श्रावण मास माहात्म्य

वरलक्ष्मी व्रत कथा

सब देवों से सेवित कैलाश के शिखर पर महादेव गौरी के साथ चौसर खेल रहे थे ।।
वे दोनों एक दूसरे से कहने लगे कि, मैंने तुम्हें जीत लिया, इस प्रकार उनका एक दूसरे से  विवाद हो गया।।
वहाँ पर चित्रनेमि भी उपस्थित था शिव–पार्वती ने चित्रनेमि से पूछा तो वह झूठ बोला कि; शिवजी जीते। इससे गौरी ने क्रोध में आकर शाप दे डाला कि ।।
हे झूठे चित्रनेमि ! तुझे कुष्ठ रोग  हो जाये। चित्रनेमि हतप्रभ हो गया। पीछे शिव बोले कि, चित्रनेमि महाप्रज्ञ और बुद्धिमान है, मैंने तृण के  बराबर भी पाप  इसमें देखा या  सुना नहीं है परम बुद्धिमानी चित्रनेमि कभी झूठ नहीं बोलता सत्य कहता है, हे देवी ! आप इस पर कृपा करें ।।
इस पर दयालु हो कर पार्वती जी ने उसे कहा कि, जब सुंदर सरोवर पर अप्सराएं पवित्र व्रत  करेंगी तथा एकाग्र मन से तुझे सब कुछ कहेंगी उस समय तुम शाप से मुक्त हो जाओगे ! इतना कहते ही चित्रनेमी वहाँ से उसी समय उस सरोवर को गया ।।
उस सरोवर पर चित्रनेमी कोड़ी होकर रहने लगा।।
वहाँ उसने स्वर्ग में विलास करने वाली अप्सराओं को देखा ।।
वे सब देव पूजन में लगी हुई थी, उन्हें प्रणाम करके पूछने लगा कि, हे महाभागिनियों ! किसकी पूजा करती हो और क्या चाहती हो ।।
मैं क्या करूं जिसका यहाँ और वहाँ दोनों जगह फल हो आप ऐसा कोई व्रत कहें, ऐसा चित्रनेमी ने स्वर्ग की विलासनी अप्सराओं से पूछा ।।
कि जिसके किये से मैं बहुत दिनों के दुखदयी गिरजा के श्राप से छूट जाऊं।।
वे बोली कि, तुम इस श्रेष्ठ व्रत को करो।।
यह सब काम और समृद्धि देने वाला दिव्य वरलक्ष्मी व्रत है,
जब सूर्य कक्र्कट राशि पर हो तथा श्रावण मास हो ।।
गंगा और यमुना के योग में या तुंगभद्रा नदी के किनारे उसी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार के दिन संयमी पुरुषों को महालक्ष्मी का व्रत करना चाहिये। चतुर्भुज सोने की प्रतिमा बनावें ।।
रंगोली और तोरण से घर को सजाकर घर के पूर्व भाग में विशेषकर ईशान दिशा में एक प्रस्थ तंदुल भूमि पर रखें तथा अष्ठदल कमल बनावें उस कमल पर कलश रखें उसमें तीर्थों का पानी भरे ।।१५–१६।।
उस पर फल रखकर, स्वर्ण दौर एवं पंच पल्लव डालकर वस्त्रों से ढक दे।।
अग्न्युतारण आदि संस्कार की हुई प्रतिमा को विधि पूर्वक उस पर स्थापित करके पूजन करें। क्रमशः शुद्ध स्नान आदि कराएं ।।
तथा मंत्रों से पंचामृत से स्नान करावें, देवीसूक्त से अभिषेक  करें ।।
अष्टगंध से पूजकर पल्लवों से पूजे।
अश्वत्थ, वट, बिल्व, आम्र, मालती और अनार ।।
इसके इक्कीस पत्ते लें और भी अनेक को तरह के मालती आदि के पुष्प।।
एवं धूप दीपों सब कामों के देने वाली महालक्ष्मी का पूजन करें।।
अनेक व्यंजनों के साथ भक्ष्य  भोज्य और पायस।।
21 अप्पू इनसे शिव का पूजन करें, नैवेद्य चढ़ावे पीछे वर मांगे ।।
सरस्वती और प्यारा बोलने वाली शची का ध्यान करते हुए नाच गाने आदि के साथ श्री की प्रार्थना करें ।।
उन स्वर्ग की विलासनियों ने उसे इस प्रकार व्रत विधि कही कि, यह करके विधि से पांच बायने दें और यत्न पूर्वक कथा सुने ।।
मौन से पाँच आरतियों से पूजे। व्रत करने वाला एक सुपारी लेकर चूर्ण रहित एक पत्ते को सावधानी से चढ़ावे, कपड़े में के टुकड़े में मजबूत बांधकर प्रातः काल देखें ।।
यदि वे अच्छी तरह लाल हो जाए तो व्रत करें ।। नहीं तो भूमि चाहने वाले को यह व्रत किसी भी सूरत में नहीं करना चाहिये।।
इसी विधान से व्रत ग्रहण करें, सब समृद्धिओं के देने वाले इस व्रत को अप्सराओं ने अच्छी तरह किया ।।
वह पूजा के अंत में चित्रनेमी को देखने लगी कि वह धूप के धुआं को सूंघ घृत के दीपक के प्रभाव से ।।
कुष्ठ रहित हो, शुचि एवं सोने सा दीप रहा है एवं उसका मन उस व्रत में लगा हुआ है मैं इन सब सिद्धीदाता व्रतों को यतना से करूंगा ।।
ऐसा चित्रनेमि ने सब देवियों से कहा। उसी समय उसने वस्त्र अलंकारों से विभूषित सोने की देवी बनवाई ।।
पहले कहे हुए विधान के अनुसार पूजा की। वेणु के पात्र दक्षिणा समेत फल और अन्न से तथा 21 पकवानों से भर कर बैध पाँच वायने दिए।।
विप्र, यति, देवी,  ब्रह्मचारी, और सुवासिनी को चित्रनेमी ने एक-एक वायना दिया ।।
इस प्रकार क्रम से पांच बयाने देकर क्रम पूर्वक देवी को नमस्कार कर घर चला गया ।।
चूर्ण रहित नागवल्ली का एक दल तथा सुपारी कपड़े में बाँध प्रातः काल देखा ।।
जब वह लाल हो गया तो भक्ति के साथ व्रत किया आज मैं देवी के दर्शन किये से श्राप रहित हो गया ।।
मैंने इस व्रत को भक्ति भाव से किया है। चित्र नेमी व्रत कर के शंकर के स्थान कैलाश पर पहुँचा ।।
वहाँ आदर के साथ देवेश और देवी को प्रणाम किया। पार्वती चित्रनेमी से बोली कि, हे चित्रनेमि ! अपने पुत्र की तरह तू मेरा पालनीय है। यह तू सत्य समझ, चित्रनेमि बोला कि, हे हर वल्लभे ! ।।
वरलक्ष्मी की कृपा से तेरे चरण देख सका हुँ, पवित्र व्रत वाले चित्रनेमी से महादेव जी बोले कि ।।
आज से आप इस कैलाश पर यथेष्ट भोग भोगे पीछे इस व्रत के प्रभाव से वैकुंठ चले जाओगे ।।
पुत्र के लिए पहले पार्वती ने भी इस व्रत को किया था, इसके प्रभाव से उन्हें स्वामी कार्तिक पुत्र मिला ।।
नंद और विक्रमादित्य इससे राज्य पा गए तथा स्त्री रहित नंद को सुलक्षणा स्त्री मिल गई ।।
उसने भी इस व्रत को पुत्र संतान के लिए किया था। इससे उसने एक पुत्र को पैदा किया जो तीनों लोगों का पालन कर सकें ।।
तथा यहां बड़े बड़े सुंदर भोग भोगे, उस दिन से यह लक्ष्मी व्रत प्रचलित हुआ ।।
उस दिन से जो कोई स्त्री व पुरुष इस उत्तम व्रत को करता है वह बड़े-बड़े भोगों को भोग कर अंत में शिवपूरी को चला जाता है ।।
हे विप्रो ! यह मैंने वर लक्ष्मी का व्रत सुना दिया है। जो कोई भी इसे एकाग्र होकर सुनेगा और सुनावेगा ।।
वह वरलक्ष्मी की कृपा से शिवपूरी को चला जाएगा ।।
।।इस प्रकार भविष्य पुराण में कहा हुआ श्रवण शुक्रवार के दिन होने वाला वरलक्ष्मी व्रत पूरा हुआ।।

