माघ मास माहात्म्य– ग्यारहवाँ अध्याय

माघ मास माहात्म्य, ग्यारहवाँ अध्याय

यमदूत बोला :- हे वैश्यवर प्रातः काल स्नान करके करने से बड़े-बड़े पापाचारी भी पवित्र हो जाते हैं । हे वैश्य ! प्रातः काल का स्नान बाह्य और अभ्यन्तर के सब मलों का अपहरण कर लेता है।।१।।

 प्रातः समय स्नान करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है, अतः उनको नरक में नहीं जाना होता,  एवं जो मनुष्य बिना स्नान किए भोजन कर लेते हैं,  उसको सदैव मल खाने वाला समझना चाहिए।।२।।

जो मनुष्य स्नान न करने के कारण अपवित्र रहता है, उसके पितृदेव निराश रहते हैं, कारण कि, जो मनुष्य स्नान नहीं करता वह पापी और अशुद्ध होता है।।३।।

 जो मनुष्य स्नान नहीं करते वे नरक की यातना को भोगकर नीच जातियों में उत्पन्न होते हैं और जो मनुष्य माघ मास में पर्व के दिन स्नान करते हैं।।४।।

उनकी दुर्गति नहीं होती अथवा कुत्सित योनियों में उनका जन्म नहीं होता, एवं उनके दुःस्वप्न और अनिष्ट चिंताएं सभी निष्फल हो जाती हैं ।।५।।

हे वैश्यवर !  प्रातः स्नान करने से जो मनुष्य शुद्ध हो गये हैं, उनको तिल, तिलपात्र और तिल कमल यथा विधि से।।६।।

दान करके दिए जाये तो दान करने वाला मनुष्य को यमपुरी में नहीं जाना पड़ता। पृथ्वी, कांचन, स्वर्ण, गो, और षोडश महादान।।७।।

 इन सब का दान करने से हे विकुण्डल ! प्राणी को स्वर्ग से लौटना नहीं होता। विचारशील व्यक्तियोंको चाहिये कि पवित्र तिथियों में व्यतिपात और संक्रांति के दिन।।८।।

स्नान करके कुछ ना कुछ अवश्य दान करें, क्योंकि ऐसा करने से उनको दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती। दान करने वाले व्यक्ति को दारुण रौरव मार्ग में नहीं चलना पड़ता।।९।।

और इस लोक में भी उसका निर्धनों के कुल में जन्म नहीं होता, जो मनुष्य सदैव मौन धारण अथवा सत्य संभाषण करने वाला है, किंवा जो अल्प पापी हैं।। १०।। 

जो क्रोध नहीं करता, जो क्षमा करने में अपना पौरुष सफल जानता है, जो अल्प भाषण करते हैं और किसी भी की भी निंदा नहीं करता, जिसके कार्य सदैव निपुणता के संपन्न होते हैं और जो सदैव अन्य प्राणियों के ऊपर दया करता है ।।११।। 

जो पराए धर्म की रक्षा करता और  पराये गुणों का प्रकाश करता है, और जिनके मन में पराये द्रव्य को तिल मात्र भी लेने की आशंका नहीं है ।।१२।।

हे वैश्यवर !  उनको नरक की यातना के दर्शन तक भी नहीं होते। जो मनुष्य दूसरों की निंदा करता, जो पापाचारी और सदैव पाप ही में रुचि रखता है।। १३।।

 वह प्रलय पर्यंत घोर नरक में कष्ट भोगता है, जो मनुष्य कठोर वचन बोलता है, उसके लिए समझना चाहिए कि वह अवश्य ही नरक में जाएगा।।१४।। 

और हे वैश्यवर !  इसमें कोई संदेह नहीं कि, पीछे उसे दुर्गति की प्राप्ति होगी। जो मनुष्य दूसरों के लिए किए हुए उपकार नहीं मानते, उनका तीर्थ यात्रा और तपस्या से भी उद्धार नहीं होता।। १५।। 

