*श्री निधिवन जी : नित्य रास स्थली*

*ब्रज 84 कोस यात्रा*    

*श्री निधिवन जी : नित्य रास स्थली*

द्वापर युग के समय आज से लगभग 5200 वर्ष पूर्व वृन्दावन की इसी धरा पर श्री कृष्ण ने राधारानी और गोपियों संग महारास रचाया था। कहते हैं कि द्वापर युग से आज तक हर रात राधे-कृष्ण यहां साक्षात प्रकट होते है।
श्री निधिवनराज, निज वृंदावन मे यमुना जी के समीप एक बहुत ही रमणीक कुंज है। यहाँ अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। निधिवन ही वास्तविक नित्य वृंदावन है।। यहाँ तुलसी के विशाल वृक्ष है, बिना जल स्रोत एवं जड़ के हैं। ऐसा लगता है कि ये वृक्ष मानों एक दूसरे का हाथ पकड़ नृत्य कर रहे हो । इन वृक्षों के बारे में ऐसी भी मान्यता है कि कृ्ष्ण की सखियां ही तुलसी वृक्ष है । इतना विशाल तुलसी वन अन्यत्र कहीं भी नहीं है। सामान्य झाडी के रूप में दिखाई देने वाले ये वास्तव में वृक्ष हैंं । जिनमें गोरे और काले रंंग के वृक्षों को आपस में आलिंगन करतेे हुए आप आसानी सेेे देख सकते हैं।

निधिवन में स्थित 16108 वृक्ष गोपियों मेंतब्दील होकर रातभर कान्हा संग महारास रचाती है... सूरज की पहली किरण फूटने से पहले ही गोपियां वृक्ष का आकार ले लेती है.. और भगवान कृष्ण राधिका रानी के संग अन्तर्धान हो जाते है।

यहाँ लगभग 1500 ई. मे स्वामी श्री हरिदास जी (1480-1575 ई) का आगमन हुआ था, जिनका प्रकाट्य वृंदावन के निकट राजपुर मे अपने ननिहाल मे हुआ था। इनके पिता श्री आशुधीर जी थे। 

स्वामी जी अपने स्वरूपगत दिव्यता तथा अगाध प्रेम से अपने " स्वामी श्यामा-कुंज बिहारी" की नित्य लीला का रसास्वादन किया करते थे। उनके भजन का प्रताप आज भी निधिवन की उज्ज्वलतम मधुरता के रूप मे परिलक्षित हो रहा है। 

स्वामीजी ने नित्य विहार को प्रकाशित किया। "सहज जोरी प्रकट भई", "रूचि के प्रकाश परस्पर विहरन लागे", उनके पहले दो पद है। उनके आत्मस्वरूप स्वामी "श्यामा-कुंजविहारी" सहज जोरी है, जो शाश्वत है,और अपनी रूचि के वश विहार मे रत है। 

श्री हरिदास जी समाधि अवस्था में सदा इन्ही का दर्शन करते रहते थे। वे एकतानता अर्थात एकतारा से अपार भजन रस समुद्र को अपने ह्रदय मे रमाये रहते थे। रसावेश मे जब कभी मधुर वाणी से वे गाने लगते थे, वह उनके परम शिष्य श्री विट्ठल विपुल गान को कंठस्थ कर लेते थे। इस प्रकार संग्रहित यह पद संग्रह केलिमाल कहलाता है, जिसमे निधिवन की सहज माधुरी पल्लवित हुई है। 

निधिवन मे ही वह लीला प्रवेश कर गये। उनकी बैठक ही निधिवन राज मे उनकी समाधि कहलाती है। दोनो पार्श्व मे स्वामी जी के शिष्य विठ्ठल विपुल जी एवम प्रशिष्य विहारिनदास जी की समाधि है। 

निधिवन के उन स्थानों पर जहाँ वृक्ष नही थे, वहाँ कुछ नवीन मंदिर बन गये है।अन्यथा निधिवन का स्वरूप प्राचीन है। निधिवन का परकोटा भी पहले पहल 1610 ई. के लगभग बन चुका था। यही विठ्ठल विपुल जी के निमित्त स्वामी जी ने बाँके बिहारी जी का स्वरूप उद्घाटित किया था। 