Tuesday, July 30, 2019

तीसवाँ अध्याय, श्रावण मास माहात्म्य के पाठ एवं श्रवण का फल

ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! मैंने आपसे श्रावण मास का कुछ-कुछ माहात्म्य कहा है, इसके सम्पूर्ण माहात्म्य का वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है. मेरी इस कल्याणी प्रिया सती ने दक्ष के यज्ञ में अपना शरीर दग्ध करके पुनः हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया. श्रावण मास में व्रत करने के कारण यह मुझे पुनः प्राप्त हुई इसीलिए श्रावण मुझे प्रियकर है. यह मास न अधिक शीतल होता है और ना ही अधिक उष्ण (गर्म) होता है. राजा को चाहिए कि श्रावण मास में श्रौताग्नि से निर्मित श्वेत भस्म से अपने संपूर्ण शरीर को उदधूलित करके जल से आर्द्र भस्म के द्वारा मस्तक, वक्षःस्थल, नाभि, दोनों बाहु, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, कंठ, सर और पीठ – इन बारह स्थानों में त्रिपुण्ड धारण करें.

“मानस्तोके.” मन्त्र से अथवा “सद्योजात.” आदि मन्त्र से अथवा षडाक्षर मन्त्र – ॐ नमः शिवाय – से भस्म के द्वारा शरीर को सुशोभित करें और शरीर में एक सौ आठ रुद्राक्ष धारण करें. कण्ठ में बत्तीस रुद्राक्ष, सर पर बाइस, दोनों कानों में बारह, दोनों हाथों में चौबीस, दोनों भुजाओं में आठ-आठ, ललाट पर एक और शिखा के अग्रभाग में एक रुद्राक्ष धारण करें. इस प्रकार से करके मेरा पूजन कर पंचाक्षर मन्त्र का जप करें.

हे विपेन्द्र ! श्रावण मास में जो ऐसा करता है वह मेरा ही स्वरुप है इसमें संदेह नहीं है. इस मास को मेरा अत्यंत प्रिय जानकर केशव की तथा मेरी पूजा करनी चाहिए. इस मास में मेरी अत्यंत प्रिय तिथि “कृष्णाष्टमी” (भारत के पश्चिमी प्रदेशों में युगादि तिथि के अनुसार मास का नामकरण होता है अतः श्रावण कृष्ण अष्टमी को भाद्रपद अष्टमी समझना चाहिए) पड़ती है, उस दिन भगवान् श्रीहरि देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे. हे सनत्कुमार ! यह मैंने आपको संक्षेप में बताया है, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं !

सनत्कुमार बोले – हे पार्वतीपते ! आपने श्रावण मास का जो-जो कृत्य कहा, उन्हें सुनकर आनन्दसागर में निमग्न रहने के कारण और उनका वर्णन विस्तृत होने के कारण व्यवस्थित रूप से स्मृति नहीं बन पाई, अतः हे नाथ ! आप क्रम से सबको यथार्थ रूप से बताइए, सावधानी से सुनकर मैं भक्तिपूर्वक उन्हें धारण करूँगा.

ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! श्रावण मास की शुभ अनुक्रमणिका को आप सावधान होकर सुनिए. सर्वप्रथम शौनक का प्रश्न, तत्पश्चात सूतजी का उत्तर, श्रोता के गुण, आपके प्रश्न, श्रावण की व्युत्पत्ति, उसकी स्तुति, पुनः हे मुने ! आपका विस्तृत प्रश्न, इसके बाद नामकथन सहित आपके द्वारा की गई मेरी स्तुति, फिर क्रम से उद्देश्यपूर्वक मेरा उत्तर, पुनः आपका विशेष प्रश्न, उसके बाद नक्तव्रत की विधि, रुद्राभिषेक कथन, इसके बाद लक्षपूजा विधि, दीपदान, फिर किसी प्रिय वस्तु का परित्याग, पुनः रुद्राभिषेक करने तथा पंचामृत-ग्रहण करने से प्राप्त होने वाला फल, इसके बाद पृथ्वी पर शयन करने तथा मौनव्रत धारण करने का फल, तत्पश्चात मासोपवास में धारणा-पारणा की विधि, इसके बाद सोमाख्यान में लक्षरुद्रवर्ती विधि, पुनः कोटिलिंग-विधान, इसके बाद “अनौदन” नामक व्रत कहा गया है.

इसी व्रत में हविष्यान्न ग्रहण, पत्तल पर भोजन करना, शाकत्याग, भूमि पर शयन, प्रातःस्नान और दम तथा शम का वर्णन, उसके बाद स्फटिक आदि लिंगों में पूजा, जप का फल, उसके बाद प्रदक्षिणा, नमस्कार, वेदपरायण, पुरुषसूक्त की विधि, उसके बाद ग्रह यज्ञ की विधि, रवि-सोम-मंगल के व्रत का विस्तारपूर्वक वर्णन, पुनः बुध-गुरु का व्रत, इसके बाद शुक्रवार के दिन जीवन्तिका का व्रत, पुनः शनिवार को नृसिंह-शनि-वायुदेव और अश्वत्थ का पूजन – ये सब कहे गए हैं.

उसके बाद रोटक व्रत का माहात्म्य, औदुम्बर व्रत, स्वर्णगौरी व्रत, दूर्वागणपति व्रत, पंचमी तिथि में नाग व्रत, षष्ठी तिथि में सुपौदन व्रत, इसके बाद शीतला सप्तमी नामक व्रत, देवी का पवित्रारोपण, इसके बाद दुर्गाकुमारी की पूजा, आशा व्रत, उसके बाद दोनों एकादशियों का व्रत, पुनः श्रीहरि का पवित्रारोपण, पुनः त्रयोदशी तिथि को कामदेव की पूजा, उसके बाद शिवजी का पवित्रक धारण, पुनः उपाकर्म, उत्सर्जन तथा श्रवणा कर्म – इसका वर्णन किया गया है.

इसके बाद सर्पबलि, हयग्रीव-जन्मोत्सव, सभादीप, रक्षाबंधन, संकटनाशन व्रत, कृष्णजन्माष्टमी व्रत तथा उसकी कथा, पिठोर नामक व्रत, पोला नामक वृषव्रत,कुशग्रहण, नदियों का रजोधर्म, सिंह संक्रमण में गोप्रसव होने पर उसकी शान्ति, कर्क-सिंह-संक्रमणकाल में तथा श्रावण मास में दान-स्नान-माहात्म्य, माहात्म्य-श्रवण, उसके बाद वाचकपूजा, इसके बाद अगस्त्य अर्घ्यविधि, फिर कर्मों तथा व्रतों के काल का निर्णय बताया गया है. जो श्रावण मास माहात्म्य का पाठ करता है अथवा इसका श्रवण करता है, वह इस मास में किये गए व्रतों का फल प्राप्त करता है.

हे सनत्कुमार ! आप इस शुभ अनुक्रम को अपने ह्रदय में धारण कीजिए. जो इस अध्याय को तथा श्रावण मास के माहात्म्य को सुनता है वह उस फल को प्राप्त करता है, जो फल सभी व्रतों का होता है. हे विप्रर्षे ! अधिक कहने से क्या लाभ है, श्रावण मास में जो विधान किया गया है, उनमें से किसी एक व्रत का भी करने वाला मुझे प्रिय है.

सूतजी बोले – हे शौनक ! शिवजी के अमृतमय इस उत्तम वचन का अपने कर्णपुट से पान करके सनत्कुमार आनंदित हुए और कृतकृत्य हो गए. श्रावण मास की स्तुति करते हुए तथा ह्रदय में शिवजी का स्मरण करते हुए वे देवर्षिश्रेष्ठ सनत्कुमार शंकर जी से आज्ञा लेकर चले गए. जिस किसी के समक्ष इस अत्यंत श्रेष्ठ रहस्य को प्रकाशित नहीं करना चाहिए. हे प्रभो ! आपकी योग्यता देखकर ही मैंने इसे आपसे कहा है.

|| इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वरसनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “अनुक्रमणिकाकथन” नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ||  

उनत्तीसवाँ अध्याय, श्रावण मास में किये जाने वाले व्रतों का कालनिर्णय

ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! अब मैं पूर्व में कहे गए व्रत कर्मों के समय के विषय में बताऊँगा. हे महामुने ! किस समय कौन-सा कृत्य करना चाहिए, उसे सुनिए. श्रावण मास में कौन-सी तिथि किस विहित काल में ग्रहण के योग्य होती है और उस तिथि में पूजा, जागरण आदि से संबंधित मुख्य समय क्या है? उन-उन व्रतों के वर्णन के समय कुछ व्रतों का समय तो पूर्व के अध्यायों में बता दिया गया है. नक्त-व्रत का समय ही विशेष रूप से उन व्रतों तथा कर्मों में उचित बताया गया है. दिन में उपवास करें तथा रात्रि में भोजन करें, यही प्रधान नियम है. सभी व्रतों का उद्यापन उन-उन व्रतों की तिथियों में ही होना चाहिए, यदि किसी कारण से उन तिथि में उद्यापन असंभव हो तो पंचांग शुद्ध दिन में एक दिन पूर्व अधिवासन करके और दूसरे दिन आदरपूर्वक होम आदि कृत्यों को करें.

