कार्तिक मास में भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया था , इसलिए इस महीने का नाम पड़ा कार्तिक।


पर्वों और दान-पुण्य का सबसे बड़ा महीना कार्तिक मास इस बार 25 अक्टूबर, >गुरुवार से शुरू होरहाहै, जो 23 नवंबर, शुक्रवार को समाप्त होगा। हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे। इस महीने में 15 दिन पर्व

25 अक्टूबर से शुरू हो रहा है कार्तिक मास, इसी मास में भगवान कार्तिकेय ने किया था तारकासुर का वध, इसलिए इस महीने का नाम पड़ा कार्तिक


रिलिजनडेस्क।पर्वों और दान-पुण्य का सबसे बड़ा महीना कार्तिक मास इस बार 25 अक्टूबर, >गुरुवार से शुरू होरहाहै, जो 23 नवंबर, शुक्रवार को समाप्त होगा। हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे। इस महीने में 15 दिन पर्व रहेंगे।

कार्तिक में महिलाओं के पर्व ज्यादा
27 अक्टूबर, शनिवार से प्रमुख पर्वों की शुरुआत करवा चौथ से हो रही है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह सबसे बड़ा पर्व है। इसके बाद स्कंद षष्ठी, रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी व्रत के साथ सौंदर्य का पर्व रूप चौदस, सुहाग पड़वा, आंवला नवमी जैसे पर्व भी महिलाओं से जुड़े हैं।


जानिए क्यों खास है कार्तिक महीना
1
. हिंदू पंचांग के 12 मास में कार्तिक भगवान विष्णु का मास है। इसमें नक्षत्र-ग्रह योग, तिथि पर्व का क्रम धन, यश-ऐश्वर्य, लाभ, उत्तम स्वास्थ्य देता है।
2. कार्तिक मास हिंदू शास्त्र गणना के आधार पर वर्ष आरंभ का समय माना जाता है।
3. इसी मास में शिव पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर राक्षस का वध किया था, इसलिए इसका नाम कार्तिक पड़ा, जो विजय देने वाला है।


जानिए किस दिन कौन सा पर्व...

27 अक्टूबर- करवा चौथ
31 अक्टूबर- अहोई अष्टमी
3 नवंबर- रमा एकादशी व्रत
4 नवंबर- गोवत्स द्वादशी
5 नवंबर- धनतेरस
6 नवंबर- रूप चौदस
7 नवंबर- दीपावली
8 नवंबर- गोवर्धन पूजा, अन्नकूट
9 नवंबर- भाई दूज
13 नवंबर- सूर्य षष्ठी
15 नवंबर- गोपाष्टमी
17 नवंबर- आंवला नवमी
19 नवंबर- देवउठनी ग्यारस
22 नवंबर- वैकुंठ चतुर्दशी
23 नवंबर- कार्तिक पूर्णिमा

नई दिल्ली। हिंदू धर्म की खूबसूरती और महत्व ही इसके व्रत-त्योहार हैं। ऐसा कोई माह नहीं है जिसमें कोई व्रत-त्योहार ना आता हो। लेकिन इनमें सबसे अधिक व्रत त्योहारों वाला महीना है कार्तिक माह। इसलिए इस माह का सर्वाधिक महत्व है। इस माह की शुरुआत शरद पूर्णिमा के स्नान से शुरू हो जाती है और कार्तिक पूर्णिमा यानी देव दीवाली तक जारी रहता है। इस वर्ष कार्तिक माह 1 नवंबर से प्रारंभ होकर 30 नवंबर तक जारी रहेगा।

आइए जानते हैं कार्तिक माह के प्रमुख व्रत-त्योहार कब आ रहे हैं...