और वह मनुष्य नरक में चिरकाल पर्यंत घोर कष्ट का उपभोग करता है और जो मनुष्य भूमंडल के संपूर्ण तीर्थों में स्नान करता है।।१६।।

 और जितेन्द्रिय रहकर नियमित भोजन करता है, उसको यमलोक में नहीं जाना होता, मनुष्यों को चाहिए कि, तीर्थ में पापों का आचरण ना करें एवं उसे तीर्थ की आजीविका को भी त्याग देना चाहिए।।१७।।

 हे वैश्य ! जो मनुष्य गंगा जी को अन्य तीर्थों ही के समान बताते हैं, उन्हें अतीव घोर नरक में जाना होता है ।।१८।।

तीर्थों में दान लेना और धर्म का विक्रय त्याग देना चाहिए, क्योंकि तीर्थों का दान और पातक ये दोनों ही कठिनता से दूर होते हैं ।।१९।।

 तीर्थों में जो भी पाप किया जाय सब कठिनता से दूर होता है, अतएव वहाँ पापादि करने वालों को नरक में जाना होता है, जिसने एक बार भी गंगा जल में स्नान किया है, तो उसकी आत्मा गंगाजल के स्पर्श मात्र से शुद्ध हो जाती है ।।२०।।

इसी कारण उसने चाहे जितने पाप क्यों न किये हो तथापि उसे नरक में नहीं जाना पड़ता। व्रत, दान,, तप, यज्ञ तथा अन्य पवित्र कर्म सभी मिलकर ।।२१।।

 गंगाजल के एक बिंदु के अभिषेक की समानता नहीं कर सकते, ऐसा शास्त्रों में कहा है। यह गंगाजल धर्म का द्रव्य है, धर्म का बीज स्वरूप है, इसका प्रभाव श्री विष्णु भगवान के चरणों से हुआ ।।२२।। 

उसी निर्मल गंगाजल को महादेव जी ने अपने शीश के ऊपर धारण किया, उसी गंगाजल को मायिक गुणों से रहित और जहाँ तक प्रकृति की भी पहुंच नहीं है, ऐसा ब्रह्म ही समझना चाहिए ।।२३।।

अतएव इस ब्रह्मांड के गोलोक में कोई वस्तु भी उसके समान नहीं हो सकती, जब सौ योजन की दूरी पर बैठा हुआ भी मनुष्य गंगा नाम का उच्चारण करने से ।।२४।। 

नरक यात्रा से बच जाता है, तब उसके सदस्य भला और क्या हो सकता है, अन्य किसी के द्वारा नरक देने वाले कार्य तत्काल भस्मीभूत नहीं होते ।।२५।। 

अतएव यत्न पूर्वक गंगा जी में मनुष्यों को स्नान करना चाहिए। जिसने दान लेना त्याग दिया, अथवा जो दान नहीं लेता है।।२६।। 

वह तारा रूप होकर चिरकाल पर्यंत स्वर्ग लोक में ही प्रदीप्त रहता है। जो मनुष्य कीचड़ से गौ का उद्धार और रोगी की रक्षा करते हैं ।।२७।।

अथवा गौशाला में जिसका मरण होता है वह सब आकाश में तारे होते हैं और प्राणायाम करने वाले मनुष्य को भी यमलोक के दर्शन नहीं होते ।।२८।। 

हे वैश्य ! जो प्रतिदिन सोलह प्राणायाम करते हैं, उन्होंने चाहे जैसे दुष्कर्म किये हो तथापि उनके सब पाप दूर हो जाते हैं ।।२९।।

जो मनुष्य तप, व्रत तथा अन्य नियमों का पालन करते हैं, उन्हें भूर्ण हत्यादि पातक भी दूर हो जाते हैं ।।३०।।

सहस्त्र गऊओं का दान तथा प्राणायाम करना अथवा जो मनुष्य एक मास पर्यंत कुशाग्र से गंगाजल पान करता है ।।३२।।

 इसका फल एक सौ वर्ष प्राणायाम करने के समान है, जितने महापातक हैं तथा जितने शूद्र उपपातक  हैं ।।३३।।

