माघ मास माहात्म्य– पाँचवाँ अध्याय
माघ मास माहात्म्य, पाँचवाँ अध्याय, दत्तात्रेय जी और राजा कार्तवीर्य का संवाद
*वशिष्ठ जी बोले हे –* राजन ! अब तुमसे माघ मास माहात्म्य कहता हूँ, जो कार्तवीर्य के पूछने पर दत्तात्रेय जी ने कथन किया था ।।१।।
साक्षात हरि रूप दत्तात्रेय जी जब सह्य पर्वत पर निवास करते थे, तब महिष्मति से राजा ने उनसे जाकर पूछा था ।।२।।
*सहस्त्रार्जुन बोले–* हे भगवान हे योगीश्रेष्ठ ! हमने सब धर्म सुने कृपा करके अब माघ स्नान का फल कहें ।।३।।
*श्री दत्तात्रेय जी बोले–* हे राजन ! इस प्रश्न का उत्तर सुनो, जो पहले महात्मा नारद जी के प्रति ब्रह्मा जी ने कहा है ।।४।।
वह सब माघ स्नान का महा फल कहता हूँ– देश, तीर्थ, विधि तथा क्रिया के अनुसार ।।५।।
इस भारतवर्ष में जो विशेषकर कर्मभूमि है, माघ स्नान न करने वालों का जन्म निष्फल कहा गया है ।।६।।
जैसे सूर्य के बिना आकाश और चंद्रमा के बिना नक्षत्र नहीं सुशोभित होते, उसी प्रकार माघ स्नान के बिना सत्कर्म की शोभा नहीं होती ।।७।।
व्रत, तप, तथा दान से भगवान इतने प्रसन्न नहीं होते जितना माघ के स्नान से प्रसन्न होते हैं ।।८।।
जैसे सूर्य के समान कोई तेज नहीं है उसी प्रकार माघ स्नान के समान दूसरे सब यज्ञ आदि कर्म नहीं हैं ।।९।।
भगवान की प्रीति हेतु एवं सब पाप नष्ट होने के निमित्त तथा स्वर्ग प्राप्ति के लिए मनुष्य को माघ स्नान करना चाहिए ।।१०।।
पुष्ट बलवान देह की रक्षा से कोई लाभ ? यह शरीर माघ स्नान के बिना अपवित्र और अध्रुव है ।।११।।
यह शरीर अस्थियों का स्तंभ, नसों से बँधा, मांस आदि से लिपटा, पर चर्म मढ़ा, दुर्गंधि से संयुक्त, मल मूत्र का स्थान है ।।१२।।
जरा, शोक, विपत्ति से व्याप्त, रोग का मंदिर, आतुर, रजस्वला, अनित्य, संपूर्ण दोषों को आश्रय देने वाला है ।।१३।।
दूसरों के दुख देने से दुखी परद्रोही, इर्ष्या करने वाला, लालची, पिशुन,क्रूर, कृतघ्न, क्षणिक बुद्धि ।।१४।।
दुष्पुर, दुर्धर, दुष्ट, त्रिदोषों से युक्त, अपवित्र वस्तु का निकालने वाला, छिद्र युक्त त्रिताप से मोहित।।१५।।
स्वभाव से अधर्म में रत, तृष्णा से व्याप्त,काम–क्रोध लोभयुक्त, नरक द्वार से व्याप्त ।।१६।।
कृमि क्रीड़ा से युक्त, परिणाम में भस्म होकर कुत्तो के काम।आता है, इस प्रकार का शरीर माघ स्नान बिना व्यर्थ है ।।१७।।
जल के बुदबुदे के समान, जन्तुओं में शुद्र मक्षिका के समाम मनुष्य, बिना माघ स्नान के मरण के ही निमित्त जन्म लेता है।।१८।।
ब्राह्मण होकर भगवान नारायण को ना माने तो ब्राह्मण मरे हुए के समान है, बिना दक्षिणा के श्राद्ध व्यर्थ है, ब्राह्मण रहित क्षेत्र और आचार रहित कुल भी नष्ट है ।।१९।।
दंभ से धर्म तथा क्रोध से तप नष्ट हो जाता है। दृढ़ता के बिना ज्ञान और प्रमाद से शास्त्र नष्ट हो जाता है ।।२०।।
अपने गुरुजनों का मान न करने से नारी तथा ब्रह्मचारी नष्ट होता है, अदीप्त अग्नि में होम तथा साक्षी रहित भक्ति का नाश होता है ।।२१।।
जीविका के निमित्त कन्या तथा जो अपने निमित्त हो वह भोजन – पाक हत है, शुद्र के घर की दीक्षा से यज्ञ नष्ट है और कृपण का धन व्यर्थ है ।।२२।।