कार्तिक स्नान प्रारंभ : 31 अक्टूबर से

भगवान विष्णु की कृपा से जीवन के समस्त सुख, भोग की प्राप्ति और मृत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्ति की कामना से कार्तिक माह में प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व जागकर तारों की छाया में स्नान किया जाता है। दिनभर व्रत रखकर रात्रि में तारों की छाया में भोजन किया जाता है।

करवाचौथ : 4 नवंबर

शरद पूर्णिमा के बाद कार्तिक माह का पहला व्रत है करवाचौथ। यह व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन होता है। पति की दीर्घ आयु और स्वस्थ जीवन की कामना के साथ यह व्रत विवाहित महिलाएं करती हैं। इस दिन निराहार, निर्जला रहते हुए स्ति्रयां व्रत करती हैं। भगवान गणेश की पूजा करती हैं और रात्रि में चंद्रदर्शन के बाद पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोलती हैं।

अहोई अष्टमी, रवि पुष्य : 8 नवंबर

यह व्रत कार्तिक मास की अष्टमी तिथि के दिन किया जाता है। यह व्रत महिलाएं अपनी संतान के दीर्घ और स्वस्थ जीवन के लिए करती हैं। इस व्रत को संतान आठे के नाम से भी जाना जाता है। नि:संतान स्ति्रयां भी संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं। इस व्रत में गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाकर उनकी पूजा की जाती है। यह व्रत उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इस दिन रविवार और पुष्य नक्षत्र के संयोग से रवि-पुष्य का शुभ संयोग भी बना है, जो समस्त प्रकार की खरीददारी के लिए शुभ है।

रमा एकादशी : 11 नवंबर

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी का व्रत समस्त प्रकार के सुख, भोग, भौतिक सुख-सुविधाएं देने वाला कहा गया है। व्रत के प्रभाव से जीवन के संकटों, परेशानियों का नाश होता है। इसमें पूर्ण व्रत रखते हुए भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप का ध्यान-पूजा की जाती है।


गोवत्स द्वादशी : 12 नवंबर

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी कहा जाता है। इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर गाय-बछड़ों की पूजा की जाती है। उन्हें गेहूं से बनी चीजें खिलाई जाती है। इस दिन व्रत करने वाले गाय के दूध और इससे बनी वस्तुओं का सेवन नहीं करते। गेहूं से बने पदार्थ और कटे फल भी नहीं खाते।

धनतेरस, यम दीपदान : 13 नवंबर

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को आयुर्वेद के देवता भगवान धनवंतरि का जन्मोत्सव मनाया जाता है। दीपावली से दो दिन पहले वाले धनतेरस को धन की पूजा की जाती है। इस दिन नए बर्तन, सोना-चांदी खरीदने का विधान है। व्यापारी लोग इस दिन अपने प्रतिष्ठानों में नई गादी बिछाकर, बही-खाता की पूजा करते हैं। धनतेरस के दिन से पांच दिवसीय दीपावली पर्व की शुरुआत होती है। तिथि संयुक्त होने के कारण इस रात्रि में यम दीपदान किया जाएगा।

1. धन्वंतरि को हिन्दू धर्म में देवताओं का वैद्य (चिकित्सक) माना जाता है। ये एक महान चिकित्सक थे जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये भगवान विष्णु के अवतार समझे जाते हैं। इनका पृथ्वीलोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरि, चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मीजी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था इसीलिए दीपावली के 2 दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धन्वंतरि का जन्म धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था।

2. इन्हें भगवान विष्णु का रूप कहते हैं जिनकी 4 भुजाएं हैं। ऊपर की दोनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किए हुए हैं जबकि 2 अन्य भुजाओं में से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे में वे अमृत कलश लिए हुए हैं। इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है इसीलिए धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परंपरा भी है।
 
3. इन्हें आयुर्वेद की चिकित्सा करने वाले वैद्य आरोग्य का देवता कहते हैं। इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने शल्य चिकित्सा का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत बनाए गए थे। उन्होंने ही 'सुश्रुत संहिता' लिखी थी। 'सुश्रुत' विश्व के पहले सर्जन थे। दीपावली के अवसर पर कार्तिक त्रयोदशी-धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की पूजा करने का विधान है।

रूप चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी : 14 नवंबर

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी, नरक चतुर्दशी, नरक चौदस कहा जाता है। मान्यता है किइस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षण का वध उसके आतंक से संसार को मुक्ति दिलाई थी। यह रूप निखारने का दिन भी माना जाता है। इस दिन घरों में लोग उबटन लगाकर स्नान करते हैं और अपने रूप को चमकाते हैं।