धारण-पारण व्रत में तिथि का घटना व बढ़ना कारण नहीं है. श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि में संकल्प करके उपवास करें, पुनः दूसरे दिन पारण करे, इसके बाद दूसरे दिन उपवास करें. इसी क्रम से करते रहें. व्रती को चाहिए कि वह पारण में हविष्यान्न – मूंग, चावल आदि – ग्रहण करे. एकादशी तिथि में पारण का दिन हो जाने पर तीन दिन निरंतर उपवास करें. रविवार व्रत में पूजा का समय प्रातःकाल ही होना चाहिए. सोमवार के व्रत में पूजा का प्रधान समय सायंकाल कहा गया है. मंगल, बुध तथा गुरु के व्रत में पूजन के लिए मुख्य समय प्रातःकाल है. शुक्रवार के व्रत में पूजन उषाकाल से लेकर सूर्योदय के पूर्व तक हो जाना चाहिए तथा रात्रि में जागरण करना चाहिए. शनिवार के दिन व्रत में नृसिंह का पूजन सायंकाल में करें.

शनि के व्रत में शनि के दान के लिए मध्याह्न मुख्य समय कहा गया है. हनुमान जी के पूजन का समय मध्याह्न है. अश्वत्थ का पूजन प्रातःकाल करना चाहिए. हे वत्स ! रोटक नामक व्रत में यदि सोमवार युक्त प्रतिपदा तिथि हो तो वह प्रतिपदा तीन मुहूर्त से कुछ अधिक होनी चाहिए अन्यथा पूर्वयोगिनी प्रतिपदा ग्रहण करनी चाहिए. औदुम्बरी द्वित्तीया सायंकाल व्यापिनी मानी गई है. यदि दोनों तिथियों में पूर्ववेध हो तो तृतीयासंयुक्त द्वित्तीया ग्रहण करनी चाहिए. स्वर्णगौरी नामक व्रत की तृतीया तिथि चतुर्थीयुक्त होनी चाहिए, गणपति व्रत के लिए तृतीयाविद्ध चतुर्थी तिथि प्रशस्त होती है.

नागों के पूजन में षष्ठीयुक्त पंचमी प्रशस्त होती है. सुपौदन व्रत में सायंकाल सप्तमीयुक्त षष्ठी श्रेष्ठ होती है. शीतला के व्रत में मध्याह्न व्यापिनी सप्तमी ग्रहण करनी चाहिए. देवी के पवित्रारोपण व्रत में रात्रि व्यापिनी अष्टमी तिथि ग्रहण करनी चाहिए. नक्तव्यापिनी कुमारी नवमी प्रशस्त मानी जाती है. इसी प्रकार आशा नामक जो दशमी तिथि है वह भी नक्त व्यापिनी होनी चाहिए. विद्ध एकादशी का त्याग करना चाहिए.

हे मुने ! उसमे वेध के विषय में सुनिए. एकादशी व्रत के लिए अरुणोदय में दशमी का वेध वैष्णवों के लिए तथा सूर्योदय में दशमी का वेध स्मार्तों के लिए निंद्य होता है. रात्रि के अंतिम प्रहार का आधा भाग अरुणोदय होता है. इसी रीति से जो द्वादशी हो, वह पवित्रारोपण में ग्राह्य है. कामदेव के व्रत में त्रयोदशी तिथि रात्रि व्यापिनी होनी चाहिए. उसमे भी द्वितीय याम व्यापिनी त्रयोदशी हो तो वह अति प्रशस्त होती है. शिवजी के पवित्रारोपण व्रत में रात्रि व्यापिनी चतुर्दशी होनी चाहिए, उसमे भी जो चतुर्दशी अर्धरात्रि व्यापिनी होती है, वह अतिश्रेष्ठ होती है.

उपाकर्म तथा उत्सर्जन कृत्य के लिए पूर्णिमा तिथि अथवा श्रवण नक्षत्र होने चाहिए. यदि दूसरे दिन तीन मुहूर्त तक पूर्णिमा हो तो दूसरा दिन ग्रहण करना चाहिए अन्यथा तैत्तिरीय शाखा वालों को और ऋग्वेदियों को पूर्व दिन ही करना चाहिए. तैत्तिरीय यजुर्वेदियों को तीन मुहूर्त पर्यन्त दूसरे दिन पूर्णिमा में श्रवण नक्षत्र हो तब भी पूर्व दिन दोनों कृत्य करने चाहिए.

यदि पूर्णिमा तथा श्रवण दोनों का पूर्व दिन एक मुहूर्त के अनन्तर योग हो और दूसरे दिन दो मुहूर्त के भीतर दोनों समाप्त हो गए हों तब पूर्व दिन ही दोनों कर्म होना चाहिए. यदि हस्त नक्षत्र दोनों दिन अपराह्नकालव्यापी हो तब भी दोनों कृत्य पूर्व दिन ही संपन्न होने चाहिए. श्रवणाकर्म में उपाकर्म प्रयोग के अंत में दीपक का काल माना गया है और सर्व बलि के लिए भी वही काल बताया गया है. पर्व के दिन में अथवा रात्रि में अपने-अपने गृह्यसूत्र के अनुसार जब भी इच्छा हो, इसे करना चाहिए.

