माघ माहात्म्य – पहला अध्याय

माघ मास माहात्म्य, पहला अध्याय, राजा दिलीप का वन में शिकार करते हुऐ मृगया करना।

श्री गणेशाय नमः श्री दुर्गा देवी नमः नर, नारायण, देवी सरस्वती एवं वेदव्यास को प्रणाम कर तत्पश्चात जय जयकार करना चाहिए ।।१।।

ऋषि बोले :–हे महाभागवत सूतजी ! अपने लोगों के मंगल के निमित्त मुक्ति मुक्ति प्रदान करने वाला कार्तिक का आख्यान वर्णन किया ।।२।।

हे लोमहर्षण ! अब आप हमसे माघ मास का महात्मा वर्णन कीजिये, जिसके सुनने से संसार के सर्वजनों के संशय दूर हो जाते हैं ।।३।।

हे महाभाग ! इस लोक में सर्वप्रथम किसने इसको प्रकाशित किया था, सो इतिहास माघ मास स्नान का माहात्म्य सुनाइये ।।४।।

सूत जी बोले :– हे मुनीश्वर ! तुम धन्य हो, तुम कृष्ण परायण हो,  जो तुम बारंबार प्रेम भक्ति से कृष्ण की कथा पूँछते हो ।।५।।

पुण्य को बढ़ाने वाला माघ स्नान माहात्म्य मैं कहता हूँ, जिसे श्रवण करने से अरुणोदय में स्नान करने वाले मनुष्य का पाप दूर हो जाता है ।।६।।

हे ब्राह्मणों ! एक समय जगत को सुख प्रदान करने वाले शंकर के चरणों को स्पर्श कर विनययुक्त हो पार्वती जी ने पूछा ।।७।।

पार्वती जी बोली :– हे देवाधिदेव महादेव ! भक्तों को अभय देने वाले स्वामिन, हे विश्वनाथ! प्रसन्न होइये और अब जो मैं पूँछती हूँ सो कहिये ।।८।।

हे प्रभो ! पूर्व में आपसे मैंने अनेक धर्म सुने हैं, अब माघ के स्नान का माहात्म्य सुनने की इच्छा है, सो आप मुझे सुनाइये ।।९।।

यह पहले किसने किया, इसकी क्या विधि है, और देवता कौन है,  यह सब विस्तार के कहे कारण कि आप भक्तवत्सल हैं ।।१०।।

शंकर जी बोले :–अवभृत स्नान और ऋषियों द्वारा मंगलाचार किये जाने के पश्चात नगरवासियों से पूजित हो राजाओं में श्रेष्ठ, मृगया के रसिक, कौतुहल को प्राप्त हो शिकार की सामग्री लिए चरणों में जूता पहिने नीली पगड़ी बाँधे बख्तर धारण किये गोधा चर्म के दस्ताने पहने धनुष धारण कर अपने नगर से बाहर निकले ।।११–१२।।

तलवार एवं धनुषधारी योद्धाओं को साथ ले मनोहर वन में विचरते हुए ।।१३-१४।।

सिंह के समान पराक्रमी राजा अनेक नदी सरोवरों को लाँघते हुए कुञ्जों में मृगों को ढूंढते उनके साथ क्रीड़ा करते थे ।।१५।।

मारो मारो, यह मृग भाग जाता है। इस प्रकार अपने भृत्यों के कहने पर वह स्वयं जाकर उसको मारते ।।१६।।

फिर इधर-उधर जाते हुए वनस्थली का अवलोकन कर रहे थे, कहीं पेड़ों पर उड़कर मोरों को बैठता हुआ देखते ।।१७।।

कहीं हिरणियों के समूह से बिछड़ कर घबराए हुए हिरणों के बच्चे चारों ओर भाग रहे थे, कहीं गीदड़ ऊंचे स्वर में भयंकर शब्द क्र रहे थे ।।१८।।

कहीं खङ्ग जाति वाले मृगों के समूह हाथियों जैसी शोभा दिखा रहे थे, कहीं कटोर में बैठे हुए उल्लूकगण शब्द करते थे ।।१९।।

कहीं सिंह के चरणों के चिह्न दिखाई देते थे, कहीं शार्दुल के नख से विखण्डित मृगों का रुधिर पड़ा था, जिससे पृथ्वी रक्त वर्ण हो रही थी ।।२०।।

कहीं आयन के भार से आर्त भैसें फिरतीं थी जो घर के आंगन की भूमि का आभास कराती थीं ।।२१।।

कहीं वृक्षों पर वन्य पुष्पों की घनी  सुगंधी से वन व्याप्त था,  कहीं लतागृहों पर भौरें गुंजन कर रहे थे ।।२२।।

कहीं सर्पों की केंचुली बिल से आधी निकली थी, कहीं बिलों में अजगर बैठे थे, बाहर उनकी केंचुली पड़ी थी ।।२३।।

कहीं दावानल की ज्योति से शिलायें सुशोभित हो रही थी, कहीं हिंसक पशुओं और व्याघ्र का फूत्कार शब्द हो रहा था ।।२४।।

