माघ मास माहात्म्य– दशम अध्याय

माघ मास माहात्म्य, दशम अध्याय

यमदूत बोला :– हे वैश्य ! जो मनुष्य एक दो अथवा तीन समय रेवा में समुद्भूत भूतनाथ की पूजा करते हैं ।।१।।

अथवा जो व्यक्ति स्फटिक मणि निर्मित रत्नलिंग, व पार्थिव अथवा स्वयं प्रादुर्भूत हुए लिंग कि किंवा हे वैश्य! किसी तीर्थ या वन में  स्थापित किए हुए शिवलिंग की ।।२।।

 "ॐ नमः शिवाय" इस मंत्र के द्वारा जप पूर्वक पूजन करते हैं, उन मनुष्यों को यमलोक की कथा भी नहीं सुननी पड़ती है ।।३।।

महादेव जी के जो भक्त शिव भक्ति में तत्पर होते हैं, वह महादेव जी की पूजा के प्रभाव से चौदह इंद्र के राज्य पर्यंत शिवलोक में आनंद भोगते हैं ।।४।।

जो मनुष्य किसी प्रसंग, मोह, अज्ञान, दंभ, पाखंड, अथवा लोभ से महादेव जी के दर्शन कर लेता है, उन्हें यमराज के दर्शन नहीं करने पड़ते ।।५।।

हे वैश्य! सब पापों का विनाश करने वाला और अखिल ऐश्वर्य दायक शिवपूजन के समान त्रिलोकी में अन्य कोई पुण्य नहीं है ।।६।।

जो मनुष्य महादेव जी की भक्ति का आचरण, करते हैं, किंतु श्री विष्णु भगवान से द्वेष करते हैं, उनका तत्काल  ही नरक में पतन हो जाता है ।।७।।

धन, अन्न, फल अथवा जल महादेव जी का चाहे जो द्रव्य हो उसका स्पर्श न करें एवं शिव निर्माल्य का उल्लंघन भी न करें, उसे कूप अथवा किसी गर्त में डाल देना चाहिए ।।८।।

जो मनुष्य लोग अथवा मोह के वशीभूत होकर मक्खी के चरण के समान भी शिव द्रव्य को ग्रहण करता है, वह कल्प पर्यंत नरक के दुखों को भोगता है ।।९।।

और जो मनुष्य तृन काष्ठ  अथवा पाषाणों के  द्वारा शिव मंदिर का निर्माण कराते है, वह महादेव जी के निकट उसके साथ आनंद से निवास करता है ।।१०।।

 जो मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और महादेव जी के मंदिर अथवा मठ बनवाते हैं, वह चिरकाल पर्यंत उन्हीं के लोके में मे निवास करते हैं ।।११।।

जो मनुष्य मार्ग में धर्मशाला, गौशाला, विश्राम स्थान, सन्यासियों के स्थान अथवा दीन दुखियों की कुटी ।।१२।।

 ब्रह्मशाला अथवा ब्राह्मणों के मंदिर निर्माण का कराते हैं। हे वैश्य! वे लोग इंद्रलोक में निवास करते हैं ।।१३।।

और उनका जीर्णोद्धार कराने से उससे द्विगुण फल की प्राप्ति होती है एवं जो व्यक्ति उन्हें भग्न करता, तोड़ता फोड़ता है वह अवश्य ही नरक में जाता है ।।१४।।

जो व्यक्ति लोग से मोहित हो देवता, ब्राह्मण अथवा यतियों के मठ का अधिकारी बनना चाहता है, उसको  समस्त धर्म कृत्यों से बहिष्कार कर देना चाहिए ।।१५।।

जो मनुष्य मठ के पत्र पुष्प फल अथवा अन्नादि किसी द्रव्य का भक्षण करता है वह इक्कीस नरको में क्लेश भोगता है ।।१६।।

 जो मनुष्य पशुओं और बंधु बांधव को नर्क में भेजना चाहता हो, उसे देवताओं, गौओं और ब्राह्मणों के ऊपर अधिकारी बना देना चाहिए ।।१७।।

मठअधिकारी का अन्न भोजन करने के आयोग्य है,  उसका भोजन करने के अनंतर चंद्रायण व्रत करना चाहिए। हे वैश्य !  मठअधिकारी का स्पर्श ले तों वस्त्रों सहित स्नान करना कर्तव्य है ।।१८।।

जो मनुष्य सूर्य, चंडिका, विष्णु, महादेव अथवा गणेश जी के द्रव्य का भक्षण करते हैं, उन्हें नरक में जाना होता है ।।१९।।

 ब्रह्मा विष्णु अथवा महादेव जी की ही पूजा के लिए जो मनुष्य पुष्प वाटिका का आरोपण करते हैं, उनके अहोभाग्य हैं, सुतराम वे लोग देव लोक में निवास करते हैं ।।२०।।

 जो मनुष्य पितरों, देवताओं और अतिथियों को की सदा पूजा करता है, वे प्रजापति यों के उत्तम उत्तम लोक में जाते हैं ।।२१।।

हे वैश्य! जो अतिथि मध्याह्न समय आके उपस्थित हुआ हो वह मूर्ख हो या पंडित, वेदपाठी हो अथवा पतित हो, उसे ब्रह्म-तुल्य  जानना चाहिए ।।२२।।

