वैशाख मास माहात्म्य
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वैशाख मास माहात्म्य अष्टम अध्याय, नारद और अम्बरीष संवाद के अंतर्गत कामदाह
मिथिला के राजा ने कहा – यह ब्राह्मण इक्ष्वाकु वंश का पुत्र बल का दान न करने से तीन बार पपीहा हुआ, बाद में मेरे गृह में छिपकली हुआ, ।।१।।
उसके पापों में फल स्वरुप में ऐसा उचित ही हुआ और संतों की सेवा ना करने के कारण उसको गिद्ध की योनि पाई और कुत्ते की योनि ।।२।।
आपने कहा कि उसने सात बार पाई यह मुझको उचित नहीं जान पड़ता, उसने संतो को दोष नहीं दिया और पाप भी नहीं किया ।।३।।
इसलिये उसकी सेवा न करने के कारण उसको निश्चय फल न मिलना चाहिय, दूसरों को पीड़ा देने वाले को अवश्य इसका दंड मिलना चाहिये और अनर्थ का कारण होता है ।।४।।
उसको बिना कारण यह बुरी योनि क्यों मिली? अपने प्रिय शिष्य की इस शंका को दूर कीजिये ।।५।।
राजा के ऐसा प्रश्न करने पर महा यशस्वी श्रुतदेव जी धन्य ! धन्य ! ऐसा कहकर वर्णन करने में प्रवृत्त हुए थे ।।६।।
श्रुतदेव जी बोले – हे राजन ! पुण्यात्मा सुनो मैं कहता हूँ, दिव्य कैलाश के शिखर पर शिवजी ने पार्वती से यह कहा था ।।७।।
इन सब लोकों की सृष्टि करके बाद में इनमें रहने वाले लोगों के लिये इस संसार तथा परलोक को दो प्रकार की विधि बनाई ।।८।।
प्रभु ने इसकी स्थापना के लिए प्रत्येक के तीन-तीन हेतु रखे, यथा जलसेवा, अन्नसेवा तथा औषधि की सेवा ।।९।।
हे महाभाग ! यह तीनों इस संसार की स्थिति के कारण हैं, इस प्रकार से है राजन ! श्रुतियों में परलोक के लिए भी तीन कारण कहे गए हैं ।।१०।।
साधुओं की सेवा, विष्णु की सेवा तथा धर्म की सेवा यह तीनों परलोक के हेतु पूर्व काल से निर्माण हुए हैं ।।११
।।
जिस प्रकार से घर में इकट्ठे किये धन मार्ग में प्रयोग होता है, हे राजन ! इस संसार में किया हुये कर्म संपत्ति को देने वाला होता है ।।१२।।
और हे राजन ! साधुओं की दुःसह इच्छा भी कभी-कभी अनर्थ का कारण होती है ।।१३।।
तब यह स्पष्ट है कि अग्रिम वाक्य जो दुख का हेतु होता है, तो क्यों बोले, इसका एक प्राचीन इतिहास मैं कहता हूँ ।।१४।।
इस रोमांचकारी पाप नष्ट करने वाले अति आश्चर्य कारक वृतांत को सुनकर प्राचीन काल में यज्ञ दीक्षा के लिए आए हुए दक्ष प्रजापति ।।१५।।
भूतभावन महादेव जी को बुलाने के लिए कैलाश पर गए, उनके हित की कामना करने वाले महादेव जी उनको देख कर नहीं उठे ।।१६।।
मैं सब देवताओं का गुरु हूँ सनातन हूँ तथा वेदों में निपुण हूँ, यह सब बलि लेने वाले इंद्र आदि देवता मेरे नौकर हैं ।।१७।।
शास्त्र जानने वालों का यह मत है कि मालिक नौकर के लिये, पति अपनी भार्या के लिये तथा गुरु शिष्य के लिए ना खड़ा हो ।।१८।।
गुरुत्व के विषय में संबंधी कारण नहीं होता, श्रुति वाक्य यह है कि बल, ज्ञान, तथा शांति जिसमें अधिक होती है ।।१९।।
वह गुरु कहलाता है, इसके सिवाय यह नीच भृत्य है, जो स्वामी इत्यादि के आने पर आदर के लिए खड़े नहीं हो जाते ।।२०।।
उनकी आयु, धन तथा यश और संतन अति शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, इसलिये यद्यपि यह मेरा प्रिय और ससुर है तो भी मैं नहीं खड़ा होता ।।२१।।
इस प्रकार सोचकर उनके हित को चाहने वाले शिवजी अपने आसन से नहीं उठे, शिवजी को न उठे देखकर प्रजापति बड़े कुरूद हुए ।।२२।।
और महादेव जी के सामने ही अनेक प्रकार से उनकी निंदा करने लगे
दक्षप्रजापति बोले – वह ! इस दरिद्र, अकृतात्मा को बड़ा घमंड है ।।२३।।
जिसका धन अधिक वय वाला बैल है, जिसके शरीर में चमड़ा ही शेष रह गया है, कपालिस्थ धारण करता है, अतएव बड़ा पाखंडी है ।।२४।।
ईश्वर इस वृथा अहंकार करने वाले को कैसे कल्याण देगा, संसार में नीति जानने वाले जानते हैं कि चर्म धारी यह अपवित्र है ।।२५।।
यह दरिद्र शीत से ग्रस्त होकर हाथी के अपवित्र चमड़े को धारण करता है, जिसका घर शमशान है और सर्प आभूषण हैं ।।२६।।
न इसमे धैर्य है, न ज्ञान है, व्रकासुर ने इसको भगा दिया था, दिन रात भूत, प्रेत, पिशाच इत्यादि दूरजनों का इसका साथ है ।।२७।।
न इसके कुल के विषय में कुछ सुना जाता है, न यह साधुओं से प्रशंसा किया जाता है, दुरात्मा नारद ने पूर्व काल में वृथा इसकी प्रशंसा की थी ।।२८।।
इसके समझाने पर मैंने अपनी कन्या शक्ति का ब्याह इसके साथ कर दिया, वह भी पृथक धर्म की हो गई और सुख से इसके घर में रहती है ।।२९।।
हम लोगों से प्रशंसा करने योग्य यह नहीं हैं और हमारी कन्या भी गई, जैसे कुमार का घड़ा चांडाल के हाथ चला गया हो ।।३०।।
इस प्रकार से दुर्बुद्धि सती तथा शिव को बिना बुलाये उनकी निंदा करके चुपचाप घर चला गया ।।३१।।
तब यज्ञशाला में जाकर ऋत्विक तथा मुनियों के साथ शिवजी की निंदा करते हुए यज्ञ करने लगा ।।३२।।
ब्रह्मा तथा विष्णु को छोड़कर सब देवता आये तथा सिद्ध, चारण, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, तथा किन्नर लोग भी आय ।।३३।।
तब पुण्यवती सती देवी स्त्री जाति की चंचलता से प्रलुब्ध हो कर उत्सव देखने तथा आये हुये बंधुओं को देखने के लिए उत्सुक हुई ।।३४।।
चंचल स्त्री स्वभाव के कारण महादेव जी से रोके जाने पर भी "अवश्य जाना चाहिए" यह निश्चय करके जाने के लिये उद्यत हो गई ।।३५।।
शिवजी ने कहा – हे वरवारिणी ! दक्ष प्रजापति सदा सभा के बीच मेरी निंदा करता है, वह तुमसे सही न जाएगी उसको सुनकर तुम सचमुच शरीर का त्याग दोगी ।।३६।।
मेरी कृपा की इच्छा करने वाली तुमको न सहने की बात भी सहनी पड़ेगी हे देवी ! मैंने जैसे किया है, वह तुमसे न होगा ।।३७।।
इसलिए तुम यज्ञशाला में मत जाना, निश्चय ही तुम्हारा कल्याण न होगा। इस प्रकार से यह समझाये जाने पर भी सती चपलता के कारण फिर भी गई
।।३८।।
सती घर से अकेली पैदल चलने लगी, ऐसा देखकर नंदी बैल ने शीघ्र ही उसको अपनी पीठ पर बैठा लिया ।।३९।।
करोड़ों भूत समुदाय तब सती के पीछे पीछे चलने लगे यज्ञशाला में जाकर वह अन्तःपुर में गई ।।४०।।
सती को देखकर सब लोग चुप रहे, यह देखकर दुखी होकर वहाँ से निकली और पति के वचनों को स्मरण करके यज्ञ मंडप में गई ।।४१।।
सब लोगों ने तथा उसके पिता ने उनको देखकर आशीर्वाद नहीं दिया। वहाँ रुद्र रुद्र का स्थान न देख तथा पिता की इस चेष्टा को देखती हुई चुपचाप खड़ी हो गईं ।।४२।।
रुद्र को छोड़कर आहुति देते देख आँख में आँसू भर कर।
देवी बोली – जो मनुष्य बड़ों का उल्लंघन करते हैं, उनका प्रायः कल्याण नहीं होता ।।४३।।
लोकों के निर्माण करने वाले, लोकों का पालन पोषण करने वाले, सबके प्रभु तथा
नाश न होने वाले वाले ऐसे शंभू को हवि क्यों नहीं दी जाती ।।४४।।
इन आये हुए महात्माओं मैं से एक ने भी तुम्हारी दुर्बुद्धि हरण नहीं कि, इसका भाग्य भी उल्टा दिखाई पड़ता है ।।४५।।
उनका ऐसा भाषण करने पर पूषा देवत हंसने लगे और अभाग भृगु ऋषि अपनी दाढ़ी फटकारने लगे ।।४६।।
दूसरे भुजा, पैर, जांघ और काँख फटकारने लगे और हत भाग उनके पिता निंदा करने लगे ।।४७।।
ऐसा सुनकर महादेव जी की भार्या आक्रोश से मन में व्याकुल हुई और उन सती ने और ऐसा सुनने का प्रायश्चित करने के लिये देह को त्याग दिया ।।४८।।
और वह सबके देखते हुए यज्ञकुंड की अग्नि में कूद पड़ी, तब बड़ा हाहाकार हुआ और जल्दी से शिवजी के गण दौड़े ।।४९।।
और उन्होंने महादेव जी से सब वृतांत कहा, यह शंकर महादेव जी ने यमराज के समान एका– एक उठकर ।।५०।।
हाथ से अपनी जटा उखाड़ कर उसको पृथ्वी पर पटका तब विपुल शरीर धरि महाबली वीरभद्र उत्पन्न हुआ ।।५१।
उसको सौ भुजा हुई और उसका तेज यमराज के समान था वह हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और उसने शिवजी से कहा ।।५२।।
जिस निमित्त से आपने मुझे उत्पन्न किया है, उस काम मे मुझे लगाइये, ऐसा कहने पर क्रुद्ध महादेव जी ने सामने खड़े हुए उससे कहा ।।५३।।
तू मेरे निंदक दक्ष को मार डाल, उसी के करण मेरी प्रिया मरी, इसी महाबली के साथ भूतों के समुदाय भी जाये ।।५४।।
भगवान से ऐसी आज्ञा पाकर वह सब शीघ्र ही दक्ष की सभा में पहुंचे और उन्होंने देवता, दैत्य, मनुष्य इत्यादि सब बड़े-बड़े वीरों को मार डाला ।।५५।।
हंसने वाले पूषा के दांत और जटा को नोच डाला, और उस दुरात्मा भृगु की मूंछ दाढ़ी उखाड़ डाली ।।५६।।
उस पराक्रमी ने उन सभी के अंग जिन्होंने पहले फड़काये थे तोड़ डाले और तब दक्ष के सिर काटने में बहुत उद्योग करने लगे ।।५७।।
परंतु मुनियों के मन्त्रों के बल से वह रक्षित था, इसलिए नहीं कटता था। यह जानकर महादेव जी ने स्वयं आकर उस दुष्ट का सिर काट डाला ।।५८।।
इस प्रकार से यज्ञ में आये हुए सबको मार कर अपने अनुचारो के साथ अपने घर आये जो मारे जाने से बच गए थे, वे ब्रह्मा की शरण में गए ।।५९।।
इसके साथ ब्रहमा जी कैलाश पर शिवजी के स्थान पर गये तब अनेकों वचनों से उन्होंने उनके क्रोध को शांत किया ।।६०।।
उन्हीं के साथ महादेव जी यज्ञ स्थान में पहुंचे और दक्ष की सभा में आये हुए सबको जीवित कर दिया ।।६१।।
तब शिव ने प्रसिद्धि के लिये दक्ष के धड़ पर बकरे का सिर लगा दिया, महात्मा भुगु को बकरे की दाढ़ी लगाई ।।६२।।
पूषा के दांत नहीं लगाये उनको पीसकर खाने वाला रहने दिया, शिव जी ने बिना क्रम के किसी के अंग किसी में लगाये ।।६३।।
ब्रह्मा तथा शिव जी से सबका कल्याण हो गया और पहले की तरह महात्मा लोग यज्ञ करने में लगे ।।६४।।
यज्ञ के अंत में देवता लोग अपने अपने घर गये, नैष्ठिक ब्रहमचर्य को करके महादेव जी महातप ।।६५।।
गंगा जी के तट पर पुन्नाग वृक्ष के नीचे तप करने लगे, दक्ष की पुत्री पतिव्रता सती देवी ने जिसने अपने शरीर का त्याग किया था ।।६६।।
हिमाचल कि मेनका के कोख से जन्म लिया, और उसके घर पालने लगी। उसी समय तारकासुर नाम का बड़ा दानव उत्पन्न हुआ ।।६७।।
उसने अति तीव्र तपस्या से परमेष्ठी ब्रह्मा की आराधना करके देव,दैत्य, मनुष्य तथा सर्पों से न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया ।।६८।।
वह महाबली दैत्य महादेव जी के पुत्र के बिना किसी प्रकार के शास्त्रों से तथा अस्त्र समुदाय से न मरेगा ।।६९।।
ऐसा वर लोकपितामह ब्रह्मा जी ने उसको दिया। महादेव जी को स्त्री तथा पुत्र न होने को कहा, उसने कहा ऐसा ही होवे ।।७०।।
वर को प्राप्त करके अपने घर जाकर वह लोकों को कष्ट देने लगा, देवताओं को दास बनाया और उसने घर में देवीयाँ मार्जन इत्यादि दासी का कार्य करने लगीं ।।७१।।
तब देवता लोग उससे पीड़ित होकर ब्रह्मा की शरण में गये, उनसे अपनी पीड़ा का वर्णन किया तब ब्रह्मा ने देवताओं से कहा ।।७२।।
ब्रह्मा जी बोले – हे देवताओं ! मैंने वर देते समय उस दुरात्मा को यह वर दिया था कि महादेव जी के पुत्र के सिवाय किसी दूसरे से नहीं मरेगा ।।७३।।
प्राचीन समय में शिव जी की पत्नी सती ने यज्ञ में अपना शरीर छोड़ दिया था, वह हिमाचल की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई है और उस नाम पार्वती पड़ा है ।।७४।।
शिव जी हिमाचल पर्वत के ऊपर बड़ी तपस्या कर रहे हैं लोकेश्वर प्रभु शिवजी का पार्वती के साथ विवाह करना चाहिये ।।७५।।
इनसे उत्पन्न हुआ पुत्र तुम लोगों के शत्रुओं को मारेगा, ब्रह्मा के ऐसा समझाने पर इंद्र इत्यादि देवता अपने अपने घर चले गये ।।७६।।
सब वे देवता लोग इंद्र के सहित इंद्रपुरी में गये और वहाँ देव गुरु बृहस्पति जी से सलाह करके पाकशासन इंद्र भगवान ने ।।७७।।
अपने कार्य की पूर्ति के लिए नारद तथा कामदेव को याद किया, तब इन दोनों ने वहाँ आने पर इंद्र ने यह वाक्य कहा ।।७८।।
आप हिमाचल के पास जाकर उसे ये कहिये कि, हे हिमाचल ! तेरी कन्या पहले महादेव जी की पत्नी थी ।।७९।।
दक्ष की कन्या के विछोह में शिवजी तेरे शिखर पर तप कर रहे हैं उनकी सेवा के लिए अपनी उनकी प्रिया को नियुक्त करो ।।८०।।
वही उनकी भार्या होगी और वह उसका पति होंगे। इंद्र से ऐसी आज्ञा पाकर नारद जी ने उस पर्वत के पास जाकर ।।८१।।