कहीं खरगोशों पर कुत्तों के समूह में छोड़ा गया था, इस प्रकार जहाँ-तहाँ छोटे सरोवरओं पर विश्राम कर के राजा एक वन से दूसरे वन को जा रहे थे ।।२५।।

मार्ग में व्याध बक बक रहे थे तभी राजा के वन भ्रमण करते समय, कोलाहल करता हुआ एक सारंग मृग वन में से निकला ।।२६।।

अपनी तेज चौकड़ी से पृथ्वी को आक्रांत करता हुआ, वह कभी आकाश और कभी भूमि पर दिखता हुआ ।।२७।।

वह मृग टेढ़े गम्भीर सोतेऔर कंटीले वृक्ष वाले महावन में प्रवेश कर गया और राजा भी उसके पीछे चला ।।२८।।

वह एक वन के दूसरे वन में प्रवेश करता हुआ बहुत दूर नियोजन वन को चला गया, मृग के न दिख पड़ने से संभ्रम और प्यास के कारण राजा का गला सूख गया ।।२९।।

तालु लाल हो गया, मुख पर पसीना आ गया, प्यादे थक गए घोड़ों की गति रुक गई, राजा दीर्घ मार्ग अतिक्रमण करने के कारण मध्याह्न समय में प्यास से व्याकुल हो गया ।।३०।।

जल की इच्छा करते हुए उसमें आगे देखा कि घने वृक्षों के नीचे एक निर्मल सरोवर था ।।३१।।

जिसमें विशाल कमल खिले हुये थे, भौंरे गुंजार कर रहे थे कमलनी से आच्छादित मानो वह सरोवर मरकतमणि से व्याप्त था ।।३२।।

स्वच्छंदता से मछलियां जिसमें उछल रही थीं, जिसका जल सज्जनों के मन के सामान निर्मल था । सरोवर का चलाए मान जल जलचर जीवों और लहरों से युक्त था ।।३३।।

जल के भीतर से क्रूर ग्राहों से आकीर्ण दुष्टों के मन के समान था  और कहीं कृपाण के भवन के समान शैवाल से व्याप्त दुर्गम था ।।३४।।

दिन-रात अनेक प्रकार के पक्षियों का हर प्रकार का ताप दूर करने वाला, मानो शरण में आये हुये को दाता द्वारा सर्वस्व प्रदान करने वाला ।।३५।।

अपने जल से हिंसक जंतुओं के पितरों के समान तृप्त करता हुआ चंद्रमा के समान दिन के सब संताप को दूर करने वाला था ।।३६।।

उसको देखते ही राजा का श्रम इस प्रकार दूर हो गया, जैसे मेघ को देख चातक की ग्लानि मिट जाती है, वहाँ जलपान कर राजा ने मध्याह्न संध्या की ।।३७।।

अपने सहायकों सहित मृग मांसादि उस सरोवर के तट पर चित्र विचित्र कथा कहने लगा ।।३८।।

धनुष पर बाण चढ़ाये रात्रि में तरु के नीचे स्थित व्याघ्र लोग निशाना साध कर चारों दिशाओं का मार्ग रोक कर बैठ गए ।।३९।।

इस प्रकार वन में जाल फैलाकर वीरों के वन में स्थित हो जाने के पश्चात शुकरों का यूथ अर्धरात्रि को तट से निकला ।।४०।।

तब कमल के कंद खाते समय बहुतों को राजा ने और बहुतों को व्याघों ने मार डाला ।।४१।।

क्षण मात्र में वे सब शूकर शर-विद्ध हो पृथ्वी पर गिर गये। उनको देख दर्पित हो व्याघ तुमुलनाद करने लगे ।।४२।।

वे आनंद से दौड़ते हुये राजा से मिले, तब उन योद्धाओं को लेकर राजा सरोवर के तट से चला ।।४३।।

और अपने नगर को जाने की इच्छा करने लगा तो रास्ते में एक तपस्वी देखा, वह वृद्ध ब्राह्मण हारीत वैखानस मत के थे,  उनके हाथ की उंगलियों में शंख और चक्र चिन्ह शोभित थे ।।४४।।

दुष्कर और कठिन नियमों से जिनका शरीर दुर्बल हो गया था ।अस्थि मात्र शेष, बड़े चतुर, कर्कश शरीर ।।४५।।

हिरण का चर्म धारण किये मृदु वल्कल वस्त्र पहिरे, नख लोम जता धारण किये निगम जप करते थे ।।४६।।

ऐसे वानप्रस्थी को देखकर राजा ने उनको मार्ग दिया और प्रणाम कर हाथ जोड़ सन्मुख स्थित हुआ ।।४७।।

तब ब्राह्मण ने इनको वेष से राजा जानकार परोपकार की इच्छा से कल्याण के निमित्त कहा ।।४८।।

हे राजन ! इस पुण्य पवित्र काल में कहाँ जाते हो ? माघ महीने में प्रातः सरोवर का स्नान किस कारण छोड़ रहे हो ? ।।४९।।

।। इस प्रकार श्री पद्मपुराण के अंतर्गत राजा दिलीप का वन में शिकार करते हुऐ मृगया करना नामक प्रथम अध्याय संपूर्ण ।।१।।.  

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