विहारी जी का प्राकट्य स्थल घेरा (परिक्रमा) मे है। स्वामी जी वृंदावन मे आने वाले सर्वप्रथम महापुरुष थे। ऐसी मान्यता है कि स्वामी जी ने ही वृंदावन-श्री को स्थापित किया । 

लगभग ई.1573 मुगल बादशाह अकबर स्वामीजी के शिष्य तानसेन के साथ उनके दर्शनार्थ यहां आया था। । 

आधुनिक युग मे भी निधिवन मे ही पूर्ण जीवंतता है। जो न केवल आध्यात्मिकता की उच्चतम गहराई को संजोए हुए है, साथ ही आधुनिक प्रौद्योगिक मनुष्य तक को भगवदानुभूति से आप्लावित करती है। यहाँ रात्रि मे रास होता है। स्वामी जी की रसरीति मे बृज लीला का कोई स्थान नही है, उनके "जुगल किशोर" ही यहाँ के आराध्य है, जिनके सानिध्य का दिक्-काल से परे प्रतिक्षण एकरस आस्वादन मिलता है। 

इस स्वानुभूति के लिये आपको स्वयं निधिवन आना होगा क्योंकि निधिवन की महिमा अक्षुण्ण है अतः श्रीनिधिवनराज, वृंदावन-रस का सार-सर्वस्व है।

एक बार कलकत्ता का एक भक्त अपने गुरु की सुनाई हुई भागवत कथा से इतना मोहित हुआ कि वह हरसमय वृन्दावन आने की सोचने लगा उसके गुरु उसे निधिवन के बारे में बताया करते थे और कहते थे कि आज भी भगवान यहाँ रात्रि को रास रचाने आते है उस भक्त को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था।

एक बार उसने निश्चय किया कि मैं वृन्दावन जाऊंगा और ऐसा ही हुआ श्री राधा रानी की कृपा हुई और वह वृन्दावन आ गया। उसने जी भर कर बिहारी जी व राधा रानी जी के दर्शन किए लेकिन अब भी उसे इस बात का यकीन नहीं था कि निधिवन में रात्रि को भगवान रास रचाते हैं। 

उसने सोचा कि एक दिन निधिवन रुक कर देखता हू इसलिए वो वही पर रूक गया और देर तक बैठा रहा और जब शाम होने को आई तब एक पेड़ की लता की आड़ में छिप गया।

जब शाम के वक़्त वहा के पुजारी निधिवन को खाली करवाने लगे तो उनकी नज़र उस भक्त पर पड गयी और उसे वहा से जाने को कहा तब तो वो भक्त वहा से चला गया लेकिन अगले दिन फिर से वहा जाकर छिप गया और फिर से शाम होते ही पुजारियों द्वारा निकाला गया और आखिर में उसने निधिवन में एक ऐसा कोना खोज निकाला जहा उसे कोई भी नहीं ढूंढ़ सकता था और वो आँखे मूंदे सारी रात वही निधिवन में बैठा रहा और अगले दिन जब सेविकाए निधिवन में साफ़ सफाई करने आई तो पाया कि एक व्यक्ति बेसुध पड़ा हुआ है और उसके मुह से झाग निकल रहा है।

तब उन सेविकाओ ने सभी कोबताया तो लोगो कि भीड़ वहा पर जमा हो गयी सभी ने उस व्यक्ति से बोलने की कोशिश की लेकिन वो कुछ भी नहीं बोल रहा था। लोगो ने उसे खाने के लिए मिठाई आदि दी लेकिन उसने नहीं ली और ऐसे ही वो 3 दिन तक बिना कुछ खाए पिये ऐसे ही बेसुध पड़ा रहा और 5 दिन बाद उसके गुरु जो कि गोवर्धन में रहते थे। उन्हें उसके बारे में बताया गया तब उसके गुरूजी वहा पहुचे और उसे अपने साथ अपने गोवर्धन आश्रम में ले आये । आश्रम में भी वो ऐसे ही रहा और एक दिन सुबह सुबह उस व्यक्ति ने अपने गुरूजी से लिखने के लिए कलम और कागज़ माँगा गुरूजी ने ऐसा ही किया और उसे वो कलम और कागज़ देकर मानसी गंगा में स्नान करने चले गए जब गुरूजी स्नान करके आश्रममें आये तो पाया कि उस भक्त ने दीवार के सहारे लग कर अपना शरीर त्याग दिया था और उस कागज़ पर कुछ लिखा हुआ था ।