वैसा ही किया जैसा इंद्र ने कहा था। बाद में काम को इंद्र ने बुलाकर यह कहा ।।८२।।
देवताओं के हित के लिये तथा शिव जी के हित के लिए बसंत के साथ शिवजी के तपोवन में जाकर ।।८३।।
वहाँ इच्छा अनुरूप बसंत के गुणों को फैलाकर जब पार्वती शिवजी के समीप होये ।।८४।।
तब तुम बाण चलाकर महाप्रभु को मोहित करो, इन दोनों के साथ हो जाने पर तुम्हारा कार्य असफल न होगा ।।८५।।
ऐसी आज्ञा होने पर काम देव जी ने बहुत अच्छा कहकर प्रस्थान किया और वह बसंत के साथ, रति के साथ तथा अपने सेवकों के साथ उस जंगल में गये ।।८६।।
अपनी शक्ति से बिना समय के ही वसंत ऋतु का विस्तार किया, उस सुंदर वन में सर्वत्र मंद वायु बहने लगी ।।८७।।
कदाचित महादेव जी ने भी पार्वती की सेवा से प्रसन्न होकर उनको अपनी गोद में बैठकर कुछ बातचीत करना आरंभ किया ।।८८।।
प्राण प्रिय के संग का यही है,ऐसा निश्चय करके उत्तम धनुष को लेकर शिवजी के पीछे की और चला गया ।।८९।।
और पेड़ को आड़ बनाकर एक बाण छोड़ा दूसरा छोड़ने के लिये बड़ा उद्योग कर रहा था ।।९०।।
इतने में मोहित चित्त होकर शिवजी चिंता करने लगे मेरा मन तो कभी चलायमान नहीं होता किसने इसको चंचल कर दिया ।।९१।।
इस चिंता से व्याकुल होकर उन्होंने बाईं और कामदेव को देखा, क्रोधित होकर ललाट की आँख को खोलकर और अपनी गोद से देवी को हटाकर ।।९२।।
ऐसी तीक्ष्ण अग्नि पकट की जो लोकों को डरा देने वाली थी। उसी से बाण लिए हुए कामदेव उसी क्षण जल कर भस्म हो गये ।।९३।।
कार्य की सिद्धि ना देकर देवता लोग स्वर्ग में भाग गये, बसंत तथा रति भी आपने दाह की शंका करने लगे ।।९४।।
डरी हुई पार्वती देवी भी आँख मूंदकर दूर भाग गई और स्त्रियों की समीपता हटाने के लिये शिवजी भी अंतर्ध्यान हो गये ।।९५।।
शिव जी तथा देवी के चित्त के हित करने वालों के लिये अनर्थ ही हुआ, यदि अप्रिय किया जाता तो क्या होता ।।९६।।
इसलिये इक्ष्वाकु वंश का पुत्र सर्वदा साधुओं को अप्रिय था और वह दुर्बुद्धि अपना हित करने वाले संतो की सेवा नहीं करता था ।।९७।।
इसी कारण से उसने बड़े-बड़े दुखों का अनुभव किया और जो त्रियार्क योनि प्राप्ति की, इसलिए सब अर्थों को साधन करने वाले साधुओं की सेवा आवश्यक करनी चाहिये ।।९८।।
महाप्रभु शिवजी का अप्रिय करने वाला कामदेव ने भविष्य जन्म में तथा जन्म काल में बहुत से दुःख प्राप्त किये ।।९९।।
जो लोग इस पुण्य इतिहास को दिन रात सुनते हैं, वे जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा इत्यादि से मुक्त हो जाते हैं इसमें कोई संदेह नहीं है ।।१००।।
।।इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के वैशाख मास के अंतर्गत नारद और अम्बरीष संवाद के अंतर्गत कामदाह नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।।८।।
छब्बीसवाँ अध्याय, वैशाख मास की अंतिम तीन तिथियाँ की महत्ता तथा ग्रंथ का उपसंहार।
श्रुतदेव जी कहते है* - राजेंद्र! वैशाख के शुक्लपक्ष में जो अंतिम तीन त्रयोदशी से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियां हैं, वे बड़ी पवित्र और शुभ कारक है।
उनका नाम 'पुष्करिणी' है , वे सब पापों का क्षय करने वाली है। जो संपूर्ण वैशाख मास में स्नान करने में असमर्थ हो, वह यदि इन तीन तिथियों में भी स्नान कर, तो वैशाख मास का पूरा फल पा लेता है।
पूर्वकालमें वैशाख मास की एकादशी तिथि को शुभ अमृत प्रकट हुआ।
द्वादशी को भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की। त्रियोदशी उन श्रीहरिने देवताओं को सुधा-पान कराया। चतुर्दशी को देश विरोधी दैत्यों का संहार किया और पूर्णिमा के दिन समस्त देवताओं को उनका साम्राज्य प्राप्त हो गया।
इसलिए देवताओं ने संतुष्ट होकर इन तीन तिथियों को वर दिया - वैशाख मासकी ये तीन शुभ तिथियां मनुष्यों के पापों का नाश करने वाली तथा उन्हें पुत्र-पोत्र आदि फल देने वाली हो।
जो मनुष्य इस संपूर्ण मास में स्नान न करें सका हो, वह इन तिथियोंमें स्नान कर लेने पर पूर्ण फलको पाता है।
वैशाख मास में लौकिक कामनाओं का नियमन करने पर मनुष्य निश्चय ही भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
महीने भर नियम निभाने में असमर्थ मानव यदि अंत तीन दिन भी कामनाओं का संयम कर सके तो उतने से ही पूर्ण फल को पाकर भगवान विष्णु के धाम में आनंद का अनुभव करता है।
इस प्रकार वर देकर देवता अपने धामको चले गये। अतः पुष्कर्णी नाम से प्रसिद्ध अंतिम तीन तिथियाँ पुण्य दायिनी, समस्त पाप राशि का नाश करने वाली तथा पुत्र-पोत्रको बढ़ाने वाली है।
जो वैशाख मास में अंतिम तीन दिन गीता का पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है।
जो उक्त तीनों दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करता है ,उसके पूण्य फल का वर्णन करने में इस भूलोक तथा स्वर्ग लोक में कौन समर्थ है ?
पूर्णिमा को सहस्त्रनामके द्वारा भगवान मधुसूदन को दूध से नहला कर मनुष्य पाप हीन वैकुंठ धाम में जाता है।
वैशाख मास में प्रतिदिन भागवत के आधे या चौथाई लोग का पाठ करने वाला मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।
जो वैशाख के अंतिम तीन दिनों में भागवत शास्त्र का श्रवण करता है, वह जल से कमल के पत्ते की भांति कभी पापों से लिप्त नहीं होता है।
उक्त तीनों दिनों के सेवन से कितने ही मनुष्य ने देवत्व प्राप्त कर लिया, कितने ही सिद्ध हो गये और कितनों ने ब्रह्मत्व पा लिया ।
ब्रह्मज्ञान से मुक्ति होती है। अथवा प्रयाग में मृत्यु होने से या वैशाख मास में नियम पूर्वक प्रातःकाल जल में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इसलिए वैशाख के अंतिम तीन दिनों में स्नान, दान और भागवत पूजन आदि अवश्य करना चाहिये।
वैशाख मास के उत्तम माहात्म्य का पूरा पूरा वर्णन रोग-शोक से रहित जगदीश्वर भगवान नारायण के सिवा दूसरा कौन कर सकता है।
तुम भी वैशाख मास में दान आदि उत्तम कर्म का अनुष्ठान करो। इससे निश्चय ही तुम्हें भोग और मोक्ष की प्राप्ति होगी।
इस प्रकार मिथिलापति जनक को उपदेश देकर श्रुतदेव जी ने उनकी अनुमति ले वहाँ से जाने का विचार किया।
राजर्षि जनक ने अपने के अभुदय के लिये उत्तम उत्सव कराया और श्रुतदेव जी को पालकी पर बिठाकर विदा किया।
वस्त्र, आभूषण, गौ, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि से उनकी पूजा करके राजा ने उनकी परिक्रमा की।
तत्पश्चात उनके विदा हो महातेजस्वी एवं परम यशस्वी श्रुतदेव जी संतुष्ट हो प्रसन्नता पूर्वक वहाँ से अपने स्थान को गये।
*नारजी जी कहते है*:– अम्बरीष ! यह उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुनाया है, जो कि सब पापों का नाशक तथा संपूर्ण संपत्तियों को देने वाला है।
इससे मनुष्य मुक्ति मुक्ति, ज्ञान एवं मोक्ष पाता है।
नारद जी का यह वचन सुनकर महायशस्वी राजा अम्बरीष मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए।
उन्होंने ब्राह्म जगत के व्यापारों से निवृत्त होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया और अपने संपूर्ण वैभव से उनकी पूजा की।
तत्पश्चात उनसे विदा लेकर देवऋषि नारद जी दूसरे लोक में चले गये; क्योंकि दक्ष प्रजापति के शाप से एक स्थान पर नहीं ठहर सकते।
राजर्षि अम्बरीष भी नारदजी के बताये हुए सब धर्मों का अनुष्ठान करके निर्गुण परब्रह्म परमात्मा में विलीन हो गये।
जो इस पाप नाशक एवं पूण्य वर्धक उपाख्यान को सुनता अथवा पढ़ता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
जिनके घर में यह लिखी हुई पुस्तक रहती है, उनके हाथ में मुक्ति आ जाती है।
फिर जो सदा इसके श्रवण में मन लगाते हैं, उनके लिए तो कहना ही क्या है।
*।। इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के वैशाख मास माहात्म्य में वैशाख मास की अंतिम तीन तिथियाँ की महत्ता तथा ग्रंथ का उपसंहार नामक छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त।।२६।।*
*वैशाख मास माहात्म्य समाप्त*
पच्चीसवाँ अध्याय, द्वादशी की महत्ता, द्वादशी के पुण्य दान के एक कुतिया का उद्धार।
शुकदेव जी कहते हैं* :– वैशाख मास की पवित्र तिथियों में शुक्ल पक्ष की द्वादशी समस्त पाप राशि का विनाश करने वाली है।
शुक्ल पक्ष द्वादशी को योग्य पात्र के लिये जो अन्न दिया जाता है, उसके एक-एक दाने में कोटि-कोटि ब्राह्मण भोजन का पुण्य होता है।
शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि में जो भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए जागरण करता है, वह जीवन मुक्त होता है।
जो व्यक्ति वैशाख की द्वादशी तिथि को तुलसी के कोमल दलों से भगवान विष्णु का पूजन करता है, वह समूचे कुल का उद्धार करके बैकुंठ लोक में अधिपति होता है ।
जो मनुष्य त्रयोदशी तिथि को दूध, दही, घी, शक्कर और शुद्ध मधु इन पांचों द्रव्यों से भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए उनकी पूजा करता है, तथा जो पंचामृत से भक्ति पूर्वक श्रीहरि का स्नान कराता है, वह सम्पूर्ण कुल का उद्धार करने वाला भगवान विष्णु के लोग में प्रतिष्ठित होता है।
जो सांयः काल में भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए शर्बत देता है, वह अपने पुराने पापों को शीघ्र ही त्याग देता है।
वैशाख शुक्ल द्वादशी में मनुष्य जो कुछ पुण्य करता है, वह अक्षय फल देने वाला होता है।
प्राचीन काल में कश्मीर देश में देवव्रत नामक एक ब्राह्मण थे। उनके सुंदर रूप वाली एक कन्या थी, जो मालिनी के नाम से प्रसिद्ध थी।
ब्राह्मण ने उस कन्या का विवाह सत्यशील नामक एक बुद्धिमान द्विज के साथ कर दिया ।
मालिनी कुमार्ग पर चलने वाली पुंश्चली हो कर स्वच्छंदता पूर्वक इधर-उधर रहने लगी ।
वह केवल आभूषण धारण करने के लिए पति का जीवन चाहती थी, उसकी हितैषी नहीं थी।
उसके घर में कामकाज करने के बहाने उपपति रहा करता था।
सभी जाति के मनुष्य जार के रूप में उसके यहां ठहरते थे।
वह कभी पति की आज्ञा पालन करने में तत्पर नहीं हुई।
इसी दोष से उसके सब अंगों में कीड़े पड़ गए, जो काल, अन्तक और यम की भांति उसकी हड्डियों में भी छेद डालते थे ।
उन कीड़ों से उसकी नाक, जीव्हा और कान उच्छेद हो गए, स्तन तथा अंगुलिया गल गई, उसमें पंगुता भी आ गई।
इन सब क्लेशों से मुक्त हो मृत्यु को प्राप्त होकर वह नरक की यातनाएं भोगने लगी।
एक लाख पचास हजार वर्षों तक तांबे के भांड में रखकर जलाई गई, सौ बार उसे कुत्ते की योनि में जन्म लेना पड़ा।
तत्पश्चात सौवीर देश में पद्मबंधु नामक ब्राह्मण के घर में वह अनेक दुखों से घिरी हुई कुत्तिया हुई।
उस समय भी उसके कान, नाक, पूछ और पैर कटे हुए थे, उसके सर में कीड़े पड़ गए थे और योनि में भी कीड़े भरे रहते थे।
हे राजन ! इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये।
एक दिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि को पद्मबंधु का पुत्र नदी में स्नान करके पवित्र हो भीगे हुए वस्त्रों से घर आया ।
उसने तुलसी की वेदी के पास जाकर अपने पैर धोये।
दैवयोग से वह कुत्तिया नीचे सोई हुई थी।
सूर्योदय से पहले का समय था ब्राह्मण कुमार के चरणोदक से वह नहा गई और तत्काल उसके सारे पाप नष्ट हो गए।
फिर तो उसी क्षण उसे अपने पूर्व जन्म का स्मरण हो आया पहले के कर्मों की याद आने से वह कुत्तिया तपस्वी के पास जाकर दीनतापूर्वक पुकारने लगी।
हे मुने ! आप हमारी रक्षा करें।
उसने पद्मबंधु मुनि के पुत्र से अपने पूर्व जन्म के दुराचरण पूर्ण वृत्तांत सुनाया और यह भी कहा ब्राह्मण ! जो कोई भी दूसरी युवती पति के ऊपर वशीकरण का प्रयोग करती है, वह दुराचारी मेरी ही तरह तांबे के पात्र में पकाई जाती है।
पति स्वामी हैं, पति ही गुरु है और पति उत्तम देवता है। साध्वी स्त्री उसके पति का अपराध करके कैसे सुख पा सकती है?