 हे वैश्यवर ! प्राणायाम करने से ये  सब पातक, क्षणभर में भस्म हो जाते हैं, जो मनुष्य पराई स्त्रियों को अपनी माता के सदृश्य अवलोकन करते हैं ।।३४।।

 हे वैश्यराज ! उन्हें यम यातना नहीं भोगनी पड़ती, एवं जो व्यक्ति पराई स्त्रियों को अपने मन से भी सेवन नहीं करता ।।३५।।

वह दोनों लोकों में उत्तम समझा जाता है और मानों उसी ने भूमि को धारण कर रखा है, इसलिए मनुष्य को पराई स्त्री सेवन सर्वथा परित्याग कर देना चाहिए ।।३६।।

पर स्त्री गमन इक्कीस नरक में ले जाता है। जिसके चित्त में पराए द्रव का लोभ नहीं होता है ।।३७।।

वे लोग देवलोक में जाते हैं और उन्हें यम यातना नहीं भोगना पड़ता,  जिन कारणों से क्रोध उत्पन्न होता है, उन कारणों के उपस्थित होने पर भी जिसे क्रोध नहीं आता ।।३८।।

क्रोध हीन व्यक्ति को स्वर्ग का विजय करने वाला समझना चाहिए, जो मनुष्य माता-पिता की  देवव्रत आराधना करता हैं ।।३९।।

 वह व्यक्ति वृद्धावस्था प्राप्त होने पर यमलोक का दर्शन नहीं करता और जो मनुष्य गुरु महाराज की पूजा पिता की अपेक्षा अधिक भाव से करते हैं ।।४०।।

हे वैश्यवर ! वे लोग ब्रह्मलोक में गमन करते हैं, एवं इस लोक में वही स्त्रियां धन्य हैं जो शील की रक्षा करती हैं ।।४१।।

यदि शील का विनाश हो जाए तो स्त्रियों को कठिन यमलोक की प्राप्ति होती है, अतः जो स्त्रियां दुष्ट संग का परित्याग कर अपने शील की रक्षा करती हैं ।।४२।।

हे वैश्य ! उन स्त्रियों को शील की रक्षा करने ही से निसंदेह स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं।।४३।।

शुद्ध पाकयाज्ञ का आचरण करने और निषिद्ध कार्यों का परित्याग करने से ।।४४।।

हे वैश्य ! स्वर्ग की गति का लाभ होता है और उक्त विधि से आचरण करने वाले को नरक की यात्रा नहीं करनी पड़ती, जो मनुष्य शास्त्र का विचार करते और वेदों का अभ्यास करते हैं ।।४५।।

 एवं जो महाशय पुराण और संहिता को सुनाते अथवा स्वयं पढ़ते हैं, जो स्मृतियों अर्थात मनुस्मृति आदि धर्म शास्त्रों की व्याख्या करते एवं करवाते एवं जो धर्म को उपदेश करते हैं ।।४६।।

 और जो व्यक्ति वेदांत शास्त्र की क्रिया में निपुण है, उन्होंने ही इस भूमि को धारण कर रखा है। जिनका जिनका नाम प्रथम लिया गया है उनके सभी पापों का विनाश उसके प्रभाव से हो जाता है ।।४७।।

सतराम वे ब्रह्मा जी के लोक में जाते हैं, जहाँ अज्ञान है ही नहीं,  जो मनुष्य वैदिक अथवा शास्त्रीय ज्ञान के ज्ञान का दूसरों को उपदेश करते है ।।४८।।

उस सांसारिक बंधन से मुक्त कराने वाले महात्मा की देवता भी पूजा करते हैं ।।४९।।

।।इस प्रकार श्रीपदमपुरण केउत्तरखंड के अंतर्गत  यमदूत- विकुण्डल संवाद में प्रातःकाल स्नान, षोडश दान, गंगास्नान, स्त्रियों के शील की रक्षा, तथा स्वाध्याय की नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।।११।।

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