छत्रवन जहाँ श्री राधा जी बनीब्रजेश्वरी
छत्रवन
जहाँ श्री राधा जी बनी
ब्रजेश्वरी
मथुरा दिल्ली राजमार्ग पर मथुरा से लगभग
20 मील उत्तर-पश्चिम तथा पयगाँव से चार
मील दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित है। छत्रवन का
वर्तमान नाम 'छाता' है। गाँव के उत्तर-पूर्व
कोने में सूर्यकुण्ड, दक्षिण-पश्चिम कोण में
चन्द्रकुण्ड स्थित है। चन्द्रकुण्ड के तट पर दाऊजी
का मन्दिर विराजमान है।
जहाँ सखाओ ने श्री कृष्ण को बनाया ब्रज का
छत्रपति
यहीं पर श्रीदाम आदि सखाओं ने श्रीकृष्ण
को सिंहासन पर बैठाकर ब्रज का छत्रपति
महाराजा बनाकर एक अभूतपूर्व लीला
अभिनय का कौतुक रचा था।
'श्रीबलरामजी' कृष्ण के बाएं बैठकर मन्त्री
का कार्य करने लगे। 'श्रीदाम' ने कृष्ण के सिर
के ऊपर छत्र धारण किया, 'अर्जुन' चामर ढुलाने
लगे, 'मधुमंगल' सामने बैठकर विदूषक का कार्य
करने लगे, 'सुबल' ताम्बूल बीटिका देने लगे, तथा
'सुबाहु' और 'विशाल' आदि कुछ सखा प्रजा
का अभिनय करने लगे।
छत्रपति महाराज कृष्ण ने मधुमंगल के माध्यम से
सर्वत्र घोषणा करवा दी कि-महाराज
छत्रपति नन्दकुमार- यहाँ के एकछत्र राजा हैं।
यहाँ अन्य किसी का अधिकार नहीं हैं।
गोपियाँ प्रतिदिन मेरे इस बाग़ को नष्ट
करती हैं, अत: वे सभी दण्डनीय हैं। इस प्रकार
श्रीकृष्ण ने सखाओं के साथ यह अभिनय लीला
कौतुकी क्रीड़ा की थी। इसलिए इस गाँव
का नाम "छत्रवन या छाता" हुआ।
उमराव - छत्रवन से लगभग चार-पाँच मील पूर्व
दिशा में उमराओ गाँव अवस्थित है। श्रीकृष्ण
की दुहाई सुनकर सखियों ने ललिता के पास
कृष्ण के विरुद्ध शिकायत की।
ललिताजी ने क्रोधित होकर कहा - ऐसा
कौन है? जो राधिका के राज्य को अपने
अधिकार में कर सकता है। हम इसका
प्रतिकार करेंगी। ऐसा कहकर राधिकाजी
को एक सुन्दर सिंहासन पर पधारकर "उमराव"
होने की घोषणा की। उमराओ का तात्पर्य राज्य के "अधिपति" से है। 'चित्रा सखी' ने उनके सिर पर छत्र धारण किया, 'विशाखा' चामर ढुलाने लगी, 'ललिता' जी राधिका के बाँए बैठकर
मन्त्री का कार्य करने लगी। कोई सखी उन्हें
पान का बीड़ा देने लगी तथा अवशिष्ट
सखियाँ प्रजा का अभिनय करने लगीं।
राधिकाजी ने सिंहासन पर बैठकर सखियों
को आदेश दिया- जाओ, जो मेरे राज्य पर
अधिकार करना चाहता है, उसे पराजित कर
तथा बाँधकर मेरे सामने उपस्थित करो।
उमराव का आदेश पाकर सहस्त्र-सहस्त्र सखियों
ने हाथों में पुष्प छड़ी लेकर युद्ध के लिए
यात्रा की. अर्जुन, लवंग, भृंग, कोकिल, सुबल और मधुमंगल उन्हें देखकर इधर-उधर भागने लगे, परन्तु किसी चतुर सखी ने मधुमंगल को पकड़ लिया और उसे पुष्प माला द्वारा बाँधकर उमराव के चरणों में उपस्थित किया तथा कुछ गोपियाँ मधुमंगल को दो- चार गंल्चे भी जड़कर बोलीं- हमारे उमराव के राज्य पर अधिकार करने का इतना साहस?
अभी हम तुम्हें दण्ड देती हैं।
मधुमंगल पराजित सेनापति की भाँति सिर
नीचे कर कहने लगा- ठीक है! हम पराजित हैं,
किन्तु दण्ड ऐसा दो कि हमारा पेट भरे।
ऐसा सुनकर महारानी राधिका हँसकर
बोली- यह कोई पेटू ब्राह्मण है, इसे मुक्त कर
दो। सखियों ने उसे पेटभर लड्डू खिलाकर छोड़
दिया। मधुमंगल लौटकर छत्रपति महाराजा
कृष्ण को अपने बँध जाने का विवरण सुनाकर
रोने का अभिनय करने लगा।
ऐसा सुनकर कृष्ण ने मधुमंगल और सखाओं को लेकर उमराओ के ऊपर आक्रमण कर दिया। जब
राधिका ने अपने प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण को
देखा तब बड़ी लज्जित होकर अपने उमराव वेश
को दूर करने के लिए चेष्टा करने लगीं। सखियाँ
हँसती हुई उन्हें ऐसा करने से रोकने लगीं।
मधुमंगल ने छत्रपति बने हुए श्रीकृष्ण को उमराव
राधिका के दक्षिण में बैठा दिया।
दोनों में संधि हुई तथा कृष्ण ने राधिकाजी का
आधिपत्य स्वीकार किया। मधुमंगल ने
राधिका के प्रति हाथ जोड़कर कहा- कृष्ण
का अंगरूपी राज्य अब तुम्हारे अधिकार में हैं।
अब जो चाहो इनसे भेंट ग्रहण कर सकती हो।
सारी सखियाँ और सखा इस अभिनय
क्रीड़ा-विलास को देखकर बड़े आनन्दित हुये।
उमराव लीला के कारण इस गाँव का नाम
उमराओ है। यह स्थान राधास्थली के रूप में भी
प्रसिद्ध है। तत्पश्चात पूर्णमासी जी ने यहाँ
पर राधिका को ब्रजेश्वरी के रूप में
अभिषिक्त किया।
यहाँ किशोरी कुण्ड भी है। श्रीलोकनाथ
गोस्वामी यहीं पर भजन करते थे। किशोरी
कुण्ड से ही श्रीराधाविनोद-विग्रह प्रकट
हुए थे। ये श्रीराधाविनोद जी ही
लोकनाथ गोस्वामी जी के आराध्यदेव हैं। अब
यह श्रीविग्रह जयपुर में विराजमान हैं।
उमराओ गाँव के पास ही धनशिंगा गाँव है।
धनशिंगा गाँव- उमराओ गाँव के पास ही
धनशिंगा गाँव है, धनशिंगा "धनिष्ठा
सखी" का गाँव है, धनिष्ठाजी कृष्णपक्षीय
सखी है। ये सदैव यशोदा जी के घर में विविध
प्रकार सेवाओं में नियुक्त रहती है।
विशेषत: दूती का कार्य करती हुई कृष्ण से राधिका जी को मिलाती है।
!! जय जय श्री राधे !!
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