पति के अपराध करने वाली स्त्री सैकड़ों बार त्रियार्क योनि में और अरबों कीड़े की योनि में जन्म लेती है ।
इसलिए स्त्रियों को सदैव अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए ।
ब्राह्मण ! आज मैं आपकी दृष्टि के सम्मुख आई हूँ । यदि आप मेरा उद्धार नहीं करेंगे तो मुझे पुनः इसी यातना पूर्ण योनि का दर्शन करना पड़ेगा।
अतः विप्र ! पर मुझ पापाचारणी को वैशाख शुक्ल पक्ष में अपना पुण्य प्रदान करके उबार लीजिए।
आपने जो पूण्य की वृद्धि करने वाली द्वादशी की है, उसमें स्नान दान और अन्न भोजन कराने से जो पुण्य हुआ है, उससे मुझे दुराचारिणी का भी उद्धार हो जाएगा।
हे महाभाग ! दीनवत्सल ! मुझे दुखिया के प्रति दया कीजिये ।
आपके स्वामी जगदीश्वर जगन्नाथ दीनों के रक्षक हैं ।
उनके भक्त भी उन्हीं के समान होते हैं।
दीनवत्सल! मैं आपके दरवाजे पर रहने वाली कुत्तिया हूँ। मुझे दीन के प्रति दया कीजिये मेरा उद्धार कीजिये।
अंत में मैं आप द्विजेन्द्र को नमस्कार करती हूँ।
*उसका वचन सुनकर मुनि के पुत्र ने कहा* :– कुतिया सब प्राणी अपने किये हुए कर्मों का ही सुख-दुख रूप फल भोगते हैं। जैसे सांप को दिया हुआ शक्कर मिश्रित दूध केवल विष की वृद्धि करता है। उसी प्रकार पापी को दिया हुआ पूण्य उसके पापों में सहायक होता है।
मुनि कुमार के ऐसा कहने पर कुत्तिया दुख में डूब गई और उसके पिता के पास जाकर आर्त स्वर में क्रंदन करती हुई बोली ।
*कुतिया ने कहा*:– पद्मबंधु बाबा ! मैं तुम्हारे दरवाजे की कुतिया हूँ। मैंने सदा तुम्हारा जूठन खया है। मेरी रक्षा करो, मुझे बचाओ।
गृहस्थ महात्मा के घर पर जो पालतू जीव रहते हैं, उनका उद्धार करना चाहिये, यह वेद–वेदताओं का मत है।
चांडाल, कौवे, कुत्ते यह प्रतिदिन गृहस्थों के दिए हुए टुकड़े खाते हैं, अतः उनकी दया के पात्र हैं।
जो अपने ही पाले हुए रोग आदि के ग्रस्त एवं असमर्थ प्राणी का उद्धार नहीं करता, वह नरक में पड़ता है, यह विद्वानों का मत है।
संसार की सृष्टि करने वाले भगवान विष्णु एक को करता बनाकर स्वयं ही पत्नी पुत्र आदि के ब्याज के समस्त जंतुओं का पालन करते हैं, अतः अपने पोष्य वर्ग की रक्षा करनी चाहिये यह भगवान की आज्ञा है।
दयालु होकर होने के कारण आप मेरा आप उद्धार कीजिये, दुख से आतुर हुई कुतिया की यह बात सुनकर घर में बैठा हुआ मुनि पुत्र तुरंत घर से बाहर निकला।
*इसी समय दया निधान पद्मबंधु ने कुतिया से पूछा* :– यह क्या वृतांत है तब पुत्र ने सब समाचार कह सुनाया।
*उसे सुनकर पद्मबंधु बोले* :– बेटा तुम कुतिया से ऐसा वचन क्यों कहा? साधु पुरुषों के मुंह से ऐसी बात नहीं निकलती। वत्स! देखो तो, सब लोग दूसरों का उपकार करने के लिय उद्धत रहते हैं। चन्द्रमा, सूर्य, वायु, राशि, अग्नि, जल, चंदन, वृक्ष और साधु पुरुष सदा दूसरों की भलाई में लगे रहते हैं।
दैत्यों को महाबली जानकर महर्षि दधीचि ने देवताओं का उपकार करने के लिये दया पूर्वक अपने शरीर की हड्डियां दे दी थी।
महाभाग ! पूर्व काल में राजा शिवि ने कबूतर के प्राण बचाने के लिए भूखे बाज को अपने शरीर का मांस दे दिया था।
पहले इस पृथ्वी पर जीमूतवाहन नामक एक राजा हो गए हैं।
उन्होंने एक सर्प के प्राण बचाने के लिये महात्मा गरुड़ को अपना जीवन समर्पित कर दिया था।
इसलिए विद्वान ब्राह्मणों को दयालु होना चाहिये, क्या इंद्रदेव शुद्ध स्थान में ही वर्षा करते हैं, और अशुद्ध स्थान में जल नहीं बरसाते क्या चंद्रमा चांडालों के घर में प्रकाश नहीं करते?
अतः बार-बार प्रार्थना करने वाली इस कुतिया का मैं अपने पूण्य से उद्धार करूँगा।
इसी प्रकार पुत्र की मान्यता का निराकरण करके परम बुद्धिमान पद्मबंधु ने संकल्प किया।
कुतिया ! ले मैंने द्वादशी का महापूण्य तुझे दे दिया। ब्राह्मण के इतना कहने कहते ही कुतिया ने अपने प्राचीन शरीर का त्याग कर दिया और दिव्य देह धारण कर दिव्य वस्त्र आभूषणों से विभूषित हो, दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई ब्राह्मण की आज्ञा ले स्वर्गलोक को चली गई।
वहाँ महान सुखों का उपभोग करके इस पृथ्वी पर भगवान नर नारायण के अंश से उर्वशी नाम से प्रगट हुई।
*।। इस प्रकार से स्कंद पुराण वैशाख मास माहात्म्य के अंतर्गत द्वादशी की महत्ता, द्वादशी के पुण्य दान के एक कुतिया का उद्धार नामक पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त।।२५।।*
चौबीसवाँ अध्याय, अक्षय तृतीया तिथि की महिमा का वर्णन।
श्रुतदेव जी ने कहा* अब मैं पाप नाश करने वाले इस महात्मा का वर्णन करता हूँ, वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष में अक्षय तृतीया के दिन ।
जो लोग प्रातः काल सूर्योदय के पहले स्नान करते हैं वह सब लोग पाप से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं।
जो देवता, पितृ तथा मुनि इसके उद्देश्य से तर्पण करता है, उसने सब शास्त्र पढ़ लिये, यज्ञ कर लिये तथा सौ श्राद्ध कर लिये।
जो मनुष्य अक्षय तृतीया के दिन मधुसूदन भगवान की पूजा करते हैं तथा कथा सुनते हैं, वे मुक्ति के भागी होते हैं।
जो लोग उस तिथि को मधुसूदन भगवान की प्रीति के लिए शुभ दान करते हैं उनको मधुसूदन भगवान की आज्ञा से अक्षय फल की प्राप्ति होती है ।
यह तिथि देवताओं, ऋषि तथा पितरों को शुभ गति देने वाली है, सनातन धर्म करने पर यह तीनों को तृप्ति देने वाली होती है।
हे राजन ! किसने इस तिथि की प्रसिद्धि कि यह मैं कहता हूँ, सावधान चित्त हो कर सुनो।
प्राचीन काल में इंद्र का बली के साथ युद्ध हुआ था सब देवताओं और दैत्यों का परस्पर द्वंद युद्ध हुआ।
इंद्र पाताल के तल में रहने वाले उन दैत्य बली को जीतकर फिर पृथ्वी पर आकर उतथ्य मुनि के आश्रम में गया।
वहाँ पर उन्होंने मंदगामिनी गर्विणी नाम की उसकी भार्या को देखा, उस सुंदरी पर इंद्र मोहित हो गया और उसने गर्विणी के साथ बलपूर्वक उसका उपभोग किया ।
तब ऋषि ने इंद्र के इस कुकृत्य को जान कर उसे श्राप दिया जिसके भय से इंद्र भागा, इंद्र को भागते हुए देखकर उसके शिष्य हंसने लगे ।।
तब लज्जित होकर वह मेरु पर्वत की गुफा में घुस गया और वहाँ पर लीन होकर दुस्तर तप करने लगा ।
जब इंद्र लज्जा के मारे मेरु पर्वत पर छिपा था, तब दैत्यों सहित बलि ने यह बात भेदियों से पता लगाकर ।
स्वर्ग को आक्रमण कर देवेंद्र अमरावती की अमरावती का भोग करने लगा, उस बलि ने शम्बर आदि दिक्पालों का ऐश्वर्य।
बल से भोगा, स्वर्ग का राज्य बिना स्वामी का होने से अग्नि इत्यादि देवताओं को इंद्र का पता न पाकर ।
पाप रहित देवाचार्य बृहस्पति से यह पूछा कि इंद्र कहां हैं।
दैत्यों से आक्रमण किया हुआ स्वर्ग का राज्य बिना स्वामी के हो गया है, उनको गये हुऐ बहुत कॉल हुआ, वह देव क्यों नहीं आते।
हे बृहस्पति ! हम लोग प्रार्थना करें और उसके पास जाएं इस प्रकार पूछने पर बृहस्पति ने देवताओं से कहा रसातल में बलि को जीतकर वह उतथ्य जी के आश्रम में गये।
धृष्टता से उसने उस ऋषि की पत्नी से उपभोग किया और उसकी शिष्यों के द्वारा निंदित किया गया ।
लज्जा के मारे स्वर्ग में न जाकर वह मेरु पर्वत में घुस गया, अपनी करनी पर चिंता करता हुआ वह इंद्राणी के साथ वहीं पर है ।
इस प्रकार से अग्नि इत्यादि देवता लोग उसके इस वाक्य को सुनकर मेरु पर्वत की गुफा में उनकी प्रार्थना करने के लिए शीघ्र गए।
पाकशासन देवेंद्र को वह गुफा में छुपा देख कर लोक प्रसिद्ध पराक्रमी उनकी स्तुतियों से उनको संतुष्ट किया है।
हे इंद्र ! हे देवों के राजा ! तुम को नमस्कार है, हम लोग अपके बिना दैत्यों से बड़ी पीड़ा पाते हैं।
हे अंग ! स्थान भ्रष्ट होकर हम लोग दुखी होकर भिन्न-भिन्न देशों में घूमते हैं, अतएव हे देवेंद्र ! हे शत्रुओं के दमन करने वाले ! शत्रुओं को जीतो।
इस प्रकार देवताओं से स्तुति किए जाने पर इंद्र गुफा से के मुख से निकले, लज्जा से मुख नीचे किया हुए नेत्रों से भूमि देखने लगे।
दुःख के मारे गदगद हो कर कुछ न बोले, यह जानकर बृहस्पति ने भय से नीचे मुख किये हुए इंद्र से कहा।
हे सुरपति ! तू शंका मत कर संसार कर्म के अधीन है, मान-अपमान, सुख-दुख, लाभ-हानि, जीत-हार यह निःसंदेह पूर्व कर्मों के अनुसार होते हैं ।
जीव कर्मों के पीछे-पीछे चलते है, दुःख समय के अनुसार भाग्य से होता है ।
बुद्धिमान लोग दुःख प्राप्त करने पर शोक नहीं करते तथा सुख पाने पर प्रसन्न भी नहीं होते अतएव हे प्रभु! प्रारंभ से ही यह दुख तुमको प्राप्त हुआ है।
हे इंद्र! इसलिए दुख प्राप्त करके तुमको शोक न करना चाहिए, गुरु बृहस्पति के ऐसा कहने पर इंद्र ने देवताओं से कहा ।
इंद्र ने कहा पर स्त्री गमन के दोष से बल, तेज, विमल यश, मंत्रों की शक्ति, शस्त्रों की शक्ति, विद्या की शक्ति तथा मेरी अन्य सभी शक्तियाँ नष्ट हो गई है।
दिव्यतेज से हत आज मैं इसी के चुपचाप बैठा हूँ, सुरपति के इस वाक्य सुनकर देवता लोग आचार्य बृहस्पति से बोले ।
एकांत में फिर से उनके बल की प्राप्ति के विषय में विचार करने लगे तब अति पंडित गुरु बृहस्पति देव ने उनसे करुणा युक्त होकर कहा ।
*बृहस्पति जी ने कहा* :– यह वैशाख महीना है जो माधव भगवान को प्रिय है, इस महीने की सभी तिथियाँ माधव भगवान को प्रिय हैं।
इसमें शुक्ल पक्ष की तृतीया अक्षय कहलाती है, इस दिन जो कोई स्नान, दान, श्राद्ध इत्यादि करता है।।
उसके सैकड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है तथा ऐश्वर्य बल और धैर्य भी बढ़ जाता है ।
अतः इसे प्राप्त करने के लिए उस दिन तृतीया के दिन बलि से द्वेष करने वाले इंद्र को स्नान, दान, सतधर्म करना चाहिए
उसमें विद्या में तथा मंत्र और शास्त्रों में शक्ति होगी, तथा बाहुबल, धैर्य औऱ यश पहले के समान हो जाएगा ।
इस प्रकार से गुरु बृहस्पति ने देवताओं के साथ विचार करके इन श्री हरि भगवान के प्रिय धर्मों को इंद्र से कराया ।
अक्षय तृतीया के दिन भक्ति और मुक्ति के फल देने वाले कर्म इंद्र ने किये जिससे उसका बल, धैर्य इत्यादि पहले के समान हो गया।
तथा पर स्त्री गमन का दोष भी तुरंत नष्ट हो गया और राहु से मुक्त चंद्रमा की तरह इंद्र पापों से छूट गया ।
बाद में देवताओं के साथ असुरों को जीतकर वह देवताओं के बीच ही में हरि विष्णु के समान शोभायमान हुआ ।
तृतीया के माहात्म्य से अमरावती भाग्य युक्त हो गई और शंख, तुरही इत्यादि बजाते हुए उसने वैभव सहित प्रवेश किया।
इंद्र की आज्ञा पाकर देवता लोग अपने अपने धाम को गये और तब से पहले की तरह यज्ञ में भाग लेने लगे।
दैत्यों के पराजय होने पर पितृ लोक पहले की तरह पिंड भाग प्राप्त करने लगे और मुनि लोग अपने अध्ययन में संतुष्ट हो गये।
तब से सब लोकों में देवताओं और ऋषियों को संतोष देने वाली अक्षय नाम की तृतीया इस लोक में प्रसिद्ध हुई।
इसीसे अति पुण्य देने वाली, सब पापों का नाश करने वाली, मनुष्यों को भोग और मुक्ति देने वाली है, यह तृतीया अक्षय कहीं जाती है ।।
*।। इस प्रकार स्कंद पुराण के वैशाख मास माहात्म्य में नारद और अम्बरीष संवाद में अक्षय तृतीया महिमा कथन नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।।२४।।*
तेइसवाँ अध्याय, धर्मवर्ण की कथा, कलियुग की अवस्था का वर्णन, धर्मवर्ण और पितरों का संवाद एवं वैशाख की अमावस्या की श्रेष्ठता।
मिथिलापति ने पूछा* :– ब्राह्मण ! इस वैशाख मास में कौन-कौन की तिथियाँ पुण्य दायिनी हैं ?
*श्रुतदेव जी बोले* :– सूर्य के मेष राशि पर स्थित होने पर वैशाख मास की तीसों तिथियाँ पुण्यदायिनी मानी गई हैं ।
एकादशी में किया हुआ पुण्य कोटी गुना होता है। उसमें स्नान दान, तपस्या, होम, देवपूजा, पुण्य कर्म एवं कथा का श्रवण किया जाए, तो वह तत्काल मुक्ति देने वाला है।
जो रोग आदि से ग्रस्त और दरिद्रता से पीड़ित हो, वह मनुष्य इस पुण्यमयी कथा को सुनकर कृतकृत्य होता है।
वैशाख मास मनसे सेवन करने योग्य है; क्योंकि वह समय उत्तम गुणों से युक्त है।
दरिद्र, धनाढ्य, पंगु, अंधा, नपुंसक, विधवा, साधारण स्त्री, बालक, युवा, वृद्ध तथा रोग से पीड़ित मनुष्य ही क्यों ना हो, वैशाख मास का धर्म सब के लिए अत्यंत सुखसाध्य है।
पुण्यमय वैशाख मास में जब सूर्य मेष राशि में स्थित हो, टैब पापनाशनी अमावस्या कोटी गया के समान फल देने वाली है।
हे राजन ! जब पृथ्वी पर राजर्षि सर्वाणि का शासन था, उस समय तीसवें कलियुग के अंत में सभी धर्मों का लोप हो चुका था।
उसी समय आनर्त देश में धर्मवर्ण नाम से विख्यात एक ब्राह्मण थे।
हे मुनिवार! धर्मवर्ण ने उस कलयुग में ही किसी समय महात्मा मुनियों के यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए पुष्कर क्षेत्र की यात्रा की।
वहां कुछ व्रत धारी महऋषियों ने कलयुग की प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा था।
सतयुग में भगवान विष्णु को संतुष्ट करने वाला जो एक वर्ष साध्य है, वह त्रेतायुग एक मास में और द्वापर में पन्द्रह दिनों में साध्य होता है।
परंतु कलयुग में भगवान विष्णु के का स्मरण कर लेने से ही उसका दस गुना पुण्य होता है।
कलियुग में बहुत थोड़ा पुण्य भि कोटी गुना होता है। जो एक बार भी भगवान का नाम लेकर दया दान करता है और दुर्भिक्ष में अन्न देता है, वह निश्चय ही ऊर्ध्व लोक में गमन करता है।
यह सुनकर देव ऋषि नारद हंसते हुए उन्मत्त के समान नृत्य करने लगे।
*सभासदों ने पूछा* :–हे नारद जी ! यह क्या बात है?
