूत संवाद नामक अष्टम अध्याय समाप्त ।।८।।
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