इस दीपदान तथा सर्व बलिदान कर्म में अस्तकालव्यापिनी पूर्णिमा प्रशस्त है. हयग्रीव के उत्सव में मध्याह्नव्यापिनी पूर्णिमा प्रशस्त होती है. रक्षाबंधन कर्म में अपराह्नव्यापिनी पूर्णिमा होनी चाहिए. इसी प्रकार संकष्ट चतुर्थी चंद्रोदयव्यापिनी ग्राह्य होनी चाहिए. यदि चंद्रोदयव्यापिनी चतुर्थी दोनों दिनों में हो अथवा दोनों दिनों में न हो तो भी चतुर्थी व्रत पूर्व दिन में करना चाहिए क्योंकि तृतीया में चतुर्थी महान पुण्य फल देने वाली होती है. अतः हे वत्स ! व्रतियों को चाहिए कि गणेश जी को प्रसन्न करने वाले इस व्रत को करें.

गणेश चतुर्थी, गौरी चतुर्थी और बहुला चतुर्थी – इन चतुर्थियों के अतिरिक्त अन्य सभी चतुर्थियों के पूजन के लिए पंचमी विद्या कही गई है. कृष्णजन्माष्टमी तिथि निशीथव्यापिनी ग्रहण करनी चाहिए. निर्णय में सर्वत्र तिथि छह प्रकार की मानी जाती है –

1) दोनों दिन पूर्ण व्याप्ति,
2) दोनों दिन केवल अव्याप्ति,
3) अंश से दोनों दिन सम व्याप्ति,
4) अंश से दोनों दिन विषम व्याप्ति,
5) पूर्व दिन संपूर्ण व्याप्ति और दूसरे दिन केवल आंशिक व्याप्ति, पूर्व दिन आंशिक व्याप्ति और
6) दूसरे दिन अव्याप्ति.

इन पक्षों में तीन पक्षों में जिस प्रकार संदेह नहीं है, उसे अब सुनिए.

विषम व्याप्ति में अंशव्याप्ति से अधिक व्याप्ति उत्तम होती है. एक दिन तिथि पूर्णा है, वही तिथि दूसरे दिन अपूर्णा कही जाती है. अव्याप्ति तथा अंश से व्याप्ति – इनमें अंशव्याप्ति उत्तम होती है और जब अंशव्याप्ति पूर्ण हो तथा जब अंश से सम हो, वहां संदेह होता है और उसके निर्णय में भेद होता है. कहीं युग्म वाक्य से वार व नक्षत्र के योग से, कहीं प्रधानद्वय योग से और कहीं पारणा योग से. जन्माष्टमी व्रत में संदेह होने पर तीनों पक्षों में परा ग्राह्य होती है. यदि अष्टमी तीन प्रहर के भीतर ही समाप्त हुई हो तो अष्टमी के अंत में पारण हो जाना चाहिए और उसके बाद यदि अष्टमी उषाकाल में समाप्त होती हो तो पारण उसी समय करना चाहिए.

पिठोर नामक व्रत में मध्याह्नव्यापिनी अमावस्या शुभ होती है और वृषभों के पूजन में सायंकाल व्यापिनी अमावस्या शुभ होती है. कुशों के संचय में संगवकाल(यह दिन के पाँच भागों में से दूसरा भाग होता है) – व्यापिनी अमावस्या शुभ कही गई है. सूर्य के कर्क संक्रमण में तीस घड़ी पूर्व का काल पुण्यमय मानते हैं. अगस्त्य के अर्घ्य का काल तो व्रत वर्णन में ही कह दिया गया है. हे वत्स ! मैंने आपसे यह कर्मों के काल का निर्णय कह दिया. जो मनुष्य इस अध्याय को सुनता है अथवा इसका पाठ करता है वह श्रावण मास में किए गए सभी व्रतों का फल प्राप्त करता है.

|| इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “व्रतनिर्णयकाल निर्णय कथन” नामक उन्नत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ||

अट्ठाईसवाँ अध्याय, अगस्त्य जी को अर्घ्य प्रदान की विधि

ईश्वर बोले – हे ब्रह्मपुत्र ! अब मैं अगस्त्य जी को अर्घ्य प्रदान करने की उत्तम विधि का वर्णन करूंगा, जिसे करने से मनुष्य सभी वांछित फल प्राप्त कर लेता है. अगस्त्य के उदय के पूर्व काल का नियम जानना चाहिए. जब समरात्रि अर्थात आठ या दस रात्रि उदय होने में शेष रहे तब सात रात्रि पहले से उदयकाल तक प्रतिदिन अर्घ्य प्रदान करें, उसकी विधि मैं आपसे कहता हूँ. जब से अर्घ्य देना प्रारम्भ करे उस दिन प्रातःकाल श्वेत तिलों से स्नान करके गृहाश्रमी मनुष्य श्वेत माला तथा श्वेत वस्त्र धारण करे और सुवर्ण आदि से निर्मित कुम्भ स्थापित करें, जो छिद्र रहित, पंचरत्न से युक्त, घृतपात्र से समन्वित, अनेक प्रकार के मोदक आदि भक्ष्य पदार्थ तथा फलों से संयुक्त, माला-वस्त्र से विभूषित तथा ऊपर स्थित ताम्र के पूर्णपात्र से सुशोभित हो.