तब बुद्धिमान नारदजी ने ते हुए उन सबको उत्तर दिया
*नारदजी बोले* :– आप लोगों का कथन सत्य है। इसमें संदेह नहीं कि कलयुग में कल्प कर्मों से ही मनुष्य पुण्य का साधन किया जाता है तथा क्लेशो का नाश करने वाले भगवान केशव स्मरण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
तभी मैं आप लोगों से यह कहता हूँ कि कलयुग में यह दो बातें दुर्घट हैं प्रथम कामेन्द्रिय का निग्रह और जिव्हा को वश में रखना।
वे दोनों कार्य जो सिद्ध कर ले वही नारायण स्वरूप है। अतः कलयुग में आपको यहाँ नहीं ठहरना चाहिए।
नारद जी की यह बात सुनकर उत्तम व्रत का पालन करनेवाले महर्षि सहसा यज्ञ को समाप्त करके सुख पूर्वक चले गए।
धर्मवर्ण में भी यह बात सुनकर भूलोक को त्याग देने का विचार किया।
उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके दंड और कमंडलु हाथ में लिया और जटाधारी वल्कल धारी होकर वे कलयुग के अवतारी पुरुषों को देखने के लिए घर छोड़ कर चल दिये।
उनके मन में बड़ा विस्मय हो रहा था । उन्होंने देखा, प्रायः मनुष्य पापाचार में प्रवृत्त हो बड़े भयंकर एवं दुष्ट हो गए हैं ।
ब्राह्मण पाखंडी हो चले हैं। शुद्र सन्यास धारण करते हैं। पत्नी अपने पति से द्वेष रखती है। शिष्य गुरु से बैर करते हैं। सेवक स्वामी के और पुत्र पिता के घात में लगा हुआ है।
ब्राह्मण शूद्र वत और गायें बकरियों के समान हो गई हैं। वेदों में गाथा की ही प्रधानता रह गई है। शुभ कर्म साधारण अलौकिक कृत्यों के ही समान रह गए हैं, और इनके प्रति किसी की महत्त्व बुद्धि नहीं है।
भूत, प्रेत और पिशाच आदि की उपासना चल पड़ी है। सब लोग मैथुन में आसक्त हैं और उनके लिये अपने प्राण भी खो बैठते हैं।
सब लोग झूठी गवाही देते हैं । मन में सदा छल और कपट भरा रहता है। कलयुग में सदा लोगों के मन में कुछ और और वाणी पर कुछ और तथा क्रिया में कुछ और ही देखा जाता है।
सबकी विद्या किसी ना किसी स्वार्थ के लिये ही होती है और राजभवन में उसका आदर होता है।
संगीत आदि कलात्मक विद्याएँ भी राजाओं को प्रिय हैं। कली में अधम मनुष्य पूजे जाते हैं और श्रेष्ठ पुरुषों की अवहेलना होती है।
कली में वेदों के विद्वान ब्राह्मण दरिद्र होते हैं। लोगों में प्रायः भगवान की भक्ति नहीं होती।
पूण्य क्षेत्र में पाखंड अधिक बढ़ जाता है। शुद्र लोग जटाधारी तपस्वी बनकर धर्म की व्याख्या करते हैं।
सभी मनुष्य अल्पायु, दयाहीन और शठ होते हैं। कलियुग में प्रायः सभी धर्म के व्याख्याता बन जाते हैं और दूसरे से कुछ लेने में ही उत्सव मनाते हैं।
अपनी पूजा कराना चाहते हैं और व्यर्थ ही दूसरों की निंदा करते हैं। अपने घर आने पर सभी अपनी स्वामी के दोषों की चर्चा में तत्पर रहते हैं ।
कलियुग में लोग साधुओं को नहीं जानते, पापियों को ही बहुत आदर देते हैं। दुराग्रही लोग इतने दुराग्रही होते हैं कि साधु पुरुषों के एक दोष का भी ढिंढोरा पीटते हैं और पापात्माओं के दोष समूहों को भी गुण बतलाते हैं।
कलियुग में गुणहीन मनुष्य दूसरों के गुण न देखकर उसके दोष ही ग्रहण करते हैं।
जैसे पानी में रहने वाली जौंक प्राणियों के रक्त पीती है, जल नहीं पीती उसी प्रकार जौंक के धर्म से संयुक्त हो मनुष्य दूसरों का रक्त चूसते हैं।
औषधियां शक्तिहीन होती हैं। ऋतुओं में उलटफेर हो जाता है। सब राष्ट्रों में अकाल पड़ता।
कन्या योग्य समय में संतानोत्पत्ति नहीं करती।
लोग नेट और नर्तकों की विद्याओं से विशेष प्रेम करते हैं। जो वेद वेदांग कि विद्याओं में तत्पर और अधिक गुणवान हैं, उन्हें अज्ञानी मनुष्य सेवक की दृष्टि से देखते हैं, वे सब के सब भ्रष्ट होते हैं।
कलियुग में प्रायः लोग श्राद्ध कर्म का त्याग करते हैं। वैदिक कर्मों को छोड़ बैठते हैं । प्रायः जीव्हा पर भगवान विष्णु का नाम कभी नहीं लाते।
लोग श्रृंगार रस में आनंद का अनुभव करते हैं और उसके गति गीत गाते हैं।
कलियुग के मनुष्यों में कभी भगवान विष्णु की सेवा देखी जाती है, न शास्त्रीय चर्चा होती है, और न कहीं यज्ञ की दीक्षा है, न विचार का लेश है, न तीर्थ यात्रा है और न दान धर्म ही होते देखा जाता है । यह कितने आश्चर्य की बात है?
उन सबको देखकर धर्मवर्ण को बड़ा भय लगा। पाप से कुल की हानि होती देख, अत्यंत आश्चर्य से चकित हो वे दूसरे द्वीप में चले गये।
सब द्वीपों और लोकों में विचरते हुए बुद्धिमान धर्मवर्ण किसी समय कौतूहल वश पित्र लोक में गए ।
वहाँ उन्होंने कर्म से कष्ट पाते हुये पितरों को बड़ी भयंकर दशा में देखा। वे दौड़ते, रोते और गिरते– पड़ते थे। इन्होंने अपने पितरों को भी नीचे अंध कूप में पड़े हुए देखा।
*उनको देखकर आश्चर्यचकित हो दयालु धर्मवर्ण में पूछा* आप लोग कौन हैं, किस दुस्तर कर्म के प्रभाव के अंध कूप में पड़े हैं?
*पित्रों ने कहा* :– हम श्रीवत्स गोत्र वाले हैं। पृथ्वी पर हमारी कोई संतान नहीं रहे गई है, अतः हम श्राद्ध और पिंड से वंचित हैं, इसलिए यहाँ हमें नर्क का कष्ट भोगना पड़ता है।
संतान हीन दुरात्माओं का अंध कूप में पतन होता है। हमारे वंश में एक ही महायशस्वी पुरुष है, जो धर्मवर्ण के नाम से विख्यात है।
किंतु वह विरक्त होकर अकेले घूमता फिरता है। उसने गृहस्थ धर्म को स्वीकार नहीं किया है।
वह एक ही तंतु हमारे कुल में अवशिष्ट है। उसकी भी आयु क्षीण हो जाने पर हम लोग घोर अंधकूप में गिर पड़ेंगे, जहाँ से फिर निकलना कठिन होगा।
इसलिए तुम पृथ्वी पर जाकर धर्म उनको समझाओ हम लोग दया के पात्र हैं, हमारे वचनों से उसको यह बताओ कि हमारी वंश रूपा दूर्वा को कालरूपी चूहा प्रतिदिन खा रहा है
क्रमशः सारे वंश का नाश हो गया है, एक तुम ही बचे हो। जब तुम भी मर जाओगे तब संतान परंपरा न होने कारण तुम्हें भी अंधकूप में गिरना पड़ेगा।
इसलिए गगृहस्थ धर्म को स्वीकार करके संतान की वृद्धि करो इससे हमारी और तुम्हारी दोनों कीऊर्ध्व गति होगी।
यदि एक भी पुत्र वैशाख, माघ अथवा कार्तिक मास में हमारे उद्देश्य से स्नान, श्राद्ध और दान करेगा तो उससे हम लोग उर्ध्व गति होगी और नरक से उद्धार हो जाएगा।
यदि एक पुत्र भी भगवान विष्णु का भक्त हो जाये, एक भी एकादशी का व्रत रहने लगे अथवा यदि एक भी भगवान विष्णु की पाप नाशक कथा श्रवण करें तो उसकी सौ बीती हुई पीढ़ियों, और सौ आने वाली पीढ़ियों का उद्धार होता है।
यह पीढ़ियाँ पाप से आवर्त होने पर भी नरक का दर्शन नहीं करती दया और धर्म से रहित उन बहुत से पुत्रों के जन्म से क्या लाभ, जो कुल में उत्पन्न होकर सर्वव्यापी भगवान नारायण की पूजा नहीं करते।
इस प्रकार प्रिय वचनों द्वारा धर्मवर्ण को समझाकर तुम उसे विरक्तिपूर्ण ब्रह्मचर्य आश्रम से ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश कराने की सलाह दो।
*पित्रों की यह बात सुनकर धर्मवर्ण अत्यंत विस्तृत हुआ और हाथ जोड़कर बोला* :– मैं ही धर्मवर्ण नामक विख्यात आपके वंश का दुराग्रही बालक हूँ। यज्ञ में महात्मा नारद जी का यह वचन सुनकर कि कलयुग में प्राया कोई भी रसनेन्द्रिय और कामेन्द्रिय को दृढ़ता पूर्वक संयम में नहीं रखता।
मैं दुर्जनों की संगति से भयभीत हो अब तक दूसरे दूसरे द्वीपों में घूमता रहा हूँ।
इस कलयुग के तीन चरण बीत गए हैं, अंतिम चरण में भी साढ़े तीन भाग व्यतीत हो गये हैं।
मेरा वह जन्म व्यर्थ बीता है, क्योंकि जिस कुल में मैंने जन्म लिया, उसमें माता पिता के ऋण को भी मैंने नहीं चुकाया।
पृथ्वी के भार भूत उस शत्रु तुल्य पुत्र के उत्पन्न होने के क्या लाभ है जो पैदा होने से क्या लाभ जो पैदा होकर भगवान विष्णु और देवताओं तथा पितरों की पूजा न करें ।
मैं आप लोगों की आज्ञा का पालन करूंगा। बताइये कि पृथ्वी पर किस प्रकार मुझे कलियुग से और संसार से भी बाधा नहीं प्राप्त होगी?
धर्मवर्ण की बात सुनकर पितरों के मन को कुछ आश्वासन मिला
*पितृ बोले* :- बेटा ! तुम गृहस्थ आश्रम स्वीकार करके संतानोत्पत्ति के द्वारा हमारा उद्धार करो।
*जो भगवान विष्णु की कथा में अनुरक्त होते, निरंतर श्री हरि का स्मरण करते और सदाचार के पालन में तत्पर रहते हैं उन्हें कलियुग बाधा नही पहुँचाता।*
*हे मानद ! जिसके घर में शालिग्राम शिला अथवा महाभारत की पुस्तक हो, उसे भी कलियुग बाधा नहीं दे सकता, जो वैशाख मास के धर्मों का पालन करता, माघ स्नान में तत्पर होता और कार्तिक में दीप दान देता है उसे भी कलियुग की बाधा प्राप्त नहीं होती।*
*जो महात्मा प्रतिदिन भगवान विष्णु की पाप नाशक एवं मोक्ष दायिनी दिव्य कथा सुनता है, जिसके घर में बलिवैश्वदेव होता है, शुभ कारिणी तुलसी स्थित होती है तथा जिसके आंगन में उत्तम गौ रहती है, उसे भी कलयुग बाधा नहीं देता।*
अतः इस पापात्मक युग में तुम्हें कोई भय नहीं है। बेटा! शीघ्र पृथ्वी पर जाओ। इस समय वैशाख मास चल रहा है, यह सब का उपकार करने वाला मास है।
सूर्य के मेष राशि में स्थित होने पर तीसों तिथियाँ पुण्यदायनी मानी गई है। एक-एक तिथि में किया हुआ पूण्य कोटि-कोटि गुणा अधिक होता है।
उसमें भी जो वैशाख की अमावस्या तिथि है, वह मनुष्य को मोक्ष देने वाली है, देवता और पितरों को वह बहुत प्रिय है, शीघ्र ही मोक्ष की प्राप्ति कराने वाली है।
जो उस दिन पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करते हैं और जल से भरा हुआ घड़ा एवं पिंड देते हैं, उन्हें अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
अतः महामति तुम शीघ्र जाओ और जब अमावस्या हो तब कुंभ सहित श्राद्ध एवं पिंडदान करो सब का उपकार करने के लिए गृहस्थ धर्म का आश्रय लो।
धर्म, अर्थ और काम से संतुष्ट हो, उत्तम संतान पाकर फिर मुनि वृत्ति से रहते हुए सुख पूर्वक द्वीप द्वीपान्तर में विचरण करो।
पितरों के इस प्रकार आदेश देने पर धर्मवर्ण मुनि शीघ्रता पूर्वक भूलोक में गये ।
यहाँ मेष राशि में स्थित सूर्य के स्थित रहते हुये वैशाख मास में प्रात काल स्नान करके देवताओं ऋषियों तथा पितरों का तर्पण किया, फिर कुंभ दान सहित पाप विनाशक श्राद्ध करके उसके द्वारा पितरों को पुनरावृत्ति रहित मुक्ति प्रदान की।
तत्पश्चात उन्होंने स्वयं विवाह करके उत्तम संतान को जन्म दिया और लोक में उस पाप नाशिनी अमावस्या तिथि को प्रसिद्ध किया।
तदनंतर वे भक्ति पूर्वक भगवान की आराधना करने के लिए हर्ष के साथ गंधमादन पर्वत पर चले गये।
इसलिये वैशाख मास की यह अमावस्या तिथि परम पवित्र मानी गई है।
*।। इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण वैशाख मास माहात्म्य के अंतर्गत धर्मवर्ण की कथा, कलियुग की अवस्था का वर्णन, धर्मवर्ण और पितरों का संवाद एवं वैशाख की अमावस्या की श्रेष्ठता नामक तेइसवाँ अध्याय समाप्त।।२३।।*
बाइसवाँ अध्याय, सर्प की मुक्ति तथा व्याघ्र का उपाख्यान में वाल्मीकि का जन्म कथन।
श्रुतदेव जी बोले :- व्याघ तथा शंख जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, शंख जी ने पूछा कि तुम कौन हो और तुम्हारी यह दशा किस कारण से है।
किस चीज किस कर्म से यह अशुभ दुरयोनि तुम को प्राप्त हुई है और अकस्मात तुम्हारी मुक्ति कैसे हुई, यह विस्तार से कहो।
शंख जी के ने ऐसा पूछने पर उसने पृथ्वी पर गिर कर दंडवत किया, और उसने फिर झुका कर हाथ जोड़कर कहा ।
अजगर ने कहा :– मैं पूर्व जन्म में प्रयाग में एक बड़ा ब्रह्मवादी ब्राह्मण था, रूप और यौवन से संपन्न था, ब्रह्म विद्या और मद से पूर्ण ।
मैं धनाढ्य था, मेरे अनेक पुत्र थे और सर्वदा अहंकार से दूषित रहता था, कुसीद मुनि का पुत्र था मेरा नाम रोशन था।
आसान, शयन, निद्रा, बुरा व्यवहार, जुआ, लोकवार्ता और सूद लेना यही मेरा व्यापार था ।
लोक निंदा के भय न करते हुए मैं सब कार्य गर्व से करता था, मुझे किसी की श्रद्धा मात्र न थी।
मेरे दोस्त दुर्बुद्धि के बहुत काल इसी तरह व्यतीत हुए, वैशाख महीने में जयंत नामक ब्राह्मण।
भागवत के प्रिय उस महीने के धर्म को सुनाया, उस क्षेत्र के निवासी, पुण्य कर्म करने वाले ब्राह्मण ।
हजारों नर-नारी, छत्रिय, वैश्य, क्षुद्रों ने प्रात काल स्नान करके अविनाशी मधुसूदन भगवान की पूजा करके ।
जयंत की सुनाई कथा को निरंतर सुनते थे, यह लोग शुद्ध होकर मौन धारण करके भगवान वासुदेव की कथा में लीन रहते थे।
वैशाख मास के धर्मों में निरत थे, लोग गर्व तथा आलस्य का त्याग करके कथा सुनते थे, कौतुक देखने की इच्छा से मैं भी उस सभा में गया ।
मेरे सिर पर पगड़ी थी मैंने नमस्कार नहीं किया, तांबूल खाता रहा कुछ कंचुक वरण किया था, तथा देह पर चंदन भी लगाया था।
वेग से लोकवार्ता करने लगा और कथा में विघ्न डाला, मेरी लोकवार्ता से सब चित्त चंचल हो गए।