दीपावली : 14 नवंबर

कार्तिक अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है। यह हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार है। पांच दिनी पर्व का यह मुख्य दिन होता है। दीपावली की तैयारियां कई दिन पहले से प्रारंभ हो जाती है। घरों में साफ-सफाई, रंग-रोगन किया जाता है और घरों को खूबसूरत लाइटिंग से सजाया जाता है। इस दिन रात्रि में मां लक्ष्मी पूजा, गणेश और सरस्वती माता की जाती है और उनसे वर्ष अन्न, धन के भंडार भरने की कामना की जाती है। लंकापति रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम इस दिन अयोध्या लौटे थे। इस खुशी में अयोध्या को दीपमालाओं से सजाया गया था। इस दिन पटाखे चलाकर खुशियां मनाई जाती है। मिठाइयों से एक-दूसरे का मुंह मीठा कराया जाता है।

गोवर्धन पूजा, अन्नकूट महोत्सव : 15 नवंबर

कार्तिक माह के शुक्लपक्ष का पहला दिन गोवर्धन पूजा के नाम रहता है। इसकी परंपरा भगवान श्रीकृष्ण ने प्रारंभ करवाई थी। इस दिन दिन गायों को धन मानते हुए उनके सजाया-संवारा जाता है और उनकी पूजा की जाती है। ग्रामीण घरों में इस दिन प्रकीतात्मक रूप में गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसकी पूजा की जाती है और उसकी परिक्रमा की जाती है। इस दिन अन्नकूट महोत्सव भी मनाया जाता है।

भाई दूज, यम द्वितीया, चंद्र दर्शन : 16 नवंबर

कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन भाई दूज या यम द्वित्तीया मनाया जाता है। पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व का समापन इसी दिन होता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को भोजन करवाकर उन्हें तिलक करती हैं और उनकी लंबी आयु की कामना करती है। भाई बहनों को उपहार देते हैं।

छठ पूजा प्रारंभ : 18 नवंबर

भगवान सूर्य की आराधना का पर्व छठ पूजा मुख्यत: बिहार, झारखंड, पूर्वाचल में मनाया जाता है। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के दिन से प्रारंभ होने वाला यह पर्व 18 नवंबर से प्रारंभ होगा। इसमें नहाय खाय, खरना, सांध्य अ‌र्घ्य किया जाता है। 20 नवंबर को छठ पूजा होगी। प्रात: अ‌र्घ्य के साथ व्रत का पारणा होगा।

आंवला नवमी, अक्षय नवमी : 23 नवंबर

कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन आंवला नवमी या अक्षय नवमी मनाई जाती है। इस दिन आंवले के वृक्ष का पूजन करके इसके नीचे बैठकर भोजन करने का महत्व है। कहा जाता है इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन को छोड़ मथुरा गए थे। यह व्रत परिवार के सुख-सौभाग्य के लिए किया जाता है।

देवोत्थान एकादशी, देव उठनी एकादशी : 25 नवंबर

कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थान एकादशी होती है। यह वर्ष की सबसे बड़ी एकादशी है क्योंकिइसी दिन भगवान विष्णु चार माह के शयनकाल से जागते हैं। चातुर्मास का समापन इसी एकादशी के दिन होता है। इस दिन से विवाह प्रारंभ हो जाते हैं और वर्ष का स्वयंसिद्ध मुहूर्त होता है। हिंदू परिवार इस दिन छोटी दीवाली मनाते हैं। सायंकाल में तुलसी विवाह किया जाता है।

बैकुंठ चतुर्दशी, हरिहर मिलन : 28 नवंबर

बैकुंठ चतुर्दशी के दिन हरि और हर अर्थात् विष्णु और शिव का मिलन होता है। चातुर्मास के चार माह भगवान विष्णु के शयनकाल में रहने के कारण पृथ्वी का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। देवोत्थान एकादशी पर भगवान विष्णु निद्रा से जागते हैं। उसके बाद बैकुंठ चतुर्दशी के दिन भगवान शिव पुन: यह कार्यभार भगवान विष्णु को सौंपते हैं। यह एकमात्र ऐसा दिन होता है जब शिव को तुलसी और विष्णु को बिल्व पत्र अर्पित किया जाता है।