उस पात्र के ऊपर अगस्त्य जी की सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित करें जो अंगुष्ठमात्र प्रमाण वाले, पुरुषाकर, चार भुजाओं से युक्त, स्थूल तथा दीर्घ भुजदंडों से सुशोभित, दक्ष्णि दिशा की ओर मुख किए हुए, सुन्दर, शांतभाव संपन्न, जटामंडलधारी, कमण्डलु धारण किए हुए, अनेक शिष्यों से आवृत, हाथों में कुश तथा अक्षत लिए हुए हों, ऐसे लोपामुद्रा सहित मुनि अगस्त्य का आवाहन करें और गंध, पुष्प आदि सोलह उपचारों तथा अनेक प्रकार के नैवेद्यों से उनका पूजन करें. इसके बाद भक्तियुक्त चित्त से उन्हें दही तथा भात की बलि प्रदान करें. इसके बाद अर्घ्य दें जिसकी विधि इस प्रकार है –

सुवर्ण, चाँदी, ताम्र अथवा बाँस के पात्र में नारंगी, खजूर, नारिकेल, कुष्मांड, करेला, केला, अनार, बैंगन, बिजौरा नीबू, अखरोट, पिस्तक, नीलकमल, पद्म, कुश, दूर्वांकुर, अन्य प्रकार के भी उपलब्ध फल तथा पुष्प, नानाविध भक्ष्य पदार्थ, सप्तधान्य, सप्त अंकुर, पंचपल्लव और वस्त्र – इन पदार्थों को रखकर पात्र की विधिवत पूजा करें. पुनः घुटने के बल, सिर झुकाकर उस पात्र को मस्तक से लगाकर नीचे की ओर मुख करके अगस्त्य मुनि का इस प्रकार से ध्यान करें और श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सावधान होकर अर्घ्य प्रदान करें – काशपुष्प के समान स्वरुप वाले, अग्नि तथा वायु से प्रादुर्भूत तथा मित्रावरुण के पुत्र हे अगस्त्य ! आपको नमस्कार है. विंध्य की वृद्धि को रोक देने वाले, मेघ के जल का विष हरने वाले, रत्नों के स्वामी तथा लंका में वास करने वाले हे देवर्षे ! आपको नमस्कार है.

जिन्होंने आतापी तथा वातापी का भक्षण किया, लोपामुद्रा के पति, महाबली तथा श्रीमान जो ये अगस्त्य जी हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है. जिनके उदित होने से समस्त पाप, मानसिक तथा शारीरिक रोग और तीनों प्रकार के ताप – आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक – नष्ट हो जाते हैं, उन्हें बार-बार नित्य नमस्कार है. जिन्होंने जल-जंतुओं से परिपूर्ण समुद्र को पूर्वकाल में सूखा दिया था, उन पुत्रसहित, शिष्यसहित तथा भार्या सहित अगस्त्य जी को नमस्कार है. बुद्धिमान द्विजाति “अगस्त्यस्य नद्भयः” (ऋक. १०|६०|६) – इस वेदमंत्र से तथा शूद्र पौराणिक मन्त्र से अगस्त्य जी को अर्घ्य देकर उन्हें प्रणाम करें. इसके बाद लोपामुद्रा को अर्घ्य दें. हे राजपुत्रि ! हे महाभागे ! हे ऋषिपत्नि ! हे सुमुखि ! हे लोपामुद्रे ! आपको नमस्कार है, मेरे अर्घ्य को स्वीकार कीजिए.

इसके बाद  अर्घ्य मन्त्र से घृत की आठ हजार अथवा एक सौ आठ आहुति प्रदान करें. इस प्रकार करके अगस्त्य जी को प्रणाम करने के बाद यह कहकर विसर्जन करे – बुद्धि से परे चरित्र वाले हे अगस्त्य ! मैंने सम्यक रूप से आपका पूजन किया है, अतः मेरी इहलौकिक तथा पारलौकिक कार्यसिद्धि को करके आप प्रस्थान कीजिए. इस प्रकार उन अगस्त्य जी को विसर्जित करके वेद-वेदांग के विद्वान्, निर्धन तथा गृहस्थ ब्राह्मण को समस्त पदार्थ अर्पण कर दे और मुख से यह कहें – “सत्कार किए गए अगस्त्य जी ब्राह्मण रूप से स्वीकार करें. अगस्त्य ही ग्रहण करते हैं, अगस्त्य ही देते हैं और दोनों का उद्धार करने वाले भी अगस्त्य ही हैं, अगस्त्य जी को बार-बार नमस्कार है.”

दोनों मन्त्रों का उच्चारण करके दान करें, ब्राह्मण आदि पूर्व विहित वैदिक मन्त्र का उच्चारण करें और शूद्र पौराणिक मन्त्र का उच्चारण करे. उसके बाद सुवर्णमयी सींगवाली, दूध देने वाली, बछड़े सहित, चाँदी के खुरवाली, ताम्र के पीठवाली, अत्यंत सुन्दर, काँसे की दोहनी से युक्त और घंटा तथा वस्त्र से विभूषित श्वेत वर्ण की धेनु प्रदान करें. अगस्त्य मुनि के उदय के सात दिन पूर्व से इस प्रकार अर्घ्य देकर ही सातवें दिन दक्षिणा सहित गौ प्रदान करें.

इस प्रकार इस व्रत को सात वर्ष तक करके निष्काम व्यक्ति पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता और सकाम व्यक्ति चक्रवर्ती राजा होता है तथा रूप व आरोग्य से युक्त रहता है, ब्राह्मण चार वेदों तथा सभी शास्त्रों का विद्वान् हो जाता है क्षत्रिय समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वी को प्राप्त कर लेता है, वैश्य धान्यसंपदा और गोधन प्राप्त कर लेता है. शूद्रों को अत्यधिक धन, आरोग्य तथा सत्य की प्राप्ति होती है, स्त्रियों को पुत्र उत्पन्न होते हैं, उनका सौभाग्य बढ़ता है तथा घर समृद्धिमय हो जाता है. हे ब्रह्मपुत्र ! विधवाओं का महापुण्य बढ़ता है, कन्या रूपगुणसंपन्न पति प्राप्त करती है और दुःखी मनुष्य रोग से मुक्त हो जाता है.