कभी मैं कपड़ा फैलाता, कभी निंदा करता, कभी हंसता, कथा की समाप्ति तक मैंने इसी प्रकार काल बिताया ।
फिर उस दोष से शीघ्र ही मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई और आयुष से भी कम हो गई और दूसरे ही दिन सन्निपात रोग से मैं मर गया।
मैं नर्क में गया जहां हलाहल और खोलते जल में यातना भोक्ता हुआ चौदह मन्वंतर तक मुझे कष्ट भोगना पड़ा ।
क्रम से चौरासी लाख योनियों में उत्पन्न होता हुआ मैं अब एक वटवृक्ष में रहता हूं।
दस योजन लंबे सौ योजन ऊँचे सात योजन के खोखले में मैं क्रूर तामसी सर्प हो कर रहता हूँ ।
हे ब्रह्म ऋषि ! मैं अपने पहले कर्मों से बँधा हूँ, मैं इस खोखले में बिना आहार के दस हजार वर्ष बिताये।
हे मुनि ! दैववश आपके मुख कमल से कही हुई अमृत रूपी कथा को नेत्रों द्वारा सुनकर मेरे सब पाप भी नष्ट हो गए ।
तथा अजगर की योनि त्यागकर पुरुष का देव रूप धारण करके विनीत होकर हाथ जोड़कर आपके पैरों की शरण में आया हूँ।
हे मुनि श्रेष्ठ ! न जाने किस जन्म के आप मेरे बंधु थे, मैंने तो कभी उपकार नहीं किया, सज्जनों की कृपा मुझ पर कैसी हुई ।
सम चित्त वाले साधु लोग सदा प्राणियों पर दया करते हैं, इनकी प्रकृति दूसरों के उपकार करने की होती है, तथा बुद्धि दूसरे तरह की नहीं होती ।
आज मुझे पर ऐसी कृपा कीजिये जिससे मेरी बुद्धि धर्म में लगे जिससे विष्णु भगवान में प्रेम हो और सुंदर गति को प्राप्त करूं ।
चक्रपाणि विष्णु भगवान कभी ना भूले और साधु चित्तवृत्ति वाले बड़े-बड़े लोगों से सदा सर्वदा मेरी संगति हो ।
मुझे कभी पाप ना हो, अहंकार और मद भी न हो, मुझे दरिद्रता हो या मद से अंधे लोगों की आंखों का अंजन होता है।
इस प्रकार अनेक प्रकार से उनकी स्तुति करके तथा बारंबार नमस्कार करके वह उनके सामने विनीत भाव से हाथ जोड़कर खड़ा रहा ।
तब प्रेम से पूर्ण होकर शंख जी उसको अपने हाथ से उठाया, इसके अंग को हाथ से छुआ जिससे इसके सब पाप छूट गये।
उस दिव्य रूप वाले ब्राह्मण पर अनुग्रह करके कृपा पूर्वक जल्दी से उसका भावी वृतांत कहा ।।
हे द्विज ! वैशाख मास का माहात्म्य सुनने से तथा हरि का माहात्म्य में सुनने से तेरे संपूर्ण पाप नष्ट हो गए हैं।
उचित क्रम से तू अति बाहिक लोक में लाकर फिर से संसार में दशाण देश में उत्तम ब्राह्मण होगा।
तुम सब विद्याओं में ऐसा पंडित होगा और वेद शर्मा नाम से प्रसिद्ध ब्राह्मण होगा, वहाँ तेरी अत्यंत शुभ गति की स्मृति होगी।
पूर्व स्मरण के अनुसार, तू सब शुभ इच्छाओं को छोड़कर भगवान विष्णु के प्रिय वैशाख मास के सब धर्मों को करेगा ।
निर्धन, निस्पर्ह, असंग, गुरु भक्त तथा जितेंद्रिय होकर, उस जन्म में तू सर्वदा विष्णु भगवान की कथा में लीन रहेगा ।
उसके सिद्धि प्राप्त करके सब बंधनों से छूटकर योगियों से भी दुर्लभ हो परम धाम को पावेगा।
हे पुत्र ! मत डर मेरे प्रसाद से तेरा कल्याण होगा, हँसी से, भाग्य से, क्रोध से तथा द्वेष और काम से ।
अथवा स्नेह से यदि एक बार भी पाप हरने वाले विष्णु भगवान का नाम उच्चारण करने वाले पापी भी विष्णु के नाम से विष्णु के धाम को चले जाते हैं।
क्रोध जीते हुए, जितेंद्रिय, दयावंत श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रद्धा पूर्वक कथा सुनकर स्वर्ग में जाते हैं, तो इसमें क्या आश्चर्य है ।
कोई तो केवल भक्ति से कथा सुनने में तत्पर रहते हैं, वे सब धर्मों को त्याग कर भी विष्णु भगवान के परम पद को जाते हैं ।
द्वेष इत्यादि से पूर्ण भी जो कोई भक्ति के विष्णु भगवान की उपासना करते हैं, वे भी प्राण हरने वाली पूतना के समान परमधाम को प्राप्त होते हैं ।
महात्माओं का संग, नित्य भगवान का नाम लेना, सदा इनका आश्रय मोक्ष इच्छा करने वालों का कर्तव्य है, यही विधि श्रुतियों में भी कही गई है।
पाप को नाश करने वाला वह पापनाशक कहलाता है, जिसमें प्रती श्लोक में निरंतर रूप से अनंत भगवान के यश तथा नाम वर्णन होते हैं, जिसको साधु लोग सुनते हैं, गाते हैं और मनन करते हैं ।
जो भगवान कष्ट कारक सेवा नहीं चाहते वे न अधिक धन, न तो रूप और यौवन चाहते हैं, जिसके एक बार स्मरण करने से ही मनुष्य दिव्य धाम को जाता है, उसी दयालु की शरण हम जाते हैं ।
उसी भक्तवत्सल अव्यय, मन से जानने योग्य, दयासागर, अपार नारायण भगवान की शरण में जा।
हे महामति ! वैशाख मास के कहे हुए इन धर्मों को कर, इससे संतुष्ट होकर जगन्नाथ तुझे कल्याण देंगे।
ऐसा कहकर वो रुक गये, व्याघ्र को अति विस्मित देख कर, उस दिव्य पुरुष ने फिर से मुनीश्वर से कहा।
*दिव्य पुरुष ने कहा*:– हे शंख जी ! मैं धन्य हूँ, आप दयालु से मैं अनुग्रहित हुआ।
अरे मेरी बुरी योनि छूट गई और मैं परम पद को जाता हूँ।।
ऐसा कहकर परिक्रमा करके तथा आज्ञा पाकर वह स्वर्ग में गया, तब हे राजन् ! संध्या हो गई, शंख जी व्याघ से संतुष्ट किए गये। सायं संध्या कर के राजाओं की देवताओं की तथा महात्माओं की अनेक कथा कहते हुऐ बची हुई रात बिताई ।।
तथा अवतारों की देखी हुई बातचीत में रात कटी, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, पैर धोकर तथा मौन होकर ।।
तारक ब्रह्म का ध्यान करके शौच आदि सत्क्रिया करके, मेष संक्रांति में वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करके।
संध्या आदि कर्म तथा सब तारपनों को करके प्रसन्नता होकर व्याध को बुलाकर उसके मस्तक पर जल छिड़ककर तथा उसको देखकर ।
वेदों से भी अधिक शुभ कारक राम इन दो अक्षरों का उपदेश किया, विष्णु भगवान के एक एक नाम सब वेदों से अधिक माने गये हैं ।।
इन अनंत नामों में भी श्री विष्णु भगवान के सहस्त्र नाम अधिक है और इसी में भी राम नाम अधिक है ।।
अतेव हे व्याध ! तू निरंतर राम राम यह नाम जप, और हे व्याघ ! मरण तक इन धर्मों को कर ।
तब तेरा जन्म वाल्मीकि ऋषि के कुल में होगा, और तू संसार में वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध होगा ।
ऐसा व्याध को समझाकर वह दक्षिण दिशा को चले गये, व्याध भी उनकी परिक्रमा कर तथा बार-बार नमस्कार कर ।
कुछ दूर जाकर बिरहा से मैं आतुर होकर रोने लगा, जब तक वह देख पड़ते थे तब तक उनकी गति को बारंबार और बाद में उस मार्ग को देखता रहा ।
फिर स्वस्थ चित्त होकर और उन्हीं के हृदय में मन करता हुआ वन को साफ करके वहाँ पर अति निर्मल पौंसला बनाकर ।।
अति योग्य इन वैशाख मास के कहे हुये धर्मों को करने लगा, जंगल में उपजे हुए कैथ, पनस, जामुन, आम इत्यादि फलों से थके हुये पथिकों को आहार देता हुआ जूता, चंदन, छाता, पंखा ।
बालू का बिछोना तथा छाया से कहीं-कहीं पर पथिकों का परिश्रम से उत्पन्न हुए पसीना सुखाता था।
प्रात काल स्नान करके तथा दिन-रात राम राम इन दोनों अक्षरों को जपता था, व्याघ के जन्म को त्याग कर यह वाल्मीकि का पुत्र हुआ ।।
उसी सरोवर में कुण्डू नाम के मुनि अन्न तथा आहार त्याग कर दुस्तर तप कर रहे थे।।
उनके शरीर उनको शरीर पर अधिक काल में कीड़ों की पहाड़ी बन गई, श्रेष्ठ मुनि ने इसको वाल्मीकि कहा ।।
बाद में तप के समाप्त होने पर कुण्डू ऋषि मुनि के कान में सर्प के रेंगने का शब्द पड़ा, उनकी इन्द्रियाँ विचलित हो गई ।।
एक सर्पनी को पकड़कर उन्होंने एक भील जाति का पुत्र उत्पन्न किया, यह बड़ा यशस्वी वाल्मीकि नाम का संसार में बड़ा प्रसिद्ध हुआ।
जिसने अपने मनोहर कविता में दिव्य रामकथा लिखा और कर्म बंधनों को काटने वाली इस कथा को संसार में प्रसिद्ध किया ।।
श्रुतदेव जी कहते:– हे राजन! वैशाख के माहात्म्य को देखो यह छोटा होकर बड़े फल को देता है, व्याध ने भी जूता दान देकर दुर्लभ ऋषि पद को पाया ।।
जो इस रोमांचकारी, पाप हटाने वाले, अपूर्व इतिहास को सुनने अथवा सुनावें उसका इस संसार में जन्म नहीं होता ।।
*।। इस प्रकार स्कंदपुराण के वैशाख मास माहात्म्य के नारद, अम्बरीष संवाद में सर्प की मुक्ति तथा व्याघ्र का उपाख्यान में वाल्मीकि का जन्म कथन नामक बाइसवाँ अध्याय समाप्त ।।२२।।*
इक्कीसवाँ अध्याय, जीवों के विभिन्न स्वभावों तथा भागवत धर्म का निरूपण।
व्याघ ने पूछा : - महामते ! भगवान विष्णु के रचे हुए करोड़ों एवं सहस्त्रों सनातन जीव नाना मार्ग पर चलने और भिन्न-भिन्न कर्म करने वाले क्यों दिखाई देते हैं?
सबका एकसा वभाव क्यों नहीं है ? यह सब विस्तारपूर्वक बताइए ?
शंख ने कहा :- रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण के भेद के तीन प्रकार के जीव समुदाय होते हैं।
उनमें राजस स्वभाव वाले जीव राजस कर्म को, तमोगुणी जीव तामस कर्म और सात्विक स्वभाव वाले जीव सात्विक कर्म करते हैं।
कभी-कभी संसार में इनके तीनों गुणों में विषमता होती है, उसीसे में वे उच्च और नीच कर्म करते हुए तदानुसार कर्म फल के भागी होते हैं।
कभी सुख, कभी दुख और कभी दोनों को ही यह मनुष्य गुणों की विषमता से प्राप्त करते हैं।
प्रकृति में स्थित होने पर जीव जो तीनों गुणों से बँधते है। गुण और कर्मों के अनुसार उनके कर्मों का भिन्न-भिन्न फल होता है।
यह जीव फिर गुणों के अनुसार ही प्रकृति को प्राप्त होते हैं। प्रकृति में स्थित हुए प्राकृतिक प्राणी गुणों और कर्मों से व्याप्त होकर प्रकृति प्राकृतिक गति को प्राप्त होते हैं।
तमोगुण जीव तामसी वृत्ति से ही जीवन निर्वाह करते हैं और सदा महान दुख में डूबे रहते हैं।
उन्हें दया नहीं होती है, वे बड़े क्रूर होते हैं और लोक में सदा द्वेष से ही उनका जीवन चलता है।
राक्षस और पिशाच आदि तमोगुण जीव है, जो तामसी गति को प्राप्त होते हैं।
राजसी लोगों की बुद्धि मिश्रित होती है। वे पुण्य तथा पाप दोनों करते हैं; पुण्य स्वर्ग पाते और पाप से यातना भोगते हैं।
इसी कारण यह मंदभाग्य पुरुष बार-बार इस संसार में आते-जाते रहते हैं।
जो सात्विक प्रभाव के मनुष्य हैं, वे धर्मशील, दयालु, श्रद्धालु, दूसरों के दोष ना देखने वाले तथा सात्विक वृत्ति से जीवन निर्वाह करने वाले होते हैं।
इसलिय भिन्न भिन्न कर्म करने वाले जीवों को एक दूसरे से पृथक अनेक प्रकार के भाव हैं; उनके गुण और कर्म के अनुसार महाभाग महाप्रभु विष्णु अपने स्वरूप की प्राप्ति कराने के लिये उनके कर्मों का अनुष्ठान करवाते हैं।
भगवान विष्णु पूर्णकाम है, उनमें विषमता और निर्दयता आदि दोष नहीं है।
वे समभाव से ही सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। सब जीव अपने गुणों से ही कर्म के फल के भागी होते हैं।
जैसे माली बगीचे में लगे हुए सब वृक्षों को समान रूप से सींचता है और एक ही कुँए के जल से सभी वृक्ष पलते हैं, तद्यपि वे प्रथक प्रथक स्वभाव को प्राप्त होते हैं।
बगीचा लगाने वाले में किसी प्रकार की विषमता और निर्दयता का दोष नहीं होता।
देवाधिदेव भगवान विष्णु का एक निमेष ब्रह्मा जी के एक कल्प के समान माना गया है।
ब्रह्माकल्प के अंत में देवाधिदेव शिरोमणि भगवान विष्णु का उन्मेष होता है अर्थात वे आँख खोलकर देखते हैं।
जब तक निमेष रहता है तब तक प्रलय है। निमेष के अंत में भगवान अपने उदार में स्थित संपूर्ण लोकों की सृष्टि करने की इच्छा करते हैं।
सृष्टि की इच्छा होने पर भगवान अपने उदर में स्थित हुए अनेक प्रकार के जीवसमूहों को देखते हैं।
उनकी कुक्षी में रहते हुए भी संपूर्ण जीवन उनके ध्यान में स्थित होते हैं।
अर्थात कौन कहाँ किस रूप में है, भगवान उनको सदा बनी रहती है। भगवान विष्णु चतुर्व्यूह स्वरूप हैं।
वे उन्मेष काल में प्रथम भाग में ही चतुर्व्यूह रूप में प्रकट हो व्यूहगामी वासुदेव स्वरूप से महात्माओं में से किसी को सायुज्य साधक तत्वज्ञान, किसी को सारूप्य, किसी को सामीप्य और किसी को सालोक्य प्रदान करते हैं।
फिर अनिरुद्ध मूर्ति के वश में स्थित हुए सम्पूर्ण लोको को वे देखते हैं, देखकर उन्हें प्रद्युम्न मूर्ति के वश में देते हैं और सृष्टि करने का संकल्प करते है।
भगवान श्रीहरि पूर्ण गुण वाले वासुदेवा आदि चार व्यूहों के द्वारा दिशाओं के द्वारा क्रमशः माया, जया, कृति और शांति को स्वंय स्वीकार किया है।
उन्हें संयुक्त चतुर्व्यूहात्मक महाविष्णु ने पूर्णकाम होकर भी भिन्न-भिन्न कर्म और वासना वाले लोगों की सृष्टि की है।
उन्मेषकाल का अंत होने पर भगवान विष्णु योगमाया का आश्रय लेकर व्यूहगामी संकर्षण स्वरूप के इस चराचर जगत का संहार करते हैं।
इस प्रकार महात्मा विष्णु का यह सब चिंतन करने योग्य कार्य बतलाया गया है, जो ब्रह्मा आदि योग से संपन्न पुरुषों के लिये अचिन्त्य एवं दुर्भाव्य है।
*व्याघ ने पूछा* :– मुने ! भगवतधर्म कौन-कौन से हैं और किन के द्वारा भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं?
