माघ मास माहात्म्य– तेरहवाँ अध्याय

विकुण्डल बोला :–  हे सौम्य!   तुम्हारा वचन सुनकर मेरा मन अति प्रसन्न हो गया, आपके वाक्य गंगा जी के समान ताप हरने वाले और सज्जनों के समान पापों का नाश करने वाले हैं।।१।। 

सज्जनों का यह स्वाभाविक गुण है कि वे प्रिय वाक्य बोलते और दूसरों का उपकार करते हैं। अमृत पूर्ण चंद्रमा वही है जो सबको शीतल प्रदान करता है।।२।। 

अब हे देवदूत ! मैं पूछता हूँ, मेरे ऊपर कृपा करके यह बताओ कि मेरा भ्राता का नरक से बहुत शीघ्र उद्धार कैसे हो सकता है।।3।।

 दत्तात्रेय जी बोले :– उसकी मित्रता रूपी रज्जु के बंधन के बँधकर जब देवदूत ने यह वाक्य सुने, तब ज्ञान दृष्टि के द्वारा क्षण मात्र में ध्यान करके यों बोला ।।४।।

देवदूत ने कहा :– हे वैश्य !  तुमने अपने व्यतीत हुए आठवें जन्म में जो पुण्य संचय किया है, यदि तुम अपने भ्राता को स्वर्ग में भेजना चाहते हो तो वह उसे प्रदान कर दो।।५।। 

विकुण्डल बोला :– हे दूत !  उस जन्म में मैं कौन था और मेरा संचित पुण्य क्या है ? मुझसे वह किस प्रकार किया गया, यह सब वृत्तांत मेरे प्रति वर्णन करो, मैं तत्काल वह पुण्य उसे प्रदान कर दूँगा ।।६।। 

दूत बोला :– सुनो वैश्य ! हम तुम्हारे पुण्य का हेतु कारण सहित वर्णन करते हैं। पहले पवित्र मधुबन में एक शाकलि ऋषि थे।।७।।

वे तपस्वी और वेदाध्ययन करने वाले थे, उनका तेज ब्रह्मा जी के समान था, रेवती नाम की उनकी स्त्री से नवग्रह के समान नव पुत्र उत्पन्न हुए।।८।। 

ध्रुव, शशि, बुध, तार और ज्योतिषमान यह पाँच अग्निहोत्री थे और गृहस्थ धर्म में रमण करते थे।।९।।

निर्मोह, जितमाय, ध्यानकाम तथा गुणाति ये चारों ऋषि कुमार गृहस्थ धर्म से विरक्त थे।।१०।।

 ये चारों ही सन्यासी थे। इसलिए किसी कर्म को भी करने में इनकी रूचि नहीं थी, ये सब एक ही ग्राम में निवास करते और संग तथा परिग्रह रहित थे।।११।। 

इन्होंने शिखा और यज्ञोपवीत का भी परित्याग कर दिया था। इनका मृत्तिका, पाषाण और स्वर्ण में समान ही ज्ञान था। इसलिए यह चाहे जिस वस्तु से अपने शरीर का अच्छादन कर लेते और चाहे जहाँ बैठ जाते थे ।।१२।।

संध्या के समय अपने घर में आ जाते और नित्य ही ब्रह्म का ध्यान करने में तत्पर रहते थे। इन्होंने निद्रा और भोजन पर भी नियंत्रण कर लिया था, तथा ये पवन और शीत को भी सहन कर लेते थे।।१३।। 

चराचर जगत संपूर्ण जगत को विष्णु रूप ही देखते थे अथवा मौन धारण पूर्वक ही यह सब भूमंडल के ऊपर विचरते थे ।।१४।। 

ये योगीजन किंचित मात्र भी  क्रिया का आचरण नहीं करते थे। इनका ज्ञान अतिशय दृढ़ था। अतएव इनको किसी विषय में भी संदेह नहीं होता था अथवा ये लोग सच्चिदानंद स्वरूप ब्रह्म के विचार अनुशीलन में बड़े ही निपुण थे।।१५।। 

इस प्रकार वे तुम्हारे पिछले आठवें जन्म में अतिथि हुये, उस समय तुम मत्स्यदेश में सकुटुंब स्त्री पुत्र सहित निवास करते थे।।१६।।

मध्याह्न समय में क्षुधा और तृषा से व्यथित हुए वे तुम्हारे घर आए और वैश्वदेव से निवृत्त होने के अनन्तर घर के आँगन में तुमने उन्हें  देखा।।१७।। 

