दोहनी कुण्ड (Dohini Kund)
दोहनी कुण्ड (Dohini Kund)
एक बार गोदोहन के समय किशोरी श्रीराधाजी खड़ी-खड़ी गोदोहन होते देख रही थीं। देखते-देखते उनके मन में भी स्वयं गोदोहन करने की इच्छा हुई।
वे भी एक मटकी लेकर एक गइया का दूध दुहने लगीं।
उसी समय कौतुकी कृष्ण भी वहाँ आ पहुँचे और बोले– 'सखी ! तोपे दूध काढ़वो भी नहीं आवे है, ला मैं बताऊँ।'
यह कहकर पास ही बैठ गये। श्रीराधाजी ने उनसे कहा– 'अरे मोहन मोए सिखा।'
यह कहकर सामने बैठ गयी।
कृष्ण ने कहा– 'अच्छौ दो थन आप दुहो और दो मैं दुहों, आप मेरी ओर निगाह राखो।'
कृष्ण ठिठोली करते हुए दूध की धारा निकालने लगे।
उन्होंने हठात् एक धारा राधाजी के मुखमण्डल में ऐसी मारी कि राधाजी का मुखमण्डल दूध से आच्छादित हो गया।
इस प्रकार लीला करते हुए दोनों आनन्दित होकर हँसने लगे।
यह लीला जिस स्थान पर हुई थी, वह आज भी ‘दोहनी-कुण्ड' नाम से प्रसिद्ध है। दोहनी कुण्ड बरसाना, मथुरा से लगभग 50 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह स्थान बरसाना के पास ही है। गहवर वन की पश्चिम दिशा के समीप ही चिकसौली ग्राम के दक्षिण में यह स्थित है। यहाँ प्राकट्य लीला के समय गोदोहन सम्पन्न होता था। यह स्थान महाराज वृषभानु की लाखों गायों के रहने का खिड़क था।
प्रस्तुत दोहे इस लीला को जीवंत करते है
आमें सामें बैठ दोऊ दोहत करत ठठोर।
दूध धार मुख पर पड़त दृग भये चन्द्र चकोर॥
वारसाना की परिक्रमा करते हुए, अगर गहवरवन जाने के लिए आप बाएं मुड़ते हैं, तो आपको दोहनी कुंड मिलता है।
बहुत से भक्त इस स्थान पर नहीं आते हैं और वास्तव बहुत से लोग इस कुंड के अस्तित्व के बारे में भी नहीं जानते थे। यह तालाब गहवरवन के दक्षिण और सिसौली गाँव के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
श्री बरसाने के परिक्रमा के दौरान कुछ और लीला स्थली आते है जिनमे -
डभरारो (Dabhararo)
कहते है यहाँ श्री राधिका के दर्शन से कृष्ण की दोनों आँखों में आँसू भर आये। डभरारो शब्द का अर्थ आँसुओं का डब–डबाना है। अब इस गाँव का नाम डभरारो है। यह स्थान बरसाना से दो मील दक्षिण में हैं।
रसोली (Rasoli)
डभरारो से डेढ़ मील दूर नैऋत कोण में रसोली स्थान है यहाँ राधा-कृष्ण का गोपियों के साथ सर्वप्रथम रासलीला सम्पन्न हुआ था। इस स्थान को तुंग विद्या सखी की जन्मस्थली भी कहते है। तुंग विद्या के पिता का नाम पुष्कर गोप, माता का नाम मेधा गोपी तथा पति का नाम वालिश है। तुंग विद्या जी अष्टसखियों में से एक हैं। वे नृत्य–गीत–वाद्य, ज्योतिष, पद्य-रचना, पाक क्रिया, पशु–पक्षियों की भाषाविद राधा-कृष्ण का परस्पर मिलन कराने आदि विविध कलाओं में पूर्ण रूप से निपुण हैं।
"जय जय श्री राधे"
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