*शंख ने कहा* :– जिस के अंतःकरण की शुद्धि होती है, जो साधु पुरुषों का उपकार करने वाला है तथा जिनकी किसी ने भी निंदा नहीं की है, उसे तुम सात्विक धर्म समझो।
वेदों और स्मृतियों में बताये हुए धर्मों का यदि निष्काम भाव से पालन किया जाए तथा वह लोक के विरुद्ध न हो, तो उनके भी सात्विक धर्म जानना चाहिये।
वर्ण और आश्रम विभाग के अनुसार जो चार चार प्रकार के धर्म है, वे सभी नित्य नैमित्तिक और काम्य और भेद से तीन प्रकार के माने गए हैं।
वे सभी अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म जब भगवान विष्णु को समर्पित कर दिये जाते हैं, तब उन्हें सात्विक धर्म जानना चाहिये।
वे सात्विक धर्म ही मंगलमय भगवान भागवत धर्म है। अन्य देवताओं की प्रीति के लिए सकाम भाव से किए जाने वाले धर्म राजस माने गए हैं।
यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि के उद्देश्य से किए जाने वाले लोकनिष्ठुर, हिंसात्मक निंदित कर्मों को तामस धर्म कहा गया है।
जो सत्व गुण में स्थित हो भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले शुभ कारक सात्विक धर्म धर्मों का सदा निष्काम भाव से अनुष्ठान करते हैं।
वे भागवत (विष्णु भक्त) माने गये हैं। जिनके चित्त भगवान विष्णु में लगा रहता है, जिनकी जीव्हा पर भगवान का नाम है और जिसके हृदय में भगवान के चरण विराजमान हैं।
वे भागवत कहे गये हैं। जो सदाचार परायण सबका उपकार करने वाले और सदैव ममता से रहित हैं, वे भागवत माने गये हैं।
जिसका शास्त्रों में गुरु में और कर्मों में विश्वास है तथा जो सदा भगवान विष्णु के भजन में लगे रहते हैं, उन्हें भागवत कहा गया है।
उन भागवत भक्त महात्माओं को जो धर्म नियत नित्य माना मान्य है, जो भगवान विष्णु को प्रिय हैं तथा वेदों और स्मृतियों में जिनका प्रतिपादन किया गया है, वे ही सनातन धर्म मानने गए हैं।
जिनका चित्त विषयों में आसक्त है, उनका सब देशों में घूमना, सब कर्मों को देखना और सब धर्मों को सुनना कुछ भी लाभ कारक नहीं है।
साधु पुरुषों का मन साधु महात्माओं के दर्शन से पिघल जाता है।
निष्काम पुरुषों द्वारा श्रद्धा पूर्वक जिनका सेवन किया जाता है तथा जो भगवान विष्णु को सदा ही प्रिय हैं वह भागवत धर्म माना गया है।
भगवान विष्णु क्षीरसागर में सबके हित की कामना से भगवती लक्ष्मी जी को, दही से निकाले हुये मक्खन की भाँती सब शास्त्रों के सार भूत वैशाख धर्म का उपदेश किया है।
जो दम्भ रहित होकर वैशाख मास के व्रत का अनुष्ठान करता है, वह सब पापों से रहित हो सूर्य मंडल को भेदकर भगवान विष्णु की योगी दुर्लभ परमधाम को प्राप्त है।
इस प्रकार शद्विज श्रेष्ठ शंख के द्वारा भगवान विष्णु के प्रिय वैशाख मास के धर्म का वर्णन होते समय वहाँ पाँच शाखाओं वाले वटवृक्ष तुरंत ही भूमि पर गिर पड़ा।
उसके खोखले में एक विकराल अजगर रहता था, वह भी पाप योनिमय शरीर को त्यागकर तत्काल दिव्य स्वरूप हो मस्तक झुकाकर शंख के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।।
*।।इस प्रकार श्रीस्कंद पुराण वैशाख मास माहात्म्य में शंख ऋषि द्वारा जीवों के विभिन्न स्वभावों तथा भागवत धर्म का निरूपण नामक इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त।।२१।।*
वैशाख मास माहात्म्य–बीसवाँ अध्याय, भगवान विष्णु के स्वरूप का विवेचन, प्राणवायु की श्रेष्ठता व श्राप।
व्याघ ने पूछा :–ब्राह्मण ! आपने पहले कहा था कि भगवान विष्णु के प्रीति के लिए कल्याणकारी भागवत धर्म का और उसमें भी वैशाख मास में कर्तव्य रूप से बताए हुए नियमों का विशेष रूप से पालन करना चाहिए।
वह भगवान विष्णु कैसे हैं ? उनका क्या लक्षण है? उनका शास्त्रों में क्या प्रमाण है? तथा वे सर्व व्यापी भगवान किनके द्वारा जानने योग्य हैं? वैष्णव धर्म कैसा है? और किस्से भगवान श्री हरि जल्दी प्रसन्न होते हैं।
महामते मैं आपका किंकर हूँ, मुझे यह सब बातें बताइए।
व्याध के इस प्रकार पूछने पर शंख ने रोग शोक से रहित संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान नारायण को प्रणाम करके कहा :– हे व्याघ! भगवान विष्णु का स्वरूप कैसा है, यह सुनो। भगवान समस्त शक्तियों के आश्रय, संपूर्ण गुणों की निधि तथा सबके ईश्वर बताए गए हैं ।।
वे निर्गुण, निश्चल तथा अनंत हैं। सत्य और चित आनंद यही उनका स्वरूप है।
यह जो अखिल चराचर जगत है, अपने अधीश्वर और आश्रय के साथ नियत रूप से जिसके वश में स्थित है, जिसकी इसकी उत्पत्ति, पालन, संहार, पुनरावृत्ति तथा नियमन आदि होता है ।
प्रकाश, बंधन, मोक्ष और जीविका - इन सब की प्रवृत्ति जहाँ से होती है, वे ही ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध भगवान विष्णु हैं।
वे ही विद्वानों के समान सर्वव्यापी परमेश्वर हैं। ज्ञानी पुरुषों ने उन्हीं को साक्षात् परब्रह्म कहा है।
वेद, शास्त्र, स्मृति, पुराण, इतिहास, पंचरात्र और महाभारत सब विष्णु स्वरुप हैं, विष्णु के ही प्रतिपादक हैं।
इन्हीं के द्वारा महा विष्णु जानने योग्य हैं। वेद-वेद्य सनातन देव भगवान नारायण का कोई इंद्रियों से ( प्रत्यक्ष प्रमाण ) द्वारा अनुमान से और तर्क से भी नहीं जान सकता है।
उन्हीं के दिव्य जन्म कर्म तथा गुणों को अपनी बुद्धि के अनुसार जानकर उनके अधीन रहने वाले जीव समूहों सदा मुक्त होते हैं।
यह संपूर्ण जगत प्राण से उत्पन्न हुआ है, प्राण स्वरूप है, प्राणी रूप सूत्रों में पिरोया हुआ है तथा प्राण से ही चेष्टा करता है।
सब का आधारभूत यह सूत्र आत्मा प्राण ही विष्णु है, ऐसा विद्वान पुरुष कहते हैं।
व्याघ ने पूछा :– ब्राह्मण! जीवो में यह सूत्रात्मा प्राण सबसे श्रेष्ठ किस प्रकार हैं?
शंख ने कहा :- व्याघ ! पूर्व काल में सनातन देव भगवान नारायण ने ब्रह्मा आदि देवताओं की सृष्टि करके कहा – देवताओं में तुम्हारे सम्राट के पद पर ब्रह्मा जी की स्थापना करता हूँ, यही तुम सबके स्वामी हैं।
अब तुम लोग जो सबसे अधिक शक्तिशाली हो, उसे तुम स्वयं ही युवराज के पद पर प्रतिष्ठित करो।
भगवान के इस प्रकार कहने पर इन्द्रादि सब देवता आपस में विवाद करते हुए कहने लगे – मैं युवराज होऊंगा, मैं युवराज होऊँगा।
किसी ने सुर्य को श्रेष्ठ बताया किसी ने इंद्र को। किन्ही की दृष्टि में काम देव ही सर्वश्रेष्ठ थे ।
कुछ लोग मौन ही खड़े रहे। आपस में कोई निर्णय न होता देखकर वे भगवान नारायण के पास पूछने के लिए गए और प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले
देवताओं ने कहा :- हे महाविष्णु ! हम सबने अच्छी तरह विचार कर लिया, किंतु हम सब में श्रेष्ठ कौन है, यह हम अभी तक किसी प्रकार निश्चय न कर सके।
अब आप ही निर्णय कीजिये। तब भगवान विष्णु ने हंसते हुए कहा
विष्णुजी बोले:- इस विराट ब्रह्मांड रूपी शरीर से जिसके निकल जाने पर यह गिर जायेगा और जिस के प्रवेश करने पर पुनः उठ कर खड़ा हो जाएगा, वह देवता सबसे श्रेष्ठ हैं।
भगवान ने के ऐसा कहने पर जब देवताओं ने कहा अच्छा ऐसा ही हो तब सबसे पहले देवेश्वर जयंत विराट शरीर के पैर से बाहर निकला।
उसके निकलने के उस शरीर को लोग पंगु कहने लगे परंतु शरीर गिर न सका। यद्यपि वह चल नहीं पाता था तो भी सुनता, पीता, बोलता, सूँघता और देखता हुआ पिरववत चलता रहा।
तत्पश्चात गुह्य देश से दक्ष प्रजापति निकल कर अलग हो गए तब लोगों ने उसे नपुंसक कहा किंतु उस समय भी वह शरीर गिर न सका।
उसके बाद विराट शरीर के हाथ से सब देवताओं के राजा इंद्र बाहर निकले। उस समय भी शरीर पात नहीं हुआ। विराट पुरुष को सब लोगों हस्तहीन कहने लगे।
इसी प्रकार नेत्रों से सूर्य निकले। तब लोगों ने उसे अंधा और काणा कहा उस समय भी शरीर का पतन नहीं हुआ।
तदनंतर नासिका से अश्वनी कुमार निकले किंतु शरीर नहीं गिर सका। केवल इतना ही कहा जाने लगा कि यह सूँघ नहीं सकता।
कानों से अधिष्ठात्री देवी दिशाएं निकली उस समय लोग उसे बधिर कहने लगे, परंतु उसकी मृत्यु नहीं हुई।
तत्पश्चात जीव्हा से वरुण देव निकले। तब लोगों ने यही कहा कि यह रस का अनुभव नहीं कर सकता किंतु देहपात नहीं हुआ।
तदनंतर वाक इंद्रियों से उसके स्वामी अग्नि निकले। उस समय उसे गूँगा कहा गया किंतु शरीर नही गिरा।
फिर अंतः करण से ओज स्वरूप रूद्र देवता अलग हो गए, उस दशा में लोगों ने उसे जड़ कहा किंतु शरीरपात नहीं हुआ।
सबसे अंत में उस शरीर के प्राण निकला तब लोगों ने उसे मरा हुआ बतलाया।
इससे देवताओं के मन में बड़ा विस्मय हुआ।
देवता बोले – हम लोगों में से जो भी इस शरीर में प्रवेश करके इसे पूर्ववत उठा देगा - जीवित कर देगा, वहीं युवराज होगा।
ऐसी प्रतिज्ञा करके सब क्रमशः उस उसके शरीर में प्रवेश करने लगे ।
जयंत ने पैरों में प्रवेश किया, किंतु वह शरीर नहीं उठा।
दक्ष प्रजापति ने गुहा इंद्रियों में प्रवेश किया फिर भी शरीर नहीं उठा ।
इंद्र ने हाथ में, सूर्य ने नेत्रों में, दिशाओं ने कानों, में वरुण देव ने जीव्हा में, अश्वनी कुमार ने नासिका में, अग्नि ने वॉक इंद्रियों में, तथा रूद्र ने अंतःकरण में प्रवेश किया, किंतु वह शरीर नहीं उठा नहीं उठा।
सबसे अंत में प्राण ने शरीर में प्रवेश किया, तब वह शरीर उठ खड़ा हो गया।
तब देवताओं ने प्राण को ही सब देवताओं में श्रेष्ठ निश्चित किया ।
बल, ज्ञान, धैर्य, वैराग्य और जीवन शक्ति में प्राण को ही सर्वाधिक मानकर देवताओं ने उसकी को युवराज पद पर अभिषिक्त किया।
इस उत्कृष्ट स्थिति के कारण प्राण को उक्त कहा गया है।
अतः समस्त चराचर जगत प्राण आत्मक है।
जगदीश्वर प्राण अपने पूर्ण एवं बलशाली अंशों द्वारा सर्वत्र परिपूर्ण हैं।
प्राण हीं जगत का अस्तित्व नहीं है।
प्राण हीन कोई भी वस्तु वृद्धि को प्राप्त होती।
इस जगत में किसी भी प्राण हीन वस्तु की स्थिति नहीं है, इस कारण प्राण सब जीवो में श्रेष्ठ, सबका अंतरात्मा और सर्वाधिक बलशाली सिद्ध हुआ।
इसलिए प्राणोपासक प्राण को ही सर्वश्रेष्ठ कहते हैं।
प्राण सर्वदेव-आत्मक है, सब देवता प्राणमय है।
वे भगवान वासुदेव का अनुगामी तथा सदा उन्हीं में स्थित है।
मनीषी पुरुष प्राण को महा विष्णु का बल बताते हैं।
महाविष्णु के माहात्म्य और लक्षण को इस प्रकार जानकर मनुष्य पूर्व बंधनों का अनुसरण करने वाले अज्ञानमय लिंग को उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे सर्प पुरानी केंचुली को।
लिंग देह का त्याग करके वह परम पुरुष अनामय भगवान नारायण को प्राप्त होता है।
शंख मुनि की कहि हुई यह बात सुनकर व्याघ ने पुनः पूछा :- ब्राह्मन ! यह प्राण जब इतना महान प्रभावशाली और इस संपूर्ण जगत का गुरु एवं ईश्वर है, तब लोगों में इसकी महिमा क्यों नहीं प्रसिद्ध हुई?।।
शंख ने कहा :– पहले की बात है। प्राण अश्वमेघ यज्ञों द्वारा अनामय भगवान नारायण का यजन करने के लिए गंगा के तट पर प्रसन्नता पूर्वक गया ।
अनेक मुनि गणों के साथ उसने फलों के द्वारा पृथ्वी का शोधन किया ।
उस समय वहाँ समाधि में स्थित लिए स्थित हुए महात्मा कण्व बांबी की मिट्टी में छिपे हुए बैठे थे।
हल जोतने पर बांधी गिर जाने से वे बाहर निकल आये और क्रोध पूर्वक देखकर सामने खड़े हुए महाप्रभु प्राण को शाप दिया
महाऋषि कण्व बोले – देवेश्वर ! आज के लेकर आप की महिमा तीनो लोकों में विशेषतः भूलोक में प्रसिद्ध ना होगी।
हां, आपके अवतार तीनों लोकों में विख्यात होंगे। मुनि के उससे ऐसा कहने पर प्राण ने क्रोध करके कहा।
तुमने मुझ निरपराधी को शाप दिया है अतएव हे महाबली कण्व तू शीघ्र ही गुरु द्रोही होगा ।
उन्होंने कहा संसार में तेरी गति और तेरा आचरण निंदित होगा।
तब से इस लोक में यह महाप्रभु प्राण की महिमा प्रसिद्ध नही हुई तथा विशेषकर पृथ्वी में, शाप के कारण कण्व गुरु के द्रोही तथा सूर्य के शिष्य हुए।
यह सब जैसा तुमने पूछ वैसा मैंने कहा, अब जो कुछ तुमको पूछना हो, सो पूछो, विचार मत करो
।। इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण, वैशाख मास माहात्म्य में व भगवान विष्णु के स्वरूप का विवेचन, प्राणवायु की श्रेष्ठता व श्राप नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त।।२०।।
उन्नीसवाँ अध्याय, शंख मुनि द्वारा व्याघ के पूर्वजन्म का वर्णन।
व्याघ्र ने कहा :– हे मुने ! मैं अत्यंत पापी और दुर्बुद्धि हूँ ।
मेरे ऊपर आपने बहुत कृपा की है, क्योंकि महात्मा साधु लोग स्वभाव से ही दया युक्त होते हैं। कहाँ मैं नीच कुल तथा कहाँ मेरी ऐसी पवित्र बुद्धि ।।
मैं इसे केवल आपकी ही उत्तम कृपा का यह फल मैं मानता हूं, तो है यदि में आपका प्रिय शिष्य हूं, आप कृपा के योग्य हैं।।
अनुग्रह के योग्य हूँ साधु पुरुषों का समागम होने पर मनुष्य फिर कभी दुःख को नहीं प्राप्त होता, अतः आप मुझे अपने पापनाशक उपदेश कीजिए, जिससे मुक्ति जिससे मुक्ति चाहने वाले संसार रूपी समुद्र को पार करते हैं।।
साधु पुरुषों का चित्त सबके प्रति समान होता है। वे सब प्राणियों के प्रति दयालु होते है। उनकी दृष्टि में न कोई नीच है, न ऊंच न अपना है न पराया।
मनुष्य संतप्त होकर जब जब गुरुजनों से उपाय पूछता है तब तब वे उसे संसार बंधन से छुड़ाने वाले ज्ञान का उपदेश करते है ।।
जैसे गंगाजल मनुष्यों के पापों का नाश करने वाला है, उसी प्रकार मूढ़जनों का उद्धार करना साधु पुरषों का स्वभाव ही माना गया है।
व्याघ के यह वचन सुनकर शंख जी ने कहा :–व्याध ! यदि तुम कल्याण चाहते हो तो वैशाख मास में भगवान विष्णु को प्रसन्न और संसार समुंदर के पार करने वाले जो दिव्य धर्म बताया गया है, उसका पालन करो।।
मुनि श्रेष्ठ शंख प्यास से बहुत कष्ट पा रहे थे। दोपहर के समय उन्होंने सुंदर सरोवर में स्नान किया और युगल वस्त्र धारण करके मध्याह्न काल की उपासना पूरी की ।।
फिर देव पूजा करने के पश्चात व्याघ के लाये हुए श्रमहारी एवं स्वादिष्ट केथ का फल खाया ।।
जब वह खा पीकर सुखासन पर सुख पूर्वक विराजमान हुए, उस समय व्यास ने हाथ जोड़कर कहा– मुने ! किस कर्म से मेरा तमोमय व्याघ कुल में जन्म हुआ और किससे ऐसी सद्बुद्धि और महात्मा की संगति प्राप्त हुई?।।
प्रभु ! यदि आप ठीक समझें तो मैंने जो कुछ पूछा है, वह तथा अन्य जानने योग्य बातें भी मुझ से कहिए।
शंख बोले :– पूर्व जन्म में तुम वेदों के पारंगत विद्वान ब्राह्मण थे। शाकल्य नगर में तुम्हारा जन्म हुआ था। तुम्हारा गोत्र श्रीवत्स और नाम स्तंभ था।।
उस समय तुम बड़े तेजस्वी समझे जाते थे, किंतु आगे चलकर किसी वेश्या में तुम्हारी आसक्ति हो गई।
उसके संग दोष से तुमने नित्य कर्मों का त्याग कर दिया और शुद्र की भांति उसे घर लाकर रहने लगे ।।
यद्यपि तुम सदाचार शून्य, दुष्ट दतथा धर्म–कर्म के त्यागी थे, तो भी उस समय तुम्हारी ब्राह्मणी पत्नी कांतिमति ने वेश्या सहित तुम्हारी सेवा की।
वह सदा तुम्हारा प्रिय करने में लगी रहती थी । वह तुम दोनों के पैर धोती, दोनों की आज्ञा का पालन करती और दोनों से नीचे आसन पर सोती थी।
इस प्रकार वेश्या सहित पति की सेवा करती हुई उस दुखनी ब्राह्मणी का इस भूतल पर बहुत समय बीत गया।
एक दिन उसके पति ने मूली सहित उड़द खाया और तिल मिश्रित निष्पाप भक्षण किया।।
उसके अपथ्य भोजन से उसका मुँह और पेट चलने लगा और उसे बड़ा भयंकर भगंदर रोग हो गया।।
वह उस रोग के दिन रात जलने लगा जब तक घर में धन रहा, तब तक वैश्या भी वहां टकी रही उसके उसका सारा धन लेकर पीछे उसने घर छोड़ दिया।
वैश्या तो क्रूर और निर्दयी होती ही है। उसे छोड़कर दूसरे के पास चली गई ।।
तब वह ब्राह्मण रोग से व्याकुल चित्त हो रोता हुआ अपनी स्त्री के बोला :– देवी मैं वेश्या के प्रति आसक्त और अत्यंत निष्ठुर मनुष्य हूँ, मेरी रक्षा करो।
सुंदरी तुम परम पवित्र हो, मैंने तुम्हारा कुछ भी उपकार नहीं किया। कल्याणी ! जो पापी एवं निंदित मनुष्य अपनी विनीत पत्नी का आदर नहीं करता।
वह पंद्रह जन्मों तक नपुंसक होता है। महाभागे ! दिन-रात साधु पुरुष उसकी निंदा करते हैं,।
तुम साध्वी और पतिव्रता हो, मैं तुम्हारा अनादर करके पाप योनि में गिरूँगा।
तुम्हारा अनादर करने से जो तुम्हारे मन में क्रोध हुआ होगा, उसके में दग्ध हो चुका हूँ।
इस प्रकार अनुताप युक्त वचन कहते हुए पति से वह पतिव्रता हाथ जोड़कर बोली :– प्राणनाथ ! आप मेरे प्रति किए हुए व्यवहार को लेकर दुःख न माने ।।
लज्जा का अनुभव ना करें ।
मेरा अपके ऊपर तनिक भी क्रोध नहीं है।।
जिससे आप अपने को दग्ध हुआ बतलाते हैं । पूर्व जन्म में किये हुये पाप ही इस जन्म में दुख रूप होकर आते हैं ।
जो उन दुखों को धैर्य पूर्वक सहन करती है, वही स्त्री साध्वी मानी जाती है और वहीं पुरुष श्रेष्ठ समझा जाता है।
वह उत्तम वर्ण वाली स्त्री अपने पिता और भाइयों से धन मांग कर लाई और उसीसे पति का पालन करने लगी।
उसके अपने स्वामी को साक्षात क्षीरसागर निवासी विष्णु ही माना।
वह दिन-रात पति का मल मूत्र साफ करती और उसके शरीर में पड़े हुए कष्टदायक कीड़ों को धीरे धीरे नख से खींचकर निकालती रहती थी ।।
वह ब्राह्मणी न रात में सोती थी न दिन में अपने स्वामी के दुख से संतप्त होकर वह दुखनि इस प्रकार प्रार्थना किया करती थी :– प्रसिद्ध देवता और पित्र मेरे स्वामी की रक्षा करें, इन्हें रोग हीन एवं निष्पाप कर दें ।।
मैं पति के आरोग्य के लिए चंडिका देवी को भैंस का दही और उत्तम अन्न चढ़ाऊंगी, महात्मा गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए मोदक बनाऊंगी, दस शनिवार का उपवास करूंगी तथा मीठा और घी नहीं खाऊंगी ।।
मेरे पति रोग हीन होकर सौ वर्ष तक जिये ।।
इस प्रकार वह देवी प्रतिदिन देवताओं से प्रार्थना करती थी ।।
उन्हीं दिनों कोई देवल नामक महात्मा वहाँ आये।
वैशाख मास में धूप से पीड़ित हो सायकाल के समय उस ब्राह्मण के घर में उन्होंने पदार्पण किया ।।
ब्राह्मणी ने महात्मा के चरण धोकर उस जल को मस्तक पर लगा चढ़ाया और धूप से कष्ट पाये हुए महात्मा को पीने के लिए शरबत दिया।
प्रातः काल सूर्योदय होने पर मुनि जैसे आए थे, वैसे चले गए। तदनन्तर थोड़े ही समय में उस ब्राह्मण को सन्निपात हो गया।
ब्राह्मणी सोंठ, मिर्च और पीपल लेकर जब उसके मुंह में डालने लगी, तब उसने अपनी पत्नी की अंगुली काट ली।
उसके दोनों दांत सहसा सट गये और ब्राह्मणी की अंगुली का वह कोमल खंड उसके मुंह में ही रह गया।
उंगली काटकर उस वैश्या का ही चिंतन करता हुआ वह ब्राह्मण मर गया।
तब उसकी पत्नी कांतिमति ने कंगन बेचकर बहुत सा ईंधन खरीदा और चिता बनाकर वह साध्वी पति के साथ उसने जा बैठी ।।
उसने पति के रोगी शरीर का गाड़ आलिंगन करके उसके साथ अपने को भी चिता में जला दिया।
शरीर त्यागकर वह सहसा भगवान विष्णु के धाम को चली गई।
उसने वैशाख मास में जो देवल मुनि को शरबत पिलाया था और उनके चरणोदक को शीश पर चढ़ाया था।
जिसके फलस्वरूप उसको योगिगम्य परम पद की प्राप्ति हुई।
तुमने अंतकाल में वैश्या का चिंतन करते हुए शरीर त्याग किया था ।।
इसलिए इस घोर व्याघ के शरीर में आये हो और हिंसा में आसक्त हो सबको उद्वेग में डाला करते हो ।।
तुमने वैशाख मास में मुनि को शरबत देने के लिए ब्राह्मणी को की अनुमति दी थी, उसी पुण्य आज व्याघ होनेपर भी तुम्हें सब सुखों के एकमात्र साधन धर्म विषयक प्रश्न पूछने के लिये उत्तम बुद्धि हुई है।
तुमने जो सब पापों को हरने वाले मुनि के चरणोदक को सर पर धारण किया था, उसीका यह फल है कि वन में तुम्हें मेरा संग मिला है।
।। इस प्रकार की वैशाख मास महात्म्य के अंतर्गत व्याघ के पूर्वजन्म का वृत्तान्त नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त।।१९।।
सत्रहवाँ अध्याय, राजा पुरुयशा को भगवान का दर्शन, उनके द्वारा भगवत स्तुति और भगवान के वरदान से राजा की सायुज्य मुक्ति।
श्रुतदेव जी कहते बोले :– परमात्मा भगवान नारायण चार भुजाओं से सुशोभित थे।
उन्होंने हाथ मे शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे।
वे पीतांबर धारण करके वर्णमाला से विभूषित थे।
भगवती लक्ष्मी तथा एक पार्षद के साथ गरुड़ की पीठ पर विराजित थे।
उनका दुःसह तेज देखकर राजा के नेत्र सहसा मूंद गये।
उनके अंगों में रोमांच हो आया और नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी।
भगवत दर्शन के आनंद में उनका हृदय सर्वथा डूब गए।
उन्होंने तत्काल आगे बढ़कर भगवान को साष्टांग प्रणाम किया, प्रेम विहल नेत्रों से विश्वात्मान देव जगदीश्वर श्री हरि को बहुत देर तक निहार कर उनके चरण धोये और उस जल को अपने मस्तक पर धारण किया।
उन्हीं चरणों की धूल धोवन रूपा श्री गंगा जी ब्रह्मा जी सहित तीनों लोकों को पवित्र करती हैं।
तत्पश्चात राजाने महान वैभव से, बहुमूल्य वस्त्र आभूषण और चंदन से, हार , धूप, दीप तथा अमृत के समान नैवेद्य के निवेदन आदि से एवं अपने तन, मन, धन और आत्मा का समर्पण कर के अद्वितीय पुराण पुरुष भगवान विष्णु का पूजन किया। पूजा के बाद इस प्रकार स्तुति की–
राजा पुरुयशा बोले :–जो निर्गुण, निरंजन एवं प्रजापतियों के भी अधीश्वर है, ब्रह्मा आदि संपूर्ण देवता जिनकी वंदना करते रहते हैं, उन परम पुरुष भगवान श्रीहरि को मैं प्रणाम करता हूँ।
शरणागतों की पार राशि का नाश करने वाले आपके चरणाविन्दों की परिपक्व योग वाले योगियों ने जो अपने हृदय में धारण किया है, यह उनके लिए बड़े सौभाग्य की बात है।
बढ़ी हुई भक्ति के द्वारा अपने अंतःकरण तथा जीव भाव को भी आपके चरणों में ही चढ़ा कर वे योगीजन उन चरणों के चिंतन मात्र से आपकी धाम को प्राप्त हुए हैं।
विचित्र कर्म करने वाले ! आप स्वतंत्र परमेश्वर को नमस्कार है। साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने वाले ! आप परमात्मा को प्रणाम है।
प्रभु ! आपकी माया से मोहित होकर मैं स्त्री और धन रूपी विषयों में ही भटका रहता हूँ, अनर्थ में ही मेरी अर्थ दृष्टि हो गई थी।
प्रभु ! विश्वमूर्ते ! जब जीव पर आप अनंत शक्ति परमेश्वर की कृपा होती है, तभी उसे महापुरुषों का संग प्राप्त होता है, जिससे यह संसार समुद्र गौ पद के समान हो जाता है।
ईश्वर ! जब सत्संग मिलता है, तभी आपमें मन तथा बुद्धि का अनुराग होता है।
मेरा समस्त के राज्य जो मुझसे छीन गया था, वह भी आपका मुझ पर महान अनुग्रह ही हुआ था, ऐसा मैं मानता हूं।
मैं न तो राज्य चाहता हूँ, न पुत्र आदि की इच्छा रखता हूँ और न कोष की ही अभिलाषा करता हूँ।
अपितु मुनियों के द्वारा ध्यान करने योग्य जो आपके आराधनीय चरणाविन्द है, उन्ही का नित्य सेवन करना चाहता हूँ।
देवेश्वर ! जगन्निवास ! मुझ पर प्रसन्न होइए, जिससे आपके चरण कमलों की स्मृति बराबर बनी रहे।
तथा स्त्री, पुत्र, खजाना एवं आत्मीय कहे जाने वाले सब पदार्थों में जो मेरी आसकती है, वह सदा के लिए दूर हो जाए।
भगवान ! मेरा मन सदा आपके चरणाविन्दों के चिंतन में लगा रहे, मेरी वाणी आपकी दिव्य कथा के निरंतर वर्णन में तत्पर हो, मेरे यह दोनों नेत्र आपके श्री विग्रह के दर्शन में, कान कथा श्रवण में तथा रसना आपके भोग लगाये हुये प्रसाद के आस्वादन में प्रवृत हो।
प्रभु ! मेरी नासिका आपके चरण कमलों की तथा आपके भक्त जनों के गंध–विलेपन आदि की सुगंध लेने में, दोनों हाथ आपके मंदिर में झाड़ू देने आदि की सेवा में, दोनों पैर आपके तीर्थ और कथा स्थान की यात्रा करने में तथा मस्तक निरंतर आप को प्रणाम करने में संलग्न रहे।
मेरी कामना आपकी उत्तम कथा में और बुद्धि अहर्निश आपका चिंतन करने में तत्पर हो।
मेरे घर पर पधारे हुए मुनियों द्वारा आपकी उत्तम कथा का वर्णन तथा आप की महिमा का गान होता रहे और इसी में मेरे दिन बीते।
विष्णु ! एक क्षण तथा आधे पल के लिये भी ऐसा प्रसंग उपस्थित हो, जो आपकी चर्चा से रहित हो। हरे ! पर परमेष्ठी ब्रह्मा का पद, भूतल का चक्रवर्ती राज्य और मोक्ष भी नहीं चाहता, केवल आपके चरणों की निरंतर सेवा चाहता हूँ, जिसके लिए लक्ष्मी जी तथा ब्रह्मा, शंकर आदि देवता भी सदा प्रार्थना किया करते हैं।