देव दीवाली, कार्तिक पूर्णिमा : 30 नवंबर

कार्तिक पूर्णिमा के साथ कार्तिक माह का समापन हो जाता है। इस दिन देव दीवाली मनाई जाती है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था। इसी दिन गुरुनानक देव जी का प्रकाशोत्सव मनाया जाता है। इस दिन घरों को दीपों से सजाया जाता है। पवित्र नदियों में दीपदान किया जाता है। जो लोग कार्तिक स्नान और कार्तिक व्रत रखते हैं वे इस दिन व्रत का उजमना करते हैं।


मोक्ष प्राप्ति का महीना है कार्तिक मास

ऐसा माना जाता है कि व्रत और त्योहार करने से सभी पापों का नाश हो जाता है और सदा हम पर ईश्वर का आशीर्वाद बना रहता है।

धर्म शास्त्रों और पुराणों के हिसाब से अन्य महीनों की अपेक्षा कार्तिक मास व्रत और त्योहार की दृष्टि से खास है। जो मनुष्य कार्तिक मास में व्रत व तप करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है।

शरद पूर्णिमा के दिन से वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु का प्रवेश हो जाता है। शरद पूर्णिमा के व्रत और स्नान के बाद ही शुरू हो जाता है त्योहारों और व्रतों का महीना कार्तिक। दूसरे महीनों की अपेक्षा इस महीने में सबसे ज्यादा त्योहार और व्रत होते हैं। यहां तक कि भगवान विष्णु की उपासना का क्रम भी इसी मास से शुरू होता है।

इस महीने में सबसे पहले पूर्णिमा व्रत व स्नान, पति की रक्षा के लिए करवा चौथ व्रत, अहोई व्रत, रमा एकादशी व्रत, गोवत्स द्वादशी, धनतेरस पर्व, नरक चतुर्दशी व हनुमान जयंती, धन संपत्ति की देवी मां लक्ष्मी का दीपावली पर्व, अन्नकूट महोत्सव व गोवर्धन पूजा, भाई की रक्षा के लिए भैया दूज, सूर्य की आराधना का पर्व छठ पूजा और देवोत्थान एकादशी व्रत जैसे सारे प्रमुख त्योहार और व्रत इसी महीने में आते हैं।

हिंदू कैलेंडर में कुल 12 चंद्र मास रहते हैं। कार्तिक आठवां चंद्र माह है। धर्म शास्त्रों में कार्तिक महीने को सबसे पुण्य का महीना माना गया है। स्कंद पुराण में इसे सबसे अच्छा महीना माना गया है, वहीं पद्म पुराण में कार्तिक को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष देने वाला माह माना गया है।

पौराणिक शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में दीपदान करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट होते हैं। कहा जाता है कि इस महीने में जो मनुष्‍य देवालय, नदी किनारे, तुलसी के समक्ष एवं अपने शयन कक्ष में दीप जलाते है, उसे सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।

कार्तिक माह के पूरे महीने चलने वाले स्नान का तो धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्व रहा है। जो भी व्यक्ति कार्तिक महीने में सूर्योदय से पूर्व उठकर नदी, तालाब, कुएं अथवा नलकूप के पानी में स्नान करता है और अपने इष्ट का ध्यान व उपासना करता है तो उसे अत्यंत पुण्य, सुख, समृद्धि, आयु एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है।

इसके साथ ही निरोगी काया के लिए आयुर्वेदिक दृष्टि से भी यह महीना बहुत लाभकारी माना जाता है। तभी तो इस महीने में भगवान धनवंतरी की पूजा होती है। इस महीने में प्रकृति नए रूप-रंग एवं सुगंध से युक्त होता है।

यह वह समय होता है, जब ठंड धीरे-धीरे बढ़ रही होती है और शीत ऋतु में प्रवेश कर रही होती है। सुबह खेतों में घास व फसलों पर ओस की बूंदों के रूप में प्रकृति के अनुपम मोती अपनी छटा बिखेरते हैं। सुबह-सुबह इन मोतियों को निहारने व इन पर नंगे पांव चलने से ने केवल नेत्र-ज्योति तेज होती है, बल्कि शारीरिक और मानसिक शक्ति भी बढ़ती है।

इन नियमों का करें पालन:

1.तुलसी के पौधे की पूजा करना और उनकी सेवा करना इस महीने में बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दौरान मां तुलसी की पूजा करने का महत्व दोगुना हो जाता है.