मार्ग में थके हुए ब्राह्मण अथवा अन्य क्षुधित व्यक्ति को जो मनुष्य जल प्रदान करते हैं, वह स्वर्ग लोक में चिरकाल पर्यंत निवास करते हैं ।।२३।।

 जिनको पहले कभी ना देखा हो ऐसे मनुष्य क्षुधित होकर भोजन करने की कामना से आकर  जिनके घर तृप्त होते हैं, उन मनुष्यों का ब्रह्म लोक में निवास होता है ।।२४।।

हे वैश्य ! मध्याह्न अथवा संध्या के समय जिसके घर से होकर आगत अतिथि विमुख हो लौट जाता है, वह यमलोक में निवास करता है ।।२५।। 

जिस गृहस्थ के घर में अभ्यागत 'नहीं-नहीं' वाक्य सुन निराश हो लौट जाता है, उस गृहस्थ के जन्म भर के संचित पुण्य को वह अतिथि ले जाता है ।।२६।।

अतिथि के समान बंधु, धर्म, धन, धर्म और हितकारी अन्य कोई भी नहीं है ।।२७।।

हे वैश्य ! अथितियों के प्रताप से राजा और मुनि लोग ब्रम्हलोक में पहुंचे हैं और अब तक उनका पतन नही हुआ है ।।२८।।

हे वैश्य ! जो गृहस्थ आपने जीवन मे प्रमाद से भी अतिथि को भोजन करा देते है, उनको यमराज के दर्शन कदापि नही होते ।।२९।।

हे वैश्य ! अन्नदान करने वाले व्याक्ति देदीप्यमान विमानों में बैठकर अमृत पान करते हैं और स्वर्ग से च्युत होने पर उत्तम कुलों में उनका जन्म होता है ।।३०।।

 तदनंतर वे लोग भारत वर्ष में धर्माचारी राजा होते हैं, अथवा जो मनुष्य अन्नदान करता है, उसे दीर्घायु औऱ विपुल सुख की प्राप्ति होती हैं ।।३१।।

क्योंकि सब मनुष्यों के प्राण अन्न में है, इसलिये हे वैश्यराज ! अन्नदान करने वाले को विद्वानों ने प्राण दाता कहा है ।।३२।।

जब केसरीध्वज राजा स्वर्ग से निपातित होने लगा, टैब वैवस्वत देव ने करुणा करके उससे कहा ।।३३।।

हे राजन ! यदि कर्मभूमि मृत्यु लोक में जाकर फिर तुम स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा करो तो अन्नदान अवश्य करना ।।३४।।

हे वैश्य ! यह वृत9 मैने धर्मराज के मुख से सुना था, अतएव अन्नदान के समान अन्य कोई दान नही है, ऐसा मैंने कहा है ।।३५।।

जो मनुष्य ग्रीष्म ऋतु में जल, हेमंत ऋतु में अग्नि औऱ सब काल में अन्नदान करते हैं, उन्हें नरक यातना नही भोगनी पड़ती ।।३६।।

जो मनुष्य ज्ञान अथवा अज्ञान से किये हुये छोटे अथवा बड़े पापों के लिये छः मास में प्रायश्चित करता है ।।३६।।


हे वैश्यराज !वह मनुष्य निष्पाप हो जाता है, अतएव उसे यमराज के दर्शन नहीं होते और जो पुरुष वाचिक, मानसिक अथवा कायिक  कर्मों के प्रायश्चित का आचरण  करता है ।।३७।।

उसको देवताओं और गंधर्व से शोभित लोको की प्राप्ति होती है। है वैश्य ! जो लोग वेदमाता गायत्री का नित्य ही जप करते हैं ।।३८।।

 अथवा अन्य किसी वैदिक मंत्र का जप करते हैं, उन्हें पातकों में लिप्त नहीं होना पड़ता, जो व्यक्ति वेद के अभ्यास में निरत रहकर प्रातः एवं संध्या अग्नि में हवन करते हैं ।।३९।।

हे वैश्य ! उनको अक्षय गति की प्राप्ति होती है, जो मनुष्य नित्य ही व्रत का आचरण करता,  नित्य तीर्थों का सेवन करता है।।।४०।


 और जो नित्य ही इंद्रिय निग्रह पूर्वक सत्य संभाषण करता है,  उसको वीभत्स यमराज के दर्शन नहीं करने पड़ते, मनुष्य को नरकों की दारुणता का विचार स्मरण करके पराये अन्न की अभिरुचि का परित्याग कर देना चाहिए ।।४१।।

कारण कि, जो जिसके अन्न का उपभोग करता है,  वह उसके पातकों का भी उपभोग करता है, जो मनुष्य प्रभात समय स्नान करता है, उसे यम यातना नहीं भोगनी पड़ती ।।४२।।

इस प्रकार श्रीपदमपुरण उत्तरखंड के अंतर्गत यमदूत द्वारा विकुण्डल को शिव तथा शिवलिंग पूजन, मंदिर निर्माण, अन्न–जल दान तथा गायत्री मंत्र की महिमा का वर्णन नामक दशम अध्याय सम्पूर्ण

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