माघ मास माहात्म्य– सातवाँ अध्याय
माघ मास माहात्म्य, सातवाँ अध्याय, कुण्डल-विकुण्डल की मृत्यु तथा उन्हें स्वर्ग तथा नर्क की प्राप्ति
श्री दत्तात्रेय जी बोले :– इस संबंध में एक और पुरातन इतिहास सुनाता हूं। हे राजन! पहले सतयुग में निषध नामक एक कुबेर के समान धनी एक वैश्य हिमकुण्डल नाम वाला था, वह कुलीन सत्कर्मी, चतुर, द्विज अग्नि तथा देवताओं का पूजन करने वाला था ।।१-२।।
वह कृषि वाणिज्य का करने वाला और अनेक प्रकार के क्रय विक्रय के कार्य करता, गौ, घोड़े, महिषी आदि पशुओं का पालन करता।।३।।
दूध, दही, मट्ठा, गोमय, तृण, काष्ठ,फल मूल, लवण, पिप्पल, धन्य, शाक, तेल और अनेक प्रकार के वस्त्र, धातु, खांड, मिठाई आदि सदा विक्रय करता था।।४ – ५।।
इस प्रकार उस वैश्य ने नाना प्रकार के उपायों से स्वर्ण की आठ करोड़ मुद्राओं का उपार्जन किया।।६।।
और वह महाधनी पूर्ण वर्द्धत्व को प्राप्त हुआ, फिर अपने मन में विचार कर कि यह संसार क्षणिक है ।।७।।
उस धन के छठे अंश से उसने धर्म कार्य किया। ठाकुरद्वारा और शिवजी का मंदिर बनाया ।।८।।
सागर के समान एक बड़ा सरोवर खुदवाया, बावली और पुष्करिणी तो उसने बहुत सी बनवाई ।।९।।
बरगद, अश्वत्थ, आम्र, जामुन और नीम आदि के वृक्ष एवं पुष्प वाटिका भी उसने लगवाई ।।१०।।
उदय से अस्त पर्यंत उसने अन्न दान किया। पुर के बाहर चारों और उसने परकोटा बनवाया ।।११।।
पुराणों के अंतर्गत भूमि पर जितने दान हैं उस धर्मात्मा ने वह सब नित्य दान दिए ।।१२।।
फिर जन्म पर्यंत तक किए पापों का उसमें प्रायश्चित किया और सदा देवताओं एवं अतिथियों के पूजन में रत रहा ।।१३।।
इस प्रकार कर्म करते हुए उसके दो पुत्र हुए, वह दोनों कुंडल और विकुण्डल नाम से प्रसिद्ध थे ।।१४।।
बाद में उन बालकों को घर सौंपकर वैश्य भगवत भजन करने वन को गया, वहाँ गोविंद प्रभु का आराधना करने कर ।।१५।।
तप से शरीर को क्लेश देता हुआ सदा वासुदेव में मन लगाए विष्णु लोक को प्राप्त हुआ, जहाँ जाकर फिर शोच नहीं करना पड़ता ।।१६।।
हे राजन! तब उसके पुत्र धन मान के मद में मत होकर तरुण रूप संपन्न धन के गर्व से गर्वित होकर ।।१७।।
दुःशील व्यसन में आसक्त धर्म-कर्म से रहते हुए, वे दोनों माता और वृद्धजनों के वचन नहीं मानते थे।।१८।।
वे दुरात्मा पितृ, मित्र का निषेध करने वाले, उन्मार्गी, अधर्म में निरत, दुष्ट, पराई स्त्रीयों का गमन करने वाले।।१९।।
गीत, बाजों में निरत, वीणा, वेणु को बजाते, सैकड़ों वैश्याओं को साथ रखने वाले थे।।२०।।
खुशामदी मनुष्यों से युक्त, धूर्तो की गोष्ठी में चतुर, सुंदर वेष, सुंदर वस्त्र और सुंदर सुंदर चंदन से विभूषित ।।२१।।
सुगंधित मालाओं से युक्त, कस्तूरी के चिन्हों से सेवित, अनेक आभूषणों से सुशोभित, मोती के श्रेष्ठ हार पहने ।।२२।।