2. इसके साथ ही इस दौरान अगर आप सनीचे सोते हैं तो मन में पवित्र विचार आते हैं. दरअसल भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम माना गया है.

3.कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी है. इसका पालन नहीं करने पर पति-पत्नी को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं.

4. कार्तिक के पवित्र महीने में दीपदान जरूर करना चाहिए. कहा जाता है कि इससे पुण्य की प्राप्ति होती है. इस महीने में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है.

5.कार्तिक महीने में शरीर पर तेल नहीं लगाया जाता है. इस महीने में सिर्फ एक दिन यानी नरक चतुर्दशी पर ही तेल लगाया जाता है.


कार्तिक मास में धन की प्राप्ती

ये मास श्री हरि का अत्यंत प्रिय है और मां लक्ष्मी को भी ये मास बेहद पसंद है. कहते हैं कि इस महीने ही भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं और सृष्टि में आनंद और कृपा की वर्षा होती है. इसके साथ ही मां लक्ष्मी धरती पर भ्रमण करती हैं और भक्तों को अपार धन देती हैं. इसलिए इस दौरान मां लक्ष्मी की पूजा करना बेहद शुभ माना गया है. मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए ही इस महीने धन त्रयोदशी, दीपावली और गोपाष्टमी मनाई जाती है. इस महीने विशेष पूजा और प्रयोग करके आप आने वाले समय के लिए अपार धन पा सकते हैं और कर्ज व घाटे से मुक्त हो सकते हैं.

चातुर्मास का आखिरी महीना है. इसी माह से देव तत्व मजबूत होता है. इस महीने में धन और धर्म दोनों से संबंधित प्रयोग किए जाते हैं. इसी महीने में तुलसी का रोपण और विवाह सर्वोत्तम होता है. इस महीने में दीपदान और दान करने से अक्षय शुभ फल की प्राप्ति होती है. इस दौरान आपको कई सारी चीजें करनी होती हैं जिससे आपकी सारी मनोकामना पूरी हो सकती है. तो चलिए जानते हैं कार्तिक मास में आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

शरद पूर्णिमा के बाद से कार्तिक का महीना लग जाएगा। इस मास में श्री हरि  जल में ही निवास करते हैं।  जल के तीन कर्मकांडों में स्नान महत्वपूर्ण कर्मकांड है। पुलस्त्य ऋषि ने कहा भी है कि स्नान के बिना न तो शरीर निर्मल होता है और न ही बुद्धि। धर्मशास्त्रों में माघ, वैशाख और कार्तिक में नित्य स्नान का जो विधान दिया गया है, उसके पीछे का उद्देश्य शरीर की शुद्धता ही है। पवित्र नदी, समुद्र, सरोवर, कुआं और बावड़ी जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों में किया गया स्नान तो अति पावन माना गया है।

महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने स्पष्ट रूप से प्रथम पूज्य गणेश से लिखवाया है कि कृष्ण, स्नान-ध्यान-दान आदि कर उसी समय निकलते थे, जब सूर्योदय की पहली किरण धरती पर पड़ती थी। मदनपारिजात के अनुसार कार्तिक मास में जिते्द्रिरय रहकर नित्य स्नान करें। चांद-तारों की मौजूदगी में सूर्योदय से पूर्व ही पुण्य प्राप्ति के लिए स्नान करना चाहिए। जौ, गेहूं, मंूग, दूध-दही और घी आदि का भोजन करें, इससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।  स्नान के लिए तीर्थराज प्रयाग, अयोध्या, कुरुक्षेत्र और काशी को श्रेष्ठ माना गया है। इनके साथ ही सभी पवित्र नदियों और तीर्थस्थलों पर भी स्नान शुभ रहता है। अगर आप इन स्थानों पर नहीं जा सकते, तो इनका स्मरण करने से भी लाभ होता है।