जिन देशों में मनुष्यों के द्वारा अगस्त्य की पूजा की जाती है, उन देशों में मेघ लोगों की इच्छा के अनुसार वृष्टि करता है, वहाँ प्राकृतिक आपदाएं निर्मूल हो जाती हैं और व्याधियां नष्ट हो जाती हैं. जो कोई भी अगस्त्य जी के इस अर्घ्यदान का पाठ करते हैं अथवा इसे सुनते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ मनुष्य पापों से छूट जाते हैं और पृथ्वीलोक में दीर्घकाल तक निवास करके हंसयुक्त विमान से स्वर्ग जाते हैं. जो लोग जीवनपर्यन्त निष्काम भाव से इसे करते हैं वे मुक्ति के भागी होते हैं.

||  इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वरसनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “अगस्त्य अर्घ्यविधि” नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ||

श्रावण मास माहात्म्य सत्ताईसवाँ अध्याय, कर्क संक्रांति और सिंह संक्रांति में किए जाने वाले कार्य

ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! श्रावण मास में कर्क संक्रांति तथा सिंह संक्रांति आने पर उस समय जो कृत्य किए जाते हैं उन्हें भी मैं आपसे कहता हूँ. कर्क संक्रांति तथा सिंह संक्रांति के बीच की अवधि में सभी नदियाँ रजस्वला रहती हैं अतः समुद्रगामिनी नदियों को छोड़कर उन सभी में स्नान नहीं करना चाहिए. कुछ ऋषियों ने यह कहा है कि अगस्त्य के उदयपर्यन्त ही वे रजस्वला रहती हैं. जब तक दक्षिण दिशा के आभूषण स्वरुप अगस्त्य उदित नहीं होते तभी तक वे नदियाँ रजस्वला रहती हैं और अल्प जलवाली कही जाती हैं. जो नदियाँ पृथ्वी पर ग्रीष्म-ऋतू में सूख जाती हैं, वर्षाकाल में जब तक दस दिन न बीत जाएं तब तक उनमे स्नान नहीं करना चाहिए. जिन नदियों की गति स्वतः आठ हजार धनुष तक नहीं हो जाती तब तक वे ‘नदी’ शब्द की संज्ञावली  नहीं होती अपितु वे गर्त कही जाती हैं.

कर्क संक्रांति के प्रारम्भ में तीन दिन तक महानदियां रजस्वला रहती हैं, वे स्त्रियों की भाँति चौथे दिन शुद्ध हो जाती हैं. हे मुने ! अब मैं महानदियों को बताऊँगा, आप सावधान होकर सुनिए. गोदावरी, भीमरथी, तुंगभद्रा, वेनिका, तापी, पयोष्णी – ये छह नदियाँ विंध्य के दक्षिण में कही गई हैं. भागीरथी, नर्मदा, यमुना, सरस्वती, विशोका, वितस्ता – ये छह नदियाँ विंध्य के उत्तर में कही गई हैं. ये बारह महानदियां देवर्षिक्षेत्र से  उत्पन्न हुई हैं. हे मुने ! देविका, कावेरी, वंजरा, कृष्णा – ये महानदियां कर्क संक्रमण के प्रारम्भ में एक दिन तक रजस्वला रहती हैं, गौतमी नामक नदी कर्क संक्रमण होने पर तीन दिनों तक रजस्वला रहती है.

चंद्रभागा, सती, सिंधु, सरयू, नर्मदा, गंगा, यमुना, प्लक्षजाला, सरस्वती – ये जो नादसंज्ञावाली नदियाँ हैं, वे रजोदोष से युक्त नहीं होती हैं. शोण, सिंधु, हिरण्य, कोकिल, आहित, घर्घर और शतद्रु – ये सात नाद पवित्र कहे गए हैं. धर्मद्रव्यमयी गंगा, पवित्र यमुना तथा सरस्वती – ये नदियाँ गुप्त रजोदोषवाली होती हैं, अतः ये सभी अवस्थाओं में निर्मल रहती हैं. जल का यह रजोदोष नदी तट पर रहने वालों को नहीं होता है. रजोधर्म से दूषित जल भी गंगा जल से पवित्र हो जाता है. प्रसवावस्था वाली बकरियां, गायें, भैंसे व स्त्रियाँ और भूमि पर वृष्टि के प्रारम्भ का जल – ये दस रात व्यतीत होने पर शुद्ध हो जाते हैं. कुएँ तथा बावली के अभाव में अन्य नदियों का जल अमृत होता है. रजोधर्म से दूषित काल में भी ग्रामभोग नदी दोषमय नहीं होती है. दूसरे के द्वारा भरवाए गए जल में रजो दोष नहीं होता है.

उपाकर्म में, उत्सर्ग कृत्य में, प्रातःकाल के स्नान में, विपत्तियों में, सूर्यग्रहणकाल में तथा चंद्रग्रहणकल में रजोदोष नहीं होता है. हे सनत्कुमार ! अब मैं सिंह संक्रांति में गोप्रसव के विषय में कहूँगा. सिंह राशि में सूर्य के सक्रमण होने पर यदि गोप्रसव होता है तब जिसकी गाय प्रसव करती है, उसकी मृत्यु छह महीनों में हो जाती है. मैं इसकी शांति भी बताऊँगा, जिससे सुख प्राप्त होता है. प्रसव करने वाली उस गाय को उसी क्षण ब्राह्मण को दे देना चाहिए. उसके बाद घृत मिश्रित काली सरसों से होम करना चाहिए. इसके बाद व्याहृतियों से घृत में सिक्त तिलों की एक हजार आठ आहुतियां डालनी चाहिए. उपवास रखकर विप्र को प्रयत्नपूर्वक दक्षिणा देनी चाहिए.