हाथी, घोड़े, रथों के समूह से युक्त इधर-उधर क्रीड़ा करते हुए मधुपान किये वेश्या संग लिये।।23।।
पिता के द्रव्य का अपव्यय करते नित्य भोग परायण अपने सुंदर घर में निवास करते थे ।।२४।।
इस प्रकार वह धन उन्होंने कुपात्रों में व्यय किया। वेश्या, जार, शैलूष, पहलवान, भाट बनावटी श्लाघा करने वाले जनों में ।।२५।।
अर्थात कुपात्रों में सब धन इस प्रकार व्यय किया जिस प्रकार ऊसर में बीज बोया गया हो, न कभी सत्पात्रों को दान दिया, न ब्राह्मणों के मुख में हवन किया ।।२६।।
न कभी सर्वभूतों के पालक सब पापहारी विष्णु का अर्चन किया। इस प्रकार उनका द्रव्य बहुत थोड़े ही काल में क्षय हो गया ।।२७।।
तब वे महादुःखी हो परम कृपणता को प्राप्त हुये। क्षुधा की पीड़ा से दुःखी हो सोच करते मोह को प्राप्त हो गये।।२८।।
जब उनके घर में भोजन योग्य कोई वस्तु नही रह गई जिससे उनकी क्षुधा का निवारण हो सके तो स्वजनों, बन्धु, सेवक, उपजीवी ।।२९।।
इन सब ने द्रव्य के आभाव से उनका त्याग कर दिया, तब पुर में उनकी निंदा होने लगी। हे राजन ! तब उन्होंने उस नगर में चोरी करनी प्रारंभ की ।।३०।।
फिर राजा और लोगों के भय से भयभीत हो अपने पुर से निकले और सबके ऋण से पीड़ित हो वह में निवास करते हुऐ ।।३१।।
वे मूढ़ वहाँ तीक्ष्ण बाणों से अनेक पक्षी, वराह, हरिण, रोहित मृग ।।३२।।
खरगोश, शल्लक, गोधा आदि जीवों को मारने लगे। वे महाबली भीलों के सङ्ग आखेट करते थे ।।३३।।
इस प्रकार मांस का आहार करते तथा पापाचरण में रत रहते हुये एक समय किसी पर्वत पर आये, एक उसमे से वन को गया ।।३४।।
वहाँ बड़े को सिंह ने मार दिया और छोटे को सर्प ने डस लिया। हे राजन! एक ही दिन वे दोनों पापी मरण को प्राप्त हुए ।।३५।।
तब यमदूत उनको अपने पाशों में बांधकर यमलोक को ले गए और वहाँ जाकर दूतों ने कहा है ये बड़े पापी हैं ।।३६।।
हे धर्मराज! इन दोनों को हम आपकी आज्ञा से लाये हैं, आप हमको शीघ्र आज्ञा दें कि अब हम क्या करें ।।३७।।
चित्रगुप्त के द्वारा उनका लेखा जोखा लिया गया, तब यमराज ने कहा – एक को घोर नरक में जहाँ तीव्र वेदना होती है ले जाओ ।।३८।।
और दूसरे को उत्तम भोगो वाले स्वर्ग में ले जाओ। तब शीघ्र ही दूतों ने उनकी आज्ञा से वैसा ही किया ।।३९।।
हे राजन ! बड़ा (कुण्डल) तो घोर नरक में भेजा गया। तब एक दूत मनोहर वचन बोला ।।४०।।
हे विकुण्डल। मेरे साथ आ मैं तुझे स्वर्ग में ले चलूंगा, और वहाँ अपने कर्म से उत्पन्न भोगों को तू भोग ।।४१।।
।। इस प्रकार श्री पदमपुराण उत्तरखंड के अंतर्गत कुण्डल – विकुण्डल की मृत्यु तथा उन्हें स्वर्ग तथा नर्क की प्राप्ति नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।।७।।
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