इसके लिए एक श्लोक भी प्रचलित है- गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु।। 
स्नान करते समय- आपस्त्वमसि देवेश ज्योतिषां पतिरेव च। पापं नाशाय मे देव वामन: कर्मभि: कृतम। बोल कर जल की ओर दु:खदरिद्रयनाषाय श्रीविश्णोस्तोशणाय च। प्रात:स्नान करोम्यद्य माघे पापविनाषनम।।  कहकर परमपिता परमेश्वर की स्तुति करनी चाहिए। स्नान जब समाप्त हो जाए तो- सवित्रे प्रसवित्रे च परं धाम जले मम। त्वत्ेतजसा परिभ्रश्टं पापं यातु सहस्त्रधा।। से सूर्य की अर्ध्य देकर श्री हरि का पूजन करना बहुत अच्छा रहता है। नदी में स्नान नहीं कर सकते, तो रातभर छत पर रखे तांबे या मिट्टी के बरतन में भरे जल से स्नान करना भी शुभ रहता है। हां, इस माह लहसुन, प्याज और मांसाहर का सेवन न करें। ब्रह्मचर्य का नियम मानते हुए भूमि शयन करना चाहिए।

विशेष:  शनि की साढ़ेसाती जिन राशियों-धनु, मकर और कुंभ पर तथा शनि की ढैय्या-मिथुन, तुला है, और इनमें भी जिनका शनि अपनी नीच राशि मेष में है, उन्हें तो अवश्य ही ब्रह्ममुहूर्त यानी अमृतवेला में स्नान कर श्री हरि का जाप करना चाहिए।


कार्तिक महीने का हिन्दू धर्म में खास महत्व है। यह मास शरद पूर्णिमा से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा पर खत्म होता है। इस महीने में दान, पूजा-पाठ तथा स्नान का बहुत महत्व होता है तथा इसे कार्तिक स्नान की संज्ञा दी जाती है। यह स्नान सूर्योदय से पूर्व किया जाता है। स्नान कर पूजा-पाठ को खास अहमियत दी जाती है। साथ ही देश की पवित्र नदियों में स्नान का खास महत्व होता है। इस दौरान घर की महिलाएं नदियों में ब्रह्ममूहुर्त में स्नान करती हैं। यह स्नान विवाहित तथा कुंवारी दोनों के लिए फलदायी होता है। इस महीने में दान करना भी लाभकारी होता है। दीपदान का भी खास विधान है। यह दीपदान मंदिरों, नदियों के अलावा आकाश में भी किया जाता है। यही नहीं ब्राह्मण भोज, गाय दान, तुलसी दान, आंवला दान तथा अन्न दान का भी महत्व होता है।शरद पूर्णिमा

 

हिन्दू धर्म में इस महीने में कुछ परहेज बताए गए हैं। कार्तिक स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को इसका पालन करना चाहिए। इस मास में धूम्रपान निषेध होता है। यही नहीं लहुसन, प्याज और मांसाहर का सेवन भी वर्जित होता है। इस महीने में भक्त को बिस्तर पर नहीं सोना चाहिए उसे भूमि शयन करना चाहिए। इस दौरान सूर्य उपासना विशेष फलदायी होती है। साथ ही दाल खाना तथा दोपहर में सोना भी अच्छा नहीं माना जाता है।

 

कार्तिक महीने में तुलसी की पूजा का खास महत्व है। ऐसा माना जाता है कि तुलसी जी भगवान विष्णु की प्रिया हैं। तुलसी की पूजा कर भक्त भगवान विष्णु को भी प्रसन्न कर सकते हैं। इसलिए श्रद्धालु गण विशेष रूप से तुलसी की आराधना करते हैं। इस महीने में स्नान के बाद तुलसी तथा सूर्य को जल अर्पित किया जाता है तथा पूजा-अर्चना की जाती है। यही नहीं तुलसी के पत्तों को खाया भी जाता है जिससे शरीर निरोगी रहता है। साथ ही तुलसी के पत्तों को चरणामृत बनाते समय भी डाला जाता है। यही नहीं तुलसी के पौधे का कार्तिक महीने में दान भी दिया जाता है। तुलसी के पौधे के पास सुबह-शाम दीया भी जलाया जाता है। अगर यह पौधा घर के बाहर होता है तो किसी भी प्रकार का रोग तथा व्याधि घर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। तुलसी अर्चना से न केवल घर के रोग, दुख दूर होते हैं बल्कि अर्थ, धर्म, काम तथा मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

 



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