माघ मास माहात्म्य– नवम अध्याय

माघ मास माहात्म्य, नवम अध्याय



यमदूत बोले– हे वैश्य श्रेष्ठ ! जो व्यक्ति किसी को अभय दान देता है, उसने सब तीर्थों में स्नान कर लिया और उसी को सब यज्ञों की दीक्षा प्राप्त हो गई है ।।१।।

हे वैश्य ! जो व्यक्ति शास्त्रोक्त अपने अपने धर्म का यथोक्त रीति  से पालन करते हैं उन्हें यमलोक में जाना नहीं होता ।।२।।

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी यह सब ही अपने-अपने धर्म में निरत रहकर स्वर्ग लोक में निवास करते हैं ।।३।।

जो मनुष्य जितेंद्रीय रहकर वर्ण आश्रम के धर्मों का यथोक्त रीति के पालन करते हैं, उन्हीं को अविनाशी ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है ।।४।।

जो मनुष्य इष्टापूर्त अथवा पंचयज्ञ  करने में निरत हैं एवं जो नित्य ही दयालु रहते हैं, उन्हें यमलोक के दर्शन नहीं होते ।।५।।

जो ब्राह्मण इंद्रियों के विषयों से पृथक रहकर वेद वाक्यो का वर्णन करते हैं, जो शक्तिशाली हैं और अग्निहोत्र करने में नित्य लगे रहते हैं, वे ही स्वर्ग की यात्रा करते हैं ।।६।।

जिन शूरवीरों ने शत्रुओं के द्वारा वेष्टित होकर भी कभी दीन वचन नहीं कहे और जिनकी मृत्यु संग्राम में हुई है, वे लोग सूर्यलोक से होकर परलोक में जाते हैं ।।७।।

जो मनुष्य अनाथ, असहाय, स्त्री और ब्राह्मणों के लिए अथवा शरणागत का पालन करने में अपने प्राणों का परित्याग करते हैं – हे वैश्य ! वे सदैव स्वर्ग लोक में आनंद का उपभोग करते हैं ।।८।।

हे वैश्य! जो व्यक्ति पंगु, लूले, लंगड़े, अंधे, बालक, वृद्ध, रोगी, अनाथ और दरिद्र इनका पालन पोषण करते हैं, उनका स्वर्ग लोक  से पतन कदापि नहीं होता ।।९।।

 गौ को कीचड़ में फंसी हुई और ब्राह्मण को रोग ग्रस्त देखकर जो मनुष्य उनका उद्धार करते हैं, उन्हें अश्वमेघ यज्ञ करने वालों के लोक की प्राप्ति होती है।।१०।।

जो मनुष्य गौ–ग्रास देते हैं, सदैव गौ की सेवा सुश्रुषा करते हैं और जो लोग गौ की पीठ के ऊपर कभी नहीं चढ़ते वे स्वर्ग लोक में जाते हैं ।।११।

जहाँ गायें जलपान करती हैं उस स्थान में जो मनुष्य गड्ढा बना देता है, वह यमलोक को बिना ही देखे स्वर्ग लोक को चले जाते हैं ।।१२।।

बावड़ी वापी कूप और तालाब आदि के  निर्माण करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है क्योंकि उसमें जलचर और स्थलचर जीव सदैव वजलपान किया करते हैं ।।१३।।

 अपनी इच्छा के अनुसार जैसे-जैसे मनुष्य उसमें जलपान करते हैं, उसी क्रम से हे वैश्य! कूपादी निर्माणकर्ता के धर्म की वृद्धि और स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।।१४।।

 जल ही में प्राण रहते हैं इसलिए केवल जल ही को प्राणियों का जीवन कहना चाहिए, अतः हे वैश्य! जो व्यक्ति जल की प्याऊ लगाते हैं उसका प्रताप स्वर्ग लोक में सदैव वृद्धि को प्राप्त होता है।।१५।।

पीपल का एक, नीम का एक, वटवृक्ष का एक, इमली के दस वृक्ष, कपित्थ (जामुन), बेल और आंवले के तीन और आम के पाँच वृक्ष बोन वाले मनुष्यों को नर्क के दर्शन नहीं करने होते ।।१६।।