बिना अभ्यास के विद्या हत है, विरोध करने वाला राजा नष्ट है। जीविका के निमित्त तीर्थ और व्रत व्यर्थ हैं ।।२३।।
असत्य से वाणी तथा चुगली से जीवह्य हत है, संदिग्ध होने के मंत्र तथा व्याघ्र चित होने से जप हत है ।।२४।।
अश्रोत्रिय को दान देना तथा नास्तिक से लोक हत है और श्रद्धा के बिना की हुई समस्त पारलौकिक क्रियाएं हत है ।।२५।।
हे राजन्! जिस प्रकार इस लोक में प्राणी का जीवन दरिद्रता से व्याप्त व्यर्थ है, उसी प्रकार माघ स्नान के बिना मनुष्य जन्म व्यर्थ है ।।२६।।
मकर के सूर्य में जो प्रभात समय स्नान नहीं करता वह कैसे पाप से छूट सकता है और कैसे स्वर्ग को जा सकता है ।।२७।।
ब्रह्म हत्यारा, स्वर्ण को चुराने वाला, मद्य पीने वाला गुरु की सेज पर चढ़ने वाला, ऐसे पाप करने वाला और पाँचवाँ इसका संसर्ग करने वाला यह सब माघ स्नान करने से पाप रहित हो जाता है ।।२८।।
माघ मास में किंचित सूर्य उदय होने पर ब्रहम हत्यारे, सुरापान करने वाले और पतित प्राणियों को माघ स्नान पवित्र करता है।।२९।।
महापातक भी माघ स्नान करने से भस्म हो जाते हैं ।।३०।।
माघ स्नान में के आते ही सभी पाप कम्पित होने लगते हैं कि यदि यह पुरुष स्नान कर लेगा तो हमारा नाश हो जाएगा
।।३१।।
इस प्रकार स्नान करने को उद्यत हुए पुरुष को देखकर पाप दुःखी होते हैं। माघ स्नान में श्रेष्ठ मनुष्य अग्नि के समान दीप्तवान लगते हैं ।।३२।।
वे पापों से विमुक्त होकर इस प्रकार प्रदीप्त होते हैं जिस प्रकार मेघों से मुक्त होकर चंद्रमा प्रकाशमान होता है। आद्र्र, शुष्क, लागय, स्थूल, वाणी, मन और कर्म से जो पाप किए गये हैं।।३३।।
वे सब पाप माघ स्नान से इस प्रकार भस्म हो जाते हैं, जैसे अग्नि में समिधा। प्रमाद वश व जानकर या न जानकर जो पाप किया है ।।३४।।
वह मकर के सूर्य होने पर स्नान मात्र से नष्ट हो जाता है, पाप रहित हो स्वर्ग को जाते हैं और पापिष्ठी शुद्ध हो जाते हैं ।।३५।।
हे राजन ! माघ स्नान के विषय में संदेह न करना चाहिए। हे राजन माघ स्नान के सभी अधिकारी है, जैसे भगवान की भक्ति के सभी अधिकारी है।।३६।।
माघ सभी को स्वर्ग देने वाला और सभी का पाप नाशक है, यही परम मंत्र और यही परम तप है ।।३७।।
माघ स्नान का करना परम उत्तम प्रायश्चित है, जन्मान्तरों के अभ्यास से मनुष्य को माघ स्नान की बुद्धि होती है ।।३८।।
जिस प्रकार जन्मान्तरों के अभ्यास से अध्यात्म की प्राप्ति होती है उसी प्रकार संसार रूपी कर्दम का इसी से प्रक्षालन होता है।।३९।।
हे राजन्!यह माघ स्नान पवित्रों को भी पवित्र करने वाला है। हे राजन्! जो सब प्रकार के अभीष्ट फल देने वाले माघ में स्नान नहीं करते ।।४०।।
वे चंद्र के समान बड़े भोग किस प्रकार से भोग कर सकते हैं। हे राजन! माघ स्नान के प्रभाव से उत्पन्न हुआ एक महा आश्चर्य सुनो ।।४१।।
इस प्रकार श्री पद्मपुराण माघ मास माहात्म्य के अंतर्गत दत्तात्रेय जी और राजा कार्तवीर्य का संवाद नामक पाँचवाँ अध्याय
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