तब नेत्रों में आसूँ  भर कर आनंद पूर्वक गदगद हो संभ्रम से दंडवत प्रणाम कर अतिशय आदर सहित सत्कार सहित।।१८।। 

उनके चरणों का स्पर्श करके दोनों हाथ जोड़कर मनोहर वाणी से तुमने उनका सम्मान किया।।१९।। 

और बोले आज मेरा जन्म और जीवन सफल है, आज मेरे ऊपर विष्णु भगवान प्रसन्न हुए और आज ही मैं सनाथ हुआ, जो आपने मुझे पवित्र किया।।२०।।

 मुझे, मेरे घर, स्त्री, भ्राता, पिता, गायें, शास्त्रों का श्रवण और धन सभी को धन्य है।।२१।।

 इसका कारण यह है कि – दैहिक, दैविक, और भौतिक तापों का नाश करने वाले आपके चरणों का मुझे दर्शन हुआ, क्योंकि आपका दर्शन ईश्वर दर्शन के  समान सौभाग्यवानों को होता है।।२२।।

इस प्रकार उनकी पूजा करके तुमने उनके चरण पखारे और बड़ी श्रद्धा के साथ चरणोदक को अपने शिर पर धारण किया।।२३।।

हे वैश्य ! यदि सन्यासियों का चरणोंदक परम श्रद्धा पूर्वक शिर के ऊपर धारण किया जाय तो वह सात जन्म के संचित पापों का नाश कर देता है।।२५।। 

फिर तुमने गंध, पुष्प, अक्ष, धूप और निराजन आदि से उनकी पूजा करके सुंदर पकवान का भोजन कराकर सन्यासियों को संतुष्ट किया।।२५।। 

उन परमहंसों ने तृप्त होकर रात्रि में तुम्हारे ही घर विश्राम किया और समस्त ज्योतियों के भी ज्योति स्वरूप परब्रह्म परमेश्वर का ध्यान करते रहे।।२६।। 

हे वैश्य! उसका अतिथि सत्कार करने से तुम्हें जिस पुण्य की प्राप्ति हुई, उसे मैं सहस्त्रों मुख से भी वर्णन नहीं कर सकता।।२७।।

सृष्टि में प्राणी, प्राणियों में बुद्धिमान, बुद्धिमान में मनुष्य और मनुष्य में ब्राह्मणों को श्रेष्ठ कहा गया है।।२८।। 

ब्राह्मणों में विद्वान, विद्वानों में कृतबुद्धि, उनमें भी क्रिया करने वाले एयर क्रिया करने वालों में भी  ब्रह्मवादी श्रेष्ठ हैं।।२९।।

क्योंकि वे तीनों लोकों में श्रेष्ठ हैं। अतएव उनका पूजन करना कर्तव्य है। हे परम श्रेष्ठ ! उनकी संगति महापातकों को नाश करने वाली है।।३०।।

सतोगुण का आश्रय करने वाले ब्रह्मवादी महात्मा ग्रहस्थियों के घर में विश्रांत होकर जन्म भर के पापों को क्षणभर में नष्ट कर देते हैं ।।३१।।

सो पहिले आठवें जन्म में संचित किये हुये इसी पुण्य को तुम भ्राता के निमित्त प्रदान कर, तब वह नरक से मुक्त हो जाएगा।।३२।।

दूत के ऐसे वचन सुन उसने अपने मन में प्रसन्न हो वह पुण्य अपने भ्राता को दे दिया। तब कुण्डल का भी नरक से उद्धार हो गया।।३३।। 

पुष्प वृष्टि के द्वारा देवताओं से पूजित होकर वे दोनों भ्राता स्वर्ग को चले गये एवं वह दूत भी उन दोनों से पूजित होकर जैसे आया था वैसे ही चला गया।।३४।। 

वेद वाक्य के समान सब मनुष्यों के लिए ज्ञान प्रदान करने वाले देवदूत के वाक्यों को सुनकर वैश्य पुत्र ने अपने अपना पुण्य भ्राता को दिया और उसका उद्धार कर उसके साथ ही आप भी स्वर्ग लोक को चला गया।।३५।।

 इतिहास को जो पड़ेगा अथवा सुनेगा, वह निष्पाप होकर सहस्त्र गोदान का फल पावेगा।।३६।।

 इस प्रकार श्री पद्म पुराण, उत्तरखंड के अंतर्गत माघ मास माहात्म्य में कुंडल–विकुण्डल का स्वर्ग गमन नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त

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