दस कुपात्रों की अपेक्षा पाँच वृक्ष श्रेष्ठ हैं, कारण कि – वह पत्र, पुष्प, फल और मूलों के द्वारा अपने पितरों की तृप्ति संपादन करते हैं ।।१७।।

उन स्त्री पुरुष को अग्नि में अग्निहोत्र करने की आवश्यकता नहीं, जिन्होंने मार्ग में घनी छाया वाले वृक्ष लगाएं हैं ।।१८।

जो मनुष्य वृक्षारोपण करते और दान करते हैं और यज्ञ में का यजन करते हैं वह सदा सुखी रहते हैं ।।१९।

जो मनुष्य मार्ग में लगे हुये फल फूल समन्वित वृक्षों को काटते हैं,  वे मूढ़ चिरकाल पर्यन्त नरक में  निवास करते हैं ।।२०।।

 तुलसी के वन लगाने से भी यमराज के दर्शन नहीं करने होते हैं, क्योंकि तुलसी का वन पवित्र पवित्र और कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, अतः वह समस्त पापों का भी अपहरण करता है।।२१।।

हे वैश्य! जिस घर में तुलसी की वाटिका लगी रहती है, उसे बिल्कुल ही तीर्थ समझना चाहिये, सुतराम उसमें यमदूत नहीं जा सकते हैं ।।२२।।

जो व्यक्ति तुलसी का जितना आरोपण करते है, वे मनुष्य उतने ही सहस्त्रों वर्षों पर्यंत जितने की दल और बीज होते हैं, देवलोक में निवास करते हैं ।।२३।।

तुलसी की सुगंध का आघ्रण करने से पितरों का चित्त संतुष्ट हो जाता है, अतएव वे गरुड़ जी के ऊपर आरूढ़ होकर चक्रपाणि श्री विष्णु भगवान के भवन में निवास करते हैं ।।२४।।

हे वैश्यराज! नर्मदा नदी का दर्शन, गंगाजी मे स्नान तुलसी वन का स्पर्श ये तीनों अर्थात इन तीनों का पुण्य समान ही कहा गया है ।।२५।।

 तुलसी के लगने, पालने, जल देने दर्शन और स्पर्श करने से तुलसी मनुष्य के मन वचन काया से संचय किए पाप का विनाश करती है ।।२६।।


हे वैश्य! प्रत्येक पक्ष की द्वादशी को ब्रह्मादी देवता भी तुलसी वन की पूजा करते हैं ।।२७।।

मणि, स्वर्ण, पुष्प, मोती यह सब तुलसी के एक पत्र की पूजा की भी समानता नहीं कर सकते अर्थात तुलसी के एक पत्र की पूजा करने से जिस उत्तम फल की प्राप्ति होती है मणि,स्वर्ण, पुष्प और मोती द्वारा पूजा करने से उसके षोडश-अंश की भी प्राप्ति नहीं हो सकती ।।२८।।

 आम्र के सहस्त्र और पीपल के सौ वृक्ष लगाने से जो फल मिलता है, वह फल तुलसी के एक वृक्ष लगाने से प्राप्त होता है ।।२९।।

 जो मनुष्य विष्णु भगवान की पूजा में निरत रहकर तुलसी के वृक्ष का आरोपण करता है, वह ग्यारह सहस्त्र वर्ष पर्यन्त स्वर्ग लोक में निवास करता ।।३०।।

जो व्यक्ति तुलसी की मंजरी के द्वारा नारायण की पूजा करते हैं, उनकी मुक्ति हो जाती है, अतएव वे गर्भ में कभी नहीं आते हैं ।।३१।।

 पुष्कर आदि सब तीर्थ, गंगा आदि सब नदियां और वासुदेव आदि सब देवता तुलसी दल में निवास करते हैं ।।३२।।

जो मनुष्य तुलसी वृक्ष का आरोपण कर उसके दलों से विष्णु भगवान का पूजन करते हैं वह प्रसन्नता पूर्वक हरि भगवान के निकट निवास करते हैं ।।३३।।

इस प्रकार श्री पदमपुराण के माघ मास माहात्म्य में यमदूत द्वारा शरणागत पालन, गो सेवा, कुपादि निर्माण,  वृक्षारोपण तथा तुलसी आदि की महिमा सुनाना नामक नवम अध्याय समाप्त

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