सिंह राशि में सूर्य के प्रवेश करने पर जब गोष्ठ में गौ प्रसव होता है तब कोई अनिष्ट अवश्य होता है अतः उसकी शान्ति के लिए शांतिकर्म अनुष्ठान करना चाहिए. “अस्य वाम.” इस सूक्त से तथा “तद्विष्णो:” इस मन्त्र से तिल तथा घृत से एक सौ आठ आहुतियां देनी चाहिए और मृत्युंजय मन्त्र से दस हजार आहुतियां डालनी चाहिए. उसके बाद श्रीसूक्त से अथवा शांतिसूक्त से स्नान करना चाहिए. इस प्रकार किए गए विधान से कभी भी भय नहीं होता है. इसी प्रकार यदि श्रावण मास में घोड़ी दिन में प्रसव करे तो इसके लिए भी शान्ति कर्म करना चाहिए, उसके बाद दोष नष्ट हो जाता है.

हे सनत्कुमार ! अब मैं कर्क संक्रांति में, सिंह संक्रांति में तथा श्रावण मास में किए जाने वाले शुभप्रद दान का वर्णन करूँगा. सूर्य के कर्क राशि में स्थित होने पर घृतधेनु का दान तथा सिंह राशि में स्थित होने पर सुवर्ण सहित छत्र का दान श्रेष्ठ कहा जाता है तथा श्रावण मास में दान अति श्रेष्ठ फल देने वाला कहा गया है. भगवान् श्रीधर की प्रसन्नता के लिए श्रावण मास में घृत, घृतकुम्भ, घृतधेनु तथा फल विद्वान् ब्राह्मण को प्रदान करने चाहिए. मेरी प्रसन्नता के लिए श्रावण मास में किए गए दान अन्य मासों के दानों की अपेक्षा अधिक अक्षय फल देने वाले होते हैं. बारहों महीनों में इसके समान अन्य मास मुझको प्रिय नहीं है. जब श्रावण मास आने को होता है तब मैं उसकी प्रतीक्षा करता हूँ.

जो मनुष्य इस मास में व्रत करता है वह मुझे परम प्रिय होता है क्योंकि चन्द्रमा ब्राह्मणों के राजा हैं, सूर्य सभी के प्रत्यक्ष देवता हैं – ये दोनों मेरे नेत्र हैं, कर्क तथा सिंह की दोनों संक्रांतियां जिस मास में पड़े उससे बढ़कर किसका माहात्म्य होगा. जो मनुष्य इस श्रावण मास में पूरे महीने प्रातःकाल स्नान करता है, वह बारहों महीने के प्रातः स्नान का फल प्राप्त करता है. यदि मनुष्य श्रावण मास में प्रातः स्नान नहीं करता है तो बारहों महीनो में किये गए उसके स्नान का फल निष्फल हो जाता है.

हे महादेव ! हे दयासिन्धो ! मैं श्रावण मास में उषाकाल में प्रातःस्नान करूँगा, हे प्रभो ! मुझे विघ्न रहित कीजिए. प्रातः स्नान करके शिवजी की पूजा करके श्रावण मास की सत्कथा का प्रतिदिन भक्तिपूर्वक श्रवण करना चाहिए. बुद्धिमान व्यक्ति इस प्रकार से ही मास व्यतीत करता है. अन्य मासों की प्रवृत्ति पूर्णमासी प्रतिपदा से होती है किन्तु इस मास की प्रवृत्ति अमावस्या की प्रतिपदा से होती है. श्रावण मास की कथा के माहात्म्य का वर्णन भला कौन कर सकता है. इस मास में व्रत, स्नान, कथा-श्रवण आदि से जो सात प्रकार की वन्ध्या स्त्री होती है, वह भी सुन्दर पुत्र प्राप्त करती है. विद्या चाहने वाला विद्या प्राप्त करता है, बल की कामना करने वाले को बल मिल जाता है, रोगी आरोग्य प्राप्त कर लेता है, बंधन में पड़ा हुआ व्यक्ति बंधन से छूट जाता है, धन का अभिलाषी धन को पा लेता है, धर्म के प्रति मनुष्य का अनुराग हो जाता है तथा पत्नी की कामना करने वाला उत्तम पत्नी पाता है.

हे मानद ! अधिक कहने से क्या प्रयोजन, मनुष्य जो-जो चाहता है उस-उस को पा लेता है और मृत्यु के बाद मेरे लोक को पाकर मेरे सान्निध्य में आनंद प्राप्त करता है. कथा सुनाने के बाद वस्त्र, आभूषण आदि से कथा वाचक की विधिवत पूजा करनी चाहिए. जिसने वाचक को संतुष्ट कर दिया उसने मानो मुझ शिव को प्रसन्न कर दिया. श्रावण मास का माहात्म्य सुनकर जो वाचक की पूजा नहीं करता, यमराज उसके कानों को छेदते हैं और वह दूसरे जन्म में बहरा होता है. अतः सामर्थ्यानुसार वाचक की पूजा करनी चाहिए. जो मनुष्य उत्तम भक्ति के साथ इस श्रावण मास माहात्म्य का पाठ करता है अथवा सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है उसको अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है.

|| इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “नदी-रजोदोष-सिंह-गौप्रसव-सिंहकर्कट-श्रावणस्तुति वाचकपूजाकथन” नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ||

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