उस पर लिखा था

"गुरूजी मैंने यह बात किसी को भी नहीं बताई है, पहले सिर्फ आपको ही बताना चाहता हूँ , आप कहते थे न कि निधिवन में आज भी भगवान रास रचाने आते है और मैं आपकी कही बात पर यकीन नहीं करता था, लेकिन जब मैं निधिवन में रूका तब मैंने साक्षात बांके बिहारी का राधा रानी के साथ गोपियों के साथ रास रचाते हुए दर्शन किया और अब मेरी जीने की कोई भी इच्छा नहीं है क्योंकि इस जीवन का जो लक्ष्य था वो लक्ष्य मैंने प्राप्त कर लिया है और अब मैं जीकर करूँगा भी क्या?
श्याम सुन्दर की सुन्दरता के आगे ये दुनिया वालो की सुन्दरता कुछ भी नहीं है,इसलिए आपके श्री चरणों में मेरा अंतिम प्रणाम स्वीकार कीजिये"

इस प्रकार एक भक्त अपने इष्ट के दर्शन कर दुनिया के सामने अपने ईस्ट भगवान श्री राधा कृष्ण की रासलीला वाली संपूर्ण सच्चाई पूर्ण सच्चाई सामने रखकर, इस दुनिया से विदा हो गया। बंगाली भाषा में लिखा हुआ वह पत्र जो उस भक्त ने अपने गुरु के लिए लिखा था आज भी मथुरा के सरकारी संघ्रालय में रखा हुआ है।

कहा जाता है निधिवन के सारी लताये गोपियाँ है जो एक दूसरे कि बाहों में बाहें डाले खड़ी है।

♥️ निधिवन सम्पूर्ण दर्शन, श्रीधाम वृंदावन ♥️

धार्मिक नगरी वृन्दावन में निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है।

शयन के लिए पलंग लगाया जाता है। सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं।

निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट एवं धुपद के जनक श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थान है। निधिवन दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा निधिवन के बारे में जो जानकारी दी जाती है, उसके अनुसार निधिवन में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो।

कहा जाता है निधिवन के सारी लताये गोपियाँ है जो एक दूसरे कि बाहों में बाहें डाले खड़ी है जब रात में निधिवन में राधा रानी जी, बिहारी जीके साथ रास लीला करती हैतो वहाँ की लताये गोपियाँ बन जाती है, और फिर रास लीला आरंभ होती है,इस रास लीला को कोई नहीं देख सकता,दिन भर में हजारों बंदर, पक्षी,जीव जंतु निधिवन में रहते है पर जैसे ही शाम होती है,सब जीव जंतुबंदर अपने आप निधिवन में चले जाते है एक परिंदा भी फिर वहाँ पर नहीं रुकता यहाँ तक कि जमीन के अंदर के जीव चीटी आदि भी जमीन के अंदर चले जाते है रास लीला को कोई नहीं देख सकता क्योकि रास लीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है रास तो अलौकिक जगत की "परम दिव्यातिदिव्य लीला" है कोई साधारण व्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता. जो बड़े बड़े संत है उन्हें निधिवन से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है.
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जब रास करते करते राधा रानी जी थक जाती है तो बिहारी जी उनके चरण दबाते है. और रात्रि मेंशयन करते है आज भी निधिवन में शयन कक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान,फुल और प्रसाद रखते है, और जब सुबह पट खोलते... है तो जल पीया मिलता है पान चबाया हुआ मिलता है और फूल बिखरे हुए मिलते है.राधे....राधे...
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वृन्दावन धाम या बरसाना कोई घूमने फिरने या पिकनिक मनाने की जगह नहीं है ये आपके इष्ट की जन्मभूमि लीलाभूमि व् तपोभूमि है सबसे ख़ास बात ये प्रेमभूमि है जब भी आओ इसको तपोभूमि समझ कर मानसिक व् शारीरिक तप किया करो शरीर से सेवा व् वाणी से राधा नाम गाया जाए तब ही धाम मे आना सार्थक है

एक अद्भुत मस्ती ताकत व् आनंद ले कर वापिस जाया करो .आप की धाम निष्ठां मे वृद्धि हो इसी कामना है

जय प्रभुपाद
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण दंडवत प्रणाम


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