राजा के इस प्रकार स्तुति करने पर कमलनयन भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर मेघ के समान गंभीर वाणी में इस प्रकार कहा –
भगवान विष्णु बोले :– राजन ! मैं जानता हूँ, तुम मेरे श्रेष्ठ भक्त हो, कामना रहित और निष्पाप हो।
नरेश्वर ! मुझमे तुम्हारी दृढ़ भक्ति हो और अंत में तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करो, तुम्हारे द्वारा किये हुये इस स्त्रोत्र से, इस पृथ्वी पर जो लोग स्तुति करेंगे, उनके ऊपर संतुष्ट हो मैं उन्हें भोग और मोक्ष प्रदान करूँगा।
यह अक्षय तृतीया इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध होगी, जिसमें भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हुआ। जो मनुष्य इस तिथि को किसी भी बहाने से अथवा स्वभाव से ही स्नान, दान आदि कक्रियायें करते हैं, वे मेरे अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
जो मनुष्य पितरों के उद्देश्य से अक्षय तृतीया को श्राद्ध करते हैं, उनका किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होता है।
इस तिथि में थोड़ा सा भी जो पुण्य किया जाता है, उसका फल अक्षय होता है।
हे नृप श्रेष्ठ ! जो कुटुम्बी ब्राह्मण को गाय दान करता है, उसके हाथ में सब संपत्तियों की वर्षा करने वाली भुक्ति और मुक्ति भी आ जाती है।
जो वैशाख मास में मेरा प्रिय करने वाला धर्मों का अनुष्ठान करता है, उसके जन्म, मृत्यु, जरा, भय और पाप को मैं हर लेता हूँ।
अनघ ! यह वैशाख मास मेरे चरण चिंतन की ही भांति ऐसे सहस्त्रों पापों को हर लेता है, जिनके लिए शास्त्रों में कोई प्रायश्चित नहीं मिलता है।
राजा को यह वरदान देकर देवाधिदेव भगवान जनार्दन सबके देखते-देखते वहीं अंतर्धान हो गए।
तदनंतर राजा पुरुयशा सदा भगवान में ही मन लगाये हुये उन्हीं की सेवा में तत्पर रहकर इस पृथ्वी का पालन करने लगा।
देव दुर्लभ समस्त मनोरथों का उपभोग कर के अंत में उन्होंने चक्रधारी भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लिया ।
जो इस उत्तम उपाख्यान को सुनते और सुनाते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं।
।।इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के अंतर्गत, राजा पुरुयशा को भगवान का दर्शन, उनके द्वारा भगवत स्तुति और भगवान के वरदान से राजा की सायुज्य मुक्ति नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त।।१७।।
अठारहवाँ अध्याय, वैशाख मास माहात्म्य से सिंह और गज की मुक्ति।
मैथिली जी बोले :- इस संसार तथा परलोक में फल देने वाले वैशाख मास के संपूर्ण धर्मों को बारंबार सुनकर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई ।।
जहाँ निष्कपट धर्म होता है, जहाँ विष्णु भगवान की शुभ कथा होती है, उस शास्त्र को सुनते हुए कानो को तृप्ति नहीं होती ।।
देव वश मेरे पूर्व जन्म के किये हुये पुण्य उदय हुए हैं क्योंकि आपको पाहुन (मेहमान बनकर) के बहने मेरे घर आये हैं ।।
आप के मुख कमल से निकले हुए परम अद्भुत वचनामृत को पीकर मैं तृप्त हो गया हूँ, मुझे परमेष्ठी मोक्ष की कामना नहीं है।।
अतएव विष्णु को प्रीती करने वाले भुक्ति और मुक्ति को देने वाले उन्हीं धर्मों को फिर से विस्तार पूर्वक कहिये ।।
राजा के ऐसा पूछने पर महात्मा श्रुतदेव जी ने प्रसन्न होकर शुभ धर्मों को वर्णन करना फिर से आरंभ किया ।।
*श्रुतदेव जी बोले* :– हे राजन ! पाप नाश करने वाली कथा को सुनो मैं कहता हूँ ।।
यह वैशाख मास के धर्म संबंधी कथा को मुनियों ने बारंबार कहां है चंपा के तीर पर शंख नाम का एक यशस्वी ब्राह्मण बृहस्पति नक्षत्र के सिंह राशि में जाने पर शुभ गोदावरी नदी पर गये ।।
और पूण्य भीमरथी को पार करके धाम से व्याकुल वैशाख महीने में घोर, निर्जन, निर्जल कांटो से भरी पहाड़ी पर पहुंचे ।।
मध्याह्न के समय वह ब्राह्मण वृक्ष के नीचे बैठ गया, एक दुष्ट व्याघ हाथ में धनुष बाण लिया हुए आया ।।
वह सब प्राणियों से घृणा करता था और मानो दूसरा यमराज था, उसने सूर्य के समान कुंडल धारण किय हुए दीक्षा प्राप्त ब्राह्मण को ।।
देखकर बांध लिया और उसका कुंडल ,जूता, छाता, रुद्राक्ष की माला तथा कमंडलु को छीन लिया ।।
और तब उस मूर्ख ने उस ब्राह्मण से "तू जा चला जा" यह कहकर उसको छोड़ दिया ।।
उस दुष्ट से छूटे कर वह ब्राह्मण सूर्य की किरणों तथा गर्म बालू से तपा हुआ जल हीन वन के मार्ग में चला, कहीं तो उसके जलते हुए पैर तिनको से ढकी भूमि पर पड़ते थे, और कहीं कांटो पर पड़ते थे ।।
वह जल्दी जल्दी गिरता पड़ता और बैठता हुआ हाय हाय करता हुआ शीघ्र चला, उसी दुःखी मुनि को देखकर, पृथ्वी पर पहुंचने पर उस व्याघ को दया आई ।।
उसके धर्म विमुख पाप बुद्धि व्यग्र ने सोचा कि मैं इसको सुख देने वाली पैरों की रक्षा करने की लिए जुटा क्यों न दे दूं ।।
जिसको मैंने अपने धर्म के अनुसार दूसरे वनों में चोरों से लिया था, व्याघों का धर्म निर्णय यही सब कुछ है ।।
इसलिए इसके दुख को हटाने के लिए मैं इसको जूता दूंगा ऐसा करने से मुझे मुझ पापी का कल्याण होगा ।।
मेरे पैरों में उत्तम पुराना जूता है इसने मुझे अब काम नहीं है इसलिए इन्हीं को मैं दे दूं ।।
ऐसा मन में निश्चय करके शीघ्र जाकर बालू और घाम से तपे हुए पैरों के श्रेष्ठ ब्राह्मण को जूता दे दिया ।।
जूता दे कर उसको परम संतोष हुआ "तुम खुश रहो" यह आशीर्वाद व्याघ को देकर ब्राह्मण ने कहा ।।
वैशाख महीने में इसके देने से अवश्य पुण्य का फल मिलेगा, दुर्बुद्धि व्याघ्र पर भी विष्णु भगवान प्रसन्न होते हैं ।।
जो सुख सब पदार्थों के प्राप्त करने से होता है, वही सुख मुझको अभी हुआ, इन वाक्यों को सुनकर आश्चर्य से युक्त होकर यह क्या है ?।।
ऐसा ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवादी ब्राह्मण से फिर कहा, तुम्हारी ही वस्तु तुमको देकर मुझे पुण्य कैसा होगा ।।
तुम वैशाख मास की प्रशंसा करते हो और कहते हो कि हरि संतुष्ट होंगे, हे ब्राहमण ! मुझे बतलाओ की वैशाख कौन है ? और हरी कौन है? ।।
हे दयानिधि ! मुझको सुनने की अभिलाषा है कि धर्म क्या है ? और उसका फल क्या है ? व्याध के इस वचनों को सुनकर शंख बड़े प्रसन्न हुये ।।
*उन्होंने फिर से विस्मित होकर और वैशाख की प्रशंसा करते हुए कहा*:– इस समय इस लालची दोस्त ने मुझे जूता दिया है ।।
मुझको बड़ा आश्चर्य है कि इस दुर्बुद्धि का मन अभी विपरीत क्यों हुआ ? सब धर्मों का फल जन्मांतर में होता है ।।
परंतु वैशाख मास के धर्मों का फल मनुष्य को उसी क्षण मिलता है, पापी दुरात्मा दुर्बुद्धि व्याघ की ।।
देव योग से जुटा दान करने से सत्त्व शुद्धि हो गई, यह बड़ा आश्चर्य है, जो कार्य विष्णु भगवान को प्रिय होता है और जो उनके संतोष का कारण होता है ।।
उसी को मनु इत्यादि धर्म वेत्ताओं ने धर्म कहा है, वैशाख महीने के धर्म विष्णु भगवान को बड़े ही प्रिय हैं ।।
वैशाख मास के धर्मों से केशव भगवान जैसे संतुष्ट होते हैं वैसे सब दानों से, तपों से और बड़े-बड़े यज्ञों से नहीं होते ।।
सब धर्मों में इसके समान कोई दूसरा धर्म नहीं है, गया में मत जाओ, गंगा में मत जाओ, प्रयाग पुष्कर में मत जाओ ।।
केदारनाथ में, कुरुक्षेत्र में, प्रभास में, समयंतक में, गोदावरी में, कृष्णा में, सेतुबंध रामेश्वर में, मरुकृध में मत जाओ ।।
वैशाख के धर्म महात्मा की प्रशंसा करने वाली कथा रूपी नदी में स्नान करने से विष्णु भगवान तुरंत सबके हृदय में आ विराजते हैं ।।
इस माधव नाम के मास में जो थोड़े ही साधन में होते हैं, वह बहुत धन का व्यय करने से धर्मो से यज्ञयों से साध्य नहीं हो ।।
हे व्याध ! यह माधव नाम का पुण्य बढ़ाने वाला महीना है, इसीसे तुमने ताप नाशन करने वाला जूते दिए ।।
इसीसे तुम्हारे पूर्व काल में किये हुए पुण्य का उदय हुआ भगवान प्रसन्न होंगे और प्राया तेरा कल्याण होगा ।।
नहीं तो तुम्हारी ऐसी शुभ बुद्धि कैसे हुई, जब मुनि जब इस प्रकार कह रहे थे मृत्यु से प्रेरित होकर बलवान हाथी और सिंह वह आ गये ।।
सिंह व्याघ का वध करने के लिये क्रोध से बिहाल होकर दौड़ा, पर दैववश बीच में कहीं से एक हाथी आ कर खड़ा हो गया ।।
वह सिंह बड़े वेग से दौड़कर हाथी को मारने में उद्धत हुआ, उस जंगल में सिंह और हाथी का घोर युद्ध हुआ ।।
उन महात्मा मुनि और व्याघ के देखते युद्ध से विरक्त तथा थक हार कर वे वहीं गिर पड़े ।।
समस्त पापों का नाश तथा देव अनुग्रह वश उन दोनों ने वैशाख मास माहात्म्य के वर्णन को श्रवण किया ।।
जिस के पुण्य से उनके पुराने सभी पापों का नाश हो गया।।
तथा उसके फल स्वरूप श्राप से प्राप्त उनकी वह देह शांत हो गई तथा दिव्य रूप से युक्त हुए ।।
दिव्य अलंकारों एवं दिव्य गंधों से अनुलेपित हो दिव्य विमानों पर चढ़कर दिव्य देहधारी के रूप में परिवर्तित हो गए।।
उन दोनों को देखकर तथा विस्मित हो मुनि ने उन दोनों से पूछा हे अनघ ! आप दोनों कौन है, तथा अपने इस पूर्व वृत्तान्त का वर्णन करें।।
उन दोनों ने कहा हे ऋषि हम दोनों मातंग मुनि के पुत्र दंतिल और कोहल है।।
हमारे पिता के श्राप वश ही हमारी यह दुर्दशा हुई है ।।
सर्वविद्या के विशारद हमारे पिता धर्मात्मा तथा ज्ञानी जनों से वंदित है ।।
वे मातंग नाम के ब्रह्म ऋषि है और सभी धर्मों की विद्वत्ता में उत्तम है।।
वे भगवान मधुसूदन के वैशाख मास के माहात्म्य का उसी प्रकार पालन करते हैं जिस प्रकार एक पिता आपने पुत्र का पालन करता है ।।
एक समय हमारे पिता मतंग मुनि वैशाख मास के नियमों का पालन करते हुए। गंगा स्नान के निमित्त एक घने वन की शीतल छाया से होते हुए जा रहे थे।।
तथा धर्म की लालसा करते हुए उस गंगा नदी को जाते हुए मुझ दंतिल और कोहल ने रूप और यौवन के मद से सम्पन्न, लोभ तथा द्वेष के कारण झगड़ा होने लगा जिसके फल स्वरूप वन में कोलाहल होने लगा ।।
इस प्रकार पुत्रों को धर्म से विमुख तथा प्रियजनों के साथ अप्रिय बोलने के कारण उन्होंने हमें शुद्र योनि में जन्म तथा दक्षिणा के लोभ के संसर्ग से चौदह भुवन के सब नारको को भोगने का श्राप दिया ।।
इस प्रकार क्रोध से युक्त हो उन्होंने हमें श्राप दिया दंतिल को क्रोध के वश हो सिंह ।।
कोहल को मद से उन्मत हो कर हाँथी की योनि को प्राप्त करने का श्राप दिया।।
उनके इस प्रकार क्रुद्ध होने पर हमने उनसे क्षमा याचना की तथा अपने पाप का उद्धार किस प्रकार हो इसके लिए प्रार्थना की।।
इस प्रकार से प्रार्थना करने पर हमारे पिता ने हम पर दया करके कहा। इस दुरयोनि को प्राप्त होने पर आपने इस बैर को याद करते हुये जब किसी समय मारने के लिये एकत्र हो जाओगे ।।
उसी समय देवयोग से शंख की वैशाख माह के धर्म के विषय की वार्ता तुम लोग सुनोगे ।।
उसी क्षण इससे तुम दोनों मुक्ति मार्ग में चले जाओगे, तुम दोनों पुत्र शाप से मुक्त होकर पहले का रूप पाओगे ।।
मुक्ति प्राप्त करके रहोगे, मेरी वाणी बृथा न होगी, इस प्रकार गुरु से श्राप पाकर हम दोनों दुर्बुद्धि ने बुरी योनि पाकर ।।
दैववश परस्पर हत्या करने के लिये हम लोग एकत्र हुये और आप दोनों का दिव्य शुभ संवाद हमने सुना ।।
उसी से तत्क्षण हम लोगों की मुक्ति हुई, यह सब कह कर तथा मुनीश्वर को प्रणाम करके ।।
मुझसे कुछ पूछकर और आज्ञा पाकर वे दोनों अपने पिता के पास गये, दयानिधे मुनि ने व्याघ को दिखलाकर कहा ।।
वैशाख माहात्म्य के सुनने के बड़े फल को देखा, मुहूर्त भर सुनने से ही उन दोनों की मुक्ति हो गई।।
उस श्रेष्ठ मुनि के ऐसा कहने पर शस्त्रों को फेंककर व्याघ ने उस दयानिधि, निःस्पृह, तीव्रबुद्धि बुद्ध विशुद्ध आत्मा, पूण्य के एकमात्र पात्र से कहा ।।
।।इस प्रकार स्कंद पुराण के वैशाख मास महत्तम में के नारद और अमरीश के संवाद में दंगल और कोहल को मुक्ति प्राप्ति नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।।१८।।
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