माघ मास माहात्म्य– छठा अध्याय
माघ मास माहात्म्य, छठा अध्याय, सुन्द–उपसुन्द का वध
भृगुवंश में उत्पन्न हुई कुब्जिका का नामक कल्याणी एक ब्राह्मणी थी, वह बाल वैधव्य से दुखी हो घोर तप करने लगी ।।१।।
विंध्याचल पर्वत के महा क्षेत्र में जहां रेवा कपिल का संगम हुआ है, वहाँ वह व्रतानि होकर नारायण परायण हुई ।।२।।
सदैव सदाचार से युक्त संपूर्ण संघ से वर्जित, जितेंद्रिय, जीत क्रोध सत्य बाक अल्प भाषण करने वाली ।।३।।
सुशीला, दानशीला, अपने देह को सुखाने वाली पित्र देव एवं ब्राह्मणों को देकर अग्नि में आहुतियां देने वाली थी ।।४।।
हे राजन! वह कृच्छ व्रती करने वाली सदा छठे काल में भोजन करती, कृच्छ, अतिकृच्छ और तप्त कृच्छ व्रत का सदा अनुष्ठान करती।।५।।
पुण्य करते हुए ही वह नर्मदा के तट पर माघ मास व्यतीत करती थी। इस प्रकार वल्कल वस्त्र धारणी उस सुशीला ने ।।६।।
महासत्यता से युक्त धैर्य और संतोष से रेवा कपिल के संगम में साठ माघ स्नान किए ।।७।।
हे राजन! फिर तप से क्षीण होकर वह उस क्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त हुई। तब वह मास स्नान के पुण्य से विष्णु लोक में ।।८।।
प्रसन्नता पूर्वक सहस्त्र चतुर युग निवास कर सुन्द उपसुन्द के नाश करने को पद्म भव से प्रकट हुई ।।९।।
तिलोत्तमा नाम से ब्रह्मलोक में रही और पुण्य के शेष रहने से महा रूपवती हुई ।।१०।।
वह अयोनिज स्त्रियों में रत्न देवताओं को मोहने वाली सुंदर नाभि वाली मनोहर अप्सरा हुई ।।११।।
विधाता की चातुरी का मानो वह आश्चर्य थी, उसको उत्पन्न कर विधाता ने प्रसन्न हो आज्ञा दी ।।१२।।
हे मृग लोचनी ! शीघ्र ही तुम दैत्यों का नाश के निमित्त गमन करो, तब वह भामिनी वीणा लेकर ब्रह्म लोक से चली ।।१३।।
और पुष्कर मार्ग से वहाँ आई जहाँ वे दोनों दैत्य स्थित थे वहाँ रेवा के पवित्र निर्मल जल में स्नान कर ।।१४।।
बंधूक पुष्प के समान लाल वस्त्र धारण कर शब्दायमान कंकण मेखला और नूपुर धारण किये ।।१५।।
चलायमान मुक्तावली कंठी चलायमान कुण्डलों से सुशोभित, चमेली के फूलों को जुड़े में गुँथे, अशोक वृक्ष के नीचे स्थित ।।१६।।
मधुर स्वर से गाती, वीणा बजाती सप्तसुरों की तान लेती सुस्निग्ध कोमल शब्दों से युक्त।।१७।।
इस प्रकार तिलोत्तमा अशोक वृक्ष के नीचे स्थित हुई। हे राजन!दैत्य के सेवकों ने मन को आनंद देने वाली चंद्रकला के समान।।१८।।
उसको देख विस्मित और आनंदित होकर दैत्य सेना के बड़े सेनानायकों ने शीघ्रता से सुन्द उपसुन्द के समीप जाकर ।।१९।।
बारंबार उसका वर्णन करके संभ्रम से कहा :- है दैत्य ! हम नहीं जानते कि वह स्त्री एक देवी है या दानवी ।।२०।।
नाग स्त्री, यक्षिणी या कौन है, सर्वथा वह स्त्री रत्न है, आप दोनों इस लोक को के रत्ना भोगी हो और वह अबला रत्नभूत है ।।२१।।
वह अशोक को हरने वाली थोड़ी ही दूर पर अशोक वृक्ष के नीचे स्थित है उसको जाकर शीघ्र देखो, वह काम को भी मोहित करने वाली है ।।२२।।
सेनापतियों की मनोहर वाणी सुनकर वे दोनों मधु के कटोरे तथा जलसेवन जल विहार को त्याग ।।२३।।
सहस्त्रों उत्तम स्त्रियों को छोड़ उस जलाशय से निकल शत भार के प्रमाण वाली लोहे की काल दंड के समान कठोर ।।२४।।
भिन्न भिन्न गदाओं को लेकर दोनों बड़े वेग से चले, जहाँ पर वह श्रृंगार किए चंडी के समान इन को मारने को स्थित थी ।।२५।।
हे राजन ! जहाँ वह उन दोनों दैत्यों की कामाग्नि प्रदीप करती हुई स्थिति थी, उसके रूप से मोहित हो दोनों उनके आगे आये।२६।।
और मद से विशेष मत होकर परस्पर कहने लगे :- हे भ्राता! तुम इसको छोड़ो, इसे मैं अपनी भार्या बनाऊँगा ।।२७।।
तुम इसको छोड़ो यह मेरी भार्या होगी, इस प्रकार मतंग कि समान मत हो परस्पर दोनों कहने लगे।।२८।।
काल के वशीभूत हो दोनों ने परस्पर गदा घात किया और परस्पर प्रहार से प्राण रहित हो दोनों पृथ्वी पर गिर पड़े ।।२९।।
इनको मरा देखकर सेना के लोगों में बड़ा कोलाहल किया। यह कालरात्रि के समान कौन है? यह क्या हो गया ?।।३०।।
सेना के ऐसा कहने पर सुन्द–उपसुन्द दैत्यों को पर्वत शिखर से गिरा कर मनोहारिणी तिलोत्तमा ।।३१।।
दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई आकाश में चली गई और देव कार्य करके ब्रह्मलोक में आकर स्थित हुई ।।३२।।
तब संतुष्ट होकर ब्रह्मा जी ने उसका अनुमोदन किया, हे चन्द्रानने! मैंने तुम्हें सूर्य के रथ पर स्थान दिया ।।३३।।
जब तक सूर्य आकाश में स्थित है, तब तक तू अनेक प्रकार के भोगों को भोग। हे राजन! इस प्रकार वह ब्राह्मणी श्रेष्ठ अप्सरा होकर।।३४।।
अब तक सूर्य लोक में माघ स्नान के महत्फलको भोग करती है। हे राजन! इसी कारण श्रद्धा मनुष्यों को ।।३५।।
परम गति चाहने वालों को सदा यतन पूर्वक माघ स्नान करना चाहिए, उसने कौन से पुरुषार्थ की प्राप्ति ना कि या उसके कौन सा पाप क्षीण नहीं हुये ।।३६।।
जिस मनुष्य ने माघ महीने में स्नान किया है, इसकी बराबरी दक्षिणा सहित सब यज्ञ भी नहीं कर सकते ।।३७।।
हे राजन! माघ स्नान और विशेषकर तीर्थ सेवन से बढ़कर पपानाशक और स्वर्ग को देने वाला कोई कर्म नहीं है ।।३८।।
माघ स्नान के समान इस पृथ्वी पर और कोई मोक्ष देने वाला नहीं है ।।३९।।
*इस प्रकार श्री पद्म पुराण में माघ मास महात्मा के अंतर्गत सुन्द–उपसुन्द का वध नामक छठा अध्